Monday, May 24, 2010

यादें कोई कैसे फेंके भला...

12 comments:

  1. wah!!!! nice presentation... jitni khoobsoorat poem hai utni hi khoobsoorat presentation bhi... aapkee is poem ke sath hum bhi apni yaadon me ek gota laga ke aaye ...

    Happy Blogging

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  2. waah bahut sundarta se yaadon ko sajaaya aur prastuti ka tareeka bhi lajawaab...

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  3. बहुत भावात्मक ....यादों को कैसे फेंका जा सकता है

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  4. कोई ये बात हमारी श्रीमती जी को भी समझा दे......उसके मायके की चीज तो मूल्यवान धातु चाहे वो कुछ भी,और हमारे घर की यादें भी कबाड़,चाहे वो कुछ भी......

    आपकी कविता शानदार रही जी.....

    कुंवर जी,

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  5. kaash! koi time machine hoti to jee lete ek baar....Nostalgic feel de gai ye creation...vastav mein lajawaab aur opper se aapka presentation.... Great going...Keep it up

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  6. wowwww... awesome.. ज़िन्दगी का जैसे एक कोलाज सा बना दिया है तुमने... यादो को कितने करीने से लगाया है तुमने... बेहतरीन.. बचपन की तस्वीरे तो बहुत प्यारी है.. मेरी पसन्द जिसमे तुम और तुम्हारा भाई एक दूसरे को शरारती मुस्कान से देख रहे हो :) अलमारिया ऎसी ही चीज़ होती है हर बार जैसे कुछ न कुछ मिलता है वहा से.. बहुत ही सुन्दर..

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  7. अरे वाह कितनी खूबसूरती के साथ लिखा है आपने...मजा आ गया...आजकल हम भी थोड़े पुरानी यादों के साथ रह रहे हैं...ऐसे में आपकी ये कविता...मजा ही आ गया :)

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  8. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति ।

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दिल की गिरह खोल दो... चुप ना बैठो...

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