Friday, April 10, 2009

लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पायी


ye lines maine bahot pehle kisi magazine ya shayad kisi newspaper me padhi thi aur achhi lagi to diary me note kar li, pata nahi kisne likhi hain, sheershak kya hai, bas achhi lagti hain...

इस राज़ को क्या जाने साहिल के तमाशाई
हम डूब के समझे हैं दरिया तेरी गहराई

जाग ए मेरे हमसाया ख़्वाबों के तसलसुल से
दीवारों से आँगन में अब धूप उतर आई

चलते हुए बादल के साये के त-अक्कुब में
ये तशनालबी मुझको सहराओं में ले आई

ये जब्र भी देखे हैं तारीख की नज़रों ने
लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सज़ा पायी

क्या सानेहा याद आया मेरी तबाही का
क्यूँ आपकी नाज़ुक सी आँखों में नमी आई

तसलसुल - continuous, त-अक्कुब - to chase,
तशनालबी - thirst, जब्र - zulm, सानेहा - incident.

5 comments:

  1. वाह मजा आ गया आपकी ये पोस्ट पढ़कर

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  2. मुजफ्फर रजमी की है।
    कौछ लाइनें गलत हैं आपकी

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  3. ये पंक्तियां जनाब मुज़फ्फर रज़मी की है, उन्वान है -"लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई"
    पूरी नज़्म इस लिंक से देखी जा सकती है।
    https://m.facebook.com/permalink.php?id=220467668076235&story_fbid=344164429039891

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  4. ये पंक्तियां जनाब मुज़फ्फर रज़मी की है, उन्वान है -"लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई"
    पूरी नज़्म इस लिंक से देखी जा सकती है।
    https://m.facebook.com/permalink.php?id=220467668076235&story_fbid=344164429039891

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  5. Zanaab Mujaffar Razmi kee ye Kaaljayee Nazm hai....Sanyog se ve bhee Kairana ke hee rahne waale thay jahaan aajkal UP kee satta paane kee ek nayee patkatha likhi jaa rahi hai....

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दिल की गिरह खोल दो... चुप ना बैठो...

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