Sunday, June 24, 2012

चलो ना भटकें लफ़ंगे कूचों में, लुच्ची गलियों के चौक देखें...


23 जून 2012. बहुत बेचैन शाम थी आज... मन किसी पिंजरे में क़ैद पंछी के जैसे छटपटा रहा था... बस पिंजरा तोड़ के उड़ जाना चाहता था... खुली फिज़ा में साँस लेने को बेचैन... शाम के क़रीब पौने सात बज रहे थे... सूरज ढल चुका था... रात अभी हुई नहीं थी... "ना अभी रात ना दिन, ना अँधेरा ना उजाला" वाली स्थिति थी... किसी काम में मन नहीं लग रहा था... कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करें कि इस बेचैनी से राहत मिले... तो एक्टिवा निकाली और बस चल दिये... मम्मी ने पूछा कहाँ जा रही हो... अब पता हो तब तो बतायें... बोला, मन नहीं लग रहा... ऐसे ही जा रहे हैं लखनऊ की सड़कें नापने... ख़ैर निकल तो गये घर से पर अभी तक वाकई नहीं पता था कि कहाँ जा रहे हैं...

फ़्यूल मीटर देखा... गाड़ी रिज़र्व में थी... आलस में पिछले कितने दिनों से पेट्रोल नहीं डलवाया था... कहीं दूर जाना भी नहीं हुआ तो जैसे तैसे काम चल रहा था... पर आज जब पता ही नहीं कहा जाना है तो रिस्क नहीं ले सकते ना... तो सबसे पहले पेट्रोल पम्प... पेट्रोल डलवाया... हवा चेक करवाई... जा कहाँ रहे हैं अभी तक नहीं पता... ख़ैर... आगे बढ़े... अब तक कुछ अँधेरा भी होने लगा था... गोमती नदी का पुल पार किया तो सामने पीली सी रौशनी में झांकता सादत अली खां के मकबरे का गुम्बद दिखा... दूर से बड़ा अट्रैक्टिव सा दिखा तो चल पड़े उधर... यूँ तो वो शहर के बीचों बीच है और जाने कितनी ही बार उसके सामने से गुज़रते हैं पर ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार उधर नज़र डालने का मौका भी नहीं देती... हाँ बचपन में बहुत बार गये हैं वहाँ पर वो बस अब धुंधली सी यादें हैं... पास जा के देखा तो वहाँ रीस्टोरेशन का काम चल रहा था... देख के अच्छा लगा कि पुरातत्व विभाग और सरकार ने कुछ तो सुध ली ऐसी ख़ूबसूरत इमारतों को बचाने की...

फिर जाने क्या आया मन में और गाड़ी पुराने लखनऊ की ओर मोड़ दी... और बस चल पड़े पुराने लखनऊ की सड़कें नापने :) ... शाम से ही हवा बड़ी अच्छी चल रही थी... हवा की ठंडक और नमी बता रही थी कि कुछ लोगों में सुकून बाँट के और उनकी दुआएं ले के आयी है... आस पास ही कहीं कुछ अब्र बरसे हैं शायद ! सड़कों पर भी आज बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं थी... आज लखनऊ में नगर पंचायत और नगर निगम के चुनाव थे तो सुबह से ही सब बन्द था... शाम के समय कुछ एक ही दुकाने खुली थी और लोग भी कम ही थे सड़कों पर... शाम का वक़्त, सूनी सड़कें, ठंडी हवा... कुल मिला के सुकून ! हम भी धीरे धीरे, ३० की स्पीड पे चल रहे थे मौसम का आनंद लेते हुए... कहीं जाना ही नहीं था तो कोई जल्दी भी नहीं थी...

बड़े इमामबाड़े का प्रवेश द्वार
थोड़ा आगे जाने पर बड़ा इमामबाड़ा दिखा, इसे आसिफ़ी इमामबाड़ा भी कहते हैं... अँधेरा हो चुका था तो अन्दर जाने का कोई फ़ायदा नहीं था... बाहर से ही थोड़ी बहुत फ़ोटोज़ क्लिक करीं... क्या बुलंद इमारत है... इसके बनने के पीछे कि कहानी भी बड़ी दिलचस्प है... सन १७८३ में इस इलाके में भीषण आकाल पड़ा था... अवध के लोग भले भूखे मर जाएँ पर माँग के खाना उस वक़्त भी उन की शान के खिलाफ़ था... तब नवाब आसिफ़-उद-दौला ने लोगों को रोज़गार देने के लिये इस इमामबाड़े का निर्माण करवाया... आम प्रजा दिन में निर्माण का काम करती और उच्च वर्ग के लोगों से (क्यूँकि वो और कोई काम करने में सक्षम नहीं थे) रात के वक़्त दिन में हुए निर्माण को तुड़वा दिया जाता जिससे की लोगों को ज़्यादा दिन तक काम मिलता रहे... वो अकाल तकरीबन एक दशक से भी अधिक समय तक चला... और तब तक इस ईमारत का निर्माण भी चलता रहा और लोगों को काम मिलता रहा... शायद इसीलिए कहा गया होगा "जिसको ना दे मौला उसको दे आसिफ़-उद-दौला"... वैसे और भी बहुत कुछ है इस इमामबाड़े के बारे में बताने को पर वो फिर कभी...

रूमी दरवाज़ा
बड़े इमामबाड़े के बाहर ही सड़क पर बना है रूमी दरवाज़ा जिसे लखनऊ का प्रवेश द्वार भी कहते हैं और जो सारी दुनिया में लखनऊ की पहचान है... इसका निर्माण भी उसी आकाल के दौर में हुआ था... अपने आप में कारीगरी का एक बेमिसाल नमूना... पर रख रखाव के आभाव में अभी इसकी दशा भी कुछ ठीक नहीं है... आज भी रोज़ाना सैकड़ों गाड़ियाँ इसके नीचे से गुज़रती हैं... उम्मीद है पुरातत्व विभाग जल्द ही इसकी ओर भी ध्यान देगा...

इसी सड़क पर थोड़ा और आगे जाने पर हुसैनाबाद घंटा घर, सतखंडा, छोटा इमामबाड़ा और हुसैनाबाद बाज़ार पड़ते हैं... वहाँ तक पहुँच के देखा तो घड़ी क़रीब पौने आठ बजा रही थी... आगे कुछ ख़ास था भी नहीं देखने को और रात भी हो चुकी थी सो वापस मुड़े... वापस आते हुए क्वालिटी वाल्स का ठेला दिख गया... गाड़ी रोक के एक चॉकबार खायी और नौ बजे तक वापस घर... निकले थे बेमक़सद और देखिये ना दो ही घंटो में कितना सारा सुकून ले कर वापस आये.. वो भी यूँ ही.. बेवजह !

P.S. :- घर आ के पापा को फोटो दिखायीं तो नेक्स्ट ट्रिप उनके साथ प्लान हो गई... अगले जिस भी दिन मौसम अच्छा हुआ :) हाँ, इस बार इन सारी इमारतों को अन्दर से घुमाउंगी... पक्का प्रॉमिस !




हुसैनाबाद बाज़ार
चलो ना भटकें
लफ़ंगे कूचों में
लुच्ची गलियों के
चौक देखें
सुना है वो लोग
चूस कर जिन को वक़्त ने
रास्तें में फेंका था
सब यहीं आ के बस गये हैं
ये छिलके हैं ज़िन्दगी के
इन का अर्क निकालो
कि ज़हर इन का
तुम्हारे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और जितने
वो मार देगा
चलो ना भटकें
लफ़ंगे कूचों में


-- गुलज़ार

10 comments:

  1. भटकने में जीवन के रास्ते छिपे हैं।

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  2. स्वागत है लखनऊ घुमक्कड़ डायरी का

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  3. बहुत बढ़िया .... बाहर के नज़ारे कर लिए अब अगली किश्त ?????

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    1. उम्मीद है भीतर के नजारों के साथ जल्द ही अगली किश्त आएगी संगीता जी... बरखा रानी का इन्तेज़ार है बस :)

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  4. बे-वजह घूमने का अपना लुत्फ़ है ..पर एक शिकायत वहां तक गई थी तो चौक की कुल्फी या लस्सी का लुत्फ़ लेना था .....चाकोबार naaaa
    हाँ उस इलाके में तुम स्कूटी पर अकेले घूमती रही वो भी सुकून से .... हमारा अनुभव कुछ और रहा है कभी फुर्सत से बाटेंगे तुमसे किस्से अवध के

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    1. सही कहा सोनल उस इलाके में जाओ और चौक की कुल्फी या लस्सी का लुत्फ़ न लो तो मज़ा अधूरा ही रहता है... पर उस दिन किसी भीड़ भरी जगह में जाने का दिल नहीं था और वो भी चौक... कर्फ्यू वाले दिन भी पहुँच जाओ तो सौ पचास लोग तो ऐसे ही मिल जायेंगे टहलते :)

      तुम्हारे अवध के किस्सों का इन्तेज़ार रहेगा :)

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  5. राम राम जी,
    बिना पते ही निकल जाना घूमने... और जब लौटे तो साथ हो तृप्ति,सुकून,शान्ति से भरा झोला....
    अच्छा तो लगेगा ही!भटको जी... साथ हमें भी भटकाओ...
    कुँवर जी,

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  6. आपके यूँ घूमने का फायदा हमें भी हो ही गया ... बेहतरीन

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  7. यायावरी आपके अंदर ​बसी है बस फूट पडने का इंतजार रहता है

    गुलजार की ​कविता के साथ् मिलकर ये यात्रा और सुंदर हो गयी है

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दिल की गिरह खोल दो... चुप ना बैठो...

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