Showing posts with label Happy B'day Gulzar. Show all posts
Showing posts with label Happy B'day Gulzar. Show all posts

Thursday, August 18, 2016

चाय में चीनी सी ज़िन्दगी में घुली तुम्हारी नज्में...!



सुनो... एक कप चाय पियोगे हमारे साथ.. दो पल साथ बैठो ना... कि बड़े अर्से बाद आज थोड़ी फ़ुर्सत हाथ लगी है वो भी रात के इस पहर... और आज तुम्हारा जन्मदिन भी है तो तुमसे यूँ ही थोड़ी बातें करने का दिल चाह रहा है.. पिछले साल तो तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ लिख भी नहीं पायी तुम्हारे लिये... हाँ याद सारे दिन किया... सुनने में कितना अजीब सा लगता है ना.. कि लेखक ठहरे तुम और हम जैसे कोई बड़े फन्ने खां हैं जो तुम्हारे बारे में लिखेंगे... फिर भी जाने क्यूँ लोग तुम्हें ढूँढते हुए हमारे दरवाज़े आ जाते हैं... सही कहते हैं लोग इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते... तुमसे हमारा इश्क भी मशहूर हो चला है...

मोटर गैराज में रंगों के शेड्स मिलाते मिलाते जाने कब तुम ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से यूँ खेलने लगे... उनकी बारीकियों को ऐसे जान लिया... तुमने लिखना तो बहुत देर से शुरू किया पर शायद ज़िन्दगी के तजुर्बों को बचपन से ही आत्मसात करते गए थे... वो सब तजुर्बे जो तुमने अपने दिल में संजो रखे थे वो सब तुम्हारी नज़्मों में घुले हुए नज़र आते... तुम्हारी नज़्मों से गुज़रो तो समझ आता है कि वो ज़िन्दगी के इतने करीब कैसे हैं... बिना उन लम्हों को जिये कोई यूँ ही नहीं लिख सकता इस साफ़गोई से और दिल को यूँ छू लेने वाला और कभी कभी झकझोर देने वाला... सोचने पे मजबूर कर देने वाला... कुछ मायनों में तुम्हारी नज़्में हम सब का एक्सटेंशन हैं... हमारे लम्हों और हमारी ज़िन्दगी का एक्सटेंशन...

तुम्हारी नज़्में ज़िंदगी के हर लम्हें में घुल गयी हैं... कोई ना कोई नज़्म हर मोड़ पर हाथ थामे मिल ही जाती है... ख़ुशियों में... उदासियों में... प्यार में... तकरार में... सुनहरी सुबहों में... संदली शामों में... बारिशों के पानी में बच्चों सी छप-छप करती कोई, निम्मी निम्मी ठण्ड में आंगन में धूप सेकती कोई... चाँदनी रातों में बादलों का पश्मीना ओढ़े कोई... और तुम्हारी इन नज्मों से सिर्फ़ हम ही मुतास्सिर नहीं हैं.. यकीन नहीं तो ख़ुद देख लो.. जितने अच्छे से तुमने ये समझाया है कि नज़्म क्या होती है उतनी ही ख़ूबसूरती से ये विडियो बनाया गया है... जिसे चार मराठी डायरेक्टर्स ने अपनी फिल्म बाईस्कोप की ओपनिंग में इस्तेमाल किया था, ये फिल्म भी चार शायरों की नज्मों पर बनायी चार शॉर्ट फिल्मों के फॉर्मेट में एक अनूठा प्रयोग थी... तुमसे मुत्तासिर लोग भी तुम जैसे ही हो जाते हैं... अनकन्वेंशनल और सेंसिटिव !!!



आज का दिन तुम्हें और तुम्हारे चाहने वालों को बहुत बहुत मुबारक़ हो.. हैप्पी बर्थडे गुलज़ार साब... आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे चाहने वालों के लिए तुम्हारी पचास कहानियाँ छोड़े जाती हूँ...


Monday, August 18, 2014

चेसिस की तारीख अट्ठारह अगस्त उन्नीस सौ चौंतीस है !!!



आज ये चेसिस अस्सी बरस की हो गयी है... रूह अब भी ताज़ा है... दिल बच्चे सा मासूम... और लफ्ज़ जवां...!

कितना कुछ लिख चुकी हूँ तुम पर... कितनी ही बार... तुम्हारे बारे में बात करते हुए जाने कितने अनजान लोग दोस्त बने... वजह सिर्फ़ एक... तुम्हारे लिये बेपनाह प्यार और इज्ज़त... तुम्हारे बारे में बातें करना.. दोस्तों से तुम्हारी पोएट्री डिसकस करना... हमारा फेवरेट शगल बन गया है...

तुम्हें पढ़ना... तुम्हारे बारे में पढ़ना... तुम्हारे बारे में दुनिया जहान के रेडियो और टीवी इंटरव्यूज़ ढूँढ ढूँढ के सुनना देखना... ये आदत अब फितूर और जूनून की हद से आगे बढ़ कर शायद कहीं परस्तिश की देहरी तक पहुँच गयी है... जाने अनजाने तुम एक दोस्त... एक मेंटोर... बनते जा रहे हो... कितनी ही बार ज़िंदगी के फलसफों को तुम्हारी नज़्मों में तलाशा है... कितनी ही बार मेरे दर्द को तुम्हारे गीतों में पनाह मिली है... कभी किसी बड़े बुज़ुर्ग की तरह सिर सहला के तुम्हारी नज़्में रिश्तों के मायने समझा गयी हैं... कभी खलाओं में बिखरे हज़ारों करोड़ों सय्यारों को देखने का नया नज़रिया दे गयी हैं... कभी उँगली पकड़ के मेले घुमा लाती है... तुम्हारी नज़्में भी तुम्हारी तरह ही वर्सेटाइल हैं...

कभी एक मोटर गैराज में काम करते हुए तुम रंगों से खेलते थे... बिमल दा तुम्हारी उँगली पकड़ के ले आये वहाँ से तब से तुम लफ़्ज़ों से खेल रहे हो... तुम्हारे अन्दर छुपा वो आर्टिस्ट अब भी वही है.. एक्सप्रेशन का मीडियम बदल गया बस... और तुम तो वैसे भी मल्टी फैसिटेड हो... कभी एक शायर... कभी कहानीकार... कभी स्क्रीन प्ले लिखते हो कभी फ़िल्में डायरेक्ट करते हो... हर फन में माहिर... तुम्हारी आवाज़ उन चंद आवाजों में से हैं जिनसे हम बेहद मुत्तासिर हैं... जो सीधे रूह तक पहुँचती है... तुम्हारे लफ़्ज़ों की तरह... आज के दिन ज़्यादा कुछ नहीं सूझ रहा है कहने को... बस इतना ही की ये चेसिस हमेशा यूँ ही चुस्त दुरुस्त रहे... जन्मदिन मुबाराक़ को गुलज़ार साब !

जाते जाते तुम्हारे चाहने वालों के लिये तुम्हारा एक इंटरव्यू छोड़े जा रही हूँ यहाँ...



Sunday, August 18, 2013

तुम जियो हज़ारों साल... मेरे यार जुलाहे !!!


मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे !

दाँतों में ऐनक की डंडी दबाये... काली स्याही से उर्दू जुबां में जब... रेशमी हुरूफ़ों से कागज़ का आँचल रंगते हो... जानते हो किसी बूढ़े फ़रिश्ते की मानिंद लगते हो... झक सफ़ेद कुरते पायजामे और पकी हुई दाढ़ी में गोया चंद ख़राशें लिए चाँद अपनी पूरी आभा के साथ चमक रहा हो आसमान के आग़ोश में...

तुम्हारी नज़्मों की तरह तुम्हारी शख्सियत भी बड़ी रहस्यमयी सी है... तुम्हारी नज़्मों में कई परते होती हैं... बहुत से मानी... पढ़ने वाला कितना समझ पाता है ये उसकी समझ और संवेदनशीलता पर निर्भर करता है... जितनी बार पढ़ो उतनी बार नये आयाम खुल कर सामने आते हैं और लगता है हाँ एक नज़रिया ये भी तो हो सकता है... तुम्हारी शख्सियत भी कुछ वैसी ही है... आज तक तुम्हारे जितने भी इंटरव्यूज़ पढ़े या देखे हमेशा यही महसूस हुआ कि जो तुम बताते हो उससे कहीं ज़्यादा सामने वाले को खुद समझना होता है...

तुम्हें कब से जानती हूँ मालूम नहीं पर हमेशा यही लगा की बरसों से तुम्हारे लफ़्ज़ों को जीती आयी हूँ... मोगली से ले कर मेरा कुछ सामान तक... हर मूड.. उम्र के हर दौर में तुम साथ थे... उदास होती हूँ तो लगता वो सारी उदासी तुमने लफ़्ज़ों में पिरो के गीत की शक्ल दे दी है... खुश होती हूँ तो उसकी लहक भी तुम्हारे बोलों में नज़र आती है... प्यार में होती हूँ तो तुम्हारे सारे गीत बेहद अपने से लगते हैं... जैसे मैंने ही अपनी डायरी में लिखा हो इन्हें...

बचपन में कभी संडे को मोगली और पोटली बाबा की ले कर आ जाते तुम तो कभी प्यार में पड़ने पर माया मुझ में जीने लगती... हाल ही में तकरीबन तुम्हारी सारी ही फ़िल्में फिर से देखीं... उन सब में शायद इजाज़त हमारे दिल के सबसे करीब है... पूरी फ़िल्म एक बड़ी नज़्म सी लगती है... या फिर किसी खूबसूरत पेन्टिंग सरीखी... इन्सानी जज़्बातों और रिश्तों की पेचीदगी को कितनी खूबसूरती से दिखाया है तुमने...

पंचम के साथ जो सफ़र शुरू किया था तुमने वो विशाल तक जारी है... तकनीक भले बादल गयी पर रूह अभी तक ताज़तन है... आज अपने इंटरव्यूज़ तुम "Skype" पर भी देते हो... और इससे तुम्हें मिलवाने वाला और कोई नहीं ऐ. आर. रहमान हैं... जिन्होंने खुद "Skype" को तुम्हारे लैपटॉप में इंस्टाल किया और इसे चलाना सिखाया तुम्हें... वही रहमान जिन्हें तुम बाल भगवान कहते हो... उम्र के इस दौर में भी तुम्हारा दिल बच्चा है अभी तो इसका कुछ श्रेय तो विशाल, रहमान जैसे लोगों को भी जाता है... और कुछ टेनिस खेलने के तुम्हारे शौक़ को... बाकि बची कसर "समय" ने पूरी कर दी... जिसके पीछे तुम सारा दिन दौड़ते फिरते हो... पहले बोस्की के लिये किताबें लिखा करते थे और अब समय के लिये...

तुम्हारी नज्में हों या फ़िल्में... नोस्टैल्जिया से तुम्हारा लगाव साफ़ नज़र आता है... लोग शहरों में बस्ते हैं और तुमने अपने अन्दर जाने कितने शहर बसा रखे हैं... दीना हो या दिल्ली जहाँ भी रहे वहाँ का एक हिस्सा हमेशा के लिये तुम्हारे अन्दर ही बस गया... उसके गली, मोहल्ले, पेड़, सड़कें, लैम्पपोस्ट तक तुम्हारी नज़्मों में आज भी साँस लेते हैं... कैसे कर पाते हो इतना प्यार सबसे... कैसे जुड़ जाते हो ऐसी बेजान चीज़ों से और उनमें भी जान फूँक देते हो... चाँद को तो तुमने जैसे कॉपीराइट करा लिया है... आधा चाँद, पूरा चाँद, फीका चाँद, गीला चाँद, रोटी सा चाँद, इतनी उपमाएं तो खुद ब्रह्मा ने भी नहीं सोची होंगी चाँद को रचते समय...

जब तुमने समपूरण सिंह कालरा की जगह खुद को "गुलज़ार" नाम दिया तो तुम्हारे बहुत से साथी शायरों ने तुमसे कहा कि ये नाम कुछ अधूरा सा लगता है बिना किसी उपनाम के... आज इतने बरसों बात ये नाम अपने आप में सम्पूर्ण है... गुलज़ार... सिर्फ़ गुलज़ार... जैसा तुम चाहते थे... जैसे अब लोग तुम्हें चाहते हैं...

तुम्हें चाहने वाले हर उम्र, हर दौर और दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं... गुल्ज़ारियत को पूरी शिद्दत से मानने वाले... तुम्हारी ऐसी ही एक फैन और सिडनी के एक रेडियो चैनल में काम करने वाली शैलजा चंद्रा से तुम्हारी बातचीत की रिकॉर्डिंग कल रात ही हाथ लगी... सुनते सुनते कब रात के तीन बज गये पता ही नहीं चला...

तुम्हारे जन्मदिन पर ख़ास तुम्हारे चाहने वालों के लिये यहाँ छोड़े जाती हूँ... जन्मदिन बहुत मुबाराक़ हो... लफ़्ज़ों का ताना-बाना बुनने वाले मेरे यार जुलाहे!


Saturday, August 18, 2012

वो जो शायर है...



कुछ तो ज़रूर है तुम्हारे शब्दों में कि हर वो शख्स जिसने एक बार भूले से भी पढ़ लिया तुम्हें, बकौल तुम्हारे, उसकी आदत बिगड़ ही जाती है... तुम्हारी नज़्में उँगली थामे ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मिल जाती हैं... कभी बचपन के भेस में... कभी यादों के देस में... कभी चाँद पे सवार... कभी बादलों के पार... तुम्हारे अनोखे मेटाफ़र्स को जीने लगते हैं हम... हँसी सौंधी लगने लगती है... नैना ठगने लगते हैं... कभी जगते जादू फूंकती हैं तुम्हारी नज़्में कभी नींदे बंजर कर देती हैं...

कोई कोई दिन तो ऐसा भी आता है कि सुबह से शाम बस तुम्हारे गाने सुनते ही बीत जाता है... क़तरा क़तरा मिलती है क़तरा क़तरा जीने दो... फिर से आइयो बदरा बिदेसी... थोड़ी सी ज़मीं थोड़ा आसमां... तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई शिक़वा तो नहीं... तुम आ गये हो नूर आ गया है... तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी... ओ माझी रे... ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले... दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन... तुम सारा दिन यूँ ही घेरे रहते हो और हम कहते हैं आज कैफ़ियत बड़ी गुल्ज़ाराना है... जलन भी होती है कभी तुमसे... कितने चाहने वाले हैं तुम्हारे... इतनी शिद्दत से परस्तिश करते हैं तुम्हें कि एक नया धर्म ही बना दिया है तुम्हारे चाहने वालों ने - गुल्ज़ारियत !

जानते हो तुम्हारे नाम का एक फोल्डर हर उस कम्प्यूटर, फ़ोन और आईपॉड में बना हुआ है जिसे हम इस्तेमाल करते हैं... और हाँ किसी से कहना नहीं पर हमारा दोस्त ना जलता है तुमसे :) हमारा ही क्या हर उस लड़की का जो तुम्हें पसंद करती है... तुम्हारी नज़्मों में हर इक रिश्ते को जिया है हमने... जब कभी चल गुड्डी चल पक्के जामुन टपकेंगे चिल्लाते हुए रौशन आरा खेत कि जानिब भागते हो तो बचपन का कोई भूला बिसरा दोस्त याद आ जाता है जिसके साथ जाने कितनी ही दोपहरें ऐसी बचकानी हरकतें करते बिताई हैं... जब कहते हो बोस्की बेटी मेरी, चिकनी-सी रेशम की डली तो लगता है जैसे खुद हमारे पापा हमें आवाज़ लगा रहे हों...

बोस्की में तुम्हारी जान बस्ती है ना... जानती हूँ... उसे दो चोटियाँ बना के स्कूल जाना होता था और वो भी एक बराबर कोई छोटी बड़ी नहीं होनी चाहिये... तो तुमने चोटी बनाना सीखा बोस्की के लिये... हर साल उसके जन्मदिन पर ख़ास उसके लिये लिखी कविताओं कि एक किताब उसे गिफ्ट किया करते थे.. बोस्की का पंचतंत्र... और तुम्हारे घर का नाम भी तो बोस्कियाना है ना...

लोगों को शायद नहीं पता कि तुम्हें टेनिस खेलना कितना पसंद है... और आज भी सुबह उठ कर तुम टेनिस ज़रूर खेलते हो... और क्या पसंद है तुम्हें ? बैगन बिलकुल भी नहीं पसंद खाने में :) है ना ? हाँ, कलफ़ किया हुआ सफ़ेद कुर्ता पायजामा बहुत पसंद है तुम्हें, जिसे तुमने अपना सिग्नेचर स्टाइल बना लिया है... कलफ़ भी इतना कड़क कि जाने कितने कुर्ते तो पहनते वक़्त ही शहीद हो गये :) तुम्हारी नज्में भी तुम्हारे कुर्ते कि तरह ही हैं कभी सीधी सपाट चिकनी तो कभी उसकी सलवटों की तरह ही पेचीदा...

जब सुनती हूँ की तुम मीना कुमारी के लिये पूरे रमजान रोज़े रखते थे सिर्फ़ इसलिए कि उनकी तबियत नासाज़ थी और वो रोज़े ना रख पाने कि वजह से बेहद उदास थीं, तो दिल से दुआ निकलती है कि ऐसा दोस्त सबको मिले... और जब कहते हो मैं अकेला हूँ धुँध में पंचम तो जी करता है तुम्हारे दोस्त को कहीं से भी ढूँढ़ के वापस ला दूँ तुम्हारे पास... तुम्हारी और पंचम की क्या कमाल की जोड़ी थी... वो संगीत के साथ एक्सपेरिमेंट करते थे और तुम शब्दों के साथ... कितने गाने तो ऐसे खेल खेल में ही बन जाते थे... तुम्हारा कोई फ्रेज़ पसंद आता उन्हें तो कहते थे इसे इलैबोरेट करो... और करते करते पूरा गाना बन जाता था... तुमने भी तो पंचम के कितने बंगाली गानों की धुनें चुरा कर उस पर अपने बोल लिख दिये...



तुमसे जब बात नहीं होती किसी दिन और तुम ख़ामोश, उदास से हो जाते हो तो जी करता है तुम्हारे गले में बाहें डाल कर गुदगुदा कर पूछूँ तुम्हें कहो यार कैसे हो ?

बरसों पहले जब उर्दू का एक हर्फ़ भी समझ नहीं आता था तो तुमने ग़ालिब को हमसे मिलवाया था अपने सीरिअल के ज़रिये... पंजाबी नहीं आती थी तो तुमने अमृता से मिलवाया उनकी नज़्में पढ़ के... ये तुम्हारी आवाज़ का ही जादू था कि पंजाबी सीखने समझने कि इच्छा हुई... और अब टैगोरे से मिलवाने जा रहे हो उनकी लिखी बंगाली कविताओं का तर्जुमा कर के... इतना कुछ करते रहते हो हम सब के लिये कि जी करता है तुम्हारी पीठ थपथपा दूँ...

तुम शब्दों के जादूगर तो हो ही... पर तुम्हारी फिल्मों में ख़ामोशियाँ भी बोलती हैं ये "कोशिश" के ज़रिये तुमने साबित कर दिया... जहाँ मौन ना सिर्फ़ बोला, उसने लोगों के दिलों को छुआ भी और उन्हें रुलाया भी... कैसे कर पाते हो ऐसा... कैसे इतनी आसानी से समझ पाते हो इतने पेचीदा इन्सानी रिश्तों को...

कितने ग्रेसफुल लगते हो आज भी सफ़ेद कुर्ते, सफ़ेद बालों, पकी हुई दाढ़ी और मोटे फ्रेम के चश्मे में... तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि हमारे बाबा होते तो ऐसे ही दिखते शायद... दिल करता है कभी कि बढ़ कर चरण स्पर्श कर लूँ तुम्हारे... और आशीर्वाद ले लूँ उनकी तरफ़ से... तो कभी दिल करता है सिर पे हाथ फेर के ढेर सारी दुआएँ दूँ तुम्हें... हमेशा स्वस्थ रहो और अपनी नज़्मों और गीतों से अपने चाहने वालों के दिल ऐसे ही गुलज़ार करते रहो सदा...

जन्मदिन बहुत मुबारक़ हो गुलज़ार साब !

(राज्य सभा टी.वी. पर प्रसारित हाल ही में इरफ़ान जी द्वारा लिया गया गुलज़ार साब का इंटरव्यू)

Wednesday, August 18, 2010

सब "गुलज़ार" हो जाये...


सबसे पहले तो अपने सबसे पसंदीदा शायर को उनके जन्मदिन पर ढेर सारी दुआएँ, बधाईयाँ और प्यार और ये चंद अल्फ़ाज़ हमारी ओर से उनको जन्मदिन का छोटा सा तोहफ़ा -

वो जो फूँक दे जान लफ़्जों में
तो नज़्म भी साँस लेने लगे
धड़क उठे ग़ज़लों का दिल
और त्रिवेणियाँ बह निकलें
सफ़्हा दर सफ़्हा
किरदार जी उठें
हर्फ़ों को मानी मिल जाये
सब "गुलज़ार" हो जाये...

गुलज़ार साब के बारे में क्या कहें या कहाँ से कहना शुरू करें... कुछ धुंधला-धुंधला सा याद पड़ता है... जब छोटे थे तो लोग उनके बारे में ये मज़ाक में कहा करते थे जो समझ ना आये वो गुलज़ार... आज सोचते हैं तो हँसी आती है... गर वो लोग समझ पाते तो शायद जानते की गुलज़ार कौन हैं और क्या हैं... कलम के ऐसे जादूगर जो अपने शब्दों से बस जादू सा कर देते हैं... वो भी ऐसा जादू जो सीधे दिल को छूता है और सर चढ़ के बोलता है... नज़्मों, ग़ज़लों, त्रिवेणियों, कविताओं या कहानियों की गलियों से जब भी गुज़रे हैं, हर बार, बात को कहने का उनका मुख्तलिफ़ अंदाज़ दिल से "वाह !" निकलवाये बिना नहीं माना... ज़िन्दगी को देखने, समझने और अभिव्यक्त करने का उनका अनूठा अंदाज़, रिश्तों की बारीकियाँ, कुछ कही-अनकही बातें, आपको हर बार एक नया नज़रिया दे जाती हैं चीज़ों को देखने और समझने का...

गुलज़ार साब के लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता ये है की वो "आम" होते हुए भी ख़ास है... वैसी ही भाषा जैसा हम रोज़-मर्रा की आम ज़िन्दगी में बोलते हैं... शायद इसीलिए उनके लेखन से हम इनती आसानी से जुड़ पाते हैं... लगता है यही तो हम कहना चाह रहे थे... बस गुलज़ार साब ने हमारी सोच को शब्द दे दिये... उनकी नज़्मों में कभी एकदम बेबाक सी सच्चाई होती है जो आपको सोचने पे मजबूर कर देती है तो कभी कोई ख़ूबसूरत सी फैंटसी जो दिल को भीतर तक गुदगुदा जाती है... उनकी नज़्मों में पिरोई हुई उदासी भी हसीन लगने लगती है... अपने शब्दों से वो ऐसे बिम्ब और लैंडस्केप्स उकेर देते हैं की मानो किसी पेंटर ने शब्दों की कोई ख़ूबसूरत सी पेंटिंग बना दी हो या किसी फोटोग्राफ़र ने तमाम ख़ूबसूरती को अपनी फोटो में क़ैद कर लिया हो...

वो जो भी लिखते हैं बिलकुल उस किरदार में घुस के लिखते हैं... फिर चाहे वो संजीदा सी नज्में या कहानियाँ हों या बच्चों के लिये लिखे गीत और कवितायें... वो तो याद ही होगा आपको "जंगल जंगल बात चली है पता चला है, अरे चड्डी पहन के फूल खिला है, फूल खिला है..." स्कूल टाइम में हम बच्चों के लिये किसी नेशनल एंथम से कम नहीं हुआ करता था वो... :)

और चाँद के साथ उनका राब्ता तो जग ज़ाहिर हैं... वो एक सौ सोलह चाँद की रातें कोई कैसे भुला सकता है भला :) ... या फिर वो "बल्लीमारां के मोहल्ले की पेचीदा दलीलों की सी गलियाँ"... अरे उनके पसंदीदा शायर की ग़ालिब साब की बात कर रहे हैं हम जिनके ऊपर उन्होंने एक कमाल का सीरियल बनाया था "मिर्ज़ा ग़ालिब" जो की एक ज़माने में दूरदर्शन पर आया करता था... तब तो ख़ैर क्या ही समझ आता था पर अभी हाल ही में दोबारा देखा सी.डी. पर और बस मज़ा आ गया... क्या कमाल का डायरेक्शन था और क्या बेहतरीन श्रद्धांजलि थी अपने पसंदीदा शायर को... आपने नहीं देखा तो हमारी मानिये और ज़रूर देखिये... ग़ालिब के लिये ना सही गुलज़ार के लिये ही सही :)

वैसे तो आजतक गुलज़ार साब की बहुत सी नज़्में शेयर करीं हैं आप सब के साथ पर आज उनकी अपनी नज़्मों के साथ एक गुफ़्तगू शेयर करने जा रहे हैं... अस्तित्व की लड़ाई यहाँ भी है... एक शायर और उसकी नज़्म के बीच... पर उम्मीद है आपको पसंद आएगी...

कभी-कभी, जब मैं बैठ जाता हूँ
अपनी नज़्मों के सामने निस्फ़ दायरे में
मिज़ाज पूछूँ
कि एक शायर के साथ कटती है किस तरह से ?

वो घूर के देखती हैं मुझ को
सवाल करती हैं ! उनसे मैं हूँ ?
या मुझसे हैं वो ?
वो सारी नज़्में,
कि मैं समझता हूँ
वो मेरे 'जीन' से हैं लेकिन
वो यूँ समझती हैं उनसे है मेरा नाक-नक्शा
ये शक्ल उनसे मिली है मुझको !

मिज़ाज पूछूँ मैं क्या ?
कि एक नज़्म सामने आती है
छू के पेशानी पूछती है -
"बताओ गर इन्तिशार है कोई सोच में तो ?
मैं पास बैठूँ ?
मदद करूँ और बीन दूँ उलझने तुम्हारी ?"

"उदास लगते हो," एक कहती है पास आ कर
"जो कह नहीं सकते तुम किसी को
तो मेरे कानों में डाल दो राज़
अपनी सरगोशियों के, लेकिन,
गर इक सुनेगा, तो सब सुनेंगे !"

भड़क के कहती है एक नाराज़ नज़्म मुझसे
"मैं कब तक अपने गले में लूँगी
तुम्हारी आवाज़ कि खराशें?"

एक और छोटी सी नज़्म कहती है
"पहले भी कह चुकी हूँ शायर,
चढ़ान चढ़ते अगर तेरी साँस फूल जाये
तो मेरे कंधे पे रख दे,
कुछ बोझ मैं उठा लूँ !"

वो चुप-सी इक नज़्म पीछे बैठी जो टकटकी बाँधे
देखती रहती है मुझे बस,
न जाने क्या है उसकी आँखों का रंग
तुम पर चला गया है
अलग-अलग हैं मिज़ाज सब के
मगर कहीं न कहीं वो सारे मिज़ाज मुझमे बसे हुए हैं
मैं उनसे हूँ या....

मुझे ये एहसास हो रहा है
जब मैं उनको तखलीक़ दे रहा था
वो मुझे तखलीक़ दे रही थीं !!

-- गुलज़ार


जाते जाते गुलज़ार साब के जन्म दिन पर एक बार फिर से उनको ढेरों बधाईयाँ और ढेर सारी दुआएँ... ईश्वर उन्हें लम्बी उम्र दे और सदा स्वस्थ रखे... लॉन्ग लिव गुलज़ार साब !!!

Sunday, August 23, 2009

Long Live Gulzar Sa'ab !!!


"उसको भूले से पढ़ लिया था कभी, तब से आदत बिगड़ गई शायद,
तब से हैं मेज़ पे खुली रखी, हज़ार रातें पश्मीने की"

aaj kaafi dino ki masroofiyat ke baad kuchh samay mila hai to socha sabse pehle wo kaam kar le jo shayad aaj se paanch din pehle hi kar lena chahiye tha 18th August ko... khair der aaye durust aaye... yun to dil se duaayen usi din de di thi par aaj ek baar phir se gulzar sa'ab ko janm din ki dher saari shubhkaamnaayen...
gulzar sa'ab ko kab se padhna shuru kara tha ye to yaad nahi... par pasand humesha se hi the... shayad tab se jab bachpan me unka likha wo song suna tha... "mera kuchh saamaan..." ya tab se jab ye pata bhi nahi tha ki gulzar naam ka koi shayar hai jisne ye gaana likha hai... haan kabhi kabhar filmfare awards me zaroor unhen dekha tha... kalaf kara hua safed kurta paijama, pairon me moojri, aankhon pe moote se frame ka chashmaa aur hoothon pe ek chir parichit muskan... bilkul ek aam aadmi ki tarah... unki ye aam aadmi waali image jaise dil me bas gayi thi... aur bahot saalon baad jab shayad thodi akl aayi ki unka likha kuchh samajh saken tab se unhen padhte aur pasand karte aaye hain.
sabse juda, sabse alag gulzar sa'ab ka apna hi ek style hai... roz marra ki zindagi se kuchh shabd uthate hain aur unhen ek ladi me piro ke ek khoobsoorat sa geet bana dete hain "din khaali khaali bartan hai aur raat hai jaise andha kuaan"... ya aajkal ka latest song hi le leejiye "aaja aaja dil nichoden, raat ki matki toden, koi good luck nikalen, aaj gullak to phoden"... ab bhala bataaiye ye gullak, bartan, matki in shabdon me bhi koi khoobsoorti dhundh sakta hai bhala? par gulzar sa'ab to phir gulzar sa'ab hain... the one and only...
gulzar sa'ab ko jitna humne samjha hai wo ek bahot keen observer hain... apne aas paas jo kuchh ho raha ho use bahot hi dhyaan se observe karte hain aur usse prerna lete hain aur wahi sachchayi unki likhi nazmon me nazar aati hai... kabhi rishton ka taana baana, to kabhi zindagi ke phalsafe, kabhi ek masoom bachche ke masoom sawaal to kabhi prakriti ka aseem saundarya... sabhi kuchh sameta hai unhone apni nazmon me... aur kahin agar un nazmon ko wo apni aawaaz me padh de to samajhiye mazaa dugna ho jaata hai... waise aapne kabhi gulzar sa'ab ki likhi kahaniyan padhi hain? kabhi mauka mile to zaroor padhiyega... apni nazmon ki hi tarah kuchh alag par dil ko chhu lene waali hoti hain...
ab tak to aap log jaan hi gaye honge ki aap sabhi ki tarah hum bhi gulzar sa'ab ke ek adna se fan hain :-) ... aur apni har dursi post me unhi ki nazm pesh karte rehte hain... par kya karen unka likha sabhi kuchh itna achha hota hai ki man hi nahi maanta...
waise to gulzar sa'ab ke baare me kitna kuchh hai share karne ke liye par wo sab phir kabhi... aaj to bas unko ek lambi aur sukhad zindagi ki dher saari shubhkamnaayen aur ye ummed ki wo hamesha aise hi likhte rahe...

ना आमद की आहट और ना जाने की टोह मिलती है
कब आते हो
कब जाते हो ...

ईमली का ये पेड़ हवा में हिलता है तो
ईंटों की दीवार पे परछाईं का छींटा पड़ता है
और जज़्ब हो जाता है, जैसे,
सूखी मिट्टी पे कोई पानी के कतरे फेंक गया हो
धीरे धीरे आँगन में फिर धूप सिसकती रहती है
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...

बंद कमरे में कभी कभी
जब दिए की लौ हिल जाती है तो
एक बड़ा सा साया मुझको
घूँट घूँट पीने लगता है
आँखें मुझसे दूर बैठ के मुझको देखती रहती हैं
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...

ना आमद की आहट और ना जाने की टोह मिलती है
कब आते हो
कब जाते हो
दिन में कितनी बार मुझे तुम याद आते हो ...

-- गुलज़ार

Related Posts with Thumbnails