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Monday, May 25, 2015

बेअदब सी पर गज़ब सी.. मनमर्ज़ियाँ...!!!




जाने क्यूँ अनप्लांड जर्नीज़ हमेशा से बहुत अट्रैक्ट करती आयी हैं हमें... कुछ कुछ मिस्टीरियस सी... बिना किसी तय परिसीमा या दायरों के... न पता हो जाना कहाँ है... न पता कि पहुंचना कब है... न ये कि कब वापस आना है... पहले से कुछ भी नहीं पता... बस मन हुआ कहीं जाने का और चल दिए... बंजारों के जैसे... कभी कभी सोचती हूँ ऐसी लॉन्ग ड्राइव्स और जर्नीज़ क्यूँ पसंद है हमें... ख़ासकर हाइवे पे बेवजह बेमकसद की यात्रा... मंज़िल से ज़्यादा रास्ते पसंद आते हैं... खुले खुले... अंतहीन...

इन आवारा सड़कों पर बेपरवाह भटकते हुए ख़ुद के बेहद करीब महसूस होता है... जैसे अपने ही वजूद का कोई खोया हुआ हिस्सा पा लिया हो... कितने ख़ूबसूरत होते हैं ये अनजान रास्ते... कहीं भी नहीं जाती फ़िर भी आपको ख़ुद तक पहुँचाती ये आवारा सड़कें... कि इनके साथ यूँ आवारा हो जाने के लिए बड़ा जिग़र चाहिए और साथ में थोड़ा पागलपन और जुनून...

बड़ा अच्छा लगता हैं इन रास्तों का हाथ थामे बस चलते चले जाना... इनसे बातें करते... इनके साथ हँसते खिलखिलते... सड़कों के किनारे खिले बंजारे फूलों की बस्तियों से ठिठोली करते... पेड़ों की आदिम गंध में ख़ुद को डुबोते.. या कभी कभी बस यूँ ही ट्रेन या बस की खिड़की से अनंत में देखते रहना जाने किन ख्यालों में डूबे हुए...

हाइवे वाली किसी चाय की टपरी पर रुकना... कुछ पल सुस्ताते हुए कुल्हड़ वाली चाय पीना.. मिट्टी की सौंधी सी ख़ुश्बू को आत्मा तक महसूसना.. आह... Bliss... ! कोई CCD, Barista, Star Bucks अपनी प्रीमियम कॉफ़ी से आत्मा को यूँ छू के बताये तो जानू...

ख़ुद के बारे में बहुत कुछ सोचने का... ख़ुद को और बेहतर जानने समझने का मौका देती हैं ये जर्नीज़... मानो किसी खुली जगह पर जाने से दिमाग़ की कितनी गिरहें खुल जाती हैं.. हमारा मानना है हर कुछ समय के बाद ऐसी कोई यात्रा बहुत ज़रूरी हो जाती है.. just to loosen yourself..

हमारा रिश्ता भी कुछ कुछ ऐसा ही है ना जान... कभी न ख़त्म होने वाली किसी अविरल यात्रा जैसा... जो हमें अन्वाइन्ड होने का... रिलैक्स होने का मौका देता है... या फिर डिस-आर्गनाइज़्ड सी किसी अनप्लांड जर्नी जैसा... बेदायरा... बेमंज़िल... खुला खुला... अनंत... !



Thursday, July 10, 2014

Kumaon Diaries - Day 2


27th June 2014; Kausani to Ranikhet

सनराइज़ @ कौसानी !

जैसा की पिछली पोस्ट में बताया... कौसानी का सनराइज़ बहुत ख़ूबसूरत होता है और टूरिस्ट ख़ासकर उसे ही देखने इतनी दूर आते हैं... तो उसके लिए एक सुबह की थोड़ी सी नींद तो क़ुर्बान करी ही जा सकती थी... पहाड़ों पर सनराइज़ थोड़ा जल्दी हो जाता है सो सुबह साढ़े चार बजे का अलार्म लगा के सोये थे... सनराइज़ देखने का एक्साईटमेंट इतना की अलार्म बजने से पहले ही चार बजे नींद ख़ुद-ब-ख़ुद खुल गयी... खिड़की से झाँक के देखा तो बाहर अच्छा ख़ासा अँधेरा था... किसी तरह थोड़ा और समय काटा लेटे लेटे... डर भी था की दोबारा आँख न लग जाये... आख़िरकार साढ़े चार बजे बिस्तर छोड़ ही दिया.. हाथ मुंह धो कर और जैकेट पहन कर पहुँच गए होटल की छत पर...

आमतौर पर लोग अनासक्ति आश्रम से सनराइज़ देखते हैं पर क्यूंकि हमारे होटल की छत से ही पूरी रेंज दिखती थी सो हमारे लिए सुबह सुबह की दौड़ बज गयी.. तो बस पौने पाँच बजे कैमरा वैमरा ले के जम गए होटल की छत पे... रात भर बारिश हुई थी तो सुबह थोड़ी ठंडी थी... और बारिश का नुकसान ये हुआ की अभी तक भी बादल छाये हुए थे... हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ धुंध की चादर में ढकी हुई थी... तो उन्हें देखने की उम्मीद तो खैर छोड़ ही चुके थे... फिर भी सूरज निकलने की राह देखते हुए देर तक छत पर टहलते रहे...


चूल्हे से उठता धुंआ देख के बादलों का गुमां होता रहा

पेड़ों में छुपी सर्पीली सड़कें

इसका फ़ायदा ये हुआ की घाटी में अलसाई आँखों को मसलती और अंगड़ाई लेती उनींदी सी ज़िन्दगी दिखाई दे गयी... दूर कहीं किसी घर में जलते चूल्हे से उठता धुंआ देर तलक बादलों का भ्रम दिलाता रहा... वादी में फैले सन्नाटे और कुहासे को बींधती दूर से आते किसी ट्रक की हेडलाइट... परिंदों ने भी अपने घोसले छोड़ दिए थे अब तलक और खुले आसमान में कसरत और कलाबाज़ियाँ लगा कर अपनी नींद भगा रहे थे... कोहरे में ढकी वादी देख कर वो गाना सहसा याद आ गया.. आज मैं ऊपर आसमां नीचे...

आज मैं ऊपर आसमां नीचे...!

गाना गुनगुनाते हुए सूरज चाचू को घूरा तो उन्हें भी आखिर दया आ ही गयी हमारे ऊपर और बहुत देर से छायी लालिमा को परे हटा कर लजाते हुए निकले एक बादल के पीछे से... सुन्दर दृश्य था.. पर मन में तो वो पिछली बार वाली सनराइज़ की छवि अंकित थी... दरअसल यहाँ की ख़ासियत है अपनी आखों के आगे सूरज की किरणों को एक एक कर के हिमालय की छोटी बड़ी सभी चोटियों को रंगते हुए देखना, ऐसा लगता है मानो कोई ब्रश ले कर आपके सामने पेंटिंग बना रहा हो और सोने चाँदी सी जगमगाती सुनहरी सफ़ेद चोटियाँ एक एक कर उकेरता जा रहा हो कैनवस पे... वो देखना अपने आप में एक मैजिकल एक्सपीरिएंस है... खैर इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया तो न सही... अगली बार मुन्सियारी से ये देखने की तमन्ना है... कुछ और क़रीब से...

बादलों से झाँकता सूरज

ख़ैर सनराइज़ देखने की रस्म पूरी हुई और एक बार फिर हम तैयार हो के करीब साढ़े नौ बजे तक होटल से चेक आउट कर के निकल गए कौसानी की सर्पीली सड़कों पर... सबसे पहले अनासक्ति आश्रम से शुरुआत करी... सन 1929 में गाँधी जी अपने भारत व्यापी दौरे पर २ दिन के लिए कौसानी आये थे पर इस जगह ने ऐसा मन मोहा की उन्होंने यहाँ क़रीब १४ दिन का समय बिताया... प्राकृतिक समानताओं की वजह से गाँधी जी ने कौसानी को "भारत का स्विट्ज़रलैंड" कहा था... अपने १४ दिन के प्रवास के दौरान गाँधी जी ने यहाँ अपनी किताब अनासक्ति योग की प्रस्तावना लिखी थी... जिस पर बाद में इस जगह का नाम अनासक्ति आश्रम रखा गया... अब इसे एक छोटे से गाँधी स्मारक का रूप दिया गया है... जिसमें गाँधी जी की बचपन से ले कर अंत समय तक की सारी फोटोग्राफ्स लगी हुई हैं... अन्दर फ़ोटो लेना मना था सो बस सब देख कर और मन में बसा कर चल दिए अगले पड़ाव की ओर... हाँ बाहर इस जगह के बारे में गाँधी जी के विचार लिखे हुए हैं... आप भी पढ़ते चलिए...




दिन का दूसरा पड़ाव था कौसानी टी गार्डन... टी गार्डन के साथ साथ वहाँ पर एक टी फैक्ट्री भी है जहाँ आप बगान से पत्ती तोड़े जाने से ले कर चाय बनने तक का पूरा प्रोसेस देख समझ सकते हैं... और साथ ही एकदम ताज़ी चाय भी टेस्ट कर सकते हैं और खरीद भी सकते हैं... हालांकि मुक्तेश्वर के रस्ते में पड़ने वाला टी प्लांटेशन पहले घूम चुके थे तो ये ज़्यादा अच्छा नहीं लगा... पर वहाँ मिलने वाली चाय अच्छी थी... सो उसे पी कर तर-ओ-ताज़ा हो कर अगले गंतव्य के लिए निकल पड़े...


एक चुस्की चाय

कौसानी से करीब बीस किलोमीटर नीचे बागेश्वर रोड पर बैजनाथ मंदिर है.. जो दरअसल गोमती नदी के तट पर बसा भगवान शिव, माँ पार्वती, श्री गणेश और सूर्य भगवान आदि को समर्पित मंदिरों का एक समूह है.. इसे कत्यूरी शासकों ने बारहवीं शताब्दी में बनवाया था... इस मंदिर की महत्ता इसलिए भी है कि हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान शिव और माँ पार्वती की शादी गोमती और गरुड़ गंगा के संगम पर हुई थी... पत्थरों को जोड़ के बना ये मंदिर देखने में बेहद ख़ूबसूरत लगता है... पास बहती गोमती नदी में बहुत सी मछलियाँ देखी जा सकती हैं... हालांकि रात भर हुई बारिश के कारण उस दिन नदी का पानी काफी मटमैला था और धूप तेज़ होने की वजह से मछलियाँ कम ही दिखाई दे रही थी...


बैजनाथ मंदिर

भीमशिला

इस जगह की एक और दिलचस्प विशेषता है भीमशिला... जो असल में एक गोल चिकना सा पत्थर है कोई पचास साठ किलो का... किम्विन्दंती है की भीम ने उस पत्थर पर अपना पाँव रख दिया था जिससे उसमें कुछ चमत्कारिक शक्तियाँ आ गयी थीं और इस कारण कोई भी इंसान उसे अकेले नहीं उठा सकता... पर अगर नौ लोग मिल कर अपनी तर्जनी (index finger) से उस पत्थर को उठायें नौ-नौ बोलते हुए तो वो आसानी से उठ जाता है... हमने वो पत्थर तो देखा पर उस वक़्त वहाँ नौ लोग मौजूद नहीं थे सो उसे आज़मां नहीं पाये... असल में ये फंडा सीधा सीधा सेन्टर ऑफ़ ग्रेविटी की थ्योरी से जुड़ा हुआ है.. खैर लोगों को उनकी मान्यताओं के साथ छोड़ कर हम आगे बढ़े...


खूबसूरत सीढ़ी नुमा खेत में काम करती पहाड़ी औरतें

सीढ़ी नुमा खेत
 
माँ के खेतों से लौटने का इन्तेज़ार करता घर में बंद पहाड़ी बच्चा


रास्ते में बस एक जगह खाने के लिए ब्रेक ले कर हम सीधा रानीखेत पहुँचे करीब शाम के चार बजे... होटल में चेक इन कर के थोड़ा सुस्ताये... रास्ते की थकन उतारी और करीब छः बजे फ़िर निकले रानीखेत से रू-ब-रू होने ... जो दिन का सबसे अच्छा और सुकून भरा हिस्सा होने वाला था... रानीखेत से करीब पाँच किलोमीटर आगे हैड़ाखान बाबा का आश्रम है... चारों ओर प्राकृतिक ख़ूबसूरती में घिरा शिव जी का मंदिर है यहाँ... इतना सुकून है इस जगह की बस मन करता है घंटों यही बैठे रहें और बादलों को पहाड़ों के साथ अटखेलियाँ करता देखते रहें...

हैड़ाखान बाबा आश्रम के एक विश्रामगृह की छत पर सुस्ताता कबूतर 


अगले पड़ाव पर पहुँचने की जल्दी थी सो वहाँ ज़्यादा नहीं रुके... ये अगला पड़ाव अभी तक की ट्रिप का सबसे ख़ूबसूरत पड़ाव होने वाला था... दरअसल आश्रम के लिए आते वक़्त रास्ते में एक जगह पाइन के पेड़ों का जंगल मिला... बिलकुल ऐसा जैसा सिर्फ़ फिल्मों में देखते आये थे अब तक... बेइन्तेहां ख़ूबसूरत... जहाँ तक नज़र जा रही थी सिर्फ़ पाइन के ही पेड़ छोटे बड़े... बीच में गुज़रती सर्पीली सी सड़क...

पाइन का खूबसूरत जंगल

जंगल से गुज़रती सड़क
करीब आधा पौन घंटा कब बीत गया वहाँ पता ही नहीं चला... वहाँ से वापस आने का मन तो बिलकुल नहीं था पर अँधेरा हो चला था सो वापस आना पड़ा... खाना खा के वापस होटल आये तो सोनी मैक्स पर पंचम की ७५ वीं जयंती पर स्पेशल प्रोग्राम चल रहा था... बहुत कोशिश करी उसे देखने की लेकिन नींद की जादुई झप्पी मन पे भरी पड़ गयी... एक और ख़ूबसूरत दिन मुकम्मल हुआ...!

Saturday, July 5, 2014

Kumaon Diaries - Day 1


26th June 2014; Lucknow to Kausani




अल्मोड़ा से कौसानी जाते वक़्त पाइन के ख़ूबसूरत जंगलों से गुज़रते हुए

नैनीताल हमेशा से हमारा पसंदीदा हिल स्टेशन रहा है... झील के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर... यूँ तो तीन बार पहले भी आ चुकी हूँ यहाँ... पर दिल है की भरता ही नहीं इस जगह से... जाने मन की कौन सी डोर है जो हर बार यही अटक कर रह जाती है और बार बार हमें अपनी ओर खींच लेती है...

अब ये चौथी ट्रिप थी यहाँ की तो सोचा क्यूँ ना इस बार थोड़ा अलग रूट लिया जाये... पहले कौसानी चलते हैं... वहाँ से उतर के रानीखेत आयेंगे और सबसे आखिर में नैनीताल... तो बस ट्रिप फ़ाइनल होते ही irctc की साईट पे जम गये... भला हो रेलवे वालों का की आख़िरकार उन्हें लखनऊ काठगोदाम शताब्दी की याद आ ही गयी... एक हफ्ते के लिये चली इस ट्रेन को एक और वीक का एक्सटेंशन भी मिल गया... बस फिर क्या था टिकट बुक किये और चल दिये इस गर्मी में सुकून के चंद रोज़ बिताने के लिये...

सुबह सवा पाँच बजे की ट्रेन थी सो तीन बजे उठे... नहा धो कर तैयार हुए और सुबह पाँच बजे के करीब उमस भरी गर्मी में स्टेशन पहुँचे... प्रीमियम ट्रेन थी सो साफ़ सुथरी थी... पिछले हफ़्ते न्यूज़ पेपर में छपी ख़बरों के विपरीत रास्ते भर खाना भी ठीक ठाक ही मिला... दोपहर करीब पौने एक बजे हम काठगोदाम पहुँच गये... वहाँ से तीन दिन के लिये टैक्सी हायर करी और निकल पड़े कौसानी की ओर... ख़ूबसूरत कुमाउनी वादियों से गुज़रते हुए अपने पाँच दिन के कुमाऊं प्रवास पर...


दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत बारिश पहाड़ों पर होती है !

काठगोदाम से थोड़ा ही आगे बढ़े थे की बादल और बारिश उमड़ पड़े हमारे स्वागत में... मन की सूखी धरती पर बारिश की बूँदे पड़ते ही ऐसा सौंधा सा एहसास हुआ की क्या बतायें... सुबह तीन बजे उठ कर ट्रेन पकड़ने की थकन जैसे गायब ही हो गयी... सब एकदम से हराभरा हो गया... मानो मेघों से अमृत बरस रहा हो और हम उसे पी कर अमर हुए जाते हों...


कोसी पे बना कोई पुल

काठगोदाम से भुवाली होते हुए रास्ते का पहला पड़ाव था कैंची... यहाँ नीम करोली बाबा का बनवाया हुआ हनुमान जी का प्रसिद्ध मन्दिर है... प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थापित इस मन्दिर की साफ़ सफ़ाई और यहाँ का अनुशासन देखने लायक है... यहाँ मिलने वाला चने का प्रसाद हमें बड़ा पसंद है... बारिश ने यहाँ तक भी उँगली थामी हुई थी सो कैमरे को हमने सुस्ताने दिया... और ख़ुद बारिश में भीगे पाइन के पेड़ों से उठती मदहोश कर देने वाली ख़ुश्बू के खो गए... ऐसी मादक ख़ुश्बू जिसे बस महसूस किया जा सकता है... बयां नहीं...


शिखर पे बसा अल्मोड़ा किसी परी कथा के गाँव सा प्रतीत होता है

करीब पौन घंटे बाद हम अपने अगले पड़ाव अल्मोड़ा पहुँचे... ये बहुत ही शान्त और खूबसूरत पहाड़ी शहर है... हमें यहाँ ठहरना नहीं था... पर अल्मोड़ा से गुज़रें और बाल मिठाई ना लें ये तो इस खूबसूरत जगह का अपमान करने जैसा हुआ... और ऑफिस में भी सबको प्रॉमिस कर के आये थे की बाल मिठाई ले कर ही वापस आयेंगे... सो जम कर यहाँ की प्रसिद्ध बाल मिठाई और चॉकलेट मिठाई खरीदी... इतनी बार आये हैं यहाँ की इस बार तो वो मिठाई वाला भी पहचान गया हमें...

मुँह मीठा कर के थोड़ा आगे बढ़े ही थे की बारिश एक बार फिर हमसे मिलने आ गयी... और फिर कौसानी तक उसकी ये आँख मिचोली चलती रही...


पर्बतों से गले मिलते बादल, मिलन के गवाह बने सीढ़ी वाले खेत

कौसानी दो चीज़ों में लिये बहुत फेमस है यहाँ का सनराइज़ और सनसेट... होटल पहुँचते तक करीब छः बज गये थे... बारिश हो रही थी सो अलग... सनसेट देखने की हसरत मन में ही रह गयी... लेकिन यहाँ पहुँचने का सुकून था... होटल में चेक इन कर के रूम में पहुँचे तो वहाँ के नज़ारे ने सारी थकन उतार दी... रूम में ही पूरी दीवार भर की फुल लेंग्थ खिड़की से नज़र आती बारिश में भीगी हिमालय की चोटियाँ... अद्भुत नज़ारा था...


होटल की खिड़की से दिखता 375 किलोमीटर लम्बा हिमालयन रेंज

चेंज कर के और चाय पी कर जब तक हम होटल की छत पर पहुँचे तो हल्का अँधेरा घिर आया था... हवा ठंडी थी... हलकी सिहराने वाली... नीचे वादी में टिमटिमाता कोई पहाड़ी गाँव जुगनुओं के झुरमुट सा प्रतीत हो रहा था... आँखों और कैमरे में उस खूबसूरती को क़ैद कर वापस रूम में आये... खाना खाया...


जुगनुओं के झुरमुट सा टिमटिमाता पहाड़ी गाँव

करीब दस बजे लेट कर डायरी लिखते हुए इस पूरे दिन को याद किया... लखनऊ से कौसानी तक के इस एक दिन के सफ़र में कितने मौसमों से गुज़रे... गर्मी... उमस... बारिश... और अब ये निम्मी निम्मी ठण्ड... रूह को ठंडक पहुँचाने वाली... नींद ने कब बढ़ कर अपनी आगोश में समां लिया पता ही नहीं चला....!


 

Thursday, April 18, 2013

पिओनी और इनूरी के देस में...




नीले पॉपी के बगल से होकर
वो जो अलसायी सी पगडण्डी मुड़ती है न
ठीक उसी पर आगे बढ़ना
मील भर के फासले पर
आबशारों की इक टोली मिलेगी
सुना है पूरनमासी की रात
आसमां से परियाँ आती हैं वहाँ

थोड़ा आगे बढ़ने पर
शफ्फाक़ बर्फ़ का जज़ीरा मिलेगा
न न उसके रंग पर मत जाना
दिल का बड़ा पाजी है !
संभल संभल के चलना उस पर
ज़रा सा कोई फिसला गया तो
मुआं खिलखिला के हंस पड़ता है

वहां से कुछ ही दूर पर
अलसाई सी पीली पिओनी का झुण्ड
हरी घास पर धूप सेंकता मिलेगा
बस वहीं से दायें मुड़ना
संभल कर… आगे ढलान है
सामने रुई के फ़ाहे सा नर्म
बादलों का इक दरिया होगा

जानती हूँ, दिल करेगा
उस मखमली दरिया में
पैर डाल के बैठो कुछ देर
रस्ते की कुछ थकन उतारो
पर वो मायाजाल है
उसमें फँसना मत... आगे बढ़ना

ज़रा ध्यान से सुनोगे तो
पास बहती नदी की शरारत सुनाई देगी
उसकी अठखेलियों से लजाये
कुछ गुलाबी फूलों की कतारें
नदी के किनारे दूर तक फैली होंगी
तुम भी उनकी ऊँगली थाम बढ़ते आना

आगे लाल और सफ़ेद फूलों की
इक बस्ती मिलेगी
आजकल कुछ नाज़ुक नारंगी
मेहमां भी आये हैं उनके देस
आदतन सब के सब बैठे
गप्पें मार रहे होंगे देवदार तले
या फिर भँवरे और तितली का
वाल्ट्ज देखते होंगे !

उनसे मिल के आगे बढ़ोगे तो
ओस में भीगी सकुचाई सी इक
जामुनी इनूरी मिलेगी
पीले गुलाब की दीवानी है
पर वो निरा जंगली ठहरा
अब तक उसका मन न समझा !

आगे रास्ता थोड़ा संकरा है
थोड़ा सा पथरीला भी
कोहरे के धुंधलके में
परिन्दों की आवाज़ का पीछा करते
जुगनुओं से कुछ नूर उधार ले कर
अपनी राह तलाशते, ये सफ़र अब
तुम्हें ख़ुद तय करना होगा

कुदरत की इस नायाब पेंटिंग में
जहाँ सूरज अपनी सारी लाली
घाटी के नर्म गालों पर मल कर
उसकी आग़ोश में जज़्ब हो जाता है
पहाड़ी के उस अंतिम छोर पर
मैं मिलूँगी
धरती की इस जन्नत में
तुम्हारा इंतज़ार करती !

-- ऋचा 


* पॉपी, पिओनी, इनूरी - फूलों की घाटी में खिलने वाले ३०० फूलों में से तीन फूलों के नाम !

Saturday, October 13, 2012

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ !



मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...

कितने दिन हो गए कुछ लिखा नहीं... आज दिल किया कुछ लिखूँ तो तुम्हारे सिवा और तुमसे बेहतर कोई दूसरा मौज़ू ही नहीं मिला... गोया मेरी लेखनी को भी प्यार हो गया है तुमसे...

तुमसे बात करना हमेशा ही दिल को एक सुकून दे जाता है... दुनिया भर की परेशानियों के बीच दो पल तुम्हारी आवाज़ रूह को ऐसे ठंडक पहुंचती है जैसे पसीने से भीगे बदन पर ठंडी हवा का झोंका... सारा तनाव सारी परेशानियाँ सब चंद लम्हों में ही काफ़ूर हो जाते हैं... सारे दिन की थकन के बाद तुमसे बात होती है तो यूँ लगता है मानो हर की पौड़ी पर बैठ कर संध्या आरती देख रहे हों... गंगा के ठन्डे पानी में पैर डाल के... तृप्ति !

जाने तुम्हारी आवाज़ का जादू है या तुम्हारे साथ का, पर कुछ तो ज़रूर है... कभी कभी तो जी करता है तुम्हें बिना बताये तुम्हारी आवाज़ का एक टुकड़ा चुरा कर रख लूँ अपने पास और फ़ुर्सत में उससे खूब सारी बातें किया करूँ...

जानते हो तीन दिन पहले एक सपना देखा था... हम साथ काम कर रहे थे एक ही ऑफिस में, एक ही बिल्डिंग में... पर तुम इस कदर मसरूफ़ थे कि एक पल के लिए बात करने का भी समय नहीं था... हम बस एक दूसरे को देख भर पा रहे थे... फिर सब काम छोड़ कर अचानक तुम मेरे पास आये... बोला कुछ भी नहीं बस मेरा हाथ पकड़ा था... तुम्हारा वो स्पर्श बिन कुछ बोले भी कितना कुछ कह गया था... उस एक स्पर्श में सहानुभूति थी, संवेदना थी, करुणा थी, समय न दे पाने की तकलीफ़ थी और सबसे बढ़ कर बेहद गहरा प्यार था... तीन दिन बाद भी सपने में महसूस किया वो तुम्हारे हाथों का स्पर्श अब भी अंकित है मन के पन्नों पर...

तुम ज़्यादा बोलते नहीं... तुम्हारे होंठ अक्सर ख़ामोश रहते हैं... पर तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... जाने किस भाषा में बातें करती हैं मेरी आँखों से कि सीधे दिल तक पहुँचती है उनकी आवाज़... बहुत से ऐसे एहसास हैं जिन्हें महसूस तो किया है तुम्हारी आँखों के ज़रिये पर शब्दों में उनका तर्जुमा करना मुमकिन नहीं है... कहाँ से सीखी ये भाषा ? सीधे दिल पे दस्तक देने वाली !

जानते हो पहला अक्षर और पहली भाषा कैसे बने ? और संगीत का पहला सुर ? नहीं जानते ? आओ आज बताती हूँ तुम्हें...

आदि रचना
मैं - एक निराकार मैं थी

ये मैं का संकल्प था
जो पानी का रूप बना
और तू का संकल्प था
जो आग की तरह नुमाया हुआ
और आग का जलवा
पानी पर चलने लगा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मैं की मिट्टी की प्यास थी
कि उसने तू का दरिया पी लिया
ये मैं की मिट्टी का हरा सपना था
कि उसने तू का जंगल खोज लिया
ये मैं की मिट्टी की गंध थी
और तू के अम्बर का इश्क़ था
कि तू का नीला सा सपना
मिट्टी की सेज पर सोया
ये तेरे और मेरे मांस की सुगंध थी
और यही हक़ीक़त की आदि रचना थी

संसार की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि पुस्तक
मैं थी और शायद तू भी
शायद एक सांस के फासले पे खड़ा
शायद एक नज़र के अँधेरे पे बैठा
शायद एहसास के मोड़ पे चल रहा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मेरा और तेरा अस्तित्व था
जो दुनिया की आदि भाषा बना
मैं की पहचान के अक्षर बने
तू की पहचान के अक्षर बने
और उन्होंने आदि भाषा की आदि पुस्तक लिखी

ये मेरा और तेरा मिलन था
हम पत्थर की सेज पर सोये
और आँखें, होंठ, उँगलियाँ, पोर
ये मेरे और तेरे बदन के अक्षर बने
और उन्होंने आदि पुस्तक का अनुवाद किया

ऋगवेद की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि चित्र
मैं थी और शायद तू भी
मैं छाँव के भीतर थिरकती सी छाया
और तू भी शायद एक खाकी सा साया
अंधेरों के भीतर अंधरों के टुकड़े
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

रातों और पेड़ों का अँधेरा था
जो तेरी और मेरी पोशाक थी
एक सूरज कि किरण आयी
वो दोनों के बदन में से गुज़री
और परे एक पत्थर पर अंकित हो गयी
सिर्फ़ अंगों की गोलाई थी,
चाँदनी की नोकें
ये दुनिया का आदि चित्र था
पत्तों ने हरा रँग भरा
बादलों ने दूधिया, अम्बर ने सिलेटी
और फूलों ने लाल, पीला, कासनी

चित्रों की कला तो बहुत बाद की बात है !

आदि संगीत
मैं थी और शायद तू भी
एक असीम खामोशी थी
जो सूखे पतों कि तरह झड़ती
या यूँ ही किनारों की रेत कि तरह घुलती
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

मैं ने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तू ने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिट्टी के कान कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया
पेड़ की टहनियाँ कुछ कस सी गयीं
पत्तों में एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिड़िया के पंख हिले
ये पहला नाद था
जो कानों ने सुना था

सप्त सुरों की संज्ञा तो बहुत बाद की बात है !

आदि धर्म
मैं ने जब तू को पहना
तो दोनों के बदन अंतर्ध्यान थे
अंग फूलों की तरह गूंथे गये
और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये

तू और मैं हवन की अग्नि
तू और मैं सुगन्धित सामग्री
एक दूसरे का नाम होंठों से निकला
तो वही नाम पूजा के मन्त्र थे
ये तेरे और मेरे अस्तित्व का एक यज्ञ था

धर्म की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि क़बीला
मैं की जब रुत गदराई थी
मांस के पौधे पर बौर आया था
पवन के आँचल में महक बंध गयी
तू का अक्षर लहलहाया था

मैं और तू की छाँव में
जहाँ "वह" आ कर निश्चिन्त सो गया
ये "वह" का एक मोह था
गेंहूँ का दाना हमने बाँट लिया
"वह" सहज था, स्वाभाविक था
मैं की और तू की तृप्ति

क़बीलों की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि स्मृति
काया की हकीक़त से लेकर
काया की आबरू तक मैं थी
काया के हुस्न से लेकर
काया के इश्क़ तक तू था

यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख्लाक़ दिया
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने "वह" को पहचान लिया
भयमुक्त मैं की हस्ती
और भयमुक्त तू की, "वह" की

मनु स्मृति तो बहुत बाद की बात है !

-- अमृता प्रीतम

Monday, May 14, 2012

राग पहाड़ी !



बंजारों सा ये मन उड़ते उड़ते जाने कौन शहर किस गली पहुँच जाता है हर रोज़... उसकी परवाज़ पर न तो कोई पहरा है न ही कोई सरहद उसे रोक पायी है कभी... बिना किसी रोक टोक कहीं भी, कभी भी चला जाता है... देखा जाए तो ये मन वो मुसाफ़िर है जिसे किसी मंजिल पर नहीं पहुंचना होता... उसे सिर्फ़ सफ़र करना होता है... भटकना ही जिसकी नियति होती है... वही उसकी प्रकृति भी और वही उसका शौक भी... अनवरत चलते रहने वाले इस सफ़र के दौरान बहुत से लोगों से उसका जुड़ाव होता है... मन मिलता है.. दो पल किसी के साथ ठहरता है, सुस्ताता है और फिर बढ़ चलता है अपने अगले पड़ाव की ओर...

ऐसे ही कुछ नए पुराने चेहरों के बीच से होता हुआ... कुछ जानी पहचानी और कुछ अनजानी गलियों से गुज़रता हुआ... ये मन उड़ चला आज पहाड़ों की ओर... जाने कैसा तो अजीब सा नाता है इन पहाड़ों से मन का... जाने किस जन्म का... जैसे कोई आवाज़ जो आपको पुकारती रहती हो हर पल... जैसे कान्हां की मुरली की धुन और मन राधा हो कर खिंचा चला आता है यहाँ... जैसे किसी भूले बिसरे गीत के बोल जो गूंजा करते हैं देवदार से ढकी इन ख़ूबसूरत वादियों में... जैसे बचपन का बिछड़ा हुआ कोई दोस्त जो लुक्का छिप्पी खेलते हुए दूर निकल आया और किसी चीड़ के पेड़ के पीछे खड़ा आज भी आपका इंतज़ार कर रहा हो कि आप आयें और उसे ढूंढ के जोर से बोलें, "पकड़ लिया... चल अब तेरी बारी..."

कितना सुकून मिलता है यहाँ आ कर... हर सू असीम शान्ति की एक उजली चादर फैली रहती है... ऐसी ख़ामोशी जो अकेले होते हुए भी आपको तन्हाँ महसूस नहीं होने देती... आपको मौका देती है ख़ुद से बात करने का, ख़ुद को समझने का... दिन के उजाले में जो ख़ामोशी आपको आकर्षित करती है, साँझ ढलते ढलते वही ख़ामोशी रहस्यमयी सी हो जाती है... एक अबूझ पहेली सी... देर शाम हुई हलकी बारिश की नमी हवा में महसूस होती है... फ़िज़ा में घुली गीले देवदार और चीड़ों की अनूठी ख़ुश्बू उसे और ज़्यादा रहस्यमयी बना देती है... और इस सब के बीच पेड़ों से छन के आती ठंडी हवा में लिपटी चाँदनी आपको किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाती हैं... जहाँ आपका जन्मों का साथी आपका इंतज़ार कर रहा होता है... जुगनुओं की पायल पहने ख़्वाब आपको अपने आग़ोश में ले लेते हैं...


सूरज की पहली किरण के साथ ही पहाड़ों का रूप जैसे बदल सा जाता है... बर्फ़ से ढकी शफ्फाक़ चोटियाँ चाँदी सी चमक उठती हैं... मन एक बार फिर मचल जाता है बच्चों की तरह उस पर फिसलने को... कुछ दूर फिसलता हुआ आता है और फिर अचानक उड़ चलता है बादलों पर सवार होकर जंगल की सैर करने... वहाँ से नीचे देखो तो जहाँ तक नज़र जाती है सिर्फ़ हरा भरा जंगल दिखता है... अंतहीन... जैसे धरती सिमट कर बस इतनी सी हो गयी हो... इस हरियाली के परे कुछ भी नहीं... जंगल में गुलांची भरते हिरन और ख़रगोश दिखते हैं... दूर एक झरना जो बहुत शोर मचाता हुआ काफ़ी ऊँचाई से गिर रहा है... एक झील भी... और उसके एक सिरे पर किसी पहाड़ी देवी का मन्दिर भी... बादल उसी झील में उतरते हैं... जैसे वो भी देवी के दर्शन को आये हों... शाम होने वाली है... झील दियों की टिमटिमाहट से रौशन हो गयी है... मंजीरे और घंटियों की आवाज़ के बीच मन संध्या आरती में खो जाता है... कहता है आज यहीं बस जाओ... यहीं... इसी मन्दिर की सीढ़ियों पर... कल किसी और देस चलेंगे.....!




 

Tuesday, December 20, 2011

कुछ ख़ुश्बूएँ यादों के जंगल से बह चलीं...



कुछ ख़ुश्बूएँ दिल के कितने क़रीब होती हैं... कभी होता है ना बैठे बैठे अचानक कोई ख़ुश्बू याद आ जाती है और बस मन बच्चों सा मचल उठता है उसे महसूस करने को... हाँ, इन ख़ुश्बुओं को बस महसूस करा जा सकता है बताया या समझया नहीं जा सकता... रूहानी सी कुछ ख़ुश्बूएँ... किसी नन्हें से बच्चे के हाथों से आती भीनी सी महक जैसी... पाकीज़ा सी कुछ ख़ुश्बूएँ... हवन वेदी से उठती पवित्र गंध जैसी... कोहरे में भीगी पहाड़ी पर चीड़ और देवदार से आती पुर-असरार सी कोई ख़ुश्बू, सम्मोहित कर के अपने मोहपाश में बाँध लेने वाली... रूमानी सी कोई ख़ुश्बू... जैसे बारिश की हल्की सी फुहारें पड़ने के बाद मिट्टी से उठने वाली सौंधी सी महक जो बस पागल ही कर देती है... सुकून देती कोई ख़ुश्बू जैसे सर्दियों की सुबह पेड़ से छन के आने वाली धूप की महक...

सर्दियों की रात अंगीठी में जलते कोयले की ख़ुश्बू... बारिश में भीगे मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ी और उसमें सिंकती रोटी की ख़ुश्बू... सरसों के खेत से उठती सरसों के फूलों की तीखी गंध... आम के पेड़ पर आये नये कोपलों और बौर की ख़ुश्बू... गीली मेहँदी की ख़ुश्बू... किसी बेहद अज़ीज़ किताब के पन्नों से आती अतीत की ख़ुश्बू... इलायची वाली चाय की ख़ुश्बू... पुदीने की चटनी की ख़ुश्बू... गरम गरम भुट्टे पर नींबू और नमक की ख़ुश्बू... ताज़े भुने हुए अनाज की ख़ुश्बू... सर्दी की सुबह धुँध की ख़ुश्बू... जंगली फूलों की ख़ुश्बू... दादी के आँचल से आती वात्सल्य की ख़ुश्बू... बच्चों की आँखों से झाँकती शरारत की ख़ुश्बू... ब्लैक कॉफी से उठती कोई तल्ख़ सी ख़ुश्बू... सुबह सुबह झरे हरसिंगार की ख़ुश्बू..

आधी रात भीगे हुए मोगरे की ख़ुश्बू... चाँदनी की ख़ुश्बू... यादों की ख़ुश्बू... ख़्वाबों की ख़ुश्बू... साहिल की भीगी रेत की ख़ुश्बू... पीले गुलाब की ख़ुश्बू... पहले प्यार की ख़ुश्बू... लब-ए-यार की ख़ुश्बू... तुम्हारी ख़ुश्बू.....!



Friday, December 16, 2011

फिर नहीं सो सके इक सदी के लिये... हम दिलजले....



कानों में पहन के तेरी ख़ामोशी के सुर
साँसों में बसाये तेरी साँसों का मोगरा
खनकी रहती हूँ आरज़ू सी कभी...
महकी फिरती हूँ मुश्क़-बू सी कभी...

जाने ख़ुद को तुझमें छोड़ आयी हूँ या तुम्हें ख़ुद में बसा लायी हूँ... हमेशा के लिये... जाने क्या हुआ है पर कुछ तो हुआ है... आँखें भारी सी हो रही हैं गोया सदियों की नींद भरी हो उनमें... सोने का मन भी होता है पर नींद नहीं आती... भूख लगती है पर कुछ खाया नहीं जाता... किसी काम में दिल नहीं लग रहा... अजीब हाल है... बेवजह मुस्कुरा रही हूँ... बाँवरी सी... लगता है जैसे कोई बेहद ख़ूबसूरत ख़्वाब देखा है... या हक़ीक़त ख़्वाबों सी ख़ूबसूरत हो आई है... ये कैफ़ियत... ये गफ़्लत... उफ़ ! ये क्या कर दिया है तुमने मुझे...

धड़कने भी जाने कैसी दीवानी सी हो गई हैं... जाने किस सप्तक के सुर छेड़ रही हैं हर पल... बीथोवन की सातवीं सिम्फनी सी... ये कैसा सुरूर छाया हुआ है मुझ पर... नशे के ये किस भंवर में आ फँसी हूँ... जिस्म पर ये कैसी मदहोशी तारी है... साँसों में भी कुछ नशा सा घुलता हुआ महसूस होता है... जैसे नशे के किसी नमकीन महासागर में डूब के आयी हूँ... तुम्हारी कसम शराब को तो कभी हाथ भी नहीं लगाया... फिर ये नशा कैसा है... मैं सच में अपने होश खो बैठी हूँ क्या ?

ये कैसा मायावी जाल फेंका है कि ख़ुद-ब-ख़ुद खिंचती चली जा रही हूँ इसमें... ये कैसी कसमकस है... ये कैसी क़शिश है कि इससे बाहर निकलने का भी दिल नहीं होता... तुम सच में मायावी हो... जाने किस देस से आये हो... और आते ही मेरे दिल दिमाग़ सब पर तो कब्ज़ा कर लिया है... ना कुछ सोच पाती हूँ ना समझ पाती हूँ... फिर भी ख़ुश हूँ... बहुत ख़ुश... सुनो... इस क़ैद से कभी आज़ाद मत करना... ये बन्धन ज़िन्दगी बन गया है... इससे आज़ाद हुई तो मर जाऊँगी !

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