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Monday, October 18, 2010

लोग ग़ुस्से में बम नहीं बनते !!!


बस, हवा ही भरी है गोलों में
सुई चुभ जाए तो पिचक जाएँ

लोग ग़ुस्से में बम नहीं बनते !

-- गुलज़ार

ग़ुस्सा... प्यार ही की तरह हमारे व्यक्तित्व का एक हिस्सा होता है... बुरा ही सही, पर होता है... हर किसी में... कितनी बार ऐसा होता है कि हम जाने-अनजाने, अपने अपनों को कुछ ऐसा बोल देते हैं ग़ुस्से में, जो उन्हें तो तकलीफ़ देता ही है साथ ही ख़ुद हमें भी उतनी ही चोट पहुंचाता है... पर वो कहते हैं ना कमान से निकला हुआ तीर और मुँह से निकले हुए शब्द कभी वापस नहीं आ पाते... वो तो एक बार निकलने के बाद बस चोट ही पहुँचाते हैं... कोई "undo" कमांड नहीं चलता उनपे... और आप फिर चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते सिवाय अफ़सोस के, कि आपने ऐसा क्यूँ कहा...

ऐसा क्यूँ होता है कि आप जिसे सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं उसे ही सबसे ज़्यादा चोट पहुँचाते हैं जाने-अनजाने, ना चाहते हुए भी... फिर चाहे वो हमारे माँ-बाबा हों, भाई-बहन हों, यार-दोस्त हों या कोई भी अपना, जिसे आप दिल से सिर्फ़ और सिर्फ़ प्यार करते हैं... जिसका बुरा करना तो दूर की बात है, आप उसके बारे में बुरा सोच भी नहीं सकते... पर इन्सान हैं तो ग़लतियाँ करना भी लाज़मी है... परफेक्ट तो हो नहीं सकते... हम ग़लतियाँ भी करते हैं और उनका एहसास होने पर पछतावा भी...

पर ये सब तब होता है जब ग़ुस्सा कर के अपना और सामने वाले का, दोनों का ही मूड ख़राब कर चुके होते हैं... उस वक़्त तो ग़ुस्से में कुछ समझ ही नहीं आता सही-ग़लत... पता है ये ग़ुस्सा बहुत बुरा होता है... आपसे सारे अच्छे शब्द छीन लेता है और सारे बुरे और कड़वे शब्द आपको दे जाता है... जिन्हें बोलने का आपको बाद में अफ़सोस होता है... इसलिए ग़ुस्से में हमेशा शान्त रहना चाहिये... हम भी ऐसा ही करते हैं अक्सर... पर कभी कभी जाने कहाँ से ये कड़वे शब्द आ ही जाते हैं... देखो ज़रा अभी दिमाग़ शान्त है तो हम भी कैसी समझदारी की बातें कर रहे हैं :) ग़ुस्सा सच में बड़ा बुरा होता है...

अब ग़लती तो होती है हमसे, तो उसके लिये माफ़ी माँगना भी बनता है, पर माफ़ी जब भी माँगे दिल से माँगे... सिर्फ़ औपचारिकतावश "सॉरी" बोल देना माफ़ी माँगना नहीं होता... वो तो सिर्फ़ अपने लिये होता है... ख़ुद का अपराधबोध दूर करने के लिये... कोशिश करें कि जिस वजह से सामने वाले का दिल दुखा वो काम ही ना करें दोबारा... और एक बात तो है हमें पता है भले ही हम कितना भी नाराज़ हो जाएँ या ग़ुस्सा कर लें... हमारे अपने हमेशा हमारे साथ रहते हैं... भले सामने से ऐसा दिखाएँ ना पर दिल से तो साथ ही होते हैं...

पर जैसे ही आपको अपनी ग़लती का एहसास हो... माफ़ी मांगने में कभी देर मत करिये... झिझकिये मत... क्यूँकि कई बार ज़िन्दगी हमें ये मौका भी नहीं देती...


बस इक लम्हे का झगड़ा था
दर-ओ-दीवार पे ऐसे छनाके से गिरी आवाज़
जैसे कांच गिरता है
हर इक शै में गयीं उड़ती हुई, जलती हुई किर्चें !
नज़र में, बात में, लहजे में,
सोच और सांस के अन्दर...
लहू होना था इक रिश्ते का,
सो वो हो गया उस दिन !
उसी आवाज़ के टुकड़े उठा के फ़र्श से उस शब,
किसी ने काट लीं नब्ज़ें
न की आवाज़ तक कुछ भी,
कि कोई जाग न जाये !!

-- गुलज़ार


Monday, October 26, 2009

लफ़्ज़ों का पुल

उन्हें ये ज़िद थी के हम बुलाएं
हमें ये उम्मीद वो पुकारें
है नाम होठों पे अब भी लेकिन
आवाज़ में पड़ गयीं दरारें
-- गुलज़ार

भावनाएं, ख्वाहिशें, एहसास, विचार, ख़्वाब, हक़ीकत और उन सब को अभिव्यक्त करते कुछ शब्द... कभी सोचा है ये शब्द हमारी ज़िन्दगी से निकल जाएँ तो क्या हो ? हर सिम्त सिर्फ़ दिल को बेचैन कर देने वाली एक अंतहीन ख़ामोशी... एक गूंगा मौन...
ये शब्द ही तो हैं जिनसे आप किसी का दिल जीत लेते हैं और जाने अनजाने किसी का दिल दुखा भी देते हैं... ये शब्द ही तो हैं जो किसी को आपका दोस्त बना देते हैं तो किसी को आपका दुश्मन... ये शब्द ही तो होते हैं जो आपकी सोच को एक आकार देते हैं और कोई प्यारी सी नज़्म बन कर कागज़ पर बिखर जाते हैं... ये शब्द कभी दवा तो कभी दुआ बन कर हमारे साथ रहते हैं... और ये शब्द ही तो होते हैं जो दो लोगों को आपस में बाँध कर रखते हैं, उनके रिश्ते को एक मज़बूत नींव देते हैं... है ना ?
कहते हैं शब्दों में बड़ी ताक़त होती है... किसी बीमार इंसान से बोले गए प्यार और परवाह के चंद शब्द उसके लिये दवा से भी बढ़ कर काम करते हैं... नाउम्मीदी के दौर से गुज़र रहे किसी शख्स से बोले गए कुछ उत्साहवर्धक शब्द उसे उम्मीद की किरण दिखा जाते हैं... आपस में मिल बैठ कर सूझबूझ से की गयी बातचीत बड़ी से बड़ी समस्याओं का समाधान ढूंढ देती है... सहानुभूति के चंद लफ्ज़ किसी के ज़ख्मों पर मरहम का सा असर करते हैं और सच्चे दिल से माफ़ी के लिये बोले गए कुछ बोल किसी टूटते रिश्ते को बचा लेते हैं...
ये लफ्ज़ों का ही पुल है जो हर रिश्ते को जोड़े रखता है... एक ऐसा पुल जिसके दोनों सिरे एक रिश्ते से जुड़े दो इंसानों को बांधे रखते हैं... पर कभी कभी हम शब्दों की जगह मौन का सहारा ले लेते हैं... अपने रिश्ते के बीच हम अपने अहं को ले आते हैं...  और उस एक इंसान से, जिससे हम दुनिया में शायद सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं, बात करना बन्द कर देते हैं... हम चाहते हैं की सामने वाला हमारी ख़ामोशी को समझे... लेकिन वो कहते हैं ना कि "मुंह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन, आवाजों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन"...  इसलिए आइये लफ्ज़ों के इस पुल को टूटने ना दें... किसी भी रिश्ते में कोई भी ग़लतफहमी ना पलने दें... अपने अहं को अपने रिश्तों से बड़ा कभी ना होने दें... चुप ना रहें... बात करें और अपने बिखरते रिश्ते को बचा ले... क्यूंकि जैसे जैसे बातें कम होती जाती है, शब्द शिथिल पड़ते जाते हैं, ये पुल भी कमज़ोर होता जाता है और जिस दिन ये लफ्ज़ों का पुल टूटा समझो वो रिश्ता भी मर जाता है...

निदा फाज़ली जी ने इक ऐसे ही बिखरे हुए रिश्ते को इस नज़्म में पिरोया है जहाँ लफ्ज़ों का ये पुल टूट चुका है -




Tuesday, October 20, 2009

मोतबर रिश्ते... मुख्तसर रिश्ते...

एक बच्चा जब इस संसार में अपनी पहली साँस लेता है तो उसके साथ ही बहुत सारे रिश्ते उससे जुड़ जाते हैं... माँ, बाबा, भाई, बहन, दादा, दादी, नाना, नानी और ऐसे ही तमाम रिश्ते जो उस नन्हें से बच्चे को अपने जन्म के साथ ही मिल जाते हैं... ये खून के वो रिश्ते होते हैं जो ता-उम्र उसके साथ रहते हैं... ज़िन्दगी के हर ऊंचे-नीचे, टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर उसका हाथ थामे ख़ामोशी से उसके साथ चलते रहते हैं... उस बच्चे को तो इस बात का एहसास भी नहीं होता कि उसका बोला हुआ पहला शब्द और उसका बढ़ाया हुआ पहला कदम उन तमाम रिश्तों, उन लोगों के बिना शायद मुमकिन भी ना होता... पर कभी कभी इनमें से कुछ रिश्ते समय के साथ अपनी मिठास खो देते हैं... कड़वे हो जाते हैं... फिर भी उन्हें निभाना पड़ता है, भले ही उनसे मन मिले या ना मिले... क्यूंकि ये वो रिश्ते होते हैं जिन पर आपका कोई बस नहीं चलता... जो आप अपने लिये नहीं चुनते हैं बल्कि इन्हें आपके लिये आपका भाग्य चुनता है... आपको सिर्फ़ निभाना होता है...
फिर जैसे जैसे वो बच्चा बड़ा होता जाता है कुछ और रिश्ते उससे जुड़ जाते हैं... वो रिश्ते जिन्हें वो खुद चुनता है - उसके दोस्त... दोस्ती इस संसार का सबसे अनूठा रिश्ता है... एक ऐसा रिश्ता है जो तमाम खून के रिश्तों से भी ज़्यादा घनिष्ठ और प्रिय हो जाता है कभी कभी... आप भले ही एक बार अपने घर वालों की बात ना मानें पर अगर आपका सच्चा दोस्त आपसे कुछ कहता है तो आप उसे ज़रूर मानते हैं... है ना ? दोस्त होते ही ऐसे हैं... आपकी ख़ुशी में खुश... आपके ग़म में उदास... आपकी हर गलती पर आपको डाटते भी हैं तो आपकी हर बुराई को जानते हुए भी आपसे प्यार करते हैं... और आपकी ताक़त बन कर हर कदम पर आपके साथ होते हैं... कभी भी कहीं भी :-)
और फिर एक दिन वो नन्हा सा बच्चा एक परिपक्व इंसान बन जाता है... विवाह होता है और एक बार फिर वो तमाम सांसारिक रिश्तों और बन्धनों में बंध जाता है... ये रिश्ते भी बाकी रिश्तों की तरह ही कभी ख़ुशी तो कभी कड़वाहट ले कर आते हैं...
इन सब रिश्तों के बीच कभी कभी एक ऐसा रिश्ता भी बन जाता है किसी से, जिसे आप खुद समझ नहीं पाते... उस रिश्ते का क्या नाम है... क्यूँ वो एक अनजान इंसान आपके लिये अचानक इतना प्रिय और ख़ास हो जाता है, पता नहीं... और आप पता करना भी नहीं चाहते... बस उससे बात करना, उसके साथ समय बिताना अच्छा लगता है... ये जानते हुए भी की उस रिश्ते का कोई अस्तित्व नहीं है... वो कब तक आपके साथ रहेगा और कब अचानक साथ छूट जाएगा पता नहीं... पर आप कुछ सोचना नहीं चाहते... कुछ समझना नहीं चाहते... क्या ग़लत है क्या सही मालूम नहीं... बस उन साथ बिताये हुए कुछ पलों में तमाम उम्र जी लेना चाहते हैं... कुछ यादें बटोर लेना चाहते हैं... कुछ हँसी, कुछ मुस्कुराहट समेट लेना चाहते हैं... ज़िन्दगी भर के लिये...
गुलज़ार साब ने ऐसे ही किसी रिश्ते को अपनी इस नज़्म के ताने बाने में बुना है...



Monday, August 10, 2009

इन बूढ़े पहाड़ों पर, कुछ भी तो नहीं बदला




aaj aapke saath kuchh bahot khaas aur anootha share karne ja rahi hun... yun to ek baar phir gulzar sa'ab ki hi nazm le kar aayi hun par is baar ekdum juda andaaz ki nazm hai... ise jab pehli baar humne padha to laga ki koi kahani padh rahe hain... wo bhi itni jeevant ki har line ke saath aankhon ke saamne koi scene chal raha ho jaise...

"In Boodhe Pahadon Par, Kuchh Bhi To Nahi Badla"... haan shayad sach hi to hai sadiyon se sab kuchh waise hi hai... wahi pahad, wahi barf, wahi jharne, wahi jungle aur wahi aadamkhor bhediya... jise har baar gaaon waale maar dete hain par wo na jaane kaise phir laut aata hai... puri nazm me yun to sirf pahadon aur wahan ki zindagi ki vyaakhaya hai par agar samjha jaaye to gulzar sa'ab ne bahot gehri baat kahi hai uske madhyam se... wo bhediyaa aakhir hai kya? shayad humaare andar chhupi hui buraayi... aur jab tak wo buraayi ka bhediya humaare andar chhupa rahega uska ant mumkin nahi hai... wo har baar isi tarah se wapas aata rahega aur humen marta rahega...

to leejiye ru-ba-ru hoiye is khoobsoorat nazm se aur haan ek baat aur kehna chahungi jab ise pehli baar padha tha to ye socha bhi nahi tha ki ise gaaya bhi ja sakta hai wo bhi itne behtreen andaaz me... par vishal bharadwaaj ji ne ise apni dhun de kar ke aur suresh wadekar ji ne apni aawaaz se saja kar aur bhi jeevant bana diya hai... ab aur kuchh nahi kahungi... aap nazm aur geet dono ka lutf uthaaiye... hum chalte hain... haan agar aapko bhi pasand aaye to bata zaroor deejiyega...



इन बूढ़े पहाड़ों पर, कुछ भी तो नहीं बदला
सदियों से गिरी बर्फ़ें
और उनपे बरसती हैं
हर साल नई बर्फ़ें
इन बूढ़े पहाड़ों पर....

घर लगते हैं क़ब्रों से
ख़ामोश सफ़ेदी में
कुतबे से दरख़्तों के

ना आब था ना दानें
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गईं जानें

कुछ वक़्त नहीं गुज़रा नानी ने बताया था
सरसब्ज़ ढलानों पर बसती थी गड़रियों की
और भेड़ों की रेवड़ थे

ऊँचे कोहसारों के
गिरते हुए दामन में
जंगल हैं चनारों के
सब लाल से रहते हैं
जब धूप चमकती है
कुछ और दहकते हैं
हर साल चनारों में
इक आग के लगने से
मरते हैं हज़ारों में !
इन बूढ़े पहाड़ों पर...

चुपचाप अँधेरे में अक्सर उस जंगल में
इक भेड़िया आता था
ले जाता था रेवड़ से
इक भेड़ उठा कर वो
और सुबह को जंगल में
बस खाल पड़ी मिलती।

हर साल उमड़ता है
दरिया पे बारिश में
इक दौरा सा पड़ता है
सब तोड़ के गिराता है
संगलाख़ चट्टानों से
जा सर टकराता है

तारीख़ का कहना है
रहना चट्टानों को
दरियाओं को बहना है
अब की तुग़यानी में
कुछ डूब गए गाँव
कुछ गल गए पानी में
चढ़ती रही कुर्बानें
अलग़ोज़ा की वादी में
भेड़ों की गई जानें

फिर सारे गड़रियों ने
उस भेड़िए को ढूँढ़ा
और मार के लौट आए
उस रात इक जश्न हुआ
अब सुबह को जंगल में
दो और मिली खालें

नानी की अगर माने
तो भेड़िया ज़िन्दा है
जाएँगी अभी जानें
इन बूढ़े पहाड़ों पर कुछ भी तो नहीं बदला...

-- गुलज़ार


Monday, July 20, 2009

सादा कैन्वस पे उभरते हैं बहुत से मंज़र...


kuchh dino pehle gulzar sa'ab ki ek bahot hi khoobsoorat nazm padhi jo unhone abhi haal hi me likhi hai... bahot hi khoobsoorti se unhone jeevan ke tamaam rangon ko apne nazm roopi canvas pe utaara hai... isme jeevan ka har rang hai prakriti ka adbhut saundarya hai, baalman ki nishchhalta hai, ek boodhi bhikhaarin ki bebasi hai aur ek nayi naveli dulhan ki alhadta bhi hai... padhte padhte nazm ke ye tamaam rang aapke chehre par bhi ubhar aate hain... kabhi aapke honthon pe ek meethi si muskan chhod jaate hain to kabhi dil me ek tees si uthti hai... aap bhi padhiye aur jeevan ke in tamaam rango me saraabor ho jaaiye...




एक सनसेट है, पके फल की तरह
पिलपिला रिसता, रसीला सूरज
चुसकियाँ लेता हूँ हर शाम लबों पे रखकर
तुबके गिरते हैं मेरे कपड़ों पे आ कर उसके

एक इमली के घने पेड़ के नीचे
स्कूल से भागा हुआ बोर-सा बच्चा
जिस को टीचर नहीं अच्छे लगते
इक गिलहरी को पकड़ के
अपनी तस्वीरें किताबों की दिखा कर खुश है

मेरे कैन्वस ही के ऊपर से गुज़रती है सड़क इक
एक पहिया भी नज़र आता है टाँगे का मुझे
कटकटाता हुआ एक सिरा चाबुक का
घोड़े की नालों से उड़ती हुई चिनगारियों से
सादा कैन्वस पे कई नुक्ते बिखरते हैं धुएँ के।

कोढ़ की मारी हुई बुढ़िया है इक गिरजे के बाहर
भीख का प्याला सजाए हुए, गल्ले की तरह,
माँगती रहती है ख़ैरात 'खुदा नाम' पे सब से।
जब दुआ होती है गिरजे में तो बाहर आकर
बैठ जाता है खुदा गल्ले पे, ये कहते हुए
आज कल मंदा है, इस नाम की बिक्री कम है।

'क़ादियाँ' कस्बे की पत्थर से बनी गलियों में
दुल्हनें 'अलते' लगे पाँव से जब
काले पत्थर पे क़दम रखती हुई चलती हैं
हर क़दम आग के गुल बूटे से बन जाते हैं!
देर तक चौखटों पे बैठे, कुँवारे लड़के
सेंकते रहते हैं आँखों के पपोटे उनसे।

नीम का पेड़ है इक-
नीम के नीचे कुआँ है।
डोल टकराता हुआ उठता है जब गहरे कुएँ से
तो बुजुर्गों की तरह गहरा कुआँ बोलता है
ऊँ छपक छपक अनलहक़
ऊँ छपक छपक अनलहक।

-- गुलज़ार
( ४ मई २००९ )

( Painting by : Belgian Linen )

Monday, June 29, 2009

पहली बारिश... बांवरा मन...


aakhirkaar itne intezaar aur minnaton ke baad indr dev prasaan hue aur monsoon ki pehli baarish kuchh yun barsi ki ped paudhe, tan man, mausam, fizaayen...saari kaynaat sab dhul ke naye navele ho gaye...yun nikhar gaye maano abhi abhi beauty parlour se saj dhaj ke nikle ho :-) ... aaj subah office aate samay jab cantt se gaadi drive karte hue aa rahe the to dhule dhule pedon ki ajeeb si madhosh kar dene waali mehek aur mitti ki saundhi saundhi khushbu se dil itna khil utha ki man ho raha tha door tak bas yun hi drive karte rahen... office jaayen hi nahin... man to man hai... mausam ke saath banwra ho gaya tha itne me haath ki ghadi pe nazar padi aur man maar ke office ki taraf mudna pada...
ab physically to office me aa gaye hain but kaam karne me man nahi lag raha hai... office ki khidki se bahar padti bauchharon ko dekh dekh kar baarish me bheegne ka man ho raha hai... waise ek baar bahar ka chakkar laga kar aa bhi chuke hain :-)... aur ek hi khyaal man me aa raha hai baarish ki boondon ki aawaaz se madhur bhi kya koi sangeet hota hai ??
itne suhane mausam me parvin shakir ji ki ek nazm yaad aa rahi hai... leejiye aap bhi padhiye aur lutf uthaaiye...

वही मौसम है
बारिश की हँसी
पेडों में छन छन गूंजती है
हरी शाखें
सुनहरे फूल के ज़ेवर पहन कर
तसव्वुर में किसी के मुस्कुराती हैं
हवा की ओढ़नी का रंग फिर हल्का गुलाबी है
शनासा बाग़ को जाता हुआ खुश्बू भरा रास्ता
हमारी राह ताकता है
तुलु-ए-माह की साअत
हमारी मुन्तज़िर है

-- परवीन शाकिर

शनासा : परिचित; तुलु-ए-माह : सूर्योदय; साअत : समय

Monday, June 22, 2009

साहिल


bachpan ki yaadein ta-umr humare saath rehti hain... wo sara sara din befikri se khelna, na koi chinta na koi fikr, bas khana, peena, sona aur mast rehna... tamam duniyavi rishton se pare wo nishchhal, nishkapat vaatsalya sab par lutana aur apni ek muskan ke badle har kisi se wo dher sara pyar pana... sach insan ki zindagi ke wo sabse khoobsoorat lamhe hote hain par unki ehmiyat humen bade hokar hi pata chalti hai... bachpan me baarish ki ek boond girte hi kaise man machal uthta tha aur bas ghar me dhundhne lagte the raddi kagaz ka ek tukda... ya kabhi purani kisi copy se panna phaad kar jut jaate the bas kagaz ki ek nanhi si kashti banane aur ghar ke bahar bhare hue baarish ke paani me use taira kar der tak taakte rehte the ki kidhar ja rahi hai humari naav... kabhi aadhe raste ulat kar pani me doob jaati to man achanak udaas ho jata aur raah chalta koi use seedha kar ke phir se taira deta us maile kuchaile se pani me to man ek baar phir khil uthta... aah! wo masoom bachpan aur wo seedha-saral baalman, aaj socho to hansi aati hai... kya kabhi aapne bachpan me kaagaz ki naav banaate samay ye socha tha ki ek bemani se raddi kagaz ko aap koi maane de rahe hain... humne bhi nahi socha tha... par gulzar sa'ab ki is nazm ne humen aaj us kagaz ki naav ko ek naye nazariye se dekhne aur samajhne ka mauka diya...



Friday, May 22, 2009

शतरंज


aaj aapke saath kuchh alag sa share karne ja rahi hun, ummed karti hun pasand aayega.
shatranj ke khel se to aap sabhi waakif honge. kis tarah chausath khaano ki bisaat par aadhi-tirchhi chaalen chalte hue ek raja aur uski sena jeet jaati hai aur ek ke hisse me sirf maat aati hai.
aaiye shatranj ke is khel ko ek shayar ke nazariye se dekhte hain. gulzar sa'ab ne bahot hi khoobsoorti se ise shabdon me piroya hai. aaj ye shatranj ki baazi lagi hui hai bhagwaan aur ek aam insaan ke beech.

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने

काले घर में सूरज रख के तुमने शायद सोचा था
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे
मैंने इक चिराग जला कर
अपना रास्ता खोल लिया

तुमने एक समंदर हाथ में लेकर मुझ पर ढेल दिया
मैंने नूँह की कश्ती उसके ऊपर रख दी
काल चला तुमने, और मेरी जानिब देखा
मैंने काल को तोड़ के लम्हा लम्हा जीना सीख लिया

मेरी खुदी को तुमने चंद चमत्कारों से मारना चाहा
मेरे एक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया
मौत की शह देकर तुमने समझा था, अब तो मात हुई
मैंने जिस्म का खोल उतार कर सौंप दिया और रूह बचा ली

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी ...

-- गुलज़ार



isi shatranj ke khel pe javed akhtar ji ka ek mukhtalif nazariya hai. zindagi ki is bisaat pe hum sab ek mohre ki tarah hain, jo saari zindagi chaalen chalte hue aage badhte rehte hain, har roz ek jang ladte rehte hain, khud apne aap se aur apne apno se, aur arjun ke teer ki tarah humara sirf ek lakshya hota hai, machhli ki aankh ko bhednaa. to aaiye roobaroo hote hain ek mohre ke safar se aur dekhte hain is zindagi ki baazi me us adna se mohre ki jeet hoti hai ki haar...



जब वो कम उम्र ही था
उसने ये जान लिया था
कि अगर जीना है
बड़ी चालाकी से जीना होगा
आँख कि आखिरी हद तक है बिसात-ऐ-हस्ती
और वो एक मामूली मोहरा है
एक एक खाना बहुत सोच के चलना होगा
बाज़ी आसान नहीं थी उसकी
दूर तक चारों तरफ़ फ़ैले थे
मोहरे
जल्लाद
निहायत सफ़्फ़ाक
सख्त
बेरहम
बहुत ही चालाक
अपने हिस्से में लिये पूरी बिसात
उसके हिस्से में फ़क़त मात लिये
वो जिधर जाता था उसे मिलता था
हर नया खाना नई घात लिये
वो मगर बचता रहा
चलता रहा
एक घर
दूसरा घर
तीसरा घर
पास आया कभी औरों के
कभी दूर हुआ
वो मगर बचता रहा
चलता रहा
गो कि मामूली सा मोहरा था मगर जीत गया
यूँ वो एक रोज़ बड़ा मोहरा बना
अब वो महफूज़ है एक खाने में
इतना महफूज़ कि दुश्मन तो अलग
दोस्त भी पास आ नहीं सकते

उसके एक हाथ में है जीत उसकी
दूसरे में तन्हाई है

-- जावेद अख्तर

Thursday, May 14, 2009

लॉकेट


मुझको इतने से काम पे रख लो

जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको

मुझको इतने से काम पे रख लो

जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
आह ! चुभता है ये अलग कर दो

मुझको इतने से काम पे रख लो

जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है

मुझको इतने से काम पे रख लो

'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है
लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है
मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा

मुझको इतने से काम पे रख लो

-- गुलज़ार

Gulzar sa'ab ki is behad khoobsoorat nazm ko Suresh Wadekar ji ne apni reshmi aawaaz de kar chaar chaad laga diye hain, aap bhi suniye aur khud decide kariye...

Sunday, May 10, 2009

माँ


"माँ" is srishti ka sabse meetha shabd aur sabse pyara rishta. kehte hain bachcha jab bolna seekhta hai to sabse pehle wo maa hi bolta hai... aur uski saari duniya maa ke aaspaas hi hoti hai...
wo maa hi hoti hai jo ek nanhe se bachche ki hasi se, uske rone se, ye jaan leti hai ki wo bachcha, jo bol bhi nahi sakta, wo kya kehna chaah raha hai... kab use bhookh lagi hai, kab use dard ho raha hai aur kab wo sirf ban ke ro raha hai apni maa ka dhyaan apni oor kheechne ke liye... aaj "Mother's Day" par maa aur maatritwa ke is jazbe ko salaam karti hui nida fazli ji ki ek nazm aap sabke saath share karna chahti hun jo mujhe bahot pasand hai, ummed karti hun aapko bhi pasand aayegi.




बेसन की सोंधी रोटी पर
खट्टी चटनी जैसी माँ
याद आती है चौका-बासन
चिमटा, फुकनी जैसी माँ

बांस की खुर्री खाट के ऊपर
हर आहट पर कान धरे
आधी सोयी आधी जागी
थकी दुपहरी जैसी माँ



चिड़ियों के चहकार में गूँजे
राधा-मोहन, अली-अली
मुर्गे की आवाज़ से खुलती
घर की कुण्डी जैसी माँ



बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन
थोड़ी थोड़ी सी सब में
दिन भर एक रस्सी के ऊपर
चलती नटनी जैसी माँ



बाँट के अपना चेहरा, माथा,
आँखें जाने कहाँ गई
फटे पुराने एक एल्बम में
चंचल लड़की जैसी माँ

-- निदा फाज़ली


Thursday, May 7, 2009

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो


धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
ज़िन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो

सिर्फ़ आँखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती
दिल की धड़कन को भी बीनाइ बनाकर देखो

पत्थरों में भी ज़ुबां होती है दिल होते हैं
अपने घर के दरो-दीवार सजाकर देखो

वो सितारा है चमकने दो यूँ ही आँखों में
क्या ज़रूरी है उसे जिस्म बनाकर देखो

फ़ासला नज़रों का धोखा भी तो हो सकता है
चाँद जब चमके ज़रा हाथ बढ़ाकर देखो

-- निदा फाज़ली

Sunday, May 3, 2009

शाम


aaj aapko faiz ji ki ek bahot hi khoobsurat si nazm se roobaru karwane ja rahe hain jise humne haal hi me padha internet pe.. achhi lagi to socha aap sab ke saath share karen... aapko bhi achchhi lage to bataaiyega zaroor...







इस तरह है कि हर एक पेड़ कोई मंदिर है
कोई उजड़ा हुआ बेनूर पुराना मंदिर
ढूंढता है जो ख़राबी के बहाने कब से
चाक हर बाम, हर एक दर का दम-ए-आख़िर है
आसमां कोई पुरोहित है जो हर बाम तले
जिस्म पर राख मले, माथे पे सिंदूर मले
सर-निगूं बैठा है चुपचाप न जाने कब से

इस तरह है कि पस-ए-पर्दा कोई साहिर है
जिसने आफ़ाक पे फैलाया है यूँ सहर का दाम
दामन-ए-वक़्त से पैवस्त है यूँ दामन-ए-शाम
अब कभी शाम ढलेगी, न अँधेरा होगा
अब कभी रात बुझेगी, न सवेरा होगा

आसमां आस लिए है कि ये जादू टूटे
चुप की ज़ंजीर कटे, वक़्त का दामन छूटे
दे कोई शंख दुहाई, कोई पायल बोले
कोई बुत जागे, कोई सांवली घूँघट खोले

-- फैज़ अहमद फैज़

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Seems like each tree is a temple,
an ancient temple in ruins,
and is seeking excuses to tremble,
who knows since when,
with its roof cracked
doors lost to old winds.
The sky seems like a priest,
ashes smeared on its body,
saffron smudged on its forehead.

Like a magician behind a curtain
it is sitting silently who knows since when.
It has hypnotized time casting an evening net -
the evening will not cease now
nor will go the darkness,
night will not come now
nor will the morning dawn.

The sky's waiting for this spell to be broken
that the chains of silence are cut
and time is freed from it net;
that someone blows a conch to wake up an idol,
that some dark goddess unveils its face
and its anklets echoing, it dances.

-tr. Ravi Kopra

Friday, April 10, 2009

हर लम्हा मुझमें बनता बिखरता हुआ सा कुछ...


देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ

होता है यूँ भी, रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ

साहिल की गीली रेत पे बच्चों के खेल सा
हर लम्हा मुझमें बनता, बिखरता हुआ सा कुछ

फुर्सत ने आज घर को सजाया है इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ

धुंधली सी इक याद किसी कब्र का दिया
और, मेरे आस-पास चमकता हुआ सा कुछ

-- निदा फाज़ली

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