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Thursday, September 3, 2015

छाप तिलक सब छीनी...!!!



जानते हो दोस्त जब तुमसे पहली बार बात हुई थी जाने क्यूँ कोई स्पेशल कनेक्ट फील हुआ था उसी दिन... एक अजीब सा खिंचाव... ऐसा जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता... ऐसा पहले कभी नहीं हुआ.. किसी के भी साथ... तुमसे भागने की बहुत कोशिश करी मैंने... कितने बहाने बनाये... दिल को समझाने के... पर दिल नहीं माना... तुम किसी फरिश्ते कि तरह आये मेरी ज़िंदगी में... और उसे बेहद खूबसूरत बना दिया... अपने रंगों में रँग के...

पाता है मैं कुछ कुछ तुमसी होती जा रही हूँ आजकल... और तुम मुझसे... सोचो तो हँसी भी आती है और प्यार भी... तुम इमोशनल होते जा रहे हो और मैं प्रैक्टिकल... इस रोल रिवर्सल में बड़ा मज़ा आ रहा है इन दिनों... ऐसा भी नहीं है की तुम पहले इमोशनल नहीं थे.. हाँ इतने एक्सप्रेसिव नहीं थे जितने आजकल हो रहे हो... अच्छा लगता है तुम्हारे मुँह से सुनना की तुम मुझे मिस कर रहे हो... कि फलां-फलां काम करते हुए तुम्हें मेरी याद आयी... जैसे मेरी ज़िन्दगी के हर लम्हे में तुम बसे हुए हो.. अब मैं भी शामिल होने लगी हूँ तुम्हारी ज़िन्दगी के लम्हों में...

पर आजकल ना दिन कुछ अच्छे नहीं जा रहे... एक बार फिर से हम बहुत बहस करने लगे हैं... बात बात पे... जाने क्यूँ हर कुछ टाइम बाद ज़िन्दगी में ये फेज़ वापस आ जाता है... हमें बिलकुल अच्छा नहीं लगता.. पर जितना इससे निकलने की कोशिश करो उतना ही और फँसते जाते हैं इसमें किसी दलदल की तरह... पर तुम हो मेरे साथ और मुझे भरोसा है की निकाल ही लोगे हमें इस दलदल से और ये फेज़ भी बीत जायेगा...

जानते हो इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक तुम हो जो मुझे इतना रुलाते हो... इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक तुम हो जिसे ये हक़ है... इस पूरी दुनिया में सिर्फ़ एक तुम हो जिसे मैं इतना प्यार करती हूँ...

रात के इस पहर तुम्हारी बड़ी याद आ रही है... मेरा कमरा मानो कोई बड़े से बाइस्कोप में तब्दील हो गया है और तुम्हारे साथ गुज़रे हर खट्टे मीठे लम्हों की रील किसी फ़िल्म के जैसे इसकी दीवारों पर चल रही है... आँखें ख़ुशी से भर आयी हैं ये सब एक बार फिर से महसूसते... दिल से ढेर सारी दुआ निकल रही है तुम्हारे लिये... तुम्हारी पेशानी चूम के वो सब तुम तक पहुँचा दी हैं... क़ुबूल करो...!

Wednesday, September 3, 2014

जैसे कोई किनारा देता हो सहारा... मुझे वो मिला किसी मोड़ पर...!



तुमसे जितना झगड़ती हूँ प्यार उतना ही बढ़ता जाता है... रोती हूँ तो सपने धुल के नये से हो जाते हैं.. कुछ और चमकीले... तुम्हारे साथ हँसती हूँ तो उन सपनों में इन्द्रधनुषी रँग भर जाते हैं... तुम्हें हँसता देखती हूँ तो उनमें जान आ जाती है... हम तीनों मिल कर जी उठते हैं फिर से... तुम.. मैं और हमारे सपने...!

तुम्हारी मुस्कुराहट को पेंट करने का दिल करता है कभी कभी... काँच सी पारदर्शी तुम्हारी आँखें... उतना चमकदार रँग बना ही नहीं जो उन्हें कैनवस पे उतार सके... कभी कभी सोचती हूँ तुम्हारी रूह को एक काला टीका लगा दूँ... कहाँ बची हैं अब इतनी पाकीज़ा रूहें धरती पर... कहाँ रह गये हैं इतने साफ़ दिल इंसान...

मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... तुम्हें देखते हुए... तुमसे झगड़ते हुए... तुम्हें प्यार करते हुए.... उम्र के उस पड़ाव पर जब घुटनों में दर्द रहा करेगा... तुम्हारे गले में बाहें डाल मैं थिरकना चाहती हूँ तुम्हारी धड़कनों की सिम्फनी पे... मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारा हाथ पकड़ के... तब जब ये दुनिया वाले शायद हमें शक की निगाहों से ना देखें... मैं पूरी दुनिया घूमना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... वो सारे ड्रीम डेस्टिनेशंस जहाँ जाने का सपना हमने मिल कर देखा था... क्या तुम मुझे बाइक पर बिठा के एक लॉन्ग ड्राइव पर ले चलोगे तब... मैं महसूस करना चाहती हूँ हवा को अपने बूढ़े हो चले सफ़ेद बालों में...

मैं एक छोटा सा घर बनाना चाहती हूँ... किसी पहाड़ी गाँव में... जहाँ हम दोनों बुड्ढे बुढिया मिल कर बागवानी करेंगे... जंगल से लकड़ी बिन के लायेंगे... चूल्हे में खाना बनायेंगे... कच्ची पक्की रोटियाँ सेकेंगे... प्रकृति की सुंदरता निहारेंगे... चिड़ियों को दाना खिलायेंगे और सारा दिन फ़ुर्सत से बैठ कर सिर्फ़ बातें करेंगे...

आज सुबह से ही शहर का मौसम खुशनुमा सा है... कुछ अच्छा सा करने का दिल हो रहा है... तो इस खूबसूरत से दिन उस ऊपर वाले का शुक्रिया करना चाहती हूँ... तुम्हें मेरी ज़िंदगी में लाने के लिये... तुमसे मेरी ज़िंदगी खूबसूरत है दोस्त... तुमसे ही इस ज़िंदगी को मानी मिले हैं...!

मेरे पसंदीदा गीत तुम हो... तुम्हारा पसंदीदा गीत तुम्हारे लिये...


Wednesday, April 9, 2014

तुम्हारी बातों में कोई मसीहा बसता है...!



तुमसे बात करना हर रोज़ डायरी लिखने जैसे है... सारे दिन की उथल पुथल... मन के सारे अजीब-ओ-गरीब ख्य़ाल... दुविधाएँ... व्याकुलता... ख़ुशियों के छोटे छोटे लम्हें... सब कुछ तुम्हें बता के, तुम्हें सौंप के... ख़ुद को एकदम खाली कर देने जैसा... फिर से एक नये दिन के नये अनुभव इकट्ठे करने के लिये... जानते हो ना लिखने के मामले में थोड़ा आलसी हूँ... सो तुमसे ही काम चला लेती हूँ... जिस दिन तुम नहीं मिलते लगता है कितना कुछ रह गया है भीतर ही... जिसे निकलना था बाहर... जो तुम्हें बताना था... मन सारा दिन बेचैन रहता है...

तुमसे बात करना सारे दिन की थकन के बाद अपना पसंदीदा संगीत सुनते हुए शाम की ठंडी हवा में बैठ के इलायची वाली चाय पीने जैसा है... रिलैक्सिंग ! मन को नयी स्फूर्ति से भर देने वाला...

तुमसे बातें करना ऐसे है जैसे लू भरी दोपहर में ठन्डे पानी का एक घूँट मिल जाना... आत्मा को तृप्त कर देने जैसा... चिलचिलाती धूप में बरगद की विशाल छाया मिल जाने जैसा...

तुमसे बात करना किसी उमस भरी शाम पानी के पोखर में पैर डाल के घंटों बैठे रहने जैसा है... ठंडक तलवों से होते हुए कब मन तक पहुँच जाती है पता ही नहीं चलता...

तुमसे बात करना कोई तस्वीर पेंट करने जैसा है... मन के सारे रँग कैनवस पे उकेर देने जैसा... हल्के आसमानी... गहरे हरे... सुर्ख़ लाल...

तुमसे बात करना सृजन करने जैसा है... किसी बच्चे को जन्म देने जैसा... ख़ुद को परिपूर्ण करने जैसा...

तुमसे बात करना सिर्फ़ तुम्हारे साथ समय बिताने का एक निमित्त मात्र है... जिसे किसी भी वजह की ज़रूरत नहीं होती...

सांझ ढले तुम्हारी आवाज़ कानों में घुलती है तो दिन भर में मन पर उभर आयी सारी ख़राशों पर मलहम सा लग जाता है...

मानती हूँ हम बहुत झगड़ने लगे हैं इन दिनों... पर एक आदात जो हम दोनों में एक सी है... बुरे पल हम कभी याद नहीं रखते... तुम्हारी यादों की भीनी गलियों में उन पलों को आने की इजाज़त नहीं है... वहाँ सिर्फ़ तुम्हारी मिठास बसती है... और तुम... मुस्कुराते हुए... गुनगुनाते हुए... बादल बिजली... चन्दन पानी... जैसा अपना प्यार...!


Monday, September 2, 2013

तेरा ज़िक्र है या इत्र है...


तुम्हारा वजूद मेरे चारों ओर बिखरा हुआ है… कुछ भी करती हूँ तो जाने कहाँ से तुम चले आते हो… पेड़ों को पानी दे रही होती हूँ तो तुम पानी का पाइप छीन कर मुझे भिगो देते हो… खाना बना रही होती हूँ तो आ कर पीछे से जकड़ लेते हो बाहों में... कोई गाना सुन रही होती हूँ तो उसमें भी किरदार की जगह तुम ले लेते हो… कोई इमेज सर्च करती हूँ गूगल पे तो तुम्हारी यादें घेर लेती हैं आ के… तुमसे मिलने के बाद आज तक कभी अकेले चाय-कॉफ़ी नहीं पी पायी हूँ… कप से पहला सिप हमेशा तुम लेते हो…

पीले गुलाब की ख़ुशबू... पूरनमासी का चाँद... झील... पहाड़... झरने... जंगल... बर्फ़... पानी... रेत... सागर… क्या क्या भूलूँ मैं और कैसे भूलूँ... साँस लेना भूल सकता है क्या कोई ?

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जानते हो जब भी तैयार होकर आईने के सामने खड़ी होती हूँ तो "मैं" "तुम" में तब्दील हो जाती हूँ... ख़ुद को तुम्हारी नज़र से देखती हूँ... खूबसूरत हो जाती हूँ… ख़ुद पर ही रीझती हूँ... ख़ुश होती हूँ... मुस्कुरा उठती हूँ...

वो देखा होगा न पिक्चरों में… कैसे एक इंसान के अन्दर दो आत्माएं रहती हैं... एक सफ़ेद और एक काली… एक अच्छी एक बुरी… एक सही एक ग़लत… मेरे अन्दर भी दो लोग रहते हैं… "तुम" और "मैं"… अच्छे वाले "तुम" और बुरी वाली "मैं"…

सुना है अंत में जीत हमेशा अच्छाई की होती है…

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मैं रोती हूँ तो आँसू बन कर तुम गालों पे ढुलगते हो… हँसती हूँ तो होठों पर मुस्कराहट बन तुम महकते हो… दिल धड़कता है कि इसमें तुम रहते हो… साँसे चलती हैं कि उन्हें पता है दूर कहीं तुम साँस ले रहे हो… अपनी ज़िन्दगी में ख़ुश हो… आगे बढ़ चुके हो…

तुमने बहुत देर कर दी जान… बस दो कदम पहले बता देते मुझे तो मैं संभाल लेती ख़ुद को… पर अब तुम इस क़दर आत्मसात हो चुके हो मुझमें कि तुमसे दूरी बना पाना बहुत मुश्किल हो रहा है… हर पल तुम्हें ही सोचते रहने के बाद ये दिखाना कि तुम्हें अब पहले की तरह नहीं याद करती… कि पहले के जैसे महसूस नहीं करती तुम्हारे बारे में… कि मैं ख़ुश हूँ… कि मन को किसी और काम में उलझा लिया है…

तुमसे झूठ भी तो नहीं बोल सकती… लड़ सकती हूँ… सो लड़ रही हूँ…  तुमसे…  ख़ुद से… ज़िन्दगी से…

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कब क्यूँ कहाँ कैसे किसलिए… सवालों की फ़हरिस्त लम्बी है… जवाब बस इतना भर कि ज़िन्दगी है… और तुम्हें सज़ा मिली है जीने की… "यू हैव टू लिव टिल डेथ" दूर कहीं ये कह के कलम तोड़ दिया किसी ने…

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कभी कभी सोचती हूँ मीरा के बारे मे… अजीब दीवानी थी… बिलकुल नॉन-प्रैक्टिकल… कोई ऐसे किसी के प्यार में अपना घर-द्वार सारा सँसार भूल बैठता है क्या… सिर्फ़ उसका नाम लेकर ज़हर का प्याला पी लेना कोई समझदारी है क्या… वो न समझता उसके प्यार को तो… मर जाती तो… उसे फ़र्क पड़ता क्या…

कभी मैं पी लूँ ज़हर तुम्हारे प्यार में तो… तुम आओगे क्या बचाने ?


Thursday, August 15, 2013

प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गये...!


प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गये
आप से फिर तुम हुए फिर तू का उन्वां हो गये


मेहदी हसन साहब ने अपनी रेशमी आवाज़ में ये गाते हुए बेहद गहरी सोच में डाल दिया... क्या यूँ सारे तकल्लुफ़ मिट जाना सही है... क्या थोड़ा तकल्लुफ़, थोड़ी मासूमियत रिश्तों को ज़्यादा खूबसूरत नहीं बनाए रखती ?

किसी भी रिश्ते में दो लोगों कि सोच एक हो ये ज़रूरी नहीं... वो दोनों ही दो अलग व्यक्तित्व होते हैं... अलग सोच अलग शख्सियत के लोग... यही उनकी विशेषता भी होती है और उनका यूँ अलग हो कर भी साथ होना उस रिश्ते की खूबसूरती भी...

एक रिश्ते की शुरुआत में आप अपने साथी कि सारी अच्छी बुरी आदतों को अपनाते हैं... बिना किसी शिकायत... या किसी बात से शिकायत हुई भी तो या तो नज़रंदाज़ कर दिया या प्यार से समझा के चीज़ों को सुलझा लिया... इस बात को ध्यान में रखते हुए कि सामने वाले को बुरा न लगे... फिर जैसे जैसे समय बीतता है आपका रिश्ता परिपक्व होता है... आपसी समझ और नज़दीकी बढ़ती है... और उसके साथ ही वो सारे तकल्लुफ़ भी खत्म होते जाते हैं जो कभी अपने साथी की ख़ुशी के लिये तो कभी उसे "स्पेशल" फील कराने के लिये किये जाते थे...

अब जो भी कहना होता है स्पष्ट, सपाट और साफ़ शब्दों में कहा जाता है... बिना किसी लाग लपेट के... बिना इस बात की फ़िक्र किये कि सामने वाले को शायद इतनी साफ़गोई बुरी भी लग सकती है...

सच बोलने में कोई बुराई नहीं है... किसी भी रिश्ते की नीव ही सच्चाई पे ही टिकी होती है... एक रिश्ते की खूबसूरती ही इसी में है कि आप अपने साथी से कुछ भी और सब कुछ बोल सकते है... हाँ, अगर इस तरह से कहा जाये कि सामने वाले को बुरा न लगे तो क्या ही अच्छा हो...

यूँ  तो समय के साथ रिश्तों में परिपक्वता आना सही भी है और ज़रूरी भी... पर प्रश्न ये है कि किस हद तक... क्या रिश्ते परिपक्व होते हैं तो सामने वाले के लिये आपकी चाह आपकी परवाह कम हो जाती है ? नहीं न... तो फिर उसकी ख़ुशी के लिये अगर कभी उसके मन की ही कर ली जाये तो उसमें क्या हर्ज़ है... ऐसा नहीं करेंगे तो भी वो आपको छोड़ कर नहीं चला जायेगा... वो भी उतना ही समझदार है जितने कि आप... उसे आपकी नियत पर कोई शुबा नहीं है... पर उसे ज़रा सी ख़ुशी दे कर आपका भी तो कुछ नहीं घटेगा...

बात दरअसल यहाँ परिपक्वता की है ही नहीं... शायद इतनी आदत हो जाती है हमें एक दूसरे की... हमारे हक़ का दायरा इतना बढ़ जाता है कि हम सख्त होते चले जाते है... हमारा वो कोमल, सौम्य, नर्म रूप कहीं खो सा जाता है... भावनायें वही हैं अब भी... बस उनकी अभिव्यक्ति या तो कम हो जाती है या उसका तरीका बिलकुल बादल जाता है... तकल्लुफ़ और मासूमियत से एकदम परे...

रिश्तों की खूबसूरती न बचा पाये ऐसी परिपक्वता फिर किस काम की...!

P.S. : ये अभी अभी दिल और दिमाग की उथल पुथल से निकला एक निष्कर्ष मात्र है... आप हमसे असहमत होने का पूरा हक़ रखते हैं...

Monday, April 9, 2012

ये लम्हे ये पल हम बरसों याद करेंगे...



ज़िन्दगी चलती जाती है... उम्र बीतती जाती है... अच्छे-बुरे सभी पलों को समेटते हुए... देखा जाये तो कितना लम्बा समय और सोचा जाये तो बस चंद लम्हे जो यादों में ठहरे हैं.....!

आज से ठीक तीन साल पहले ऐसे ही कुछ लम्हों को पन्नों पे संजोने के लिये ये झरोखा खोला था... लिखना ना तब आता था ना अब आता है... बस ज़िन्दगी के इस सफ़र में जो भी कुछ महसूसते गये यहाँ संजोते गये... इकठ्ठा करते गये... यादों का एक पुलिंदा सा बन गया... आज पलट के देखते हैं तो कुछ हँसते खिलखिलाते, कुछ बहुत ही ख़ुशनुमा, कुछ थोड़े नम, तो कुछ थोड़े उदास से लम्हों का ताना-बाना सा लगता है ये... बिलकुल हमारी ज़िन्दगी सा...

आज ये पन्ने पलट के देखती हूँ तो कैसे उँगली पकड़ के किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं ये हमें... यादों के इस शहर की हर गली ख़ूबसूरत है... इन गलियों से गुज़रते हुए लगता है जैसे कल ही की तो बात है... किसी मोड़ पे बैठा कोई लम्हा आवाज़ दे के बुलाता है और बिठा लेता है अपने ही पास... और ऐसे बेलगाम दोस्तों के जैसे बातें करते हैं हम दोनों कि लगता है जैसे बरसों के बिछड़े दो दोस्त मिले हों.. तो अगले किसी मोड़ पर कोई उदास सा लम्हा सीली सी आँखों में इंतज़ार लिये हमारी राह तकता है...

आज कहने को कुछ ख़ास नहीं है... सिर्फ़ एक दस्तख़त... कि ये लम्हें, ये यादें... ज़िन्दगी हैं... इस ब्लॉग ने हमें बहुत कुछ सिखाया... आज बस इतना कहना है कि इस झरोखे से झाँकते हुए कुछ बहुत ही प्यारे दोस्त मिले... जो अब ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा हैं... तो आज की ये पोस्ट सिर्फ़ तुम्हारे लिये दोस्त... क्यूँकि तुम हो तो ये लम्हें हैं, ये यादें हैं और यादों का ये झरोखा है...


Tuesday, February 14, 2012

मेरा कुछ सामान....!


तुम कहते हो ना हमारा रिश्ता जाने कितने जन्मों से चला आ रहा है और आगे जाने कितने जन्मों तक चलने वाला है... इस जन्म में भी हम यूँ मिले जैसे कभी अलग थे ही नहीं... बस मिले और साथ चलने लगे... बहुत सा प्यार, बहुत सी यादें संजोयीं इस जन्म के छोटे से अपने सफ़र में... ना ना... ये सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है... फिर भी जाने क्यूँ दिल कर रहा है आज पलट कर वो सारे पल फिर से जीने का... वो सब फिर से याद करने का... जाने अगले जन्म तक ये सब याद रहे ना रहे... इसलिए सहेज रही हूँ यहाँ... ये सब पढ़ कर अगले जन्म अगर किसी कि याद आये ना, तो समझ लेना वो मैं ही हूँ और बस एक आवाज़ लगा देना चाहे किसी भी नाम से... मैं दौड़ी चली आऊँगी... तुम्हारे पास... तुम्हारा हाथ थामने... 

याद है जान... ये जगह... हाँ यही... जहाँ हम पहली बार मिले थे... और मिलते ही लगा था जाने कब से जानते हैं एक दूजे को... हमारे असीम प्यार और उसके तमाम ख़ूबसूरत पलों को यहीं नख्श कर रही हूँ... अगले जन्म में जब पलट के देखेंगे इन्हें तो मिल कर ख़ूब हँसेंगे... 

एक बार जब हम लॉन्ग ड्राइव पे गये थे... भीनी सर्दियों की एक गुनगुनी दोपहर... तो ओक में भर के ढेर सारी धूप चुरा लायी थी... ऐसे क्या हँस रहे हो... सच्ची बोल रही हूँ बाबा... जानती हूँ... तुम्हें भी नहीं पता... वो सारी गुनगुनाहट हमारे प्यार की यहाँ सहेज रही हूँ... 

वो रूमानी बारिशें भी सहेज दूँ जब घंटों हम पागलों की तरह बीच सड़क पे भीगा करते थे... और वो इन्द्रधनुष भी जो आसमां से तोड़ के तुम मेरे बालों में टांक दिया करते थे... वो सारे मौसम जो तुमसे ख़ूबसूरत थे... हैं... वो सारे सहेज दूँ यहाँ...

वो कैसे हम सारा-सारा दिन बात किया करते थे... बेवजह, बे सिर-पैर की बातें... अच्छा-अच्छा ठीक है... मैं बोलती थी और तुम सुनते थे मुस्कुराते हुए... अपनी वो सारी बक बक भी जमा कर दी है यहाँ... जब कभी बोर होना तो ये पन्ने पलट के देख लेना... मुस्कुराए बिना नहीं रह पाओगे... मेरा दावा है !

याद है वो एक बार जब हम पहाड़ी वाले शिव जी के मंदिर गए थे... और फिर घंटों वहीं सीढ़ियों पर बैठे रहे थे चुपचाप... घने देवदारों से घिरे हुए... घंटियों के मधुर स्वर नाद के बीच... वो सारे मौन वो सारी आवाज़ें भी सहेज रही हूँ यहाँ...

और भी बहुत कुछ सहेजना है... वो सारा रूठना मानना भी... वो बेवजह की तकरारें भी... वो बेवजह उमड़ता प्यार भी... वो मुस्कुराहटें भी... जो सब कुछ बयां कर देतीं थीं बिन बोले... वो सारी जादू भरी झप्पियाँ भी... हाँ, तुम्हारी आँखों की वो चमक भी जिसमें मेरी हँसी छुप जाया करती थी... 

वो जब मैं किचन में कुछ बनाती होती थी और तुम पीछे से आकर मुझे ज़ोर से जकड़ लेते थे बाहों में... कितना ग़ुस्सा हुआ करती थी मैं... जानते हो, नाटक करती थी... सच तो ये है कि बहुत प्यार आता था तुम्हारी उन शरारतों पे... वो सब भी यहाँ जमा करती चलती हूँ... प्यार के इस बहीखाते में...

और वो तीज के मेले में जो तुमने मेहँदी लगाई थी हमारे हाथों में... याद है क्या बनाया था ? मोर... ना ना... देखो बिलकुल भी हँस नहीं रही हूँ... तुम्हारी कसम... सच ! उससे ख़ूबसूरत मेहँदी आजतक नहीं लगाई मैंने... उस मेहँदी की ख़ुश्बू भी यहीं सहेज दी है... 

होंठों का वो प्रथम स्पर्श... शायद इस जन्म का सबसे ख़ूबसूरत एहसास... उस एहसास को बयां नहीं कर सकती... सो उस अनकहे एहसास को जिसे शब्दों में पिरो नहीं सकती... उसे भी यहाँ दर्ज करती चलती हूँ... अगले जन्म में भी इसी शिद्दत से महसूस करुँगी उसे... 

याद है ना जान... हम हनीमून मनाने कहाँ जाने वाले थे... प्यार के देस... वेनिस... पर वेनिस तो डूब रहा है ना... जब मैंने उदास हो के कहा था तो कैसे ज़ोर से हँसे थे तुम... अच्छा तो इसलिए उदास हो गईं तुम कि जाने अगले जन्म तक वेनिस रहे ना रहे... सच में बुरे हो तुम... बहुत बुरे... पर तुमसे अच्छा कभी कोई लगा भी तो नहीं... माना इस जन्म में हम नहीं मिल सकते... ये सपना पूरा नहीं हो सकता हमारा... पर सुनो अगले जन्म में ज़रा जल्दी मिलना... इतना इंतज़ार न करवाना... क्या जाने ख़ुदा को भी हम पर रहम आ जाये... 

साथ बिताये वो अनगिनत पल... वो हँसी... वो मुस्कुराहटें... वो प्यार... वो शरारतें... वो ग़ुस्सा... वो मिठास... वो सब... जो तुमसे है... जिनमें तुम हो... वो सब सहेज रही हूँ यहाँ...

सुनो, अगले जन्म में जब मिलना तो ढेर सारी फ़ुर्सत के साथ मिलना... समय से परे... बिना समय की किसी भी पाबंदी के... और हाँ ये "प्रैक्टिकल" होना... जो कि मुझसे तो ख़ैर कभी नहीं हुआ गया... पर तुम भी इस बनावटी ऐटिट्यूड को, जो कि तुम्हें बिलकुल सूट नहीं करता, जन्म की सरहद के इस तरफ़ ही छोड़ के आना... अगले जन्म मुझे सिर्फ़ तुम चाहिये... "तुम"... सुन रहे हो ना.....!

जन्मों के बन्धन पर कभी भी यकीं ना था मुझे
पर तुमसे मिली तो न जाने क्यूँ लगा कि कुछ है 
कुछ तो ज़रूर है... कोई डोर जिसने बाँध रखा था
कोई नाता... जिसका मस्क कभी मद्धम नहीं पड़ा 

हम पहली बार मिले तो यूँ लगा, मानो 
बरसों पुराने दोस्त बाज़ार में मिले हों
हँस के एक दूसरे को गले लगाया और बोले
"चल, कहीं बैठ के कॉफ़ी पीते हैं"

जैसे दो रूहें भटक रहीं थी क़ायनात में
बस मिलीं और एक नए सफ़र पे बढ़ चलीं 
उसी मोड़ से आगे चलना शुरू करा 
जहाँ अल्पविराम लिया था पिछले जन्म में

शायद ऐसे ही होते हैं जन्मों के बन्धन
रूहानी रिश्ते...

-- ऋचा



Sunday, October 9, 2011

हमने माना कि तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन...



कैसी होती होगी वो हवा जो तुम्हारे देस में बहती है... कैसे होते होंगे वो लोग जो तुम्हें देख सकते होंगे.. छू सकते होंगे... तुमसे रु-ब-रु बात कर सकते होंगे... उस हवा में साँस लेते होंगे जहाँ तुम रहते हो... जानते हो न्यूज़ चैनल बदलते हुए कभी जब तुम्हारे शहर का ज़िक्र आता है तो उँगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं... जैसे उन्हें भी सुनाई देता है तुम्हारे शहर का नाम... उस भीड़ में जाने किस अनदेखे चेहरे को तलाशने लगती हैं आँखें... कोई बात भी करता है ना तुम्हारे शहर की तो दिल करता है उससे कहूँ बस ऐसे ही बोलता रहे और मैं ऐसे ही सुनती रहूँ उसे... जी भर के...

झूठ कहते हैं लोग कि दुनिया छोटी हो रही है, दूरियाँ सिमट रही हैं... दूरियाँ तो और बढ़ गई हैं... कल हमारे बीच महज़ ७०० किलोमीटर की दूरी थी जिसे हम बस चंद लम्हों में तय कर लिया करते थे... आज वो दूरी सुदूर बसे किसी ग्रह जैसी लगती है... सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर... चाह कर भी दूरियाँ अब सिमट नहीं पातीं... तुम तक मेरी पुकार अब नहीं पहुँच पाती... बीच में ही कहीं राह भटक कर हमेशा के लिये खो जाती है ब्रह्माण्ड में...

हमारा मिलना ऐसा था जैसे आरती कि थाली में जलता हुआ कपूर... पवित्र... सुगन्धित... किन्तु क्षणिक... तुम मेरे अंधेरों में रौशनी की तरह आये... तुम्हारी उँगली थाम उम्र की  एक पथरीली पगडंडी पार करी... ठीक वैसे ही जैसे एक नन्हा सा बच्चा किसी की उँगली थाम चलना सीखता है और अपनी ज़िन्दगी का पहला क़दम बढ़ाता है... तुमने जीने की नई वजह दी... एक लम्बे अरसे बाद मुझे ख़ुद से मिलवाया...

जानती हूँ तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब तुम्हें आवाज़ दे रही हैं... मैं भी क्या करूँ... तुम्हारी आदत हो गयी है... तुम्हारी उँगली थामे बिना चलना शायद वैसा ही हो जैसा उस नन्हें बच्चे का होता है... थोड़ा डरूँगी... कुछ पल डगमगाऊँगी... शायद गिरूँ भी... पर तुम मत डरना... थोड़ा समय लगेगा पर संभल जाऊँगी... तुम जाओ... अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करो... उम्र के किसी पड़ाव पर गर फ़ुर्सत मिले कभी और याद आये मेरी या मिलने का मन करे... तो चले आना... मैं यहीं मिलूँगी... यहीं, जहाँ हम पहली बार मिले थे...

हो सके तो बस इतना करना कि भरोसा नहीं टूटने देना... विश्वास रखना... मैं यहीं मिलूँगी... तुम्हारा इंतज़ार करते... सुनो... पहचान तो लोगे ना ?

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एक कहानी याद आ रही है... बहुत जल्दी ना हो तो सुनते जाओ.. गुलज़ार साब कि आवाज़ में -




[ ये खेल आख़िर किसलिये ? मन नहीं ऊबता ? कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम अपनी ज़िन्दगी में... खेल खेला है... खेलते रहे हैं... नतीजा फिर वही... एक जैसा... क्या बाक़ी रहता है ? हासिल क्या होता है ? ज़िन्दगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क़ है ना ? आख़िर किसलिये ?

एक कहानी है... सुनाऊँ ? कहानी दो प्रेमियों की... दोनों जवान, ख़ूबसूरत, अक्लमंद... एक का दूसरे से बेपनाह प्यार... कसमों में बंधे हुए कि जन्म-जन्मान्तर में एक दूसरे का साथ निभायेंगे... मगर फिर अलग हो गये... नौजवान फ़ौज में चला गया... गया तो लौट कर नहीं आया... लापता हो गया.. लोगों ने कहा मर गया... मगर महबूबा अटल थी... बोली... वो लौटेगा ज़रूर... लौटेगा... पूरे चालीस सालों तक साधना में रही... वफ़ादारी से इंतज़ार किया... आख़िर एक रोज़ महबूब का संदेसा मिला... मैं आ गया हूँ, शिवान वाले मंदिर में मिलो... कहने लगी, देखा.. मैंने कहाँ था ना... दौड़ कर गई... मंदिर पहुंची... पर प्रेमी ना दिखाई दिया... एक आदमी बैठा था... एकदम बूढ़ा... पोपला मुँह.. टांट गंजी... आँखों में मैल... बोली.. यहाँ तो कोई नहीं... ज़रूर किसी ने शरारत की है... मायूस हो कर घर लौटी... वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया... कोई नहीं आया... चिड़िया का बच्चा तक नहीं.. हाँ, एक बुढ़िया आयी थी... कमर से झुकी हुई.. बाल उलझे हुए.. आँख में मोतिया-बिंध... मंदिर में झाँक कर देखा... कुछ बुड़बुड़ाई... और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गई... निराश हो गया बेचारा... बोला... उसने इंतज़ार नहीं किया... गृहस्ती रचाकर मुझे भूल गई... संदेसा भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आयी... किसलिये ? ... आख़िर किसलिये ये खेल ? ... मन नहीं ऊबता ? -- गुलज़ार ]
 

Wednesday, September 14, 2011

बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं...



ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़मगुसार होता
-- मिर्ज़ा ग़ालिब

कभी कभी सोचती हूँ ग़ालिब साहब का एक अरसे पहले लिखा ये शेर आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है... जब आप ज़िन्दगी के एक ऐसे बुरे दौर से गुज़र रहे हो कि कुछ ना सूझे, कुछ समझ ना आये... जब ग़म और ना-उम्मीदी के बादलों ने आपको घेर रखा हो... आप चाह कर भी इन हालातों से बाहर ना निकल पा रहे हों... घर वाले... बाहर वाले... सारी दुनिया के लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको उपदेश देने में लगे हों... और तो और आपके दोस्त भी आपको नसीहतें ही देने लगें तो मन झुंझला जाता है... ऐसे में दिल करता है कि कोई ऐसा दोस्त हो जो बस आपको सुन भर ले... कोई नसीहत ना दे... एक ऐसा दोस्त जिसके काँधे पर सिर टिका कर आप चुपचाप बैठे रहें... कुछ ना कहें फिर भी ख़ुद को बेहद हल्का महसूस करें... वो दोस्त जो आपकी परेशानियाँ नहीं बस थोड़ी सी ख़ामोशी बाँट ले... यकीन जानिये जिस किसी के पास ऐसे दोस्त होते हैं दुनियाँ में उनसे ज़्यादा ख़ुशनसीब और कोई नहीं होता...

दोस्ती... हमारी नज़र से देखिये तो दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता... हर दुनियावी रिश्ते से बड़ा... शायद "प्यार" से भी बड़ा... जहाँ ना कोई स्वार्थ होता है, ना कोई नसीहत... दोस्त कभी जजमेंटल नहीं होते... आलोचनात्मक नहीं होते... हाँ आपका भला ज़रूर चाहते हैं, चाहते हैं कि आप हमेशा ख़ुश रहें और अगर आपमें कोई कमी है, कोई बुराई है तो वो सुधर जाये... पर इस सब के बावजूद आप जैसे भी हों आपके दोस्त आपको वैसे ही अपनाते हैं आपकी कमियों के साथ... आपकी नाकामियों के साथ... किसी भी हाल में वो आपको अकेला नहीं छोड़ते...

आज के मतलबपरस्त दौर में जब दुनिया के तमाम रिश्ते अपने मायने खोते जा रहे हैं... रिश्तों पर से आपका विश्वास डगमगाने लगा है... ऐसे दौर में भी दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसने उम्मीद की लौ को जलाए रखा है... हर लड़खड़ाते कदम पर आपका हाथ थामा है... आपको वो सुकून दिया है वो हिम्मत दी है कि आप अकेले नहीं हैं... कोई है जो हर पल हर हाल में आपके साथ खड़ा है... आपका दोस्त !

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कल रात दो बेहद करीबी दोस्तों ने दो बिलकुल अलहदा सी बातें कहीं... एक ने दोस्ती का शुक्रिया अदा किया तो दूसरे ने हमसे दूर जाने कि बात कही... दोनों ही बातें दिल को छू गयीं... तो पहले दोस्त से बस इतना कहना है कि दोस्ती में शुक्रिया नहीं किया करते दोस्त और दूसरे से ये कि तुम्हारा मुझसे दूर जाना हम किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं कर सकते... ऐसा दोबारा फिर कभी ना सोचना ना कहना... "I really need u my friend... can't fight this situation alone... don't u ever dare think of going anywhere..."


तुमसे जब बात नही होती किसी दिन
ऐसे चुपचाप गुज़रता है सुनसान सा दिन
एक सीधी सी बड़ी लंबी सड़क पे जैसे
साथ-साथ चलता हुआ, रूठा हुआ दोस्त कोई
मुँह फुलाए हुए, नाराज़ सा, ख़ामोश, उदास

और जब मिलता हूँ हँस पड़ता है ये रूठा हुआ दिन
गुदगुदाकर मुझे कहता है, "कहो, कैसे हो यार"

-- गुलज़ार





Thursday, April 8, 2010

ऐ दोस्त !!


मेरे दोस्तों की पहचान इतनी मुशिकल नहीं " फ़राज़"
वो हँसना भूल जाते हैं मुझे रोता देखकर...
-- अहमद फ़राज़


इस दौड़ती भागती तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी को ब्रेक लगा के जब कभी कुछ फ़ुर्सत भरे, कुछ सुकून भरे पल बिताने का मन होता है तो सबसे पहले ख़याल आता है किसी दोस्त का... कोई ख़ास दोस्त... यूँ तो सभी दोस्त ख़ास होते हैं पर वो भीड़ से कुछ अलग कुछ अपना सा होता है... बेहद ख़ास... वो जिसके साथ आपको कुछ भी दिखावा करने की ज़रुरत नहीं होती... वो जो आपको आपकी तरह समझता है... आपकी खुशियों को, आपके ग़म को महसूस कर सकता है... बिलकुल आपकी तरह... आपकी हँसी की खनक सुन सकता है और आपकी मुस्कान में छुपे दर्द को भी पहचान सकता है... वो जो आपकी कामयाबियों में आपसे भी ज़्यादा ख़ुश होता है और नाकामियों में भी आपके साथ मजबूती से खड़ा रहता है... एक अडिग स्तम्भ की तरह... जिसे एहसास होता है आपकी ज़रूरतों का... वो जो सुन सकता है आपके दिल की आवाज़ को और आपकी ख़ामोशियों को भी...

यूँ तो वो दोस्त हर पल आपके पास होता है... आपके मन में... पर इस ज़िन्दगी के अपने ही कुछ नियम हैं... कुछ ज़रूरतें हैं... हर किसी की बहुत सी ज़िम्मेदारियां हैं... और हम सबको ही उनका निर्वाह करना ही पड़ता है... हम ना चाहते हुए भी कभी कभी उस एक इंसान को वो समय नहीं दे पाते जो हम देना चाहते हैं... अब ऐसे में सामने वाले को बुरा लगना लाज़मी है... पर यही वो समय है जो आपकी परीक्षा लेता है... अपनी कसौटी पे आपके धैर्य और विश्वास को परखता है... ऐसे में ज़रुरत होती है आपसी समझ से काम लेने की... अपने विश्वास को बनाए रखने की... ख़ुद को उसकी जगह रख के देखने की... और यकीन मानिये अगर वो आपका उतना ही ख़ास दोस्त है जैसा की हमने अभी बताया, तो आप उसे कभी ग़लत नहीं पायेंगे... अपनी ज़िम्मेदारियों से फ़ुर्सत पाते ही वो वापस आपके पास होगा... हँसता, मुस्कुराता... आपका ख़याल रखता...

दोस्ती और प्यार कभी एक तरफ से नहीं निभाये जा सकते... परस्पर होना पड़ता हैं... दोनों ओर से एक सा विश्वास... एक सा समर्पण... एक सी निष्ठा... जो आप सामने वाले से चाहते हैं पहले ख़ुद दे के देखिये... बदले में हमेशा ज़्यादा ही मिलेगा...

हाँ... एक चीज़ और... अच्छा बुरा जैसा भी हो... कम ज़्यादा जितना भी मिले... समय साथ बिताइए... एक दूसरे को और करीब से जानने का, समझने का मौका मिलेगा...

चलिए जी, अब हम चलते हैं... एक दोस्त की ज़रुरत सी महसूस हो रही है... आवाज़ लगाते हैं उसे... दोस्त... ओ दोस्त... कहाँ हो ? देखो तुमसे मिलने आयीं हूँ... ज़िन्दगी से कुछ पल चुरा के...


कुछ घुटन सी है आजकल

मन सीला सीला सा रहता है

साँसे कुछ छोटी सी होती जा रही हैं

एक लम्बी सी साँस लेना चाहती हूँ तुम्हारे साथ

तुम्हारा हाथ थामे उस लकड़ी की बेंच पे बैठ के

पार्क के एक कोने में खिलते सूरज से ले कर

दूसरे कोने में उगते चाँद तक...

-- ऋचा
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