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Wednesday, August 15, 2012

मिस यू बाबा !



मैंने कभी उनकी उँगली पकड़ कर चलना नहीं सीखा... कभी तोतली ज़ुबान में उनसे कोई ज़िद नहीं की... उनकी गोद में चढ़ कर कभी चंदा मामा को नहीं देखा... कभी उन्हें घोड़ा बना कर उनकी पीठ पर नहीं बैठी... बहुत कम याद आते हैं वो... या शायद हम याद भी उन्हें ही करते हैं जिनसे कभी मिले होते हैं... ज़्यादा ना सही कम से कम एक बार तो... कभी कभी सोचती हूँ कि कभी मिलती उनसे तो क्या बुलाती उन्हें.. दादाजी, दद्दू या बाबा... हाँ, शायद "बाबा" ही बुलाती...

वो याद तो नहीं आते बहुत पर जब भी किसी छोटे बच्चे को अपने बाबा के साथ हँसता, मुस्कुराता, खेलता हुआ देखती हूँ तो एक अजीब सी क़सक उठती है मन में... जैसे ज़िन्दगी की जिगसॉ पज़ल का एक ज़रूरी हिस्सा खो गया हो कहीं... और उसके बिना वो अधूरी ही रहेगी हमेशा चाहे बाक़ी के सारे हिस्से सही सही जोड़ दिये जाएँ... जैसे अम्मा बाबा से कहानी सुनना हर बचपन का हक़ हो और हमसे वो हक़ छीन लिया हो किसी ने...

आइये आज आपको अपने बाबा से मिलवाती हूँ... उनसे जिनसे ख़ुद मैं भी नहीं मिली कभी... सिर्फ़ सुना है उनके बारे में... और इस तस्वीर में देखा है बस... हमारे घर में बाबा कि बस ये ही एक तस्वीर है और ये भी खींची हुई फोटो नहीं है बल्कि पेंट की हुई तस्वीर है... बचपन से बाबा को इस तस्वीर में ही देखा है बस... स्वर्गीय श्री तुलसी राम गुप्ता... हमारे बाबा... आज जब हम अपना ६६वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं तो बेहद गर्व होता है ये सोच कर कि हमारे बाबा एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे...

बुआ बताती हैं कि उस ज़माने में कांग्रेस कमेटी का दफ़्तर हमारे ही घर में हुआ करता था... आये दिन मीटिंग्स होती थीं... जाने कितनी ही बार जेल भरो आन्दोलन में बाबा जेल गये... महीनों जेल में रहे... कितनी ही बार लाठी चार्ज हुआ... इसी सब के चलते उन्हें पेट की कोई ऐसी बीमारी हो गई थी जिसे समय पर डाइग्नोज़ नहीं किया जा सका और वो हम सब को छोड़ कर चले गये... उस वक़्त पापा सिर्फ़ हाई स्कूल में थे...

बाबा के बारे में जितना भी सुनते हैं पापा और बुआ से उतना ही ज़्यादा उन पर गर्व होता है और उनसे मिलने का मन करता है... आज से तकरीबन एक सदी पहले भी वो कितनी खुली विचारधारा के इन्सान थे... उस वक़्त जब घर की स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की भी आज़ादी नहीं थी वो अम्मा को अपने साथ पार्टी की मीटिंग्स में ले जाया करते थे... अपनी बेटियों और बेटों में कभी कोई फ़र्क नहीं किया उन्होंने... सबको हमेशा ख़ूब पढ़ने के लिए प्रेरित किया... बुआ लोगों के लिये भी कहते थे की ये सब हमारे बेटे हैं... और उस ज़माने में भी साड़ी या सलवार कुर्ते के बजाय सब के लिये पैंट शर्ट सिलवाते थे... बुआ बताती हैं गाँव में जहाँ हमारा घर था वहाँ आस पास के लोग अपनी लड़कियों को उन लोगों के साथ खेलने नहीं देते थे ना ही हमारे घर आने देते थे... कहते थे कि इनके पिताजी जेल का पानी पी चुके हैं इनके घर का कुछ मत खाना... हँसी आती है आज उन लोगों की सोच पर... ख़ैर...

आज स्वतंत्रता दिवस पर जाने क्यूँ बाबा की बहुत याद आ रही है... और हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति को दीमक की तरह चाट कर खोखला करते जा रहे भ्रष्टाचार, अराजकता और उन तमाम बुराइयों को देख कर उन सभी लोगों और उनके परिवारों के लिये तकलीफ़ हो रही है जिन्होंने देश को आज़ाद करने के लिये अपने प्राणों की बलि दी... उन हज़ारों, लाखों लोगों की क़ुर्बानी का ये सिला दे रहे हैं हम ?

आज की युवा पीढ़ी के लिये क्या मतलब रह गया है १५ अगस्त का... बस एक और छुट्टी का दिन... अपने मोबाइल में वंदे मातरम् की रिंग टोन लगा लेने का दिन या तिरंगे वाला टैटू लगा कर फेसबुक पर नई प्रोफाइल पिक्चर उपलोड कर लेने का दिन... दोस्तों को देशभक्ति के एस.एम.एस. भेज देने का दिन या बहुत हुआ तो एक पूरा दिन देशभक्ति के गाने सुन लेने का दिन... बस इतना ही ना... देशभक्ति का जज़्बा भी फैशन स्टेटमेंट बनता जा रहा है... सिर्फ़ एक दिखावा...

देशभक्ति ही सीखनी है तो उन सैनिकों से सीखिए जो सालों साल हर मौसम, हर पहर, हज़ारों मुश्किलों से जूझते हुए भी हमारी, आपकी और सबसे बढ़कर अपने देश की, अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिये सीमा पर डटे रहते हैं... जिनके लिये देशभक्ति महज़ २६ जनवरी, १५ अगस्त और २ अक्टूबर को उमड़ने वाला जज़्बा नहीं है... आइये हम भी उन जैसे बनते हैं जिनके लिये देशभक्ति ही उनके जीने का अंदाज़ है...!

जय हिंद... जय हिंद की सेना...!!!

Wednesday, January 27, 2010

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा...

कल हमने अपना ६१वाँ गणतंत्र दिवस मनाया... स्कूल-कॉलेज, सरकारी दफ्तरों और कुछ प्राइवेट कार्यालयों में भी तिरंगा फ़हराया गया... नेताओं ने बड़े बड़े भाषण दिये... अमन, शांति और सौहार्द बनाए रखने की नसीहत दी गयी... बीते सालों की कुछ उपलब्धियों को गिनाया गया... कुछ देशभक्ति के गाने बजाये गए... कुछ SMSs भेजे गए... मिठाई बटी और बस हो गया समारोह पूरा या यूँ कहिये शान्ति से, बिना किसी अड़चन और परेशानी के एक काम निपट गया और बाकी का दिन आराम करते हुए एक आम छुट्टी की तरह बिता दिया गया... अब फिर अगले १५ अगस्त या २ अक्टूबर को ये देशभक्ति जागेगी... एक बार फिर पुराने SMSs ढूंढ़ के भेजे जायेंगे... एक बार फिर पुराने देशभक्ति के गानों के कैसेट झाड़-पोछ के निकाले जायेंगे और एक बार फिर सारा दिन हर तरफ से एक ही आवाज़ सुनाई देगी "हम बुलबुलें हैं इसकी ये गुल्सितां हमारा...सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा"
कभी सोचा आख़िर क्यूँ हमारी ये देशभक्ति इन चंद ख़ास मौकों पर ही जागती है... क्या हो अगर सीमा पे खड़े उन तमाम सिपाहियों की देशभक्ति भी इन चंद ख़ास मौकों पर ही जागे... वो जो दिन-रात, एक से बढ़कर एक जटिल और विषम परिस्थितियों में भी वहाँ सजग होकर सीमा की रखवाली करते हैं, सिर्फ़ इसलिए की उनका देश और देशवासी तमाम बाहरी दुश्मनों से महफूज़ रहें...
खैर! हम भी कहाँ बेकार की बातों में उलझ गए... ये तो उनका काम है... और वो अपना काम पूरी इमानदारी से करते हैं... पर हम क्या करते हैं... तमाम बाहरी दुश्मनों से तो वो हमें बचा लेंगे पर हमारे देश के असली दुश्मन... "हम"... हमसे कैसे बचायेंगे इसे... सोच में पड़ गए ना ? अभी कल ही तो तिरंगा फ़हराया था... कल ही तो मोबाइल का कालर ट्यून बदल के फ़िल्मी गाने की जगह देशभक्ति का गीत लगाया था "ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम तेरी राहों में जाँ तक लुटा जायेंगे"... हम भला अपने देश के दुश्मन कैसे हो सकते हैं...
तो सुनिए... पढ़ाई करेंगे यहाँ हिन्दुस्तान में इस उम्मीद के साथ की किसी "MNC" में नौकरी लग जाये और विदेश में जा के सेटेल हो जाएँ तो बस लाइफ बन जाये... चार लोगों के बीच में खड़े होंगे तो अंग्रेजी में ही बात करेंगे भले बोलनी आये या ना आये... क्यूँ... क्यूँकि हिंदी, अपनी मातृभाषा, बोलने में तो शर्म आती है... कहीं किसी ने हिंदी में बात करते सुन लिया तो क्या कहेगा.... और कोई हिंदी में बात कर रहा हो तो ऐसे देखेंगे जैसे बहुत ही "low standard" इंसान हो... जिसे हक़ ही नहीं आज के ही समाज में रहने का... अच्छा ज़रा याद कर के बताइये आपमें से " क ख ग" कितने लोगों को पूरा याद है ? और "A B C" ? अब तो भरोसा हुआ हमारी बात का :-)
और बतायें... अच्छा चलिए आप ही बताइये कितना जानते हैं अपने देश के बारे में ? बोर्रा गुफाओं का नाम सुना है कभी आपने ? नहीं ? अच्छा सिरोही जिले के बारे में तो ज़रूर जानते होंगे ? वो भी नहीं ? ह्म्म्म... अच्छा चलिए ये ही बता दीजिये पूरब का स्विज़रलैंड किसे कहते हैं... ये भी नहीं पता ? अजी ये अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर के बारे में जानने के लिये तो बहुत बार गूगल सर्च करी होगी कभी अपने देश के बारे में भी जानिये... बहुत कुछ है यहाँ भी जानने और समझने के लिये...
हम कब ये बात समझेंगे देशभक्ति ये चंद ख़ास दिनों पर बजाये जाने वाले फ़िल्मी गानों से नहीं आती... वो हमारी सोच से आती है, हमारे कर्मों में झलकती है... अपने देश के प्रति हमारे नज़रिए से प्रतिबिंबित होती है... देशभक्ति ज़िन्दगी भर का समर्पण होता है... एक जज़्बा होता है... ज़िन्दगी जीने का तरीका होता है...
क्यूँ "Green Card Holder" बनने की ख़्वाहिश हर समय हमारे दिल में रहती है... क्यूँ "NRI" कहलाने में हमें गर्व महसूस होता है... भले ही अनपढ़ हो, भले ही ख़ूबसूरत ना हो पर "माँ" माँ होती है, उसे हम किसी ख़ूबसूरत, पढ़ी लिखी महिला से बदल नहीं लेते... और ना ही लज्जित होते हैं उसे "माँ" कहने में... फिर क्यूँ हमें अपने हिन्दुस्तानी होने पर गर्व नहीं होता...

अब और क्या कहूँ हमें अपने हिन्दुस्तानी होने पर गर्व है... हिंदी भाषी होने पर गर्व है... जय हिंद... जय हिंद की सेना !!

जाते जाते आपको दुष्यंत कुमार जी की चंद पंक्तियों के साथ छोड़े जा रही हूँ...


मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम,
जुए के पत्ते सा
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।
मुझ पर हर ओर से चोटें पड़ रही हैं,
कोपलें उग रही हैं,
पत्तियाँ झड़ रही हैं,
मैं नया बनने के लिए खराद पर चढ़ रहा हूँ,
लड़ता हुआ
नयी राह गढ़ता हुआ आगे बढ़ रहा हूँ ।

अगर इस लड़ाई में मेरी साँसें उखड़ गईं,
मेरे बाज़ू टूट गए,
मेरे चरणों में आंधियों के समूह ठहर गए,
मेरे अधरों पर तरंगाकुल संगीत जम गया,
या मेरे माथे पर शर्म की लकीरें खिंच गईं,
तो मुझे पराजित मत मानना,
समझना –
तब और भी बड़े पैमाने पर
मेरे हृदय में असन्तोष उबल रहा होगा,
मेरी उम्मीदों के सैनिकों की पराजित पंक्तियाँ
एक बार और
शक्ति आज़माने को
धूल में खो जाने या कुछ हो जाने को
मचल रही होंगी ।
एक और अवसर की प्रतीक्षा में
मन की क़न्दीलें जल रही होंगी ।

ये जो फफोले तलुओं मे दीख रहे हैं
ये मुझको उकसाते हैं ।
पिण्डलियों की उभरी हुई नसें
मुझ पर व्यंग्य करती हैं ।
मुँह पर पड़ी हुई यौवन की झुर्रियाँ
क़सम देती हैं ।
कुछ हो अब, तय है –
मुझको आशंकाओं पर क़ाबू पाना है,
पत्थरों के सीने में
प्रतिध्वनि जगाते हुए
परिचित उन राहों में एक बार
विजय-गीत गाते हुए जाना है –
जिनमें मैं हार चुका हूँ ।

मेरी प्रगति या अगति का
यह मापदण्ड बदलो तुम
मैं अभी अनिश्चित हूँ ।

-- दुष्यंत कुमार





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