जितना जो नज़दीक है उससे उतनी दूरी है
-- निदा फाज़ली
आज निदा जी की लिखी हुई ये ग़ज़ल सुन रहे थे "जीवन क्या है चलता फिरता एक खिलौना है"... वैसे तो पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन हैं पर ये दो पंक्तियाँ दिल को छू सी गयीं... सोचा सच ही तो है... हम सब ऐसे ही हैं... तमाम उम्र दो चेहरों के साथ जीते रहते हैं... एक चेहरा जो बनावटी है, दुनिया को दिखाने के लिये और एक वो जो सच है, जैसे आप वास्तव में हैं... ये बनावटी चेहरा वो है जैसा ये दुनिया हमें देखना चाहती है, जैसा हमारे अपने हमें देखना चाहते हैं... एकदम "परफेक्ट"... जो हम ना हैं और ना कभी हो सकते हैं... "परफेक्ट" हो गए तो फिर इंसान कहाँ रहेंगे भगवान नहीं बन जायेंगे... पर फिर भी जाने अनजाने, ना चाहते हुए भी हम वैसे ही बनते चले जाते हैं... बनावटी... शायद दुनिया को या अपनों को खुश रखने के लिये... या फिर इसलिए की सच कोई देखना या समझना ही नहीं चाहता... पता नहीं क्यूँ... पर ना ये ज़िन्दगी की भागदौड़ हमें कुछ सोचने का मौका देती है और ना लोगों के पास हमें समझने की फ़ुर्सत है...
इस बनावटी चेहरे के साथ ज़िन्दगी यूँ ही अपने ही वेग से दौड़ती चली जाती है और उसके साथ हम और आप भी... इस बनावट के हम ख़ुद भी इतने आदी हो जाते हैं की अपना असली चेहरा हमें भी याद नहीं रहता... हमारी इच्छाएं, हमारी ख्वाहिशें, हमारी पसंद-नापसंद, सब उस चेहरे के साथ हमारे दिल के किसी कोने में दब जाती हैं, खो जाती हैं... पर ज़रा सोचिये इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में अचानक से कभी ब्रेक लग जाये तो ?? कोई गर्मी की चिलचिलाती दोपहर में ठंडी हवा के झोंके सा आये और आपका हाथ थाम के अपने साथ ही उड़ा ले जाये सपनों के एक ऐसे संसार में जहाँ कोई बनावट नहीं... जहाँ आप "आप" हों... वो सारी इच्छाएं, वो सारी ख्वाहिशें और आपका वो कुछ मासूम सा, सच्चा, खूबसूरत सा चेहरा एक बार फिर दिल के उस कोने से निकल कर बाहर आ जाये... आप एक बार फिर अपने आप से मिलें... देखा सोच कर ही आपके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी... है ना ?
अब आप सोच रहे होगे की ऋचा तो हमेशा सपनों में ही जीती है... ये सब सपनों की बातें हैं... पागलपन है... हक़ीकत में किसे फुर्सत है आजकल जो अपना काम धाम छोड़ कर आपको आपसे मिलवाये... सच भी है... किसे फुर्सत है... क्या आपको है ? अच्छा ज़रा सोच के बताइये आखिरी बार कब आपने अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ बैठ कर फुर्सत से बात की है ? या यूँ ही बिना वजह, बिना किसी काम उससे मिलने गए हों ? सिर्फ़ उसके साथ बैठ कर चाय काफ़ी पी हो बिना कुछ बोले पर फिर भी बहुत सुकून मिला हो ? याद नहीं आ रहा ना... अरे तो देर किस बात की आज ही जाइये... थोड़ा सा समय अपने लिये निकालिए और थोड़ा अपने दोस्त के लिये... ये बनावटी चेहरा ख़ुद-ब-ख़ुद उतर जाएगा और आपको वही अपना भोला-भाला मासूम चेहरा वापस मिल जाएगा... चाहे कुछ लम्हों के लिये ही सही... अपने आप से मिलने के लिये कुछ पल तो निकाले जा ही सकते हैं... तो हो जाये एक "अपॉइंटमेंट" ख़ुद के साथ !!!
इस बनावटी चेहरे के साथ ज़िन्दगी यूँ ही अपने ही वेग से दौड़ती चली जाती है और उसके साथ हम और आप भी... इस बनावट के हम ख़ुद भी इतने आदी हो जाते हैं की अपना असली चेहरा हमें भी याद नहीं रहता... हमारी इच्छाएं, हमारी ख्वाहिशें, हमारी पसंद-नापसंद, सब उस चेहरे के साथ हमारे दिल के किसी कोने में दब जाती हैं, खो जाती हैं... पर ज़रा सोचिये इस भागती दौड़ती ज़िन्दगी में अचानक से कभी ब्रेक लग जाये तो ?? कोई गर्मी की चिलचिलाती दोपहर में ठंडी हवा के झोंके सा आये और आपका हाथ थाम के अपने साथ ही उड़ा ले जाये सपनों के एक ऐसे संसार में जहाँ कोई बनावट नहीं... जहाँ आप "आप" हों... वो सारी इच्छाएं, वो सारी ख्वाहिशें और आपका वो कुछ मासूम सा, सच्चा, खूबसूरत सा चेहरा एक बार फिर दिल के उस कोने से निकल कर बाहर आ जाये... आप एक बार फिर अपने आप से मिलें... देखा सोच कर ही आपके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गयी... है ना ?
अब आप सोच रहे होगे की ऋचा तो हमेशा सपनों में ही जीती है... ये सब सपनों की बातें हैं... पागलपन है... हक़ीकत में किसे फुर्सत है आजकल जो अपना काम धाम छोड़ कर आपको आपसे मिलवाये... सच भी है... किसे फुर्सत है... क्या आपको है ? अच्छा ज़रा सोच के बताइये आखिरी बार कब आपने अपने सबसे अच्छे दोस्त के साथ बैठ कर फुर्सत से बात की है ? या यूँ ही बिना वजह, बिना किसी काम उससे मिलने गए हों ? सिर्फ़ उसके साथ बैठ कर चाय काफ़ी पी हो बिना कुछ बोले पर फिर भी बहुत सुकून मिला हो ? याद नहीं आ रहा ना... अरे तो देर किस बात की आज ही जाइये... थोड़ा सा समय अपने लिये निकालिए और थोड़ा अपने दोस्त के लिये... ये बनावटी चेहरा ख़ुद-ब-ख़ुद उतर जाएगा और आपको वही अपना भोला-भाला मासूम चेहरा वापस मिल जाएगा... चाहे कुछ लम्हों के लिये ही सही... अपने आप से मिलने के लिये कुछ पल तो निकाले जा ही सकते हैं... तो हो जाये एक "अपॉइंटमेंट" ख़ुद के साथ !!!
आओ चलें सपनों के जहाँ में
जहाँ न बनावट का पुलिंदा
न झूठ की गठरी
जहाँ तुम "तुम" हो
और मैं "मैं"
व्योम के पार, क्षितिज से परे
ढूंढें सिरे इन्द्रधनुष के
सुनें फूलों की हँसी
चहकें चिड़िया के साथ
चाँद की नाव में बैठ कर
पार करें बादलों की नदी
धुंध की चादर हटायें
खुशियों की धूप में नहायें
तितलियों से रंग चुरायें
रंगें ये बेरंग ज़िन्दगी
कुछ पल बच्चों से मासूम बनें
ख्वाहिशों के गुब्बारे
उड़ा दें खुले आसमान में
फिर दौड़ें पकड़ने के लिये
अब तुम "तुम" नहीं
मैं भी "मैं" नहीं
क्योंकि भीतर बसे हो "तुम"
और बाहर "मैं" हूँ
अपॉइंटमेंट ख़ुद के साथ
मिटा सकता है
"तुम" और "मैं" का यह
दिखावटी फ़र्क
-- ऋचा








