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Thursday, May 21, 2020

ख़ानाबदोश !



ये मन भी कितना चंचल होता है न... कभी एक जगह टिकता ही नहीं... बिलकुल उस तितली की तरह जो फूलों से भरे बाग़ीचे में पहुँच कर एकदम पागल सी हो जाती है.... एक पल इस फूल पे बैठती है तो अगले ही पल उड़ के दूसरे फूल पर और फिर तीसरे और चौथे पर... जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा होता कि किस फूल का रस उसे सबसे ज़्यादा पसंद आया...

मन भी बिलकुल ऐसा ही होता है... इस एक छोटे से जीवन में ही उसे सब कर लेना है... कभी लगता है एक पेंटर बनना है तमाम पेंटिंग्स बनानी हैं... फिर कभी लगता है फ़ोटोग्राफ़ी करनी है... कभी लगता है की कम्प्यूटर्स की पढ़ाई ग़लत कर ली दिल तो घर बनाने और सजाने में लगता है... आर्किटेक्चर की पढ़ाई करनी चाहिये थी... फिर अगले ही पल लगता है ये सब मोह माया है... हमें तो कहीं पहाड़ पे छोटा सा एक कॉटेज बना के वहीं रहना है... मटीरिअलिस्टिक चीज़ों की ज़्यादा लालसा नहीं तो गाँव के किसी पहाड़ी स्कूल में बच्चों को पढ़ा के अपना ख़र्चा तो चल जाएगा... कितना तो ख़ाली समय मिलेगा उसमें बाग़वानी करेंगे... किताबें पढ़ेंगे... 

फिर कभी ये भी दिल करता है कि एक बी & बी चलाना है किसी पहाड़ पर.. घर का घर हो जायेगा और कमायी की कमायी और होम स्टे में जो तमाम लोग आयेंगे दुनियाभर से उनसे दुनिया जहान की बातें भी... और पहाड़ पे रहने का सपना पूरा होगा सो अलग...   फिर कभी दिल में दुनिया घूमने की ललक ज़ोर पकड़ती है...  लगता है काश किसी ट्रेवल चैनल में नौकरी मिल जाये तो सारी दुनिया घूम लें...

दरअसल हमारा मन बिलकुल किसी ख़ानाबदोश के जैसा है... हर कुछ दिन में अपना ठिकाना बदलता हुआ... कितनी तो क्षण भृंगुर लालसायें उपजती रहती है इस मन की ज़मीन पे हर रोज़... चचा ग़ालिब क्या ख़ूब कह गये हैं हम जैसों के ही लिये "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले..."

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कोई भटकन है मेरे भीतर
कोई यायावर
कि बुझती नहीं जिसकी प्यास
किसी दरिया किनारे भी
न तृप्त होती है आत्मा
न भटकन ख़त्म होती है

कुछ करना है उसे
कुछ अलग
क्या
नहीं मालूम
पर कुछ तो

वो नन्हां सा टुकड़ा 
ख़्वाब का
जो धुंधला धुंधला अटका है 
याद के चिटके काँच में 
उसे रंगों से देनी है शक़्ल
किसी शफ्फाक़ कैनवस पर

कोई इक कविता कहनी है
बिना बाँधे शब्दों को
किसी भी पैमाने में
बस बिखेर देना है
कागज़ पर
जो महके सौन्धे सौन्धे

कुछ पौधे उगाने हैं
रंगीन फूलों के
के जिन पे तितलियाँ आयें
उनसे ढेरों बातें करनी हैं
दोपहरें रातें करनी हैं
हाँ इक जुगनू पकड़ना है

कोई जंगल है जो भीतर
अनगढ़ से विचारों का
उसे बाहर लाना है
किसी ऊँची पहाड़ी पे
एक घर भी बनाना है

हो इक छोटा सा कमरा
जिसमें इक खिड़की बड़ी हो
छत हो लाल पत्थर की
पेड़ पे झूला पड़ा हो
मखमली घास का हो इक गलीचा
किसी अलसायी दोपहरी में
कोई किताब पढ़नी है

बुलेट भी तो चलानी है
दुनिया की सैर करनी है
तमाम लोगों से मिलना है
नई नई कितनी 
भाषायें सीखनी है
समय की सीमायें लांघनी है

प्रवासी परिंदों संग 
सुनहरी सुबहें देखनी हैं
स्पिति की सफ़ेद रातों में
तमाम रतजगे करने हैं
आकाशगंगा में झिलमिल 
अनगिन तारे गिनने हैं

समय की चाँदी जब
चमकेगी बालों में
शाम का पिघला सोना चुनना है
सुनहले साहिल की रेत से
पैरों में भटकन बाँध
यूँ ही बस चलते जाना है

ये भटकन ही तो हासिल है
यही कामिल है 
रगों में यूँ ही तो 
भटकता है लहू भी
और साँसे धड़कनों में
मुझे भी बस भटकना है
यूँ ही उम्र भर... ख़ानाबदोश !
-- ऋचा



Monday, February 1, 2016

ये मिलती है, बिछड़ती है, बिछड़ के फिर से मिलती है...!



आज सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ते हुए अनायास ही एक तस्वीर पर नज़र पड़ गयी... और तब से तुम बेइन्तहां याद आ रहे हो... अब तुम सोच रहे होगे कि ऐसी कौन सी तस्वीर देख ली हमने... याद है जान वो दौर जब हम सारा सारा दिन साथ रहा करते थे... सारा सारा दिन बातें करते... कभी साथ घूमते फिरते... कभी नाचते गाते... कभी साथ सफ़ाई करते... कभी साथ खाना बनाते... यूँ समझो वैसे ही एक पल की तस्वीर थी जब किचन में तुमने मुझे चुपके से जकड़ लिया था अपनी बाँहों में... और मज़ाक में कहा था अब कभी नहीं छोड़ूँगा तुम्हें और मैंने मन ही मन कहा था आमीन !

जाने क्यों आज सुबह से ही मन हो रहा है दूर कहीं हरी भरी वादियों के बीच जाने का... लंबी सी अंतहीन सड़क हो कोई... सुनसान सी... पर बेहद अपनी... सड़क के दोनों और हरे भरे खेत हों... उनकी मुंडेरों पर पीले जंगली फूल... गुनगुनी सी धुप और हवा में हरियाली की मादक गंध... पार्श्व में किसी बंजारन नदी का अनहद नाद... खुली हुई गाड़ी हो बिना छत की... तुम हो... मैं हूँ... बस... ऐसी कोई जगह जानते हो क्या जान ? ले चलो ना हमें वहाँ...

जानते हो इन शहरों का भी दिल धड़कता है... उनकी तासीर भी कुछ कुछ इंसानों जैसी ही होती है... उन्हें भी कभी कभी हम ठीक उसी तरह मिस करते हैं जैसे किसी इंसान को... तुम्हारे शहर से तो जैसे बरसों पुराना कोई रिश्ता है... यूँ साथ साथ ऊँगली थामे चलता है हर वक़्त गोया तुमने थाम रखा हो... जानते हो जान... तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे इस शहर से भी मोहब्बत होती जा रही है... हर पल आवाज़ देता है ये... फिर फिर लौट आने को मजबूर करता हुआ...

कभी कभी ना बड़ा दिल करता है कि गुनगुनी धूप हो और मखमली घास पे तुम्हारी गोद में आँखें मीचे लेटी रहूँ और तुम मेरे बालों में हाथ फेरते हुए मेरी फेवरेट किताब पढ़ के मुझे सुनाते रहो... आह.. कितना प्यारा ख्याल है ना... काश कि कभी इसे हकीकत में बदल पाऊँ... यहाँ सिर्फ़ इसलिये दर्ज करा दिया है कि सनद रहे...

किसी के प्यार में होना जितना खूबसूरत एहसास है उतना ही अपने सामने प्यार को पनपते हुए देखना भी... लगता है जैसे एक्शन रिप्ले कर के हम अपनी ज़िंदगी ही दोबारा जी रहे हों... वो छेड़ना वो मनाना... वो घंटों घंटों बातें करना.. दुनिया से बेफिक्र.. एक दूसरे की छोटी छोटी बातों का ख़्याल रखना... एक दूसरे के बारे में हर छोटी बड़ी चीज़ जान लेने की उत्सुकता... कभी कभी सोचती हूँ आजकल के लड़के लड़कियों जैसे हम कभी डेट पर नहीं गए ना जान... कभी साथ में फ़िल्म नहीं देखी... कैंडल लाइट डिनर नहीं किया... कैसा एहसास होता होगा वो... सुनो ना ! किसी दिन डेट पे चलोगे मेरे साथ... ?


Monday, May 25, 2015

बेअदब सी पर गज़ब सी.. मनमर्ज़ियाँ...!!!




जाने क्यूँ अनप्लांड जर्नीज़ हमेशा से बहुत अट्रैक्ट करती आयी हैं हमें... कुछ कुछ मिस्टीरियस सी... बिना किसी तय परिसीमा या दायरों के... न पता हो जाना कहाँ है... न पता कि पहुंचना कब है... न ये कि कब वापस आना है... पहले से कुछ भी नहीं पता... बस मन हुआ कहीं जाने का और चल दिए... बंजारों के जैसे... कभी कभी सोचती हूँ ऐसी लॉन्ग ड्राइव्स और जर्नीज़ क्यूँ पसंद है हमें... ख़ासकर हाइवे पे बेवजह बेमकसद की यात्रा... मंज़िल से ज़्यादा रास्ते पसंद आते हैं... खुले खुले... अंतहीन...

इन आवारा सड़कों पर बेपरवाह भटकते हुए ख़ुद के बेहद करीब महसूस होता है... जैसे अपने ही वजूद का कोई खोया हुआ हिस्सा पा लिया हो... कितने ख़ूबसूरत होते हैं ये अनजान रास्ते... कहीं भी नहीं जाती फ़िर भी आपको ख़ुद तक पहुँचाती ये आवारा सड़कें... कि इनके साथ यूँ आवारा हो जाने के लिए बड़ा जिग़र चाहिए और साथ में थोड़ा पागलपन और जुनून...

बड़ा अच्छा लगता हैं इन रास्तों का हाथ थामे बस चलते चले जाना... इनसे बातें करते... इनके साथ हँसते खिलखिलते... सड़कों के किनारे खिले बंजारे फूलों की बस्तियों से ठिठोली करते... पेड़ों की आदिम गंध में ख़ुद को डुबोते.. या कभी कभी बस यूँ ही ट्रेन या बस की खिड़की से अनंत में देखते रहना जाने किन ख्यालों में डूबे हुए...

हाइवे वाली किसी चाय की टपरी पर रुकना... कुछ पल सुस्ताते हुए कुल्हड़ वाली चाय पीना.. मिट्टी की सौंधी सी ख़ुश्बू को आत्मा तक महसूसना.. आह... Bliss... ! कोई CCD, Barista, Star Bucks अपनी प्रीमियम कॉफ़ी से आत्मा को यूँ छू के बताये तो जानू...

ख़ुद के बारे में बहुत कुछ सोचने का... ख़ुद को और बेहतर जानने समझने का मौका देती हैं ये जर्नीज़... मानो किसी खुली जगह पर जाने से दिमाग़ की कितनी गिरहें खुल जाती हैं.. हमारा मानना है हर कुछ समय के बाद ऐसी कोई यात्रा बहुत ज़रूरी हो जाती है.. just to loosen yourself..

हमारा रिश्ता भी कुछ कुछ ऐसा ही है ना जान... कभी न ख़त्म होने वाली किसी अविरल यात्रा जैसा... जो हमें अन्वाइन्ड होने का... रिलैक्स होने का मौका देता है... या फिर डिस-आर्गनाइज़्ड सी किसी अनप्लांड जर्नी जैसा... बेदायरा... बेमंज़िल... खुला खुला... अनंत... !



Friday, February 27, 2015

कलाइयों से खोल दो ये नब्ज़ की तरह धड़कता वक़्त तंग करता है...


फरवरी तकरीबन बीत चुकी है... ठंड भी रुखसती की कगार पर है... बस इत्ती सी बाकी है मानो हाथ छूटने के बाद उँगलियों के पोरों पर उसका स्पर्श बाकि रह गया हो... हालाँकि सुबहें और शामें अभी भी उसके मोहपाश से आज़ाद नहीं हो पायीं हैं... हल्की सी सिहरन घुली रहती है अभी सुबहों और शामों में... कुल मिला के गुलाबी सी ठंड वाला ये मौसम बहुत ही सुहाना है... एक अजीब सी मदहोशी तारी है हवाओं में... रँग बिरंगे फूलों से घर आँगन गुलज़ार है... फिज़ाओं में प्यार की ख़ुश्बू बिखरी हुई है... "लव इज़ इन दी एयर" शायद ऐसे ही किसी मौसम के लिये कहा गया होगा... प्यार के लिये परफेक्ट वेदर... दिल खामखाँ कितने तो सपने सजाये घूमता है ऐसे में... फागुन के रंगों से चमकीले... तितली के परों से नाज़ुक... वैसे भी ये तो हमारा सबसे पसंदीदा शगल है... सबसे फेवरेट वाला...

आज यूँ ही सोच रही थी इतनी बड़ी दुनिया और अरबों लोगों के बीच कैसे ढूँढ लेता है कोई... उस एक इंसान को... जो सिर्फ़ उसी के लिये बना है... जिसके लिये वो ख़ुद बना है... दो लोग... एक दूसरे से बिलकुल अलग... एक दूसरे से एकदम अनजान... पर एक दूसरे के लिये बेहद अहम... जिगसॉ पज्ज़ल के दो हिस्सों जैसे... एक दूसरे के बिना अधूरे... क्या सच में किस्मत जैसी कोई चीज़ होती है ? या फिर सोल मेट्स कि थ्योरी वाकई सही है... जानते हो जान पाँच अरब से भी ज़्यादा लोग हैं इस धरती पर... इत्ती बड़ी दनिया में इत्ते सारे लोगों के बीच भी इस दिल ने तुम्हें ढूँढ लिया... तुम्हारे शहर में होती तो ?

यूँ तो तुम्हें कभी तुम्हारे नाम से नहीं बुलाती हूँ... पर जाने क्यूँ तुम्हारे नाम से भी इक लगाव सा है... जब कभी भी तुम्हरा नाम कहीं सुनती या पढ़ती हूँ तो एक पल के लिये ठिठक जाती हूँ... यूँ लगता है मनो तुम करीब हो... कहीं आस पास ही... उस नाम में बसे हुए... जैसे ये ही नाम परफेक्ट है तुम्हारे लिये... जैसे उस ऊपरवाले ने मेरी दुआओं भरी चिट्ठियों के जवाब में ही लिखा हो ये नाम... तुम्हारा नाम... उसके आशीर्वाद जैसा...

तुम भी सोच रहे होगे जाने क्या बड़बड़ा रही हूँ इत्ती देर से... कभी वेदर... कभी सोल मेट्स... कभी नाम... हम्म... मुद्दा दरअसल ये है जान की तुम्हें मिस कर रही हूँ... बहुत... तुमसे बात नहीं हो पाती तो तुम्हारे बारे में बात कर के ही जी को बहला लेती हूँ... कितना बिज़ी रहने लगे हो आजकल... समय ही नहीं मिलता साथ बिताने को... मिलता भी है तो जैसे छुपन छुपाई खेलता रहता है... झलक दिखा के गायब... बहुत दुष्ट हो गया है... इस बार मिलेंगे न तो इसे ख़ूब मज़ा चखाएंगे... इस वक़्त को स्टैचू बोल के भाग चलेंगे कहीं दोनों...!

Thursday, January 22, 2015

बेसबब बातों की गर्माहट से खिलते बेसाख्ता हँसी के सूरजमुखी...


- सुनो हमें क्रूज़ पे जाना है.. चलोगे ?

- क्रूज़ पे ? अचानक क्या हुआ तुम्हें ?

- अरे बताओ ना... ले चलोगे ?

- हम्म... ले चलूँगा जान... पर बताओ तो क्यूँ जाना है ?

- अरे वो ना हमें समुद्र के बीचों बीच पानी में खेलती हुई डॉल्फिन्स देखनी हैं..

- हम्म :) तो उसके लिये इत्ती दूर जाने कि क्या ज़रूरत है... टीवी ऑन करो.. डिसकवरी चैनल लगाओ और देख लो.. तुम भी ना...

- अरे नहीं और भी कुछ काम है...

- वहाँ समुन्दर के बीच में भला कौन सा काम है तुम्हें...

- हमें ना सूरज को सागर के आग़ोश में सिमटते हुए देखना है... और ये मिलन देख पानी को शर्म से सुर्ख होते भी...

- तो वो तो तुम यहाँ साहिल पे खड़े हो के भी देख सकती हो... उसके लिये क्रूज़ पे क्यूँ जाना है..

- नहीं ना... यहाँ बहुत से डिस्ट्रैक्शंस होते हैं... और यहाँ किनारे तक आते आते वो लहरों का सुर्ख रँग डायल्यूट हो जाता है... मुझे वो सुर्ख नारंगी रँग की लहरों का फोटो लेना है...

- और करोगी क्या उसका ?

- उस रँग का दुपट्टा रँगवाऊँगी एक...

- अच्छा... और ?

- और वहाँ शिप के डेक पे लेट के तारे देखने हैं तुम्हारे साथ... सारी रात... कितने चमकीले दिखते हैं ना वहाँ से तारे...

- हम्म... सो तो है... :) एक बात बताओ...

- क्या ?

- तुम्हें तो पानी से डर लगता है ना... फिर वहाँ समुद्र के बीच में कैसे जाओगी... वहाँ तो चारों तरफ़ पानी ही पानी होता है ना..

- हाँ तो.. तुम होगे ना वहाँ मेरे साथ...

- तो..

- तो ये कि तुम्हारे साथ तो वहाँ डीप सी डाइविंग भी कर सकती हूँ...

- डर नहीं लगेगा... ?

- ना... बिलकुल भी नहीं... डर तब लगता है जब तुम साथ नहीं होते... तुमसे दूर हो जाने का डर लगता है... तुमसे बिछड़ जाने का डर लगता है... तुम साथ होते हो तो सुकून रहता है... ये आखिरी साँस भी हुई तो उसे लेते वक्त तुम साथ होगे...

- तुम पागल हो पूरी...

- हाँ हाँ... पता है जानेमन... रोज़ रोज़ याद क्यूँ दिलाते हो :)

- उफ्फ़... मेरे गले कहाँ से पड़ गईं आ के तुम :)

- अब तो सारी ज़िंदगी ऐसे ही टंगी रहूँगी तुम्हारी गर्दन पे.. बेताल के जैसे... विक्रम अब तू तो गया... हू हा हा हा...

- हाहाहा... चलो अब नौटंकी... क्रूज़ के टिकट बुक करते हैं ऑनलाइन... वरना फिर जान खाओगी :)

- लव यू मेरे विक्रम :):):)

- लव यू टू मेरी बेताल :):):)




Wednesday, January 14, 2015

ये सारे रँग तेरे रँग हैं...



- क्या हो गर मैं मिकोनोज़ के सफ़ेद गिरजे जैसे घरों पे एक बड़ी सी कूंची से ढेर सारे रँग छिड़क दूँ  ?

- तो.. ज़्यादा कुछ नहीं... तुम्हें पकड़ के मारेंगे वहाँ के लोग और पुलिस के हवाले कर देंगे... बस..

- हाय क्यूँ ?? किसी की बेरंग ज़िंदगी में रँग भरना कोई जुर्म है क्या ?

- नहीं... पर किसी के साफ़ सुथरे घर को ऐसे गन्दा करना कौन सा बड़ा पुण्य काम है ? और वैसे तुम्हें ये बे-सिर-पैर के खुराफ़ाती आइडियाज़ आते कहाँ से हैं ?

- हम्म... तुम जैसा नीरस इंसान नहीं समझ पायेगा... और काहे के साफ़ सुथरे जी...

- क्यूँ... देखो कैसे बर्फ़ से सफ़ेद हैं... दूर से ही चमक रहे हैं... साथ में... नीला सागर... नीला आकाश.. नीली खिड़कियाँ... बिलकुल किसी खूबसूरत पेन्टिंग सरीखे...

- ना... हमें तो ये हमेशा सूने सूने से लगते हैं... जैसे कोई बेस कोट कर के पेंटिंग बनाना भूल गया हो... इन्हें देख कर हमेशा एक बड़े से लाइफ साइज़ कैनवस का भ्रम होता है.. और दिल करता है बस रँग डालूँ इन्हें... ढेर सारे रंगों से...

- तुम पागल हो सच में :)

- हाँ तो :) मुझे तो ना इटली का बुरानो आइलैंड पसंद है... कैसा रँग बिरंगे घरों वाला द्वीप है... यूँ लगता है मानों किसी ने रँग बिरंगे फूलों से भरा पूरा एक बगीचा तैरा दिया हो पानी में...

- हम्म... तुम्हारी तरह... रँग बिरंगा...

- मैं कोई आइलैंड हूँ क्या... एक सीधी सादी साधारण लड़की हूँ...

- तुम क्या जानो... कितने किरदार बस्ते हैं तुम में... अपने आप में एक पूरी सभ्यता हो तुम...

- वाह... और तुम... मेरे मिकोनोज़ के बेरंग शहज़ादे... :)

- हाँ... तुम मुझमें यूँ ही रँग भरती रहना... हमेशा... :)

- अच्छा... आओ एक हग करो... अभी ट्रान्सफर कर देती हूँ आज के रँग :)

- हाहाहा... पागल...!

- हाँ... तुम्हारी... :):):)



Wednesday, January 7, 2015

बारहा दिल की ज़मीं पे फूटती हैं कुछ बाँवरी ख़्वाहिशों की कोपलें...



उसकी मुस्कुराहटें एक बार फिर लौट आयीं थीं... वो फिर से महकी महकी फिरने लगी थी कोहरे ढकी वादियों में... उदासियों का मौसम जा चुका था... वो धूप सी बिखरना चाहती थी... फिर से जीना चाहती थी... खुल के.. खिल के... अपनी ज़िन्दगी के साथ ज़िन्दगी भर...

उसने एक गाँव बसाया था नदी के किनारे... एक ही से दिखने वाले ढेर सारे घरों की कतारें... सारे घर चमकीले रंगों में रंगे हुए... दूर से देखो तो यूँ लगता था गोया इन्द्रधनुष धरती पर सजा दिया हो किसी ने... नदी किनारे... अपने मूड के हिसाब से वो कभी लाल रंग के घर में रहती तो कभी नीले में... कुछ सीमे सीमे से दिनों के लिए उजला पीला घर जो उसकी सारी उदासियाँ दूर कर दे... बारिशों वाले दिन धुली धुली पत्तियों के जैसे हरे रंग वाले घर में गुज़रते... जिस रोज़ उसका दोस्त गाँव से बाहर जाता वो जामुनी रंग के घर में जा कर ख़ुद को उसकी यादों में डुबा देती... वो वापस आने को होता तो गुलाबी घर में खिली खिली घूमती उसका इंतज़ार करते...

वो ढेर सारे जुगनू पकड़ना चाहती थी.. किसी घने जंगल में जा के... उन सबको अपने घर लाना चाहती थी... उसे बड़ा अच्छा लगता था जलते बुझते जुगनुओं को देखना... किसी सियाह रात जब चाँद तारे सब छुट्टी पे हों वो उन्हें अपने आसमां पे टांकना चाहती थी... फिर सारी रात छत पे लेटे हुए अपने दोस्त से बातें करना चाहती थी... उसके पास अनगिनत बातों का खज़ाना था... कभी न ख़त्म होने वाला... वो सारा खज़ाना अपने दोस्त को सौंप देना चाहती थी... दोस्त से बातें करते रात की तारीकी को तोड़ती भोर की पहली किरण को गले लगाना चाहती थी... फिर सारे जुगनुओं को विदा कर के सोना चाहती थी दोस्त का हाथ थामे... नीले आस्मां की ओढ़नी ओढ़े...




वो जंगल से गाँव तक आती पगडण्डी के किनारे खिले जंगली फूलों से उनका नाम पूछना चाहती थी... हवा के झोंको से डोलता उन फूलों का मोहल्ला उसे बहुत आकर्षित करता था... कैसे बिना माली के भी वो हमेशा मुस्कुराते हुए ही मिलते थे... क्या जाने कौन रात में आ कर उन्हें प्यार से सहला जाता था... उनकी जड़ों को सींच जाता था.. उसे तो कभी कोई नज़र नहीं आया उस गाँव में... ज़रूर कोई दूर देस का फ़रिश्ता होगा.. आधी रात आस्मां से उतरता होगा... 



वो अलसुबह घास पर बिखरी ओस की बूँदे इकट्ठी करना चाहती थी... उसे एक छोटा सा तालाब भरना था उन बूंदों से... सुनहली मछलियों के रहने के लिए... उसे ओस की बूँद पीती मछलियाँ देखनी थीं... मुँह से मुँह जोड़ कर बातें करती हुयीं... उसे भी सुननी थी उनकी बात-चीत... उसका दिल होता मछलियों की भाषा सीख ले... फिर जब उसका दोस्त काम पर गया हो तो वो उन मछलियों के संग सारी दोपहर गप्पे लड़ाया करे...

वो ढेर सारे खत लिखना चाहती थी... रँग बिरंगी स्याहियों से... इतने कि उसके जाने के बाद भी डाकिया, ता-उम्र, रोज़ाना एक खत पहुँचाता रहे उसके दोस्त को... वो उसके लिये अपने जैसा कुछ छोड़ जाना चाहती थी... उसे दोस्त की उदासी बिलकुल नहीं पसंद थी... वो कुछ ऐसा करना चाहती थी कि दोस्त उसके जाने के बाद भी उसकी कमी ना महसूस करे... उसे गीली मिट्टी बहुत पसंद थी... उसकी सौंधी सी खुश्बू ज़िंदगी का एहसास देती थी... उससे कुछ भी गढ़ा जा सकता था... उसने अपनी कल्पना के पंखों को फैलाया और कुछ सिरजना शुरू करा...

एक मुट्ठी तुम्हारी सौम्यता 
एक चुटकी तुम सा गुस्सा भी 
थोड़ी सी मेरी खीझ 
थोड़ी अपरिपक्वता 

कुछ कतरे तुम्हारे धैर्य के 
थोड़ी मुझ सी बेसब्री 
चंद छींटे तुम्हारा इश्क़
कुछ बूँदे मेरा जुनून 

मुस्कराहट तुम्हारी 
आँखें भी तुम सी ही 
चमकीली - गहरी कत्थई ! 
रँग दोनों का मिला जुला 

गर्भ की गीली मिट्टी से 
एक नयी सृष्टि गढ़ रही हूँ इन दिनों ! 
तुझे ही जन्म दे कर इक रोज़ 
मैं नया जन्म लेना चाहती हूँ

-- ऋचा

Sunday, December 14, 2014

कहाँ हो मेरे सैंटा... ख़्वाहिशों ने फिर दस्तक दी है...!


आज बड़ी सारी भीगी सीली रातों के बाद एक ख़ुशनुमा दिन खिला तो सोचा यादों की गठरी खोल के उन्हें भी थोड़ी सी धूप दिखा दूँ...  बैठी बैठी यूँ ही कुछ पुराने वर्क़ पलट रही थी यादों के कि अचानक ढेर सारी मीठी मीठी ख़्वाहिशों से लबरेज़ एक विश लिस्ट पर नज़र पड़ी...  कितनी तो प्यारी प्यारी ख़्वाहिशें लिखीं थीं उसमें... मेरी तुम्हारी... याद है वो दौर कि जब हर रोज़ हम उसमें अपनी एक ख़्वाहिश जोड़ा करते थे... एक दिन मेरी बारी होती, दूसरे दिन तुम्हारी... क्या पागलपन भरे दिन थे वो भी... कितने उजले, कितने प्यारे... ख़ुशियों से छलकते... बांवरा सा ये मन हर पल जाने किस दुनिया में विचरता रहता... अपनी ही धुन में मग्न... आज भी सोचो तो मुस्कुराहट होंठों पे बेसाख़्ता तैर जाती है...

एक एक कर सारी ख़्वाहिशों को पढ़ती गई तो पाया कि लगभग सारी ही तो पूरी हो चली हैं... समय भी तो बीत गया ना कितना... तो आओ आज इस उजले दिन में मिलकर एक नयी विश लिस्ट बनाते हैं... कुछ तुम अपनी ख़्वाहिशें जोड़ो इसमें... कुछ मैं अपने ख़्वाब टाँकती हूँ... कि कुछ ख़्वाहिश, कुछ ख़्वाब बचे रहें तो ज़िन्दगी जीने की ललक भी बची रहती है... और साथ मिल कर उन ख़्वाबों,  ख़्वाहिशों को पूरा करने का उत्साह भी बचा रहता है...

ऐसे ही किसी उजले से दिन एक लॉन्ग ड्राइव पे जाना है तुम्हारे साथ... दूर बहुत दूर तलक... जहाँ धरती और आसमां मिल कर एक होने का भ्रम देते हों... साथ ना होते हुए भी एकदम करीब... एक दूसरे में घुलते हुए से... एकसार... हमारी तरह...

किसी पूरनमासी की रात किसी ऊंचे पहाड़ की चोटी से चाँद देखना है... बिलकुल साफ़ शफ़्फ़ाक... इतना बड़ा गोया किसी ने आसमां से तोड़ के सामने वाली अल्हड़ पहाड़ी के माथे पे सजा दिया हो, बिंदिया बना के... इतना पास कि हाथ बढ़ाऊँ तो छू ही लूँ उसे... उसकी चाँदनी का शॉल ओढ़े पूरी रात तुम्हारे काँधे पे सर रख के ढेर सारी बातें करनी हैं...

किसी शांत नदी के तट पे बैठ तुम्हारी बाँसुरी सुननी है, भोर की पहली किरण के साथ... जब सुरों में बदल रही होंगी तुम्हारी साँसे उस बाँस के टुकड़े से गुज़र के... मेरे वजूद में भी घुल जायेंगे सातों सुर... तुम्हारी सिम्फनी के...
याद है हमारा पसंदीदा शहर वेनिस... पानी पे तैरते किसी ख़ूबसूरत जज़ीरे सा... वहाँ की सर्पीली गलियों में घूमना है तुम्हारे साथ हाथों में हाथ डाले... गंडोला पे बैठ के पानी में उतरता शाम का सूरज देखना है... दीवार से लग कर लकड़ी की ख़ूबसूरत नक्काशीदार खिड़की तक बढ़ती पीले गुलाब की बेल के नीचे तुम्हारा माथा चूमना है... मेरी ज़िन्दगी में आने के लिये...

देखो मैंने दर्ज करा दी अपनी चंद ख़्वाहिशें अब तुम्हारी बारी... तुम भी कुछ कहो...

तुम ये ही सोच रहे हो ना कि हमारी इन बाँवरी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिये इतने पैसे कहाँ से लायेंगे... पर हमारी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिये पैसों की ज़रूरत कब से पड़ने लगी जान... भूल गये क्या... हमारी दुनिया में बस चाहतों की करेंसी चलती है... जानते हो जान मैं दुनिया की सबसे अमीर लड़की हूँ कि मेरे पास एक पूरी गुल्लक भर के तुम्हारी हँसी के सिक्के हैं...

अच्छा छोड़ो ये सब... बाकी ख़्वाहिशें जब पूरी होंगी तब होंगी... एक ख़्वाहिश अभी पूरी कर दोगे... बोलो... कैन आई गेट अ टाईट हग... राईट नाओ ???


Friday, December 5, 2014

जागते जीते हुए दूधिया कोहरे से लिपट कर, साँस लेते हुए इस कोहरे को महसूस किया है ?



सर्दियाँ हमेशा से बड़ी पसंद हैं हमें... कि थोड़ा अलसाया, थोड़ा रूमानी, थोड़ा मिस्टीरियस, थोड़ा सूफ़ियाना सा ये मौसम बिलकुल अपने जैसा लगता है...

इन सर्दियों के पहले कोहरे ने आज सुबह सवेरे दस्तक दी... अमूमन आजकल देर से ही उठाना हो रहा है... गलती हमारी नहीं है... ये कम्बख्त रज़ाइयाँ तैयार ही नहीं होती अपनी गिरफ़्त से आज़ाद करने को... ख़ैर आज सुबह उनकी तमाम कोशिशों को नाकाम कर के बरामदे में पहुँचे तो देखा नर्म शफ्फाफ़ कोहरा अपनी पुर असरार ख़ुश्बू का मलमली शॉल ओढ़े लिपटा हुआ है धरती के आग़ोश में... जैसे सदियों से बिछड़े प्रेमी मिले तो बस एक दूजे से लिपट गए सब लोक लाज छोड़ छाड़ के... कितने देर तलक उनके इस पाकीज़ा मिलन को यूँ एक टक तकती रही... सोचा के फ्रीज़ कर लूँ इन दिव्य लम्हों को मन के कैमरे में...

मेरी इस टकटकी को तोड़ा बातूनी कबूतरों के एक जोड़े ने... जाने क्या गुटर गूं  - गुटर गूं लगा रखी थी सुबह सुबह... आप बेवजह हमें बोलते हो की हम बहुत बक बक करते हैं.. देखो इन्हें... इत्ती ठंडी में भी चैन नहीं है... ज़रूर मम्मी को कोई बहाना मार के आये होंगे सुबह सुबह कि बड़ा ज़रूरी कोई काम है और यहाँ कोहरे में छुप के बातें कर रहे हैं... ख़ैर करने दो.. हमें क्या...

ये कोहरा देख के हर बार ही मन होता है कि हाथ बढ़ा के छू लूँ इसे... या फूँक कर उड़ा दूँ... ताज़ी धुनकी रुई के जैसे कोहरे के इन फाहों को... जो बैठ गए हैं हर एक चीज़ पर और सब कुछ इनके ही रंग में रंग गया है.. या चुटकी भर ये कोहरा चाय में घोल के पी जाऊँ... या फ़िर लेप लूँ अपने तन मन पर मुट्ठी भर ये मदहोश कर देने वाली गंध... के जैसे साधू कोई भस्म लगा लेता है तन पर...

जानते हो कैसे मिली इसे ये भीनी ख़ुश्बू ? कोहरे और धरती के उस पाकीज़ा मिलन से... पर तुम तो न कुछ समझते ही नहीं... याद है कितना हँसे थे तुम... इक बार जब कहा था मैंने कि मुझे इस कोहरे की ख़ुश्बू बहुत अच्छी लगती है... कितना मज़ाक बनाया था तुमने मेरा... ये कह के कि तुम पागल हो बिलकुल... कोहरे की भी भला कोई ख़ुश्बू होती है... देखो न जान आज फिर से वही महक तारी है फिज़ा में अल-सुबह से... आज फिर तुम हँस रहे हो मुझ पर...

मुझे इस कोहरे की ख़ुश्बू वाला कोई इत्र ला दो न जानां.. कि ये कोहरे वाली सर्दियाँ पूरे साल नहीं रहतीं...!


Thursday, July 10, 2014

Kumaon Diaries - Day 2


27th June 2014; Kausani to Ranikhet

सनराइज़ @ कौसानी !

जैसा की पिछली पोस्ट में बताया... कौसानी का सनराइज़ बहुत ख़ूबसूरत होता है और टूरिस्ट ख़ासकर उसे ही देखने इतनी दूर आते हैं... तो उसके लिए एक सुबह की थोड़ी सी नींद तो क़ुर्बान करी ही जा सकती थी... पहाड़ों पर सनराइज़ थोड़ा जल्दी हो जाता है सो सुबह साढ़े चार बजे का अलार्म लगा के सोये थे... सनराइज़ देखने का एक्साईटमेंट इतना की अलार्म बजने से पहले ही चार बजे नींद ख़ुद-ब-ख़ुद खुल गयी... खिड़की से झाँक के देखा तो बाहर अच्छा ख़ासा अँधेरा था... किसी तरह थोड़ा और समय काटा लेटे लेटे... डर भी था की दोबारा आँख न लग जाये... आख़िरकार साढ़े चार बजे बिस्तर छोड़ ही दिया.. हाथ मुंह धो कर और जैकेट पहन कर पहुँच गए होटल की छत पर...

आमतौर पर लोग अनासक्ति आश्रम से सनराइज़ देखते हैं पर क्यूंकि हमारे होटल की छत से ही पूरी रेंज दिखती थी सो हमारे लिए सुबह सुबह की दौड़ बज गयी.. तो बस पौने पाँच बजे कैमरा वैमरा ले के जम गए होटल की छत पे... रात भर बारिश हुई थी तो सुबह थोड़ी ठंडी थी... और बारिश का नुकसान ये हुआ की अभी तक भी बादल छाये हुए थे... हिमालय की बर्फ़ीली चोटियाँ धुंध की चादर में ढकी हुई थी... तो उन्हें देखने की उम्मीद तो खैर छोड़ ही चुके थे... फिर भी सूरज निकलने की राह देखते हुए देर तक छत पर टहलते रहे...


चूल्हे से उठता धुंआ देख के बादलों का गुमां होता रहा

पेड़ों में छुपी सर्पीली सड़कें

इसका फ़ायदा ये हुआ की घाटी में अलसाई आँखों को मसलती और अंगड़ाई लेती उनींदी सी ज़िन्दगी दिखाई दे गयी... दूर कहीं किसी घर में जलते चूल्हे से उठता धुंआ देर तलक बादलों का भ्रम दिलाता रहा... वादी में फैले सन्नाटे और कुहासे को बींधती दूर से आते किसी ट्रक की हेडलाइट... परिंदों ने भी अपने घोसले छोड़ दिए थे अब तलक और खुले आसमान में कसरत और कलाबाज़ियाँ लगा कर अपनी नींद भगा रहे थे... कोहरे में ढकी वादी देख कर वो गाना सहसा याद आ गया.. आज मैं ऊपर आसमां नीचे...

आज मैं ऊपर आसमां नीचे...!

गाना गुनगुनाते हुए सूरज चाचू को घूरा तो उन्हें भी आखिर दया आ ही गयी हमारे ऊपर और बहुत देर से छायी लालिमा को परे हटा कर लजाते हुए निकले एक बादल के पीछे से... सुन्दर दृश्य था.. पर मन में तो वो पिछली बार वाली सनराइज़ की छवि अंकित थी... दरअसल यहाँ की ख़ासियत है अपनी आखों के आगे सूरज की किरणों को एक एक कर के हिमालय की छोटी बड़ी सभी चोटियों को रंगते हुए देखना, ऐसा लगता है मानो कोई ब्रश ले कर आपके सामने पेंटिंग बना रहा हो और सोने चाँदी सी जगमगाती सुनहरी सफ़ेद चोटियाँ एक एक कर उकेरता जा रहा हो कैनवस पे... वो देखना अपने आप में एक मैजिकल एक्सपीरिएंस है... खैर इस बार किस्मत ने साथ नहीं दिया तो न सही... अगली बार मुन्सियारी से ये देखने की तमन्ना है... कुछ और क़रीब से...

बादलों से झाँकता सूरज

ख़ैर सनराइज़ देखने की रस्म पूरी हुई और एक बार फिर हम तैयार हो के करीब साढ़े नौ बजे तक होटल से चेक आउट कर के निकल गए कौसानी की सर्पीली सड़कों पर... सबसे पहले अनासक्ति आश्रम से शुरुआत करी... सन 1929 में गाँधी जी अपने भारत व्यापी दौरे पर २ दिन के लिए कौसानी आये थे पर इस जगह ने ऐसा मन मोहा की उन्होंने यहाँ क़रीब १४ दिन का समय बिताया... प्राकृतिक समानताओं की वजह से गाँधी जी ने कौसानी को "भारत का स्विट्ज़रलैंड" कहा था... अपने १४ दिन के प्रवास के दौरान गाँधी जी ने यहाँ अपनी किताब अनासक्ति योग की प्रस्तावना लिखी थी... जिस पर बाद में इस जगह का नाम अनासक्ति आश्रम रखा गया... अब इसे एक छोटे से गाँधी स्मारक का रूप दिया गया है... जिसमें गाँधी जी की बचपन से ले कर अंत समय तक की सारी फोटोग्राफ्स लगी हुई हैं... अन्दर फ़ोटो लेना मना था सो बस सब देख कर और मन में बसा कर चल दिए अगले पड़ाव की ओर... हाँ बाहर इस जगह के बारे में गाँधी जी के विचार लिखे हुए हैं... आप भी पढ़ते चलिए...




दिन का दूसरा पड़ाव था कौसानी टी गार्डन... टी गार्डन के साथ साथ वहाँ पर एक टी फैक्ट्री भी है जहाँ आप बगान से पत्ती तोड़े जाने से ले कर चाय बनने तक का पूरा प्रोसेस देख समझ सकते हैं... और साथ ही एकदम ताज़ी चाय भी टेस्ट कर सकते हैं और खरीद भी सकते हैं... हालांकि मुक्तेश्वर के रस्ते में पड़ने वाला टी प्लांटेशन पहले घूम चुके थे तो ये ज़्यादा अच्छा नहीं लगा... पर वहाँ मिलने वाली चाय अच्छी थी... सो उसे पी कर तर-ओ-ताज़ा हो कर अगले गंतव्य के लिए निकल पड़े...


एक चुस्की चाय

कौसानी से करीब बीस किलोमीटर नीचे बागेश्वर रोड पर बैजनाथ मंदिर है.. जो दरअसल गोमती नदी के तट पर बसा भगवान शिव, माँ पार्वती, श्री गणेश और सूर्य भगवान आदि को समर्पित मंदिरों का एक समूह है.. इसे कत्यूरी शासकों ने बारहवीं शताब्दी में बनवाया था... इस मंदिर की महत्ता इसलिए भी है कि हिन्दू पुराणों के अनुसार भगवान शिव और माँ पार्वती की शादी गोमती और गरुड़ गंगा के संगम पर हुई थी... पत्थरों को जोड़ के बना ये मंदिर देखने में बेहद ख़ूबसूरत लगता है... पास बहती गोमती नदी में बहुत सी मछलियाँ देखी जा सकती हैं... हालांकि रात भर हुई बारिश के कारण उस दिन नदी का पानी काफी मटमैला था और धूप तेज़ होने की वजह से मछलियाँ कम ही दिखाई दे रही थी...


बैजनाथ मंदिर

भीमशिला

इस जगह की एक और दिलचस्प विशेषता है भीमशिला... जो असल में एक गोल चिकना सा पत्थर है कोई पचास साठ किलो का... किम्विन्दंती है की भीम ने उस पत्थर पर अपना पाँव रख दिया था जिससे उसमें कुछ चमत्कारिक शक्तियाँ आ गयी थीं और इस कारण कोई भी इंसान उसे अकेले नहीं उठा सकता... पर अगर नौ लोग मिल कर अपनी तर्जनी (index finger) से उस पत्थर को उठायें नौ-नौ बोलते हुए तो वो आसानी से उठ जाता है... हमने वो पत्थर तो देखा पर उस वक़्त वहाँ नौ लोग मौजूद नहीं थे सो उसे आज़मां नहीं पाये... असल में ये फंडा सीधा सीधा सेन्टर ऑफ़ ग्रेविटी की थ्योरी से जुड़ा हुआ है.. खैर लोगों को उनकी मान्यताओं के साथ छोड़ कर हम आगे बढ़े...


खूबसूरत सीढ़ी नुमा खेत में काम करती पहाड़ी औरतें

सीढ़ी नुमा खेत
 
माँ के खेतों से लौटने का इन्तेज़ार करता घर में बंद पहाड़ी बच्चा


रास्ते में बस एक जगह खाने के लिए ब्रेक ले कर हम सीधा रानीखेत पहुँचे करीब शाम के चार बजे... होटल में चेक इन कर के थोड़ा सुस्ताये... रास्ते की थकन उतारी और करीब छः बजे फ़िर निकले रानीखेत से रू-ब-रू होने ... जो दिन का सबसे अच्छा और सुकून भरा हिस्सा होने वाला था... रानीखेत से करीब पाँच किलोमीटर आगे हैड़ाखान बाबा का आश्रम है... चारों ओर प्राकृतिक ख़ूबसूरती में घिरा शिव जी का मंदिर है यहाँ... इतना सुकून है इस जगह की बस मन करता है घंटों यही बैठे रहें और बादलों को पहाड़ों के साथ अटखेलियाँ करता देखते रहें...

हैड़ाखान बाबा आश्रम के एक विश्रामगृह की छत पर सुस्ताता कबूतर 


अगले पड़ाव पर पहुँचने की जल्दी थी सो वहाँ ज़्यादा नहीं रुके... ये अगला पड़ाव अभी तक की ट्रिप का सबसे ख़ूबसूरत पड़ाव होने वाला था... दरअसल आश्रम के लिए आते वक़्त रास्ते में एक जगह पाइन के पेड़ों का जंगल मिला... बिलकुल ऐसा जैसा सिर्फ़ फिल्मों में देखते आये थे अब तक... बेइन्तेहां ख़ूबसूरत... जहाँ तक नज़र जा रही थी सिर्फ़ पाइन के ही पेड़ छोटे बड़े... बीच में गुज़रती सर्पीली सी सड़क...

पाइन का खूबसूरत जंगल

जंगल से गुज़रती सड़क
करीब आधा पौन घंटा कब बीत गया वहाँ पता ही नहीं चला... वहाँ से वापस आने का मन तो बिलकुल नहीं था पर अँधेरा हो चला था सो वापस आना पड़ा... खाना खा के वापस होटल आये तो सोनी मैक्स पर पंचम की ७५ वीं जयंती पर स्पेशल प्रोग्राम चल रहा था... बहुत कोशिश करी उसे देखने की लेकिन नींद की जादुई झप्पी मन पे भरी पड़ गयी... एक और ख़ूबसूरत दिन मुकम्मल हुआ...!

Saturday, July 5, 2014

Kumaon Diaries - Day 1


26th June 2014; Lucknow to Kausani




अल्मोड़ा से कौसानी जाते वक़्त पाइन के ख़ूबसूरत जंगलों से गुज़रते हुए

नैनीताल हमेशा से हमारा पसंदीदा हिल स्टेशन रहा है... झील के किनारे बसा एक खूबसूरत शहर... यूँ तो तीन बार पहले भी आ चुकी हूँ यहाँ... पर दिल है की भरता ही नहीं इस जगह से... जाने मन की कौन सी डोर है जो हर बार यही अटक कर रह जाती है और बार बार हमें अपनी ओर खींच लेती है...

अब ये चौथी ट्रिप थी यहाँ की तो सोचा क्यूँ ना इस बार थोड़ा अलग रूट लिया जाये... पहले कौसानी चलते हैं... वहाँ से उतर के रानीखेत आयेंगे और सबसे आखिर में नैनीताल... तो बस ट्रिप फ़ाइनल होते ही irctc की साईट पे जम गये... भला हो रेलवे वालों का की आख़िरकार उन्हें लखनऊ काठगोदाम शताब्दी की याद आ ही गयी... एक हफ्ते के लिये चली इस ट्रेन को एक और वीक का एक्सटेंशन भी मिल गया... बस फिर क्या था टिकट बुक किये और चल दिये इस गर्मी में सुकून के चंद रोज़ बिताने के लिये...

सुबह सवा पाँच बजे की ट्रेन थी सो तीन बजे उठे... नहा धो कर तैयार हुए और सुबह पाँच बजे के करीब उमस भरी गर्मी में स्टेशन पहुँचे... प्रीमियम ट्रेन थी सो साफ़ सुथरी थी... पिछले हफ़्ते न्यूज़ पेपर में छपी ख़बरों के विपरीत रास्ते भर खाना भी ठीक ठाक ही मिला... दोपहर करीब पौने एक बजे हम काठगोदाम पहुँच गये... वहाँ से तीन दिन के लिये टैक्सी हायर करी और निकल पड़े कौसानी की ओर... ख़ूबसूरत कुमाउनी वादियों से गुज़रते हुए अपने पाँच दिन के कुमाऊं प्रवास पर...


दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत बारिश पहाड़ों पर होती है !

काठगोदाम से थोड़ा ही आगे बढ़े थे की बादल और बारिश उमड़ पड़े हमारे स्वागत में... मन की सूखी धरती पर बारिश की बूँदे पड़ते ही ऐसा सौंधा सा एहसास हुआ की क्या बतायें... सुबह तीन बजे उठ कर ट्रेन पकड़ने की थकन जैसे गायब ही हो गयी... सब एकदम से हराभरा हो गया... मानो मेघों से अमृत बरस रहा हो और हम उसे पी कर अमर हुए जाते हों...


कोसी पे बना कोई पुल

काठगोदाम से भुवाली होते हुए रास्ते का पहला पड़ाव था कैंची... यहाँ नीम करोली बाबा का बनवाया हुआ हनुमान जी का प्रसिद्ध मन्दिर है... प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थापित इस मन्दिर की साफ़ सफ़ाई और यहाँ का अनुशासन देखने लायक है... यहाँ मिलने वाला चने का प्रसाद हमें बड़ा पसंद है... बारिश ने यहाँ तक भी उँगली थामी हुई थी सो कैमरे को हमने सुस्ताने दिया... और ख़ुद बारिश में भीगे पाइन के पेड़ों से उठती मदहोश कर देने वाली ख़ुश्बू के खो गए... ऐसी मादक ख़ुश्बू जिसे बस महसूस किया जा सकता है... बयां नहीं...


शिखर पे बसा अल्मोड़ा किसी परी कथा के गाँव सा प्रतीत होता है

करीब पौन घंटे बाद हम अपने अगले पड़ाव अल्मोड़ा पहुँचे... ये बहुत ही शान्त और खूबसूरत पहाड़ी शहर है... हमें यहाँ ठहरना नहीं था... पर अल्मोड़ा से गुज़रें और बाल मिठाई ना लें ये तो इस खूबसूरत जगह का अपमान करने जैसा हुआ... और ऑफिस में भी सबको प्रॉमिस कर के आये थे की बाल मिठाई ले कर ही वापस आयेंगे... सो जम कर यहाँ की प्रसिद्ध बाल मिठाई और चॉकलेट मिठाई खरीदी... इतनी बार आये हैं यहाँ की इस बार तो वो मिठाई वाला भी पहचान गया हमें...

मुँह मीठा कर के थोड़ा आगे बढ़े ही थे की बारिश एक बार फिर हमसे मिलने आ गयी... और फिर कौसानी तक उसकी ये आँख मिचोली चलती रही...


पर्बतों से गले मिलते बादल, मिलन के गवाह बने सीढ़ी वाले खेत

कौसानी दो चीज़ों में लिये बहुत फेमस है यहाँ का सनराइज़ और सनसेट... होटल पहुँचते तक करीब छः बज गये थे... बारिश हो रही थी सो अलग... सनसेट देखने की हसरत मन में ही रह गयी... लेकिन यहाँ पहुँचने का सुकून था... होटल में चेक इन कर के रूम में पहुँचे तो वहाँ के नज़ारे ने सारी थकन उतार दी... रूम में ही पूरी दीवार भर की फुल लेंग्थ खिड़की से नज़र आती बारिश में भीगी हिमालय की चोटियाँ... अद्भुत नज़ारा था...


होटल की खिड़की से दिखता 375 किलोमीटर लम्बा हिमालयन रेंज

चेंज कर के और चाय पी कर जब तक हम होटल की छत पर पहुँचे तो हल्का अँधेरा घिर आया था... हवा ठंडी थी... हलकी सिहराने वाली... नीचे वादी में टिमटिमाता कोई पहाड़ी गाँव जुगनुओं के झुरमुट सा प्रतीत हो रहा था... आँखों और कैमरे में उस खूबसूरती को क़ैद कर वापस रूम में आये... खाना खाया...


जुगनुओं के झुरमुट सा टिमटिमाता पहाड़ी गाँव

करीब दस बजे लेट कर डायरी लिखते हुए इस पूरे दिन को याद किया... लखनऊ से कौसानी तक के इस एक दिन के सफ़र में कितने मौसमों से गुज़रे... गर्मी... उमस... बारिश... और अब ये निम्मी निम्मी ठण्ड... रूह को ठंडक पहुँचाने वाली... नींद ने कब बढ़ कर अपनी आगोश में समां लिया पता ही नहीं चला....!


 

Friday, June 20, 2014

ख़ानाबदोश !



यात्रा करना कुछ कुछ ध्यान लगाने जैसा है... मेडीटेट करने जैसा... एक अनंत में ख़ुद को खो देने जैसा... एक असीम में ख़ुद को पा लेने जैसा... नयी जगह नये लोग नया वातावरण.. हर बार एक नया जन्म लेने जैसा... कितना रुच रुच के उस उपरवाले ने ये कायनात बनायी है... पूरी शिद्दत से... कहीं पेड़ कहीं पहाड़... झरने... जंगल... सागर... कहीं रेगिस्तान कहीं खेत खलिहान... ये प्रकृति कितनी ख़ूबसूरत है... जैसे हर कण में उसने अपना एक अंश छोड़ दिया है... और हम इंसानों के अन्दर एक यायावर की आत्मा... 

ये यायावरी ये ख़ानाबदोशी शायद थोड़ी ज़्यादा ही दे दी है उस उपरवाले ने हमें... पिछले जन्म की किसी बंजारन की आत्मा... थोड़ा सा समय बीतता है और लगता है बस अब कुछ दिनों के लिए कहीं घूम आना चाहिए... किसी नए शहर किसी नए कस्बे... और इस बार तो हद ही हो गयी... ढाई साल होने आ रहा है और हम कहीं जा नहीं पा रहे हैं... मन हर शाम एक अजीब सी बेचैनी से भर जाता है.. जैसे उसे भी सांस लेने को एक नयी खुली जगह चाहिए... पिछले साल फूलों की घाटी जाने का प्लान बनाया था... टूर ऑपरेटर को एडवांस पैसे भी जमा कर दिए, पर उत्तराखंड में पिछले साल आयी भयानक प्रलय से सारे टूर कैंसिल हो गए.. इस साल भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं दिखती... तो आजकल किसी नयी डेस्टिनेशन की तलाश है... कहीं किसी दूसरे पहाड़ पर...

पहाड़ों में तो जैसे हमारी आत्मा बसती है... आज जब लोग सेविंग और रिटायरमेंट प्लान्स के बारे में सोचते हैं तो हम दूर किसी पहाड़ी पर एक छोटा सा कॉटेज लेने के बारे में सोचते हैं... वही किसी गाँव के किसी स्कूल में पहाड़ी बच्चों को पढ़ाते हुए तमाम उम्र गुज़र जाये तो क्या ही ख़ूब हो... उफ़ ये ख्वाहिशें... के हर ख्वाहिश पे दम निकले...

वैसे कितना कुछ है ना इस दुनिया में देखने को... एक्स्प्लोर करने को... छोटी छोटी जगहें... शहर... टापू... द्वीप... हिन्दुस्तान की बात करें तो काफ़ी हद तक हमने घूमा है... ज़्यादातर पहाड़... और बहुत कुछ है जो अभी देखना बाकी है... मुनार जाना है... केरेला देखना है... कच्छ का रण... कश्मीर... राजस्थान... गुजरात... दार्जलिंग... पेंगॉन्ग सो लेक... डलहौज़ी... चम्बा.. खजियार... लैंड्सडाउन... जिम कॉर्बेट... और भी न जाने क्या क्या... हमें उन सब जगहों पर जाना है... उन्हें महसूस करना है... आत्मसात करना है... कुछ पलों के लिये उन्हीं का हिस्सा हो जाना है...

ऐल्प्स की पहाड़ियाँ... सफ़ेद नीले घरों से जगमगाता मिकोनोस शहर... अमेज़न के घने जंगल... मालदीव्स का झिलमिलता नीला समुद्र... पानी में डूबता तैरता वेनिस... फ्रेंच वाइन यार्ड्स... ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ... लॉच नदी के किनारों पे बसा ख़ूबसूरत कोलमर शहर... फिलिपींस का डेडॉन आइलैंड... कैलाश मानसरोवर में बिखरे शिव...

सोचने बैठो तो एक के बाद एक नाम जुड़ते ही जाते हैं इस लिस्ट में... देखने को कितना कुछ है... और ज़िन्दगी कितनी छोटी... हर एक लम्हें में कितना कुछ जीना है... हर गुज़रते पल के साथ एक नया जन्म लेना है...!

Thursday, April 18, 2013

पिओनी और इनूरी के देस में...




नीले पॉपी के बगल से होकर
वो जो अलसायी सी पगडण्डी मुड़ती है न
ठीक उसी पर आगे बढ़ना
मील भर के फासले पर
आबशारों की इक टोली मिलेगी
सुना है पूरनमासी की रात
आसमां से परियाँ आती हैं वहाँ

थोड़ा आगे बढ़ने पर
शफ्फाक़ बर्फ़ का जज़ीरा मिलेगा
न न उसके रंग पर मत जाना
दिल का बड़ा पाजी है !
संभल संभल के चलना उस पर
ज़रा सा कोई फिसला गया तो
मुआं खिलखिला के हंस पड़ता है

वहां से कुछ ही दूर पर
अलसाई सी पीली पिओनी का झुण्ड
हरी घास पर धूप सेंकता मिलेगा
बस वहीं से दायें मुड़ना
संभल कर… आगे ढलान है
सामने रुई के फ़ाहे सा नर्म
बादलों का इक दरिया होगा

जानती हूँ, दिल करेगा
उस मखमली दरिया में
पैर डाल के बैठो कुछ देर
रस्ते की कुछ थकन उतारो
पर वो मायाजाल है
उसमें फँसना मत... आगे बढ़ना

ज़रा ध्यान से सुनोगे तो
पास बहती नदी की शरारत सुनाई देगी
उसकी अठखेलियों से लजाये
कुछ गुलाबी फूलों की कतारें
नदी के किनारे दूर तक फैली होंगी
तुम भी उनकी ऊँगली थाम बढ़ते आना

आगे लाल और सफ़ेद फूलों की
इक बस्ती मिलेगी
आजकल कुछ नाज़ुक नारंगी
मेहमां भी आये हैं उनके देस
आदतन सब के सब बैठे
गप्पें मार रहे होंगे देवदार तले
या फिर भँवरे और तितली का
वाल्ट्ज देखते होंगे !

उनसे मिल के आगे बढ़ोगे तो
ओस में भीगी सकुचाई सी इक
जामुनी इनूरी मिलेगी
पीले गुलाब की दीवानी है
पर वो निरा जंगली ठहरा
अब तक उसका मन न समझा !

आगे रास्ता थोड़ा संकरा है
थोड़ा सा पथरीला भी
कोहरे के धुंधलके में
परिन्दों की आवाज़ का पीछा करते
जुगनुओं से कुछ नूर उधार ले कर
अपनी राह तलाशते, ये सफ़र अब
तुम्हें ख़ुद तय करना होगा

कुदरत की इस नायाब पेंटिंग में
जहाँ सूरज अपनी सारी लाली
घाटी के नर्म गालों पर मल कर
उसकी आग़ोश में जज़्ब हो जाता है
पहाड़ी के उस अंतिम छोर पर
मैं मिलूँगी
धरती की इस जन्नत में
तुम्हारा इंतज़ार करती !

-- ऋचा 


* पॉपी, पिओनी, इनूरी - फूलों की घाटी में खिलने वाले ३०० फूलों में से तीन फूलों के नाम !

Saturday, October 13, 2012

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ !



मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...

कितने दिन हो गए कुछ लिखा नहीं... आज दिल किया कुछ लिखूँ तो तुम्हारे सिवा और तुमसे बेहतर कोई दूसरा मौज़ू ही नहीं मिला... गोया मेरी लेखनी को भी प्यार हो गया है तुमसे...

तुमसे बात करना हमेशा ही दिल को एक सुकून दे जाता है... दुनिया भर की परेशानियों के बीच दो पल तुम्हारी आवाज़ रूह को ऐसे ठंडक पहुंचती है जैसे पसीने से भीगे बदन पर ठंडी हवा का झोंका... सारा तनाव सारी परेशानियाँ सब चंद लम्हों में ही काफ़ूर हो जाते हैं... सारे दिन की थकन के बाद तुमसे बात होती है तो यूँ लगता है मानो हर की पौड़ी पर बैठ कर संध्या आरती देख रहे हों... गंगा के ठन्डे पानी में पैर डाल के... तृप्ति !

जाने तुम्हारी आवाज़ का जादू है या तुम्हारे साथ का, पर कुछ तो ज़रूर है... कभी कभी तो जी करता है तुम्हें बिना बताये तुम्हारी आवाज़ का एक टुकड़ा चुरा कर रख लूँ अपने पास और फ़ुर्सत में उससे खूब सारी बातें किया करूँ...

जानते हो तीन दिन पहले एक सपना देखा था... हम साथ काम कर रहे थे एक ही ऑफिस में, एक ही बिल्डिंग में... पर तुम इस कदर मसरूफ़ थे कि एक पल के लिए बात करने का भी समय नहीं था... हम बस एक दूसरे को देख भर पा रहे थे... फिर सब काम छोड़ कर अचानक तुम मेरे पास आये... बोला कुछ भी नहीं बस मेरा हाथ पकड़ा था... तुम्हारा वो स्पर्श बिन कुछ बोले भी कितना कुछ कह गया था... उस एक स्पर्श में सहानुभूति थी, संवेदना थी, करुणा थी, समय न दे पाने की तकलीफ़ थी और सबसे बढ़ कर बेहद गहरा प्यार था... तीन दिन बाद भी सपने में महसूस किया वो तुम्हारे हाथों का स्पर्श अब भी अंकित है मन के पन्नों पर...

तुम ज़्यादा बोलते नहीं... तुम्हारे होंठ अक्सर ख़ामोश रहते हैं... पर तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... जाने किस भाषा में बातें करती हैं मेरी आँखों से कि सीधे दिल तक पहुँचती है उनकी आवाज़... बहुत से ऐसे एहसास हैं जिन्हें महसूस तो किया है तुम्हारी आँखों के ज़रिये पर शब्दों में उनका तर्जुमा करना मुमकिन नहीं है... कहाँ से सीखी ये भाषा ? सीधे दिल पे दस्तक देने वाली !

जानते हो पहला अक्षर और पहली भाषा कैसे बने ? और संगीत का पहला सुर ? नहीं जानते ? आओ आज बताती हूँ तुम्हें...

आदि रचना
मैं - एक निराकार मैं थी

ये मैं का संकल्प था
जो पानी का रूप बना
और तू का संकल्प था
जो आग की तरह नुमाया हुआ
और आग का जलवा
पानी पर चलने लगा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मैं की मिट्टी की प्यास थी
कि उसने तू का दरिया पी लिया
ये मैं की मिट्टी का हरा सपना था
कि उसने तू का जंगल खोज लिया
ये मैं की मिट्टी की गंध थी
और तू के अम्बर का इश्क़ था
कि तू का नीला सा सपना
मिट्टी की सेज पर सोया
ये तेरे और मेरे मांस की सुगंध थी
और यही हक़ीक़त की आदि रचना थी

संसार की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि पुस्तक
मैं थी और शायद तू भी
शायद एक सांस के फासले पे खड़ा
शायद एक नज़र के अँधेरे पे बैठा
शायद एहसास के मोड़ पे चल रहा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मेरा और तेरा अस्तित्व था
जो दुनिया की आदि भाषा बना
मैं की पहचान के अक्षर बने
तू की पहचान के अक्षर बने
और उन्होंने आदि भाषा की आदि पुस्तक लिखी

ये मेरा और तेरा मिलन था
हम पत्थर की सेज पर सोये
और आँखें, होंठ, उँगलियाँ, पोर
ये मेरे और तेरे बदन के अक्षर बने
और उन्होंने आदि पुस्तक का अनुवाद किया

ऋगवेद की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि चित्र
मैं थी और शायद तू भी
मैं छाँव के भीतर थिरकती सी छाया
और तू भी शायद एक खाकी सा साया
अंधेरों के भीतर अंधरों के टुकड़े
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

रातों और पेड़ों का अँधेरा था
जो तेरी और मेरी पोशाक थी
एक सूरज कि किरण आयी
वो दोनों के बदन में से गुज़री
और परे एक पत्थर पर अंकित हो गयी
सिर्फ़ अंगों की गोलाई थी,
चाँदनी की नोकें
ये दुनिया का आदि चित्र था
पत्तों ने हरा रँग भरा
बादलों ने दूधिया, अम्बर ने सिलेटी
और फूलों ने लाल, पीला, कासनी

चित्रों की कला तो बहुत बाद की बात है !

आदि संगीत
मैं थी और शायद तू भी
एक असीम खामोशी थी
जो सूखे पतों कि तरह झड़ती
या यूँ ही किनारों की रेत कि तरह घुलती
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

मैं ने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तू ने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिट्टी के कान कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया
पेड़ की टहनियाँ कुछ कस सी गयीं
पत्तों में एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिड़िया के पंख हिले
ये पहला नाद था
जो कानों ने सुना था

सप्त सुरों की संज्ञा तो बहुत बाद की बात है !

आदि धर्म
मैं ने जब तू को पहना
तो दोनों के बदन अंतर्ध्यान थे
अंग फूलों की तरह गूंथे गये
और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये

तू और मैं हवन की अग्नि
तू और मैं सुगन्धित सामग्री
एक दूसरे का नाम होंठों से निकला
तो वही नाम पूजा के मन्त्र थे
ये तेरे और मेरे अस्तित्व का एक यज्ञ था

धर्म की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि क़बीला
मैं की जब रुत गदराई थी
मांस के पौधे पर बौर आया था
पवन के आँचल में महक बंध गयी
तू का अक्षर लहलहाया था

मैं और तू की छाँव में
जहाँ "वह" आ कर निश्चिन्त सो गया
ये "वह" का एक मोह था
गेंहूँ का दाना हमने बाँट लिया
"वह" सहज था, स्वाभाविक था
मैं की और तू की तृप्ति

क़बीलों की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि स्मृति
काया की हकीक़त से लेकर
काया की आबरू तक मैं थी
काया के हुस्न से लेकर
काया के इश्क़ तक तू था

यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख्लाक़ दिया
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने "वह" को पहचान लिया
भयमुक्त मैं की हस्ती
और भयमुक्त तू की, "वह" की

मनु स्मृति तो बहुत बाद की बात है !

-- अमृता प्रीतम

Monday, July 23, 2012

ये शहर लालाज़ार है यहाँ दिलों में प्यार है, जिधर नज़र उठाइये बहार ही बहार है !


ये लखनऊ की सरज़मी

१६ जुलाई २०१२, दिन सोमवार, समय सुबह के ६.३० बजे.

बहुत ही ख़ुशनुमा सुबह थी... सारी रात हुई बारिश के बाद उजली, धुली हुई सी सुबह... हवा में हल्की नमी और बूंदों की ख़ुश्बू... पेड़, पौधे, पंछी सब ख़ुशी से चहचहाते हुए... एक ऐसी सुबह जिससे बाहें फैला के गले मिलने का दिल करे... ऐसी सुबह जो आपको आपके शहर से फिर प्यार करने पर मजबूर कर दे... और फिर हमारा शहर तो यूँ भी हमारी जान है... किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है हमारे लखनऊ के बारे में...

ये शहर रहा होगा शाइस्ता मिज़ाजों का
इस शहर के मलबों से गुलदान निकलते हैं 



हुसैनाबाद दरवाज़ा

तो सुबह सुबह हम भी चल दिये अपने शहर से मिलने... जैसा की पिछली एक पोस्ट में बताया था बड़े दिनों से मन हो रहा था पुराने लखनऊ घूमने का... तो एक रात पहले ही प्लान फाइनल हुआ और सुबह सवेरे ही हम निकल पड़े... हम, भाई और उसके दो दोस्त... क़रीब सात बजे हम घर से निकले... और सबसे पहले पहुँचे हुसैनाबाद बाज़ार... भाई के एक दोस्त को बहुत ज़ोर से भूख लगी थी बोला रात में भी खाना नहीं खाया... पहले नाश्ता करेंगे फिर कहीं चलेंगे :) तो वो लोग टूट पड़े पूड़ी सब्ज़ी पर और हमने उतनी देर में हुसैनाबाद बाज़ार की तस्वीरें लीं... हुसैनाबाद के बारे में बताते चलें कि नवाबों ने यहाँ बहुत सी इमारते बनवायीं जिसमें छोटा इमामबाड़ा (जहाँ हमें भी जाना था पर जा नहीं पाये), हुसैनाबाद बाज़ार, दो ख़ूबसूरत दरवाज़े, घंटा घर और सतखंडा प्रमुख हैं...

कुड़िया घाट

नाश्ता करने के बाद हम पहुँचे कुड़िया घाट... १९९० में इस घाट का पुनर्निर्माण करवाया गया था... सुबह के शान्त माहौल में वहाँ गोमती नदी में बोटिंग करना एक अनोखा अनुभव था... माना जाता है की गोमती नदी गंगा से भी पुरानी है इसलिए इसे "आदि गंगा" भी कहा जाता है... गोमती नदी पर बना पक्का पुल या लाल पुल जिसे हार्डिंग ब्रिज भी कहते हैं बहुत सी फिल्मों में दिखाया गया है... अगर आप दिमाग़ पर थोड़ा सा ज़ोर डालें तो याद आएगा कि हाल ही में आयी तन्नु वेड्स मन्नू और इशकज़ादे में भी इसे दिखाया गया है... १९१४ में बना तकरीबन सौ साल पुराना वास्तुशिल्प की मिसाल ये पुल आज भी उसी शान से खड़ा है और रोज़ सैकड़ों वाहन आज भी इसके ऊपर से गुज़रते हैं...

पक्का पुल

टीले वाली मस्जिद


इसी पुल के एक सिरे पर स्थित है आलमगिरी मस्जिद जिसे हम टीले वाली मस्जिद के नाम से भी जानते हैं...  इसका निर्माण औरंगज़ेब ने १५९० में करवाया था... इसके पास में ही बड़ा इमामबाड़ा या आसिफ़ी इमामबाड़ा (जिसके बारे में पिछली पोस्ट में भी बताया था) और रूमी दरवाज़ा हैं... बड़ा इमामबाड़ा जाना इस बार भी रह गया... पर उसका कोई गिला नहीं क्यूँकि हमने वो देखा जो शायद किस्मत से ही देखने को मिलता है... रूमी दरवाज़े के ऊपर से पुराने लखनऊ का नज़ारा !!

बड़ा इमामबाड़ा और आसिफ़ी मस्जिद


रूमी दरवाज़ा
बीते दिनों में कुछ एक हादसों के चलते रूमी दरवाज़े के अंदर जाने का रास्ता लोहे की फेंस लगा के पूरी तरह से बन्द कर दिया गया है... पर सुबह का समय था तो सड़क पर और आसपास भीड़ भी कम थी... बस फिर क्या था हम सब कूद-फांद के पहुँच गये दरवाज़े के अन्दर... क्या ख़ूबसूरत इमारत है... अवधी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना... नवाबों को मानना पड़ेगा... एक से बढ़कर एक इतनी ख़ूबसूरत इमारतों की सौगात दे कर गये हैं लखनऊ को कि दिल से बस वाह निकलती है उनके लिये !

रूमी दरवाज़े की उपरी मंज़िलें
सन १७८४ में बने इस दरवाज़े के नीचे से जाने कितनी ही बारगुज़रे होंगे... हमेशा ख़ूबसूरत भी लगा पर इतना ख़ूबसूरत होगा असल में ये उस दिन पता चला... क़रीब ६० फिट ऊँचे इस दरवाज़े के ऊपर बनी अष्टकोण छतरी पर जब पहुँचे तो इतने सारे जीने चढ़ के आने की थकान एक पल में गायब हो गई... एक ओर बहती गोमती नदी और दूसरी ओर बड़ा इमामबाड़ा... पीछे बैकड्रॉप में दिखता हुसैनाबाद का घंटा घर, सतखंडा, हुसैनाबाद के दरवाज़े, जुमा मस्जिद और भी जाने क्या क्या... लखनऊ बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहा था वहाँ से... क़रीब एक घंटे तक वहाँ बैठे रहे... इतनी ठंडी हवा लग रही थी की वापस जाने का मन ही नहीं हो रहा था किसी का..

ख़ैर वहाँ से निकले तो क़रीब १०.१५ हो रहा था... अब तक हमें भी भूख लग आयी थी थोड़ी थोड़ी और बाक़ी सब को दुबारा से :) तो हम जा पहुँचे चौक... श्री की मशहूर लस्सी पीने और छोले भठूरे खाने... क़रीब २० मिनट के ब्रेक के बाद हम सब की एनर्जी फिर से रीचार्ज हो गई थी... अब सोचा गया कि आगे कहाँ जाएँ... धूप हो गई थी तो इमामबाड़ा जाने का किसी का मन नहीं हो रहा था... फिर तय हुआ की काकोरी चलते हैं... बेहता नदी का पुल देखने...

बेहता पुल के पास बना शिव मन्दिर
क़रीब आधे घंटे बाद वहाँ पहुँचे... चारों तरफ़ आम के बाग़ों से घिरी वर्ल्ड मैंगो बेल्ट में :) यहाँ का मशहूर दशहरी आम पूरी दुनिया में निर्यात किया जाता है... बेहता नदी का पुल और उसके पास बने शिव जी के प्राचीन मंदिर का निर्माण १७८६-८८ में नवाब आसिफ़-उद-दौला के कार्यकाल में उनके प्रधानमंत्री टिकैत राय ने करवाया था... अगर आपको याद हो तो फिल्म शतरंज के खिलाड़ी और शशि कपूर द्वारा निर्देशित फिल्म जुनून के कुछ दृश्यों का फिल्मांकन भी यही हुआ है... यहाँ पास में ही वो रेल की पटरी भी है जहाँ 9 अगस्त १९२५ का मशहूर काकोरी कांड हुआ था... जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खान और उनके साथियों ने मिल कर ट्रेन लूटी थी...

मंदिर में दर्शन करने और पेड़ से आम तोड़ कर खाने के बाद हम लौटे अपने घर की ओर और क़रीब १ बजे हमारा उस दिन का लखनऊ भ्रमण पूरा हुआ... अब अगली बार पक्के से आप सब को इमामबाड़ा घुमाना है... जल्द ही चलते हैं फिर... ऐसी ही किसी फ़ुर्सत वाली सुबह :)



तब तक के लिये बस इतना कहना है अपने लखनऊ के भाई बंधुओं से कि बुरा लगता है तेज़ी से बदलती जा रही लखनऊ की फिज़ा को देख कर... सारी दुनिया जिसकी तमीज़ और तहज़ीब की कायल है, अवध की वो संस्कृति हमारी ही धरोहर है और हमें ही उसे बनाए रखना है और सँवार कर आगे आने वाली पुश्तों तक भी पहुँचाना है... आइये मिल कर इस संस्कृति को कायम रखते हैं जिससे आगे आने वाली पुश्तें भी शान से कह सकें... मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं !



(ऑडियो साभार : रेडियो मिर्ची एफ एम चैनल)

कुछ और तस्वीरें  --

हुसैनाबाद घंटा घर

कुड़िया घाट

गोमती नदी

रिफ्लेक्शन !

आइसोलेटेड !

माझी बगैर नैया

लाल पुल के नीचे से गुज़रते हुए

लाल पुल

बड़े इमामबाड़े का मुख्य दरवाज़ा

रूमी दरवाज़े से दिखती गोमती नदी

हुसैनाबाद दरवाज़ा, दाहिनी ओर सतखंडा और घंटा घर

बड़े इमामबाड़े में स्थित आसिफ़ी मस्जिद

बड़े इमामबाड़े का भीतरी दरवाज़ा

बड़ा इमामबाड़ा

रूमी दरवाज़े से दिखता बड़ा इमामबाड़ा

रूमी दरवाज़े से दिखता बड़ा इमामबाड़ा
रूमी दरवाज़े से दिखती आसिफ़ी मस्जिद की मीनारें

रूमी दरवाज़े के भीतर बने दरवाज़े
रूमी दरवाज़ा (पीछे से)
बेहता नदी का पुल
(सभी तस्वीरों को बड़ा कर के देखने के लिये उन पर क्लिक करें)
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