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Wednesday, December 18, 2013

तेरा नाम इश्क़ मेरा नाम इश्क़ !


तुम्हारी हँसी की आवाज़ आज बहुत देर तलक कानों में गूँजती रही...

जानते हो आज कितने दिनों बाद तुम इतना खुल के हँसे हो... वो बच्चों सी उन्मुक्त हँसी... ख़ुशी से गीली हो आयी पलकों से पोंछ के काजल... जी किया कि तुम्हारी हँसी को काला टीका लगा दूँ... या फ़ेंक के कोई जाल क़ैद कर लूँ इस लम्हें को... तुम्हारी हँसी से गूँजता खिलखिलाता ये लम्हा...

रोज़ हँस दिया करो ना ऐसी हँसी एक बार... भले मेरा मज़ाक बना कर ही सही... दिन बन जाता है मेरा...!


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एक हूक सी उठती है कई दफ़े दिल में... कि तुम्हारा हाथ थाम के और तुम्हारे काँधे पे सर रख के बस बैठी रहूँ कुछ देर... बिन कुछ बोले... तुम्हारा लम्स महसूस करूँ अपनी हथेली में... कि तुम्हारे हाथों की गर्मी मन को बहुत ठंडक पहुँचाती है... जैसे कोई अनदेखी ऊर्जा तुम्हारी हथेलियों से होके मेरे मन तक पहुँच रही हो... ज़िन्दगी की ऊर्जा... तुम से मुझ तक बहती हुई... सारी थकन सारी उदासी चंद पलों ही में कहीं ग़ुम हो जाती है...

टच थेरेपी और क्वांटम टच के बारे में सुना है कभी तुमने... कभी सोचा कैसे एक रोता हुआ बच्चा माँ की गोद में आते ही चुप हो जाता है... आप कितनी भी असफ़ल कोशिश कर चुकें हों उसे चुप करने की पर कैसे माँ के सहलाते ही बच्चे का सुबकना बंद हो जाता है... स्पर्श का ये कैसा बेआवाज़ रिश्ता होता है माँ और बच्चे के बीच...

तुम मेरे लिए माँ का वही स्पर्श हो... !

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चाय - कॉफ़ी पीने का मुझे कभी भी बहुत शौक़ नहीं रहा...मेरे लिए वो सिर्फ़ तुम्हारे साथ समय बिताने का बहाना मात्र हुआ करती थीं...वो लॉन्ग ड्राइव्स... वो बेवजह की बातें... वो बेवजह के किस्से कहानियाँ... वो बेवजह के झगड़े... सब...

जानती हूँ बहुत कीमती है तुम्हारा समय... और मेरे पास बेवजह की बातें बहुत सी... फिर भी मेरे सारे प्यार के बदले क्या एक दिन उधार दे सकते हो मुझे ? सिर्फ़ चौबीस घंटे...

बहुत समय हो गया ज़िन्दगी जिये... बड़ी सारी बेवजह की बातें भी इकट्ठी हो गयी हैं...!


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कभी किसी को एक ही सी इंटेंसिटी से पसंद और नापसंद किया है ? नहीं ? मतलब कभी किसी से प्यार नहीं किया आपने... किसी से प्यार कर के देखिये हुज़ूर... सच्चा प्यार... उसकी अच्छाइयों पे जितना प्यार आएगा उसकी बुराइयों से आप उतनी ही नफ़रत करेंगे... प्यार जितना सच्चा होगा नफ़रत उतनी ही तीव्र...

अजीब रिश्ता था उन दोनों का... पल में तोला पल में माशा जैसा... एक पल एक दूसरे पे इतना प्यार बरसाते मानो इस धरती पर प्यार की नीव उन्हीं ने डाली हो और दूसरे ही पल ऐसे पागलों के जैसे लड़ते गोया इस धरती से प्यार का अंत भी उन्हीं के हाथों लिखा हो... शब्दों के तीर से कभी ज़ख्म देते तो कभी उन्हीं ज़ख्मों पर शहद जैसे शब्दों से मरहम लगते... दर्द भी ख़ुद ही, ख़ुद ही दवा भी... जाने किस दुनिया के बंदे थे...

हमारा रिश्ता भी तो कुछ ऐसा ही अजीब है ना जान... इंटेंस... इन्सेशियेबल... इनसेन...!





Thursday, May 30, 2013

मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी...!


एक दोस्त हमेशा कहता है, शायद मज़ाक में... सच बोलते हुए इंसान बहुत ख़ूबसूरत हो जाता है... पर महसूस करो तो उसकी बात सौ फ़ीसदी सही है... सच बोलते हुए या सच स्वीकारते हुए आप हमेशा ख़ूबसूरत महसूस करते हैं ख़ुद को... एक आभा आ जाती है चेहरे पर... शायद मन का सुकूं चेहरे पे झलक आता होगा... आज बहुत समय बाद अच्छा सा महसूस हो रहा है... ख़ुद से सच बोल के... मन बहुत हल्का सा लग रहा है...

हम अक्सर अपने रिश्तों को मुट्ठी में कस के पकड़ने की कोशिश करते हैं... भूल जाते हैं रिश्ते बहता पानी होते हैं... जितनी कस के पकड़ने की कोशिश करेंगे वो उतनी ही तेज़ी से हमारी मुट्ठी से बह जायेगा... छोड़ जायेगा बस बीते लम्हों की कसक लिए एक नम सी हथेली.. और आज़ाद छोड़ दो तो चाहे कितनी भी रुकावटें हो रास्ते में वो अपनी राह तलाशते हुए... अपनी जगह बनाते हुए... अविरल बहता हुआ आ मिलेगा अपनी बिछड़ी धारा से...

जैसे एक फूल को सिर्फ़ छाया में रख के खिला नहीं सकते आप... उसे अपने हिस्से की धूप भी ज़रूर चाहिए होती है... ठीक उसी तरह एक रिश्ते को भी हर वक़्त आप ज़िन्दगी और परिस्थितियों की धूप से बचाए नहीं रख सकते... उसे इस धूप में जलना होता है और इसमें तप के ही कुंदन बनना होता है... बहुत ज़्यादा पानी और छाया में पेड़ की जड़ें गल जाती हैं.. पेड़ पनप नहीं पाता... और बहुत ज़्यादा मीठे फल में कीड़े पड़ जाते हैं... कहने के मायने बस इतने की अति हर चीज़ की बुरी होती है.. भले ही वो अच्छी चीज़ हो या अच्छे के लिए हो...

पौ फूटने से पहले अँधेरा सबसे गहरा होता है... बेहद डरावना और उदास... ऐसी स्याह तारीकी जो सब कुछ ख़ुद में छुपा ले, जज़्ब कर ले... पर सूरज की पहली किरण जब उसे चीरती हुई धरती पे पड़ती है तो चिड़ियाँ  चहक उठती हैं... फूल खिल जाते हैं... धरती पर एक बार फिर जीवन शुरू हो जाता है...

अँधेरा छंट चुका है... दिन एक बार फिर निकल आया है... 

आज अपने रिश्ते को सारे बन्धनों से मुक्त कर दिया है मैंने... उसे खुली हवा में फिर से साँस लेने की आज़ादी दे दी है... उसे पनपने और मज़बूत होने की जगह दी है... बस अब इसे प्यार की हलकी बौछार से सींचना है... आस पास उग आये घास पतवार को हटाना है और उसे एक बार फिर से ख़ूबसूरत बनाना है...

बोलो दोगे मेरा साथ ?


मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचा कर

कि रूह को एक ख़ूबसूरत सा जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट, न दाग़ कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाये
न ज़ख़्म छुए, न दर्द पहुँचे
बस एक कोरी कुँवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं

मगर तपी जब दोपहर दर्दों की,
दर्द की धूप से जो गुज़रा
तो रूह को छाँव मिल गयी है

अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी

-- गुलज़ार

Wednesday, February 20, 2013

आओ चलें अब तीन ही बिलियन साल बचे हैं, आठ ही बिलियन उम्र ज़मीं की होगी शायद !


आज जब तुम्हें अपने एक दोस्त के बारे में बता रही थी तो तुमसे सुना नहीं गया... बात को कैसे टाल गए थे तुम... जानते हो जान पूरे दिन में सबसे ज़्यादा ख़ुशी का पल था वो मेरे लिए... तुम्हारी आवाज़ में वो चिढ़ बड़ी प्यारी लग रही थी... बहुत दिनों बाद आज तुम्हारे अन्दर वो पज़ेसिव्नेस दिखी अपने लिये... बहुत दिनों बाद आज फिर से ख़ुद पे गुमाँ हुआ...!




किसी पीर फ़कीर की दरगाह पर बंधा मन्नत का लाल धागा... या दुआओं का फ़ज़ल... के तुम मिले थे इक रोज़ यूँ ही... अचानक...!

मेरी बेनूर तन्हाई में घोला था तुमने एक मुट्ठी रँग अपने प्यार का... और मैं लरज़ उठी थी इन्द्रधनुष के रंगों से सजी एक कोरी चुनर सी... मेरे होंठों पे चिपका दी थी तुमने एक मुस्कान बिलकुल अपनी मुस्कराहट की कार्बन कॉपी जैसी... और मिडास के जैसे छू के सुनहरी कर दिए थे वो सारे ख्व़ाब जो तैरा करते थे मेरी पलकों में... मेरी मामूली सी ज़िंदगी में अपनी तिलिस्मी साँसें फूँक कर कहाँ खो गये तुम... ओ मेरे मायावी दोस्त...!




जानते हो ख्व़ाब क्यूँ आते हैं हमें ? सब उस उपरवाले का किया धरा है... ये ख़ुदा भी ना... दिल तो दे दिया हमें.. ख्वाहिशें भी दे दीं... पर हर ख्वाहिश पूरी कर सकें ऐसी क़िस्मत नहीं दी... सो ख्व़ाब दे दिये... कि जी सकें हम वो सारे पल ख़्वाबों में जिन्हें हक़ीक़त में नहीं जी सकते...

ख़्वाबों के सोपान पे पैर रख, कल रात आई थी तुम्हारे पास चाँदनी की ऊँगली थामे... जाने क्या देख रहे थे सपने में तुम... बड़ी प्यारी सी मुस्कुराहट थी होंठों पे... जी चाहा उस पल को वहीं थाम दूँ... या क़ैद कर लूँ पलकों में वो प्यारी सी निश्छल मुस्कुराहट बिलकुल बच्चों सी मासूम... आह ! के ये कमबख्त ख़्वाहिशें पूरी कहाँ होती हैं... के ख्व़ाब ख्व़ाब ही हुआ करते हैं... हरे काँच कि चूड़ियों जैसे... शोख़, चमकीले, खनकते... और कच्चे !!!





दो नन्हीं मुलायम कोपलें... पहले पहल जब तोड़ के बीज का खोल... झाँकती हैं बाहर... और लेती हैं पहली साँस खुली फिज़ा में... तो बेहद मासूम होती हैं... बड़ी ही ऑप्टिमिस्टिक... चारों तरफ़ खुशहाली ही दिखती है उन्हें... नहीं जानती कि कितने दिन बच पायेंगी किसी के पैरों तले कुचले जाने से... तुमसे मिलने की उम्मीद भी गोया उन नाज़ुक कोपलों सी है... हर रोज़ फूट के निकलती है दिल के खोल से... हर शाम कुचल जाती है सच के पैरों तले... उदास होती है... नाकाम भी... ना-उम्मीद पर नहीं होती...!

हर शब इक उम्मीद सोती हैं... हर सहर नयी उम्मीद जगती है...!





कहते हैं आखें दिल का आईना होती हैं... लब झूठ बोल भी दें पर आँखें झूठ नही बोल पातीं... दो पल झाँक के देखो उनमें तो दिल के सारे गहरे से गहरे राज़ खोल देती हैं... तुम्हारी गहरी कत्थई आँखें भी बिलकुल किसी मरीचिका सी हैं... एकटक उनमें देखने की गलती करी नहीं किसी ने कि बस मोहपाश में बाँध के बिठा लेती हैं अपने ही पास...

जानते हो तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... हर रोज़ रात के आखरी पहर तक बातों में उलझा के मुझे जगाये रखती हैं... हर दिन ऑफिस के लिये लेट होती हूँ मैं... देखना किसी दिन लिख ही दूंगी अटेंडेंस रजिस्टर में देर से आने कि वजह...!





कुछ अक्षर बिखरे हुए थे... बेतरतीब से... यहाँ वहाँ... तुम जो आये तो... उन्हें इक आकार मिला... अक्षर अक्षर शब्द बने... शब्द शब्द कविता, और कविता कविता ज़िन्दगी...

सुनो जान... तुम मुझसे यूँ रूठा न करो... तुम रूठते हो तो मेरे शब्द भी गुम हो जाते हैं कहीं... गोया तुम्हारा साथ मेरे कलम की रोशनाई हो... तुम चुप होते हो तो ये भी सूख जाती है... गोया मेरे सारे ख्याल तुम्ही से हैं... तुम नहीं होते तो एक वॉइड आ जाता है पूरे थॉट प्रोसेस में... शब्द उड़ते फिरते हैं दिमाग की ख़लाओं में... तुम्हारे साथ का गुरुत्व मिले तो शायद ठहरें वो मन की ज़मीं पर...!



Saturday, October 13, 2012

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ !



मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...

कितने दिन हो गए कुछ लिखा नहीं... आज दिल किया कुछ लिखूँ तो तुम्हारे सिवा और तुमसे बेहतर कोई दूसरा मौज़ू ही नहीं मिला... गोया मेरी लेखनी को भी प्यार हो गया है तुमसे...

तुमसे बात करना हमेशा ही दिल को एक सुकून दे जाता है... दुनिया भर की परेशानियों के बीच दो पल तुम्हारी आवाज़ रूह को ऐसे ठंडक पहुंचती है जैसे पसीने से भीगे बदन पर ठंडी हवा का झोंका... सारा तनाव सारी परेशानियाँ सब चंद लम्हों में ही काफ़ूर हो जाते हैं... सारे दिन की थकन के बाद तुमसे बात होती है तो यूँ लगता है मानो हर की पौड़ी पर बैठ कर संध्या आरती देख रहे हों... गंगा के ठन्डे पानी में पैर डाल के... तृप्ति !

जाने तुम्हारी आवाज़ का जादू है या तुम्हारे साथ का, पर कुछ तो ज़रूर है... कभी कभी तो जी करता है तुम्हें बिना बताये तुम्हारी आवाज़ का एक टुकड़ा चुरा कर रख लूँ अपने पास और फ़ुर्सत में उससे खूब सारी बातें किया करूँ...

जानते हो तीन दिन पहले एक सपना देखा था... हम साथ काम कर रहे थे एक ही ऑफिस में, एक ही बिल्डिंग में... पर तुम इस कदर मसरूफ़ थे कि एक पल के लिए बात करने का भी समय नहीं था... हम बस एक दूसरे को देख भर पा रहे थे... फिर सब काम छोड़ कर अचानक तुम मेरे पास आये... बोला कुछ भी नहीं बस मेरा हाथ पकड़ा था... तुम्हारा वो स्पर्श बिन कुछ बोले भी कितना कुछ कह गया था... उस एक स्पर्श में सहानुभूति थी, संवेदना थी, करुणा थी, समय न दे पाने की तकलीफ़ थी और सबसे बढ़ कर बेहद गहरा प्यार था... तीन दिन बाद भी सपने में महसूस किया वो तुम्हारे हाथों का स्पर्श अब भी अंकित है मन के पन्नों पर...

तुम ज़्यादा बोलते नहीं... तुम्हारे होंठ अक्सर ख़ामोश रहते हैं... पर तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... जाने किस भाषा में बातें करती हैं मेरी आँखों से कि सीधे दिल तक पहुँचती है उनकी आवाज़... बहुत से ऐसे एहसास हैं जिन्हें महसूस तो किया है तुम्हारी आँखों के ज़रिये पर शब्दों में उनका तर्जुमा करना मुमकिन नहीं है... कहाँ से सीखी ये भाषा ? सीधे दिल पे दस्तक देने वाली !

जानते हो पहला अक्षर और पहली भाषा कैसे बने ? और संगीत का पहला सुर ? नहीं जानते ? आओ आज बताती हूँ तुम्हें...

आदि रचना
मैं - एक निराकार मैं थी

ये मैं का संकल्प था
जो पानी का रूप बना
और तू का संकल्प था
जो आग की तरह नुमाया हुआ
और आग का जलवा
पानी पर चलने लगा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मैं की मिट्टी की प्यास थी
कि उसने तू का दरिया पी लिया
ये मैं की मिट्टी का हरा सपना था
कि उसने तू का जंगल खोज लिया
ये मैं की मिट्टी की गंध थी
और तू के अम्बर का इश्क़ था
कि तू का नीला सा सपना
मिट्टी की सेज पर सोया
ये तेरे और मेरे मांस की सुगंध थी
और यही हक़ीक़त की आदि रचना थी

संसार की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि पुस्तक
मैं थी और शायद तू भी
शायद एक सांस के फासले पे खड़ा
शायद एक नज़र के अँधेरे पे बैठा
शायद एहसास के मोड़ पे चल रहा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मेरा और तेरा अस्तित्व था
जो दुनिया की आदि भाषा बना
मैं की पहचान के अक्षर बने
तू की पहचान के अक्षर बने
और उन्होंने आदि भाषा की आदि पुस्तक लिखी

ये मेरा और तेरा मिलन था
हम पत्थर की सेज पर सोये
और आँखें, होंठ, उँगलियाँ, पोर
ये मेरे और तेरे बदन के अक्षर बने
और उन्होंने आदि पुस्तक का अनुवाद किया

ऋगवेद की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि चित्र
मैं थी और शायद तू भी
मैं छाँव के भीतर थिरकती सी छाया
और तू भी शायद एक खाकी सा साया
अंधेरों के भीतर अंधरों के टुकड़े
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

रातों और पेड़ों का अँधेरा था
जो तेरी और मेरी पोशाक थी
एक सूरज कि किरण आयी
वो दोनों के बदन में से गुज़री
और परे एक पत्थर पर अंकित हो गयी
सिर्फ़ अंगों की गोलाई थी,
चाँदनी की नोकें
ये दुनिया का आदि चित्र था
पत्तों ने हरा रँग भरा
बादलों ने दूधिया, अम्बर ने सिलेटी
और फूलों ने लाल, पीला, कासनी

चित्रों की कला तो बहुत बाद की बात है !

आदि संगीत
मैं थी और शायद तू भी
एक असीम खामोशी थी
जो सूखे पतों कि तरह झड़ती
या यूँ ही किनारों की रेत कि तरह घुलती
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

मैं ने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तू ने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिट्टी के कान कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया
पेड़ की टहनियाँ कुछ कस सी गयीं
पत्तों में एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिड़िया के पंख हिले
ये पहला नाद था
जो कानों ने सुना था

सप्त सुरों की संज्ञा तो बहुत बाद की बात है !

आदि धर्म
मैं ने जब तू को पहना
तो दोनों के बदन अंतर्ध्यान थे
अंग फूलों की तरह गूंथे गये
और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये

तू और मैं हवन की अग्नि
तू और मैं सुगन्धित सामग्री
एक दूसरे का नाम होंठों से निकला
तो वही नाम पूजा के मन्त्र थे
ये तेरे और मेरे अस्तित्व का एक यज्ञ था

धर्म की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि क़बीला
मैं की जब रुत गदराई थी
मांस के पौधे पर बौर आया था
पवन के आँचल में महक बंध गयी
तू का अक्षर लहलहाया था

मैं और तू की छाँव में
जहाँ "वह" आ कर निश्चिन्त सो गया
ये "वह" का एक मोह था
गेंहूँ का दाना हमने बाँट लिया
"वह" सहज था, स्वाभाविक था
मैं की और तू की तृप्ति

क़बीलों की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि स्मृति
काया की हकीक़त से लेकर
काया की आबरू तक मैं थी
काया के हुस्न से लेकर
काया के इश्क़ तक तू था

यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख्लाक़ दिया
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने "वह" को पहचान लिया
भयमुक्त मैं की हस्ती
और भयमुक्त तू की, "वह" की

मनु स्मृति तो बहुत बाद की बात है !

-- अमृता प्रीतम

Wednesday, August 15, 2012

मिस यू बाबा !



मैंने कभी उनकी उँगली पकड़ कर चलना नहीं सीखा... कभी तोतली ज़ुबान में उनसे कोई ज़िद नहीं की... उनकी गोद में चढ़ कर कभी चंदा मामा को नहीं देखा... कभी उन्हें घोड़ा बना कर उनकी पीठ पर नहीं बैठी... बहुत कम याद आते हैं वो... या शायद हम याद भी उन्हें ही करते हैं जिनसे कभी मिले होते हैं... ज़्यादा ना सही कम से कम एक बार तो... कभी कभी सोचती हूँ कि कभी मिलती उनसे तो क्या बुलाती उन्हें.. दादाजी, दद्दू या बाबा... हाँ, शायद "बाबा" ही बुलाती...

वो याद तो नहीं आते बहुत पर जब भी किसी छोटे बच्चे को अपने बाबा के साथ हँसता, मुस्कुराता, खेलता हुआ देखती हूँ तो एक अजीब सी क़सक उठती है मन में... जैसे ज़िन्दगी की जिगसॉ पज़ल का एक ज़रूरी हिस्सा खो गया हो कहीं... और उसके बिना वो अधूरी ही रहेगी हमेशा चाहे बाक़ी के सारे हिस्से सही सही जोड़ दिये जाएँ... जैसे अम्मा बाबा से कहानी सुनना हर बचपन का हक़ हो और हमसे वो हक़ छीन लिया हो किसी ने...

आइये आज आपको अपने बाबा से मिलवाती हूँ... उनसे जिनसे ख़ुद मैं भी नहीं मिली कभी... सिर्फ़ सुना है उनके बारे में... और इस तस्वीर में देखा है बस... हमारे घर में बाबा कि बस ये ही एक तस्वीर है और ये भी खींची हुई फोटो नहीं है बल्कि पेंट की हुई तस्वीर है... बचपन से बाबा को इस तस्वीर में ही देखा है बस... स्वर्गीय श्री तुलसी राम गुप्ता... हमारे बाबा... आज जब हम अपना ६६वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं तो बेहद गर्व होता है ये सोच कर कि हमारे बाबा एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे...

बुआ बताती हैं कि उस ज़माने में कांग्रेस कमेटी का दफ़्तर हमारे ही घर में हुआ करता था... आये दिन मीटिंग्स होती थीं... जाने कितनी ही बार जेल भरो आन्दोलन में बाबा जेल गये... महीनों जेल में रहे... कितनी ही बार लाठी चार्ज हुआ... इसी सब के चलते उन्हें पेट की कोई ऐसी बीमारी हो गई थी जिसे समय पर डाइग्नोज़ नहीं किया जा सका और वो हम सब को छोड़ कर चले गये... उस वक़्त पापा सिर्फ़ हाई स्कूल में थे...

बाबा के बारे में जितना भी सुनते हैं पापा और बुआ से उतना ही ज़्यादा उन पर गर्व होता है और उनसे मिलने का मन करता है... आज से तकरीबन एक सदी पहले भी वो कितनी खुली विचारधारा के इन्सान थे... उस वक़्त जब घर की स्त्रियों को घर से बाहर निकलने की भी आज़ादी नहीं थी वो अम्मा को अपने साथ पार्टी की मीटिंग्स में ले जाया करते थे... अपनी बेटियों और बेटों में कभी कोई फ़र्क नहीं किया उन्होंने... सबको हमेशा ख़ूब पढ़ने के लिए प्रेरित किया... बुआ लोगों के लिये भी कहते थे की ये सब हमारे बेटे हैं... और उस ज़माने में भी साड़ी या सलवार कुर्ते के बजाय सब के लिये पैंट शर्ट सिलवाते थे... बुआ बताती हैं गाँव में जहाँ हमारा घर था वहाँ आस पास के लोग अपनी लड़कियों को उन लोगों के साथ खेलने नहीं देते थे ना ही हमारे घर आने देते थे... कहते थे कि इनके पिताजी जेल का पानी पी चुके हैं इनके घर का कुछ मत खाना... हँसी आती है आज उन लोगों की सोच पर... ख़ैर...

आज स्वतंत्रता दिवस पर जाने क्यूँ बाबा की बहुत याद आ रही है... और हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति को दीमक की तरह चाट कर खोखला करते जा रहे भ्रष्टाचार, अराजकता और उन तमाम बुराइयों को देख कर उन सभी लोगों और उनके परिवारों के लिये तकलीफ़ हो रही है जिन्होंने देश को आज़ाद करने के लिये अपने प्राणों की बलि दी... उन हज़ारों, लाखों लोगों की क़ुर्बानी का ये सिला दे रहे हैं हम ?

आज की युवा पीढ़ी के लिये क्या मतलब रह गया है १५ अगस्त का... बस एक और छुट्टी का दिन... अपने मोबाइल में वंदे मातरम् की रिंग टोन लगा लेने का दिन या तिरंगे वाला टैटू लगा कर फेसबुक पर नई प्रोफाइल पिक्चर उपलोड कर लेने का दिन... दोस्तों को देशभक्ति के एस.एम.एस. भेज देने का दिन या बहुत हुआ तो एक पूरा दिन देशभक्ति के गाने सुन लेने का दिन... बस इतना ही ना... देशभक्ति का जज़्बा भी फैशन स्टेटमेंट बनता जा रहा है... सिर्फ़ एक दिखावा...

देशभक्ति ही सीखनी है तो उन सैनिकों से सीखिए जो सालों साल हर मौसम, हर पहर, हज़ारों मुश्किलों से जूझते हुए भी हमारी, आपकी और सबसे बढ़कर अपने देश की, अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिये सीमा पर डटे रहते हैं... जिनके लिये देशभक्ति महज़ २६ जनवरी, १५ अगस्त और २ अक्टूबर को उमड़ने वाला जज़्बा नहीं है... आइये हम भी उन जैसे बनते हैं जिनके लिये देशभक्ति ही उनके जीने का अंदाज़ है...!

जय हिंद... जय हिंद की सेना...!!!

Thursday, July 5, 2012

तुम बिन आवे न चैन... रे साँवरिया...!



- मैं क्यों उसको फ़ोन करूँ ! उसे भी तो इल्म  होगा कल शब मौसम की पहली बारिश थी

- ये क्या बड़बड़ा रही हो ?

- तुम्हें क्या ?

- अरे बताओ तो...

- नहीं बताना... बातचीत बंद है तुमसे...

- ठीक है मत बताओ फिर...

- हाँ तो कहाँ बता रहे हैं... वैसे भी तुम्हें क्या फ़र्क पड़ता है हम बोलें या न बोलें...

- सो तो है :)

- ह्म्म्म... जाओ फिर काम करो अपना... क्यूँ बेकार में टाइम वेस्ट कर रहे हो...

- अच्छा... जाता हूँ... बाय...... बाय....... अब बाय का जवाब तो दे दो...

- क्यूँ... नहीं देंगे जवाब तो क्या नहीं जाओगे ?

- नहीं जाऊँगा तो तब भी... पर जवाब दे दोगी तो खुश हो के जाऊँगा... काम करने में मन लगेगा...

- ह्म्म्म... तुम्हें फिक्र है क्या हमारी ख़ुशी की... हम क्यूँ करें फिर...

- जाऊं फिर ?

- तुम्हारी मर्ज़ी...

- सच में जाऊं ?

- बोला न... तुम्हरी मर्ज़ी... मेरी मर्ज़ी का वैसे भी कब करते हो...

- हम्म... जा रहा हूँ फिर... बाय...

- रुको... वो मैकरोनी और कॉफी जो बनायी है उसका क्या होगा ? खा के जाओ...

- :)

- हँसो मत... रोक नहीं रहे हैं... खा के चले जाना... हमने भी नहीं खायी है अभी तक... बड़े मन से बनायी थी...

- :):):)

- बुरे हो सच में... बहुत बुरे... रोज़ लड़ते हो... रोज़ रुलाते हो... बुरा नहीं लगता तुम्हें...

- नहीं... मज़ा आता है तुम्हें गुस्सा दिलाने में... रुलाने में... :)

- हम्म... अच्छा सुनो... ये झगड़ा बरसात भर के लिये पोस्टपोन कर देते हैं... बारिशें तुम्हारे बिना बिलकुल अच्छी नहीं लगतीं...

- :)

- :)

- अच्छा अब तो बता दो... वो सब क्या था? वो पहली बारिश.. फ़ोन.. इल्म.. ???

- कुछ नहीं... बहुत बहुत बुरे हो तुम :):):)

- अरे बताओ तो...

- क्यूँ बतायें...

- ..........

- ..........



Tuesday, July 3, 2012

मेटामॉर्फसिस !



तुम्हारा भरोसा देता है मुझे पंख
और मैं तब्दील हो जाती हूँ
एक नन्ही सी चिड़िया में
सारा साहस समेट कर
भरती हूँ उड़ान, तो लगता है
आस्मां भी कुछ नीचे आ गया है

तुम्हारा भरोसा भर देता है मुझे
विश्वास से
उग आते हैं मेरे डैने
और मैं बन जाती हूँ नन्ही सी मछली
जो तमाम व्हेल मछलियों से बचते हुए
पार कर सकती है प्रशांत महासागर भी

तुम्हारा प्यार कर देता है लबरेज़ मुझे
ख़ुश्बू से
ख़िल जाती हैं नई कोपलें
नर्म पंखुड़ियों सी महक उठती हूँ मैं
गुलज़ार हो जाता है मेरा अस्तित्व
आशाएं तितलियाँ बन मंडराने लगती हैं

तुम रखते हो हाथ मेरी पलकों पे
तो भर जाता है रंग मेरे सपनों में
तुम्हारा भरोसा मेरे सपनों के साथ मिल
शिराओं में दौड़ते रक्त को
कर देता है कुछ और सुर्ख़
लाली से लबरेज़, खिल उठती हूँ मैं

आँखें कुछ खट्टा खाने को मचल रही हैं इन दिनों
लगता है नींद फिर उम्मीद से है
फिर कोई ख़्वाब जन्म लेने को है !

-- ऋचा



( धुन पियानो पर यिरुमा की - "ड्रीम")

Monday, April 9, 2012

ये लम्हे ये पल हम बरसों याद करेंगे...



ज़िन्दगी चलती जाती है... उम्र बीतती जाती है... अच्छे-बुरे सभी पलों को समेटते हुए... देखा जाये तो कितना लम्बा समय और सोचा जाये तो बस चंद लम्हे जो यादों में ठहरे हैं.....!

आज से ठीक तीन साल पहले ऐसे ही कुछ लम्हों को पन्नों पे संजोने के लिये ये झरोखा खोला था... लिखना ना तब आता था ना अब आता है... बस ज़िन्दगी के इस सफ़र में जो भी कुछ महसूसते गये यहाँ संजोते गये... इकठ्ठा करते गये... यादों का एक पुलिंदा सा बन गया... आज पलट के देखते हैं तो कुछ हँसते खिलखिलाते, कुछ बहुत ही ख़ुशनुमा, कुछ थोड़े नम, तो कुछ थोड़े उदास से लम्हों का ताना-बाना सा लगता है ये... बिलकुल हमारी ज़िन्दगी सा...

आज ये पन्ने पलट के देखती हूँ तो कैसे उँगली पकड़ के किसी और ही दुनिया में ले जाते हैं ये हमें... यादों के इस शहर की हर गली ख़ूबसूरत है... इन गलियों से गुज़रते हुए लगता है जैसे कल ही की तो बात है... किसी मोड़ पे बैठा कोई लम्हा आवाज़ दे के बुलाता है और बिठा लेता है अपने ही पास... और ऐसे बेलगाम दोस्तों के जैसे बातें करते हैं हम दोनों कि लगता है जैसे बरसों के बिछड़े दो दोस्त मिले हों.. तो अगले किसी मोड़ पर कोई उदास सा लम्हा सीली सी आँखों में इंतज़ार लिये हमारी राह तकता है...

आज कहने को कुछ ख़ास नहीं है... सिर्फ़ एक दस्तख़त... कि ये लम्हें, ये यादें... ज़िन्दगी हैं... इस ब्लॉग ने हमें बहुत कुछ सिखाया... आज बस इतना कहना है कि इस झरोखे से झाँकते हुए कुछ बहुत ही प्यारे दोस्त मिले... जो अब ज़िन्दगी का एक अटूट हिस्सा हैं... तो आज की ये पोस्ट सिर्फ़ तुम्हारे लिये दोस्त... क्यूँकि तुम हो तो ये लम्हें हैं, ये यादें हैं और यादों का ये झरोखा है...


Tuesday, February 14, 2012

मेरा कुछ सामान....!


तुम कहते हो ना हमारा रिश्ता जाने कितने जन्मों से चला आ रहा है और आगे जाने कितने जन्मों तक चलने वाला है... इस जन्म में भी हम यूँ मिले जैसे कभी अलग थे ही नहीं... बस मिले और साथ चलने लगे... बहुत सा प्यार, बहुत सी यादें संजोयीं इस जन्म के छोटे से अपने सफ़र में... ना ना... ये सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है... फिर भी जाने क्यूँ दिल कर रहा है आज पलट कर वो सारे पल फिर से जीने का... वो सब फिर से याद करने का... जाने अगले जन्म तक ये सब याद रहे ना रहे... इसलिए सहेज रही हूँ यहाँ... ये सब पढ़ कर अगले जन्म अगर किसी कि याद आये ना, तो समझ लेना वो मैं ही हूँ और बस एक आवाज़ लगा देना चाहे किसी भी नाम से... मैं दौड़ी चली आऊँगी... तुम्हारे पास... तुम्हारा हाथ थामने... 

याद है जान... ये जगह... हाँ यही... जहाँ हम पहली बार मिले थे... और मिलते ही लगा था जाने कब से जानते हैं एक दूजे को... हमारे असीम प्यार और उसके तमाम ख़ूबसूरत पलों को यहीं नख्श कर रही हूँ... अगले जन्म में जब पलट के देखेंगे इन्हें तो मिल कर ख़ूब हँसेंगे... 

एक बार जब हम लॉन्ग ड्राइव पे गये थे... भीनी सर्दियों की एक गुनगुनी दोपहर... तो ओक में भर के ढेर सारी धूप चुरा लायी थी... ऐसे क्या हँस रहे हो... सच्ची बोल रही हूँ बाबा... जानती हूँ... तुम्हें भी नहीं पता... वो सारी गुनगुनाहट हमारे प्यार की यहाँ सहेज रही हूँ... 

वो रूमानी बारिशें भी सहेज दूँ जब घंटों हम पागलों की तरह बीच सड़क पे भीगा करते थे... और वो इन्द्रधनुष भी जो आसमां से तोड़ के तुम मेरे बालों में टांक दिया करते थे... वो सारे मौसम जो तुमसे ख़ूबसूरत थे... हैं... वो सारे सहेज दूँ यहाँ...

वो कैसे हम सारा-सारा दिन बात किया करते थे... बेवजह, बे सिर-पैर की बातें... अच्छा-अच्छा ठीक है... मैं बोलती थी और तुम सुनते थे मुस्कुराते हुए... अपनी वो सारी बक बक भी जमा कर दी है यहाँ... जब कभी बोर होना तो ये पन्ने पलट के देख लेना... मुस्कुराए बिना नहीं रह पाओगे... मेरा दावा है !

याद है वो एक बार जब हम पहाड़ी वाले शिव जी के मंदिर गए थे... और फिर घंटों वहीं सीढ़ियों पर बैठे रहे थे चुपचाप... घने देवदारों से घिरे हुए... घंटियों के मधुर स्वर नाद के बीच... वो सारे मौन वो सारी आवाज़ें भी सहेज रही हूँ यहाँ...

और भी बहुत कुछ सहेजना है... वो सारा रूठना मानना भी... वो बेवजह की तकरारें भी... वो बेवजह उमड़ता प्यार भी... वो मुस्कुराहटें भी... जो सब कुछ बयां कर देतीं थीं बिन बोले... वो सारी जादू भरी झप्पियाँ भी... हाँ, तुम्हारी आँखों की वो चमक भी जिसमें मेरी हँसी छुप जाया करती थी... 

वो जब मैं किचन में कुछ बनाती होती थी और तुम पीछे से आकर मुझे ज़ोर से जकड़ लेते थे बाहों में... कितना ग़ुस्सा हुआ करती थी मैं... जानते हो, नाटक करती थी... सच तो ये है कि बहुत प्यार आता था तुम्हारी उन शरारतों पे... वो सब भी यहाँ जमा करती चलती हूँ... प्यार के इस बहीखाते में...

और वो तीज के मेले में जो तुमने मेहँदी लगाई थी हमारे हाथों में... याद है क्या बनाया था ? मोर... ना ना... देखो बिलकुल भी हँस नहीं रही हूँ... तुम्हारी कसम... सच ! उससे ख़ूबसूरत मेहँदी आजतक नहीं लगाई मैंने... उस मेहँदी की ख़ुश्बू भी यहीं सहेज दी है... 

होंठों का वो प्रथम स्पर्श... शायद इस जन्म का सबसे ख़ूबसूरत एहसास... उस एहसास को बयां नहीं कर सकती... सो उस अनकहे एहसास को जिसे शब्दों में पिरो नहीं सकती... उसे भी यहाँ दर्ज करती चलती हूँ... अगले जन्म में भी इसी शिद्दत से महसूस करुँगी उसे... 

याद है ना जान... हम हनीमून मनाने कहाँ जाने वाले थे... प्यार के देस... वेनिस... पर वेनिस तो डूब रहा है ना... जब मैंने उदास हो के कहा था तो कैसे ज़ोर से हँसे थे तुम... अच्छा तो इसलिए उदास हो गईं तुम कि जाने अगले जन्म तक वेनिस रहे ना रहे... सच में बुरे हो तुम... बहुत बुरे... पर तुमसे अच्छा कभी कोई लगा भी तो नहीं... माना इस जन्म में हम नहीं मिल सकते... ये सपना पूरा नहीं हो सकता हमारा... पर सुनो अगले जन्म में ज़रा जल्दी मिलना... इतना इंतज़ार न करवाना... क्या जाने ख़ुदा को भी हम पर रहम आ जाये... 

साथ बिताये वो अनगिनत पल... वो हँसी... वो मुस्कुराहटें... वो प्यार... वो शरारतें... वो ग़ुस्सा... वो मिठास... वो सब... जो तुमसे है... जिनमें तुम हो... वो सब सहेज रही हूँ यहाँ...

सुनो, अगले जन्म में जब मिलना तो ढेर सारी फ़ुर्सत के साथ मिलना... समय से परे... बिना समय की किसी भी पाबंदी के... और हाँ ये "प्रैक्टिकल" होना... जो कि मुझसे तो ख़ैर कभी नहीं हुआ गया... पर तुम भी इस बनावटी ऐटिट्यूड को, जो कि तुम्हें बिलकुल सूट नहीं करता, जन्म की सरहद के इस तरफ़ ही छोड़ के आना... अगले जन्म मुझे सिर्फ़ तुम चाहिये... "तुम"... सुन रहे हो ना.....!

जन्मों के बन्धन पर कभी भी यकीं ना था मुझे
पर तुमसे मिली तो न जाने क्यूँ लगा कि कुछ है 
कुछ तो ज़रूर है... कोई डोर जिसने बाँध रखा था
कोई नाता... जिसका मस्क कभी मद्धम नहीं पड़ा 

हम पहली बार मिले तो यूँ लगा, मानो 
बरसों पुराने दोस्त बाज़ार में मिले हों
हँस के एक दूसरे को गले लगाया और बोले
"चल, कहीं बैठ के कॉफ़ी पीते हैं"

जैसे दो रूहें भटक रहीं थी क़ायनात में
बस मिलीं और एक नए सफ़र पे बढ़ चलीं 
उसी मोड़ से आगे चलना शुरू करा 
जहाँ अल्पविराम लिया था पिछले जन्म में

शायद ऐसे ही होते हैं जन्मों के बन्धन
रूहानी रिश्ते...

-- ऋचा



Saturday, January 28, 2012

तुम आये तो..........!



तुम आये तो पीले फूलों का मौसम फिर लौटा है देखो
तुम आये तो गौरैया फिर मेरे पेड़ों पे चहकने लगी
तुम आये तो सरगम हवाओं में फिर तैरने लगी
तुम आये तो ख़ुश्बू फिर बिखर गई फिज़ाओं में
तुम आये तो नीली झील का पानी फिर से लरज़ उठा
तुम आये तो चाँदनी फिर मुस्कुरा उठी
तुम आये तो लाल रंग कुछ और सुर्ख़ हो चला
तुम आये तो बारिशें फिर हसीन लगने लगीं
तुम आये तो इन्द्रधनुष फिर सज गया फ़लक पे
तुम आये तो आँखें फिर छलक उठी ख़्वाबों से
तुम आये तो ख़ुद पर फिर यकीं हो चला है
तुम आये तो होठों को भूली हँसी फिर याद आयी
तुम आये तो एहसासों ने फिर करवट ली
तुम आये तो जी करता है नाच उठूँ फिर से
तुम आये तो फिर जीने का दिल करता है
तुम आये तो..........!

Friday, December 16, 2011

फिर नहीं सो सके इक सदी के लिये... हम दिलजले....



कानों में पहन के तेरी ख़ामोशी के सुर
साँसों में बसाये तेरी साँसों का मोगरा
खनकी रहती हूँ आरज़ू सी कभी...
महकी फिरती हूँ मुश्क़-बू सी कभी...

जाने ख़ुद को तुझमें छोड़ आयी हूँ या तुम्हें ख़ुद में बसा लायी हूँ... हमेशा के लिये... जाने क्या हुआ है पर कुछ तो हुआ है... आँखें भारी सी हो रही हैं गोया सदियों की नींद भरी हो उनमें... सोने का मन भी होता है पर नींद नहीं आती... भूख लगती है पर कुछ खाया नहीं जाता... किसी काम में दिल नहीं लग रहा... अजीब हाल है... बेवजह मुस्कुरा रही हूँ... बाँवरी सी... लगता है जैसे कोई बेहद ख़ूबसूरत ख़्वाब देखा है... या हक़ीक़त ख़्वाबों सी ख़ूबसूरत हो आई है... ये कैफ़ियत... ये गफ़्लत... उफ़ ! ये क्या कर दिया है तुमने मुझे...

धड़कने भी जाने कैसी दीवानी सी हो गई हैं... जाने किस सप्तक के सुर छेड़ रही हैं हर पल... बीथोवन की सातवीं सिम्फनी सी... ये कैसा सुरूर छाया हुआ है मुझ पर... नशे के ये किस भंवर में आ फँसी हूँ... जिस्म पर ये कैसी मदहोशी तारी है... साँसों में भी कुछ नशा सा घुलता हुआ महसूस होता है... जैसे नशे के किसी नमकीन महासागर में डूब के आयी हूँ... तुम्हारी कसम शराब को तो कभी हाथ भी नहीं लगाया... फिर ये नशा कैसा है... मैं सच में अपने होश खो बैठी हूँ क्या ?

ये कैसा मायावी जाल फेंका है कि ख़ुद-ब-ख़ुद खिंचती चली जा रही हूँ इसमें... ये कैसी कसमकस है... ये कैसी क़शिश है कि इससे बाहर निकलने का भी दिल नहीं होता... तुम सच में मायावी हो... जाने किस देस से आये हो... और आते ही मेरे दिल दिमाग़ सब पर तो कब्ज़ा कर लिया है... ना कुछ सोच पाती हूँ ना समझ पाती हूँ... फिर भी ख़ुश हूँ... बहुत ख़ुश... सुनो... इस क़ैद से कभी आज़ाद मत करना... ये बन्धन ज़िन्दगी बन गया है... इससे आज़ाद हुई तो मर जाऊँगी !

Thursday, November 3, 2011

प्यार भर देता है उड़ने की तमन्ना दिल में और मेरे पंख भी पत्थर के वो कर देता है...


"प्यार"... दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत एहसास... अपने नाम जितना ही प्यारा... कहते हैं इन्सान को ज़िन्दगी में एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिये... प्यार इन्सान को बहुत अच्छा बना देता है... जिसे आप प्यार करते हैं उसके लिये जीना सिखा देता है और बेख़ौफ़ हो के मरना भी... जब आप किसी के प्यार में होते हैं तो सारी दुनिया किसी परी-कथा सी हो जाती है... जन्नत जैसी !

शुरू शुरू में प्यार किसी पहाड़ी नदी सा चंचल होता है... अल्हड़ और गतिशील... अपनी राह ख़ुद बनता हुआ... अपने रास्ते में आने वाली हर मुश्किल हर बाधा को अपने ही साथ बहा ले जाता हुआ... अच्छा बुरा, सही ग़लत... बिना कुछ सोचे समझे हम बस बहते चले जाते हैं उसके वेग में... सोच के वैसे भी कब किया जाता है प्यार... वो तो बस हो जाता है... सब अच्छा सब सही... प्यार में कुछ भी बुरा या ग़लत कब होता है... वो तो बिलकुल एक नन्हे बच्चे के समान होता है... मासूम और निश्छल... वो चंचल या अल्हड़ भले ही हो पर बुरा या ग़लत नहीं हो सकता... बच्चे को कब सही ग़लत का ज्ञान होता है...

समय बीतता है... उम्र का एक और पड़ाव आता है... प्यार में भी ठहराव आता है... अब वो पहले सा वेग नहीं रहता... जैसे मैदानी इलाके में आकर नदी का आवेग भी शान्त हो जाता है... एक स्थिरता आ जाती है... पर ध्यान से देखिये तो उसका फैलाव बढ़ जाता है और गहराव भी... अब आप उसमें डूब तो सकते हैं बह नहीं सकते... दिमाग़ कुछ कुछ दिल पे हावी होने कि कोशिश करता रहता है जब कब... तर्क वितर्क भी अपने पाँव पसारने लगते हैं मौका पाते ही... ज़्यादातर तो दिमाग़ हार ही जाता है ये लड़ाई... पर दिल तो दिल ठहरा... कभी कभार पसीज ही जाता है... दिमाग़ को भी एक लड़ाई जीत कर ख़ुद पे इतराने का मौका दे देता है...

दिल और दिमाग़ की ये जंग यूँ ही चला करती है... रही सही कसर परिस्थितियां पूरी कर देती हैं... कुछ भी अब पहला सा नहीं रहता... समय निरंतर बीतता रहता है... नदी भी धीरे धीरे बहते हुए अपने गंतव्य कि ओर बढ़ती रहती है... उसे एक दिन सागर में ही मिल जाना है... उसकी यात्रा का यही अंत है... पर प्यार... उसका क्या कोई अंत होता है कभी ? शायद नहीं... वो बीते लम्हों की यादें बन कर ठहर जाता है हमारे ही भीतर...

ये जो साग़र कि लहरें होती हैं ना... दरअसल ये वो सारे बीते हुए खुशनुमां पल होते हैं... नदी के शुरुआती दिनों का वेग जो लहरें बन जाता है... जाने कैसी ज़िद होती है फिर से वापस लौटने की... उन बीते हुए दिनों को फिर से एक बार जीने की... ये जानते हुए भी कि यात्रा अब ख़त्म हो चुकी... गुज़रा वक़्त दोबारा नहीं आएगा... फिर भी... यादें बन कर लहरें बार बार साहिल तक आती हैं... जाने किस तलाश में... ख़ाली हाथ वापस जाती हैं... पर हारती नहीं... थकती नहीं... शायद यही प्यार है... कभी ना थकने वाला... कभी ना हारने वाला...



भटकती फिरती हूँ
बंजारों सी
हर रोज़
सुबह शाम
तुम्हारी तलाश में
जाने किस घड़ी
तुम मिल जाओ
फिर से
उम्र के किसी
अनजान मोड़ पे
तुम्हारी यादों का इक घना जंगल
बसा है मेरे भीतर कहीं...

-- ऋचा




Sunday, October 9, 2011

हमने माना कि तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन...



कैसी होती होगी वो हवा जो तुम्हारे देस में बहती है... कैसे होते होंगे वो लोग जो तुम्हें देख सकते होंगे.. छू सकते होंगे... तुमसे रु-ब-रु बात कर सकते होंगे... उस हवा में साँस लेते होंगे जहाँ तुम रहते हो... जानते हो न्यूज़ चैनल बदलते हुए कभी जब तुम्हारे शहर का ज़िक्र आता है तो उँगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं... जैसे उन्हें भी सुनाई देता है तुम्हारे शहर का नाम... उस भीड़ में जाने किस अनदेखे चेहरे को तलाशने लगती हैं आँखें... कोई बात भी करता है ना तुम्हारे शहर की तो दिल करता है उससे कहूँ बस ऐसे ही बोलता रहे और मैं ऐसे ही सुनती रहूँ उसे... जी भर के...

झूठ कहते हैं लोग कि दुनिया छोटी हो रही है, दूरियाँ सिमट रही हैं... दूरियाँ तो और बढ़ गई हैं... कल हमारे बीच महज़ ७०० किलोमीटर की दूरी थी जिसे हम बस चंद लम्हों में तय कर लिया करते थे... आज वो दूरी सुदूर बसे किसी ग्रह जैसी लगती है... सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर... चाह कर भी दूरियाँ अब सिमट नहीं पातीं... तुम तक मेरी पुकार अब नहीं पहुँच पाती... बीच में ही कहीं राह भटक कर हमेशा के लिये खो जाती है ब्रह्माण्ड में...

हमारा मिलना ऐसा था जैसे आरती कि थाली में जलता हुआ कपूर... पवित्र... सुगन्धित... किन्तु क्षणिक... तुम मेरे अंधेरों में रौशनी की तरह आये... तुम्हारी उँगली थाम उम्र की  एक पथरीली पगडंडी पार करी... ठीक वैसे ही जैसे एक नन्हा सा बच्चा किसी की उँगली थाम चलना सीखता है और अपनी ज़िन्दगी का पहला क़दम बढ़ाता है... तुमने जीने की नई वजह दी... एक लम्बे अरसे बाद मुझे ख़ुद से मिलवाया...

जानती हूँ तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब तुम्हें आवाज़ दे रही हैं... मैं भी क्या करूँ... तुम्हारी आदत हो गयी है... तुम्हारी उँगली थामे बिना चलना शायद वैसा ही हो जैसा उस नन्हें बच्चे का होता है... थोड़ा डरूँगी... कुछ पल डगमगाऊँगी... शायद गिरूँ भी... पर तुम मत डरना... थोड़ा समय लगेगा पर संभल जाऊँगी... तुम जाओ... अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करो... उम्र के किसी पड़ाव पर गर फ़ुर्सत मिले कभी और याद आये मेरी या मिलने का मन करे... तो चले आना... मैं यहीं मिलूँगी... यहीं, जहाँ हम पहली बार मिले थे...

हो सके तो बस इतना करना कि भरोसा नहीं टूटने देना... विश्वास रखना... मैं यहीं मिलूँगी... तुम्हारा इंतज़ार करते... सुनो... पहचान तो लोगे ना ?

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एक कहानी याद आ रही है... बहुत जल्दी ना हो तो सुनते जाओ.. गुलज़ार साब कि आवाज़ में -




[ ये खेल आख़िर किसलिये ? मन नहीं ऊबता ? कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम अपनी ज़िन्दगी में... खेल खेला है... खेलते रहे हैं... नतीजा फिर वही... एक जैसा... क्या बाक़ी रहता है ? हासिल क्या होता है ? ज़िन्दगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क़ है ना ? आख़िर किसलिये ?

एक कहानी है... सुनाऊँ ? कहानी दो प्रेमियों की... दोनों जवान, ख़ूबसूरत, अक्लमंद... एक का दूसरे से बेपनाह प्यार... कसमों में बंधे हुए कि जन्म-जन्मान्तर में एक दूसरे का साथ निभायेंगे... मगर फिर अलग हो गये... नौजवान फ़ौज में चला गया... गया तो लौट कर नहीं आया... लापता हो गया.. लोगों ने कहा मर गया... मगर महबूबा अटल थी... बोली... वो लौटेगा ज़रूर... लौटेगा... पूरे चालीस सालों तक साधना में रही... वफ़ादारी से इंतज़ार किया... आख़िर एक रोज़ महबूब का संदेसा मिला... मैं आ गया हूँ, शिवान वाले मंदिर में मिलो... कहने लगी, देखा.. मैंने कहाँ था ना... दौड़ कर गई... मंदिर पहुंची... पर प्रेमी ना दिखाई दिया... एक आदमी बैठा था... एकदम बूढ़ा... पोपला मुँह.. टांट गंजी... आँखों में मैल... बोली.. यहाँ तो कोई नहीं... ज़रूर किसी ने शरारत की है... मायूस हो कर घर लौटी... वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया... कोई नहीं आया... चिड़िया का बच्चा तक नहीं.. हाँ, एक बुढ़िया आयी थी... कमर से झुकी हुई.. बाल उलझे हुए.. आँख में मोतिया-बिंध... मंदिर में झाँक कर देखा... कुछ बुड़बुड़ाई... और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गई... निराश हो गया बेचारा... बोला... उसने इंतज़ार नहीं किया... गृहस्ती रचाकर मुझे भूल गई... संदेसा भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आयी... किसलिये ? ... आख़िर किसलिये ये खेल ? ... मन नहीं ऊबता ? -- गुलज़ार ]
 

Wednesday, September 14, 2011

बड़ी मुश्किल से मगर दुनिया में दोस्त मिलते हैं...



ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई चारासाज़ होता कोई ग़मगुसार होता
-- मिर्ज़ा ग़ालिब

कभी कभी सोचती हूँ ग़ालिब साहब का एक अरसे पहले लिखा ये शेर आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है... जब आप ज़िन्दगी के एक ऐसे बुरे दौर से गुज़र रहे हो कि कुछ ना सूझे, कुछ समझ ना आये... जब ग़म और ना-उम्मीदी के बादलों ने आपको घेर रखा हो... आप चाह कर भी इन हालातों से बाहर ना निकल पा रहे हों... घर वाले... बाहर वाले... सारी दुनिया के लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको उपदेश देने में लगे हों... और तो और आपके दोस्त भी आपको नसीहतें ही देने लगें तो मन झुंझला जाता है... ऐसे में दिल करता है कि कोई ऐसा दोस्त हो जो बस आपको सुन भर ले... कोई नसीहत ना दे... एक ऐसा दोस्त जिसके काँधे पर सिर टिका कर आप चुपचाप बैठे रहें... कुछ ना कहें फिर भी ख़ुद को बेहद हल्का महसूस करें... वो दोस्त जो आपकी परेशानियाँ नहीं बस थोड़ी सी ख़ामोशी बाँट ले... यकीन जानिये जिस किसी के पास ऐसे दोस्त होते हैं दुनियाँ में उनसे ज़्यादा ख़ुशनसीब और कोई नहीं होता...

दोस्ती... हमारी नज़र से देखिये तो दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता... हर दुनियावी रिश्ते से बड़ा... शायद "प्यार" से भी बड़ा... जहाँ ना कोई स्वार्थ होता है, ना कोई नसीहत... दोस्त कभी जजमेंटल नहीं होते... आलोचनात्मक नहीं होते... हाँ आपका भला ज़रूर चाहते हैं, चाहते हैं कि आप हमेशा ख़ुश रहें और अगर आपमें कोई कमी है, कोई बुराई है तो वो सुधर जाये... पर इस सब के बावजूद आप जैसे भी हों आपके दोस्त आपको वैसे ही अपनाते हैं आपकी कमियों के साथ... आपकी नाकामियों के साथ... किसी भी हाल में वो आपको अकेला नहीं छोड़ते...

आज के मतलबपरस्त दौर में जब दुनिया के तमाम रिश्ते अपने मायने खोते जा रहे हैं... रिश्तों पर से आपका विश्वास डगमगाने लगा है... ऐसे दौर में भी दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसने उम्मीद की लौ को जलाए रखा है... हर लड़खड़ाते कदम पर आपका हाथ थामा है... आपको वो सुकून दिया है वो हिम्मत दी है कि आप अकेले नहीं हैं... कोई है जो हर पल हर हाल में आपके साथ खड़ा है... आपका दोस्त !

*********

कल रात दो बेहद करीबी दोस्तों ने दो बिलकुल अलहदा सी बातें कहीं... एक ने दोस्ती का शुक्रिया अदा किया तो दूसरे ने हमसे दूर जाने कि बात कही... दोनों ही बातें दिल को छू गयीं... तो पहले दोस्त से बस इतना कहना है कि दोस्ती में शुक्रिया नहीं किया करते दोस्त और दूसरे से ये कि तुम्हारा मुझसे दूर जाना हम किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं कर सकते... ऐसा दोबारा फिर कभी ना सोचना ना कहना... "I really need u my friend... can't fight this situation alone... don't u ever dare think of going anywhere..."


तुमसे जब बात नही होती किसी दिन
ऐसे चुपचाप गुज़रता है सुनसान सा दिन
एक सीधी सी बड़ी लंबी सड़क पे जैसे
साथ-साथ चलता हुआ, रूठा हुआ दोस्त कोई
मुँह फुलाए हुए, नाराज़ सा, ख़ामोश, उदास

और जब मिलता हूँ हँस पड़ता है ये रूठा हुआ दिन
गुदगुदाकर मुझे कहता है, "कहो, कैसे हो यार"

-- गुलज़ार





Friday, July 29, 2011

वो कोयल अब न बोलेंगी...



मन बहुत उदास है आज सुबह से... पिछले कोई आठ दस साल से घर के सामने ख़ाली पड़े प्लॉट में एक नीम का पेड़ उग आया था... एक अजीब सा रिश्ता हो गया था उससे... बेनाम.. बेआवाज़... सिर्फ़ आँखों का रिश्ता.. अजब सा सुकून मिलता था उसे देख कर... जैसे घर का कोई बड़ा बुज़ुर्ग... आते जाते भले उसे ना भी देखूँ तो भी उसके होने का एहसास साथ रहता था... कितने ही दिन उसने माँ के आँचल कि तरह खिड़की से आती धूप को रोका और मेरी नींद नहीं टूटने दी... कितने ही दिन एक प्रेमिका कि तरह चाँद को अपने आग़ोश में छुपा के ज़िद पर अड़ गई आज कहीं नहीं जाने दूँगी तुम्हें.. आज तुम सिर्फ़ मेरे हो... मेरे चाँद... सिर्फ़ मेरे लिये चमकोगे... दुनिया में अमावास होती है तो हो जाये...

एक छोटे बच्चे से व्यस्क होते देखा उसे... बेहद घना और छायादार.. जाने कितने ही पँछियों का आशियाना बना हुआ था... दो कोयल भी रहती थीं उसपर... सारा दिन बोल बोल कर दिमाग़ खाती रहती थीं... वो कोयल अब न बोलेंगी... इन्सान ने एक बार फिर अपना आशियाना बनाने के लिये उनका आशियाना छीन लिया... क्या कोई सरकार उन्हें मुआफ्ज़े में नया आशियाना देगी... वो मासूम तो हम इंसानों कि तरह अपने हक़ के लिये लड़ भी नहीं सकते...

अब तक उस नीम की चीख सुनाई दे रही है... कैसे कराह रहा था बेचारा जब एक एक डाल काट कर उसके तने से अलग करी जा रही थीं... उसकी ख़ाली करी हुई जगह पर कुछ ही दिनों में एक नया कंक्रीट का आशियाना बन जायेगा... नये लोग बस जायेंगे... एक बार फिर वो जगह आबाद हो जायेगी.. हम भी भूल ही जायेंगे उस नीम को कुछ दिनों में... आख़िर एक पेड़ ही तो था बस... यही दुनिया है... डार्विन ने सही कहा था.. "सर्वाइवल ऑफ़ दा फिटेस्ट"... अंत में ताकतवर ही जीतता है... उसे ही हक़ है इस दुनिया में रहने का...

दोस्त अक्सर मुझसे कहते हैं... तुम सोचती बहुत हो... स्टॉप बीइंग सो इमोशनल... बी प्रैक्टिकल यार !!

कभी कभी लगता है वो सही कहते हैं...



हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम...
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई...!
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सब्ज़े पर छपी, पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है!
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है धुलाने पैर 'पाइन' के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़, अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का, इसे जी लो !


-- गुलज़ार

Thursday, May 26, 2011

.... कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले !


इस वीकेंड एक फिल्म देखी "दसवेदानिया - दा बेस्ट गुड बाय एवर"... यूँ तो ये फिल्म तकरीबन तीन साल पुरानी है... २००८ में रिलीज़ हुई थी... काफ़ी पसंद भी करी गई थी... और तब से ही ये फिल्म हमारी "थिंग्स टू डू" लिस्ट में पड़ी हुई थी... तो आख़िरकार देख ही डाली... अब हमारे जैसे आलसी ने तीन साल बाद भी इसे याद रखा और देख लिया ये भी क्या कोई कम अचीवमेंट है :) ख़ैर.. अपने अचीवमेंट्स का बखान फिर कभी...

हाँ तो वापस आते हैं फिल्म पर... इस फिल्म का जो नायक है बहुत ही सीधा साधा इन्सान है, आजकल के परिपेक्ष में सही-सही बोलें तो एकदम बोरिंग, भोंदू टाइप... ना कोई यार-दोस्त ना सोशल लाइफ... सिर्फ़ अपनी बूढ़ी माँ की सेवा करता है और नौकरी करता है... अकाऊंट्स मेनेजर है और अच्छा ख़ासा कमाता है पर ज़िन्दगी जीना नहीं जानता... वही रोज़ मर्रा की ज़रूरतों में सुबह से शाम करता है बस... हाँ एक काम और करता है, रोज़ाना सुबह उठ के सबसे पहले एक थिंग्स टू डू लिस्ट बनाता है - माँ कि दवाई लानी है, गीज़र सही करवाना है, ऑफिस से लौटते हुए सब्ज़ी लानी है, सब्ज़ी में तरोई नहीं लानी है... वगैरह, वगैरह, वगैरह...

एक दिन उसे पता चलता है कि उसे स्टमक कैंसर है... और उसके पास सिर्फ़ तीन महीने की ज़िन्दगी बाक़ी है... उसे समझ ही नहीं आता कि वो क्या करे... कैसे इस सिचुएशन को फेस करे... ऐसे में उसकी मदद के लिये आती है उसकी अंतरात्मा... वो रोज़ की तरह ही एक और लिस्ट बना रहा होता है... वही दवाई, गीज़र, इलेक्ट्रीशियन, तरोई टाइप... तो उसकी अंतरात्मा उससे पूछती है क्या उसकी ज़िन्दगी में और कोई ख़्वाहिशें नहीं हैं ? उसने सारी ज़िन्दगी यही तो किया है... ज़िन्दगी बीत गई पर उसे कभी जिया ही नहीं... तो क्यूँ ना ये बाक़ी बचे तीन महीने वो वो सब करे जो वो वाकई करना चाहता है... उन सारी अधूरी ख्वाहिशों को पूरा कर के इस दुनिया से, इस ज़िन्दगी से विदा ले... और सही मायने में उसके बाद शुरू होती है उसकी ज़िन्दगी... तीन महीने की ज़िन्दगी... जो वो सच में जीता है... दिल से...

ख़ैर ये तो थी फिल्म की बात... कभी मौका मिले और आपने भी हमारी तरह ना देखी हो अब तक तो ये फिल्म ज़रूर देखिएगा... अब आते हैं मुद्दे की बात पे... ये फिल्म देख कर बहुत से विचार उमड़े मन में... सोचा सही ही तो है... भविष्य तो कोई भी देख कर नहीं आया... कल हमारे साथ क्या होने वाला है किसी को कुछ नहीं पता... तो क्या अब तक जो ज़िन्दगी हमने गुज़ारी उसे क्या वाकई जिया या सिर्फ़ बिता दी... यूँ ही... आज अगर हमारी ज़िन्दगी का आख़िर दिन हो तो क्या हम संतुष्ट हो के जायेंगे इस दुनिया से... शायद नहीं... तो क्यूँ ना जो आज हमारे पास है उसे ही दिल से जियें... क्यूँ चीज़ों को उस कल पे टालें जिसका कुछ पता ही नहीं...

एक और सवाल आया मन में.. कि अगर इस फिल्म के नायक कि तरह हमारे पास भी चंद दिन ही बचे हो ज़िन्दगी के तो वो क्या सब है जो हम करना चाहेंगे यहाँ से जाने से पहले... मतलब हमारी "थिंग्स टू डू बिफोर आई डाय" लिस्ट :) ... अब यूँ तो हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले... और ये ख़्वाहिशें गाहे-बगाहे आप सब से शेयर भी करते आये हैं हम... तो इस बार आपका टर्न... सारी ना सही, एक-आध ख़्वाहिश आप भी शेयर कर लीजिये हमारे साथ... जो आप सच में करना चाहते हैं.. दिल से...


बहुत ज़्यादा तो नहीं हैं मेरी ख़्वाहिशें...

बस इक ठंडी सी सुबह
तुम्हारे काँधे पे सर रख के
पहाड़ों के बीच उगता सूरज देखना चाहती हूँ !

तुम्हारा हाथ थाम
साहिल की चमकती रेत पर कुछ दूर तलक
पैरों के दो जोड़ी निशान छोड़ना चाहती हूँ !

हरी की पौड़ी पर
एक बार तुम्हारे साथ
संध्या आरती देखना चाहती हूँ !

झील के पानी में घुले
शफ़क के पिघले रंगों को चुन
तुम्हारी एक तस्वीर बनाना चाहती हूँ !

तितली का पीछा करते कभी
किसी गहरे घने जंगल में कुछ पल
भटक जाना चाहती हूँ... तुम्हारे साथ !

इक चाँदनी रात में
छत पर तुम्हारी आग़ोश में बैठे हुए
एक टूटते तारे को देखना चाहती हूँ !

उस टूटते तारे से तुमको माँगना चाहती हूँ
हमेशा... हर जन्म के लिये...

क्या करूँ कि मेरी ख्वाहिशों का दायरा
बहुत छोटा है
तुम्ही से शुरू होता है
तुम पर ही सिमट जाता है !

-- ऋचा



A Thousand Desires such as these... A thousand moments to set this night on fire... Reach out and you can touch them... You can touch them with your silences... You can reach them with your lust... Rivers, mountains, rain... Rain against a torrid hill-scape... A thousand desires such as these....

Saturday, May 14, 2011

चलना अकेले है जो सबको यहाँ, चलें साथ-साथ परछाइयाँ भी क्यूँ...


[ ये लड़की यही कोई ८-१० साल पहले स्केच करी थी हमने...
एक पुरानी स्केच बुक में मिला ये स्केच तो यहाँ सहेज दिया... ]


ये जो मन है ना उलझनों का वेयर-हॉउस है... ऊपर से किसी नीली झील के जैसे शान्त दिखने वाले मन कि हर तह में ढेरों उलझनें छुपी रहती हैं... हमेशा... हर वक़्त... पढ़ाई-लिखाई, कैरियर, नौकरी, प्यार, मोहब्बत, दोस्ती से ले कर आपके घर-परिवार, शादी, समाज, सामाजिक मान्यताओं तक की... यही नहीं आपके स्वभाव, बर्ताव, लोगों के आपके प्रति नज़रिए और समय के साथ बदलते उनके और आपके रवैये तक की... समझ नहीं आता क्या सही है और क्या ग़लत... कब क्या करना चाहिये क्या नहीं... सच क्या है वो जो दिखता है या वो जो जिसपर हम यकीन करते हैं... सवाल ढेरों हैं और उलझनें अनंत...

आख़िर कितनी उलझनों को सुलझाएँ... और कब तक... एक की गिरहें किसी तरह खोलो तो दूसरी गाँठ लगा के बैठ जाती है... उफ़... तंग आ गये हैं अब तो... कभी कभी तो दिल करता है इन सारी उलझनों की पोटली बनायें और दूर कहीं छोड़ आयें किसी जंगल में... जहाँ से ये सब फिर कभी वापस ना आ सकें.. काश कि ऐसा कर पाते... मन कितना हल्का हो जाता ना... ये जानवर कितने अच्छे होते हैं... किसी तरह कि कोई उलझन नहीं... जब जी चाहा खाया... जहाँ जी चाहा सोये... जिसके साथ दिल किया जंगल में दौड़ लगा ली...

ये ज़िन्दगी कभी कभी कितनी ठहरी हुई लगती है ना... फिर भी साँसें चलती रहती हैं... वक़्त भी कहाँ रुकता है... वो तो बहता रहता है अपनी ही रौ में और हम कहीं पीछे, बहुत पीछे छूट जाते हैं... अपनी उलझनों के साथ... अकेले...

कभी किसी छोटे बच्चे के हाथ से अपनी उंगली छुड़ाई है आपने ? कैसे अपनी नन्हीं नन्हीं आँखों में उम्मीद के बड़े बड़े आँसू भरे आपको दूर तलक जाते हुए देखता है... आपको पता होता है ये आप सही नहीं कर रहे... आप ख़ुश भी नहीं होते... फिर भी आप चलते रहते हैं... एक टीस सी उठती है दिल में और आप खुद को किसी गुनहगार से कम नहीं समझते.. कैसे इतने कठोर हो पाते हैं आप उस पल कि उस छोटे से बच्चे के आँसू भी आपको रोक नहीं पाते... इतने कठोर ? बिल्कुल पत्थर के जैसे... एकदम खुदगर्ज़... ऐसे तो नहीं हैं ना आप... फिर कैसे और क्यूँ आप ऐसे बन जाते हैं... वो भी एक रोते हुए बच्चे के सामने...

इन उलझनों में कितना वेग होता है... बिलकुल किसी भंवर कि तरह... एक बार इसमें फंस गये तो निकलने का कोई रास्ता नहीं... कुछ ऐसी ही तो होती हैं यादें भी... ना समय देखती हैं, ना जगह, ना माहौल... बस वक़्त बे-वक़्त आपको आ के घेर लेती हैं... कितना मुश्किल हो जाता है उनसे उंगली छुड़ा के आगे बढ़ना... ना चाहते हुए भी सब भूल जाना... या कम से कम भूलने का नाटक करना... कितना दर्द होता है... वैसी ही टीस उठती है... और आप एक बार फिर गुनहगार जैसा महसूस करते हैं... ख़ुद को और ज़माने को धोखा देते हुए...


बादलों कि ओट में चाँद छुपा क्यूँ
हौले से वो लेता अंगड़ाइयां है क्यूँ
मुखड़े पे लिखी-लिखी है उलझन
जानता है आसमां वो तन्हां है क्यूँ

खिले-खिले चेहरे हैं सूने से नयन
द्वार पे रंगोली है ख़ाली-ख़ाली मन
चलना अकेले है जो सबको यहाँ
चलें साथ-साथ परछाइयाँ भी क्यूँ

चूरा-चूरा है अँधेरा हवा सन-नन
हाथ-हाथ ढूंढें हाथ, हाथ कि छुअन
दूर-दूर दिल और पास है भरम
हँसते-हँसते लगता है क्यूँ हँसे थे हम
जी में आता है रो-रो सुजा लें आँखें हम
रेत के वो पाँव जाने कहाँ खो गये
रूठी-रूठी हुई पुरवाइयाँ हैं क्यूँ

बादलों कि ओट में चाँद छुपा क्यूँ...

-- आसरिफ़ दहलवी




Monday, May 2, 2011

Love just happens... No conditions applied !



अन्कन्डिशनल लव - बेशर्त प्यार... आज तक प्यार के बारे में जितना कुछ सुना, समझा, पढ़ा उससे हमेशा यही जाना कि प्यार में शर्तें नहीं होती और बिना किसी शर्त का प्यार ही सच्चा प्यार है, "ट्रू लव" ... क़िस्से, कहानियों और परीकथाओं जैसा... वो प्यार जो आजकल की दुनिया में मिलना नामुमकिन सी बात लगती है... पर असल में देखिये तो क्या प्यार वाकई ऐसा होता है ?

अच्छा एक बात बताइये... क्या हम इस बात का अनुमान पहले से लगा सकते हैं कि हमें प्यार होने वाला है ? क्या प्यार करने से पहले हम ये शर्त रख पाते हैं कि हमें कब, किससे, कहाँ और कैसे प्यार होगा ? क्या हम प्यार के होने ना होने को काबू में कर पायें हैं कभी ? नहीं ना ?

प्यार तो बस हो जाता है... बिना हमारे कुछ करे.. बिना हमारे कुछ सोचे...

तो फिर प्यार में ये शर्तें आती कब हैं ? और क्या वाकई ये शर्तें होती हैं... शायद नहीं... ये तो बस छोटी छोटी अपेक्षाएं होती हैं... उस इन्सान से जिसे हम दिल कि गहराइयों से प्यार करते हैं... आख़िर हम उनसे क्या चाहते हैं... कोई बड़ा ख़ज़ाना तो नहीं मांगते कभी... बस छोटी छोटी चंद अपेक्षाएं, इच्छाएं होती हैं उनसे और वो ही पूरी हो जाएँ तो हमें किसी बड़े ख़ज़ाने मिलने जैसी ख़ुशी दे जाती हैं... हम बस इतना ही तो चाहते हैं ना कि अगर हम उन्हें फ़ोन करें तो बदले में वो भी हमें कभी कॉल कर लें... हम उन्हें दस चिट्ठियाँ लिखें तो कम से कम वो भी एक चिट्ठी लिख दे हमें... हम उनका ख़्याल रखते हैं तो वो भी हमारा ख़्याल रखें... हम उनकी परवाह करते हैं और बदले में यही उम्मीद ख़ुद के लिये भी रखते हैं... हम प्यार देते हैं और चाहते हैं कि हमें भी वो प्यार मिले... तो इसमें ग़लत क्या है ?

झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं... या उन्होंने उम्मीदें रखना छोड़ दिया है... ये तो इन्सानी फ़ितरत है... हमारे स्वभाव का हिस्सा है... ये भला कैसे बदल सकता है... हम जैसा महसूस करते हैं उसे झुठला तो नहीं सकते... ना ही अपनी संवेदनाओं को दबा सकते हैं... हम किसी से प्यार पाना तो चाह सकते हैं पर प्यार ना पाना भला कैसे चाह सकते हैं...

अन्कन्डिशनल लव का मतलब ये नहीं होता कि हम जिसे प्यार करें उससे बदले में प्यार ना चाहें या जिसका ख़्याल रखें, परवाह करें, जिसकी कद्र करें उससे बदले में उस सब की उम्मीद ना रखें... क्यूँकि ऐसा करना हमारे बस में नहीं है... अन्कन्डिशनल लव बिना शर्तों का प्यार नहीं होता, क्यूँकि हम कोई भगवान नहीं हैं, हम सब आम इन्सान हैं और हम अपनी भावनाओं और उम्मीदों को नियंत्रित नहीं सकते... उम्मीद कि लौ तो हम तब भी जलाए रखते हैं, हम तब भी ये चाहते हैं कि सब ठीक हो जाये जब हमें ये पता होता है कि वास्तव में कुछ भी ठीक होने वाला नहीं है...

अन्कन्डिशनल लव का मतलब दरअसल ये तमाम उम्मीद और अपेक्षाएं रखने के बावजूद उनके साथ समझौता करना होता है, उनके साथ सामंजस्य बनाना होता है... उस इन्सान के लिये... जिसे हम प्यार करते हैं...

अन्कन्डिशनल लव अपेक्षाएं रखने के साथ साथ ये स्वीकार करना भी होता है कि ज़रूरी नहीं वो सारी अपेक्षाएं पूरी हों... पूरी होती हैं तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं पर अगर पूरी नहीं होतीं तो भी बुरा मत मानिये... क्यूँकि अंत में हमारे लिये इन अपेक्षाओं के पूरा होने से ज़्यादा उस इन्सान से प्यार करना मायने रखता है... और अगर आप किस्मतवाले हैं तो आपको भी बदले में वो प्यार ज़रूर मिलता है...

शायद उस तरह से नहीं जिस तरह से आप चाहते थे पर हाँ जिस भी तरह से वो इन्सान आपको प्यार दे सकता है, पूरे दिल से...

और फिर आप प्यार करते हैं - सिर्फ़ प्यार - बिना शर्तों का - अन्कन्डिशनल लव !

[ ऐसा ही एक आर्टिकल हाल ही में एक इंग्लिश मैग्ज़ीन में पढ़ा था... उसे ही अपने शब्दों में पेश करने कि एक छोटी सी कोशिश है बस... ]

मैं
दिये की लौ सी जलती रहूँगी
निरंतर
तुम्हारे लिये

बिना किसी चाह
अपने प्यार से सदा
रौशन करती रहूँगी
ज़िन्दगी तुम्हारी

तुम बस इतना करना
जब मद्धम पड़ने लगे कभी
रौशनी मेरी
या बुझने लगूँ मैं

तो थाम लेना मेरी लौ हाथों के घेरे से
और अपने प्यार का घी डाल देना
थोड़ा सा
और मैं फिर जल उठूँगी

एक बार फिर रौशन करने
ज़िन्दगी तुम्हारी
और जलती रहूँगी
निरंतर
यूँ ही
तुम्हारे लिये...

-- ऋचा




जाने क्यूँ आज ये गाना बड़ी शिद्दत के साथ याद आ रहा है... सोचा आप लोगों को भी सुनवा दूँ... कैनेडियन सिंगर शनाया ट्वेन का गाया हुआ - "यू आर स्टिल द वन"...


Thursday, April 7, 2011

ज़िन्दगी का बहीखाता !



सुबहें अब पहले सी नहीं होतीं
कोई बाहों में भर के अब नहीं उठाता
सूरज बहुत देर से निकलता है
दिन के दूसरे या तीसरे पहर

नींद भी देर से खुलती है
फिर भी न जाने क्यूँ
एक अजीब सी सुस्ती तारी रहती है
सारा दिन

वो शामें अब नहीं आतीं
के जिनके इंतज़ार में
दोपहरें उड़ती फिरतीं थीं
लम्हें पलकें बिछाते थे

अफ़सुर्दा आसमां से अब
पहले सी चाँदनी नहीं बरसती
चाँद एक कोने में उदास पड़ा रहता है
तारे उसे नज़र भर देखने को तरस जाते हैं

कोई जुम्बिश नहीं होती अब
ख़्यालों में
ना कोई ख़्वाब ही करवट लेता है
नींद की चादर तले

ये ग्रहों ने कैसी चाल बदली है
कि दिन-रात का सारा
हिसाब बिगड़ गया
कुछ भी अपनी जगह अब नहीं रहा

एक बार आओ मिल के
ज़िन्दगी का बहीखाता जांच लें
कि कुछ किश्तें ज़िन्दगी की ग़ायब हैं
या शायद खाते में चढ़ाना भूल गये हम...

-- ऋचा


Thursday, March 17, 2011

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की...



धरती बनना बहुत सरल है कठिन है बादल हो जाना
संजीदा होने में क्या है मुश्किल है पागल हो जाना
रंग खेलते हैं सब लेकिन कितने लोग हैं ऐसे जो
सीख गये हैं फागुन की मस्ती में फागुन हो जाना !!!

-- डॉ. कुमार विश्वास

मुलायम, चमकीले हरे कोपलों की चोली, सेमल का सुर्ख़ रेशमी घाघरा, सरसों की पीली महकती चुनर और केसरिया पलाश की पायल पहने... छन छन करती... हँसती खिलखिलाती... फिज़ाओं में खुशियों के रंग बिखेरती... किसी अल्हड़ नवयौवना सी फागुन ऋतु दस्तक दे चुकी है... होली बस अगले ही मोड़ पर है... एकदम क़रीब... हवाओं में बौराए आम का नशा घुलने लगा है... ठंडाई का स्वाद ज़बान पर आने लगा है... गुजिया की मिठास होंठों पर तैरने लगी है... चटख रंगीले अबीर गुलाल से रंगे जाने को बच्चों से ले कर बड़ों तक सभी बेताब हैं...

एक बार फिर हर गली मोहल्ले में होली का राष्ट्रगान बजने लगा है - "पी ने मारी पिचकारी मोरी भीगी अंगिया... रंग रसिया ओ रंग रसिया... होली है !!! हो रंग बरसे भीगे चुनर वाली... रंग बरसे..."

सच कभी कभी तो मन करता है... नहीं कभी कभी क्या रोज़ ही मन करता है उस ईश्वर को दिल से धन्यवाद देने का जो इस भारत माँ की संतान होने का सौभाग्य मिला... ऐसी धरती पर जन्म लिया जहाँ रंगों से लेकर रिश्तों और रौशनियों हर चीज़ के त्यौहार मनाये जाते हैं... कभी जीवन के हर रंग में ख़ुश रहने की सीख देते हैं ये त्यौहार... तो कभी अमावास की काली रात को भी उम्मीद के दियों से रौशन करने की...

यहाँ हम हर रिश्ते का उत्सव मनाते हैं... फिर चाहे वो भाई बहन का रिश्ता हो, पति पत्नी का या बेटे बेटियों का... और होली का त्यौहार उस सब से ऊपर है जो सिखाता है सारे गिले शिकवे भूल कर दोस्त ही क्या दुश्मनों को भी हँस के गले लगाओ... ये ज़िन्दगी लड़ाई झगड़े, शिकवे शिकायतों के लिये बहुत छोटी है... इसे प्यार के रंगों से रंग लो...

आज जब इस दौड़ती, भागती, हांफती ज़िन्दगी में खुशियों के पल बहुत कम होते जा रहे हैं... क्या आप नहीं चाहते फागुन की मस्ती में एक बार फिर से फागुन हो जाना... पिचकारी में प्यार भर के अपनों को एक बार फिर उस प्यार में रंग देना... दोनों मुट्ठियों में अबीर गुलाल भर के यूँ ही हवा में उड़ा देना और ख़ुद भी उसमें सराबोर हो जाना सारी परेशानियाँ भूल के... हम तो बिलकुल तैयार हैं... तो आइये हो जाये... एक बार फिर मिल के होली मनाएँ... नाचे गायें... शोर मचाएं... होली है भाई होली है... बुरा ना मानो... होली है :)



जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ुम शीशे-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।

हो नाच रंगीली परियों का, बैठे हों गुलरू रंग भरे
कुछ भीगी तानें होली की, कुछ नाज़-ओ-अदा के ढंग भरे
दिल फूले देख बहारों को, और कानों में आहंग भरे
कुछ तबले खड़कें रंग भरे, कुछ ऐश के दम मुंह चंग भरे
कुछ घुंगरू ताल छनकते हों, तब देख बहारें होली की

गुलज़ार खिलें हों परियों के और मजलिस की तैयारी हो।
कपड़ों पर रंग के छीटों से खुश रंग अजब गुलकारी हो।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों और हाथों में पिचकारी हो।
उस रंग भरी पिचकारी को अंगिया पर तक कर मारी हो।
सीनों से रंग ढलकते हों तब देख बहारें होली की।।

और एक तरफ़ दिल लेने को, महबूब भवइयों के लड़के,
हर आन घड़ी गत फिरते हों, कुछ घट घट के, कुछ बढ़ बढ़ के,
कुछ नाज़ जतावें लड़ लड़ के, कुछ होली गावें अड़ अड़ के,
कुछ लचके शोख़ कमर पतली, कुछ हाथ चले, कुछ तन फड़के,
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों, तब देख बहारें होली की।।

ये धूम मची हो होली की, ऐश मज़े का झक्कड़ हो
उस खींचा खींची घसीटी पर, भड़वे खन्दी का फक़्कड़ हो
माजून, रबें, नाच, मज़ा और टिकियां, सुलफा कक्कड़ हो
लड़भिड़ के 'नज़ीर' भी निकला हो, कीचड़ में लत्थड़ पत्थड़ हो
जब ऐसे ऐश महकते हों, तब देख बहारें होली की।।

-- नज़ीर अकबराबादी


[ गीत मुज़फ्फ़र अली जी के एल्बम हुस्न-ए-जाना से, छाया गांगुली जी की आवाज़ में ]

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