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Thursday, May 21, 2020

ख़ानाबदोश !



ये मन भी कितना चंचल होता है न... कभी एक जगह टिकता ही नहीं... बिलकुल उस तितली की तरह जो फूलों से भरे बाग़ीचे में पहुँच कर एकदम पागल सी हो जाती है.... एक पल इस फूल पे बैठती है तो अगले ही पल उड़ के दूसरे फूल पर और फिर तीसरे और चौथे पर... जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा होता कि किस फूल का रस उसे सबसे ज़्यादा पसंद आया...

मन भी बिलकुल ऐसा ही होता है... इस एक छोटे से जीवन में ही उसे सब कर लेना है... कभी लगता है एक पेंटर बनना है तमाम पेंटिंग्स बनानी हैं... फिर कभी लगता है फ़ोटोग्राफ़ी करनी है... कभी लगता है की कम्प्यूटर्स की पढ़ाई ग़लत कर ली दिल तो घर बनाने और सजाने में लगता है... आर्किटेक्चर की पढ़ाई करनी चाहिये थी... फिर अगले ही पल लगता है ये सब मोह माया है... हमें तो कहीं पहाड़ पे छोटा सा एक कॉटेज बना के वहीं रहना है... मटीरिअलिस्टिक चीज़ों की ज़्यादा लालसा नहीं तो गाँव के किसी पहाड़ी स्कूल में बच्चों को पढ़ा के अपना ख़र्चा तो चल जाएगा... कितना तो ख़ाली समय मिलेगा उसमें बाग़वानी करेंगे... किताबें पढ़ेंगे... 

फिर कभी ये भी दिल करता है कि एक बी & बी चलाना है किसी पहाड़ पर.. घर का घर हो जायेगा और कमायी की कमायी और होम स्टे में जो तमाम लोग आयेंगे दुनियाभर से उनसे दुनिया जहान की बातें भी... और पहाड़ पे रहने का सपना पूरा होगा सो अलग...   फिर कभी दिल में दुनिया घूमने की ललक ज़ोर पकड़ती है...  लगता है काश किसी ट्रेवल चैनल में नौकरी मिल जाये तो सारी दुनिया घूम लें...

दरअसल हमारा मन बिलकुल किसी ख़ानाबदोश के जैसा है... हर कुछ दिन में अपना ठिकाना बदलता हुआ... कितनी तो क्षण भृंगुर लालसायें उपजती रहती है इस मन की ज़मीन पे हर रोज़... चचा ग़ालिब क्या ख़ूब कह गये हैं हम जैसों के ही लिये "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले..."

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कोई भटकन है मेरे भीतर
कोई यायावर
कि बुझती नहीं जिसकी प्यास
किसी दरिया किनारे भी
न तृप्त होती है आत्मा
न भटकन ख़त्म होती है

कुछ करना है उसे
कुछ अलग
क्या
नहीं मालूम
पर कुछ तो

वो नन्हां सा टुकड़ा 
ख़्वाब का
जो धुंधला धुंधला अटका है 
याद के चिटके काँच में 
उसे रंगों से देनी है शक़्ल
किसी शफ्फाक़ कैनवस पर

कोई इक कविता कहनी है
बिना बाँधे शब्दों को
किसी भी पैमाने में
बस बिखेर देना है
कागज़ पर
जो महके सौन्धे सौन्धे

कुछ पौधे उगाने हैं
रंगीन फूलों के
के जिन पे तितलियाँ आयें
उनसे ढेरों बातें करनी हैं
दोपहरें रातें करनी हैं
हाँ इक जुगनू पकड़ना है

कोई जंगल है जो भीतर
अनगढ़ से विचारों का
उसे बाहर लाना है
किसी ऊँची पहाड़ी पे
एक घर भी बनाना है

हो इक छोटा सा कमरा
जिसमें इक खिड़की बड़ी हो
छत हो लाल पत्थर की
पेड़ पे झूला पड़ा हो
मखमली घास का हो इक गलीचा
किसी अलसायी दोपहरी में
कोई किताब पढ़नी है

बुलेट भी तो चलानी है
दुनिया की सैर करनी है
तमाम लोगों से मिलना है
नई नई कितनी 
भाषायें सीखनी है
समय की सीमायें लांघनी है

प्रवासी परिंदों संग 
सुनहरी सुबहें देखनी हैं
स्पिति की सफ़ेद रातों में
तमाम रतजगे करने हैं
आकाशगंगा में झिलमिल 
अनगिन तारे गिनने हैं

समय की चाँदी जब
चमकेगी बालों में
शाम का पिघला सोना चुनना है
सुनहले साहिल की रेत से
पैरों में भटकन बाँध
यूँ ही बस चलते जाना है

ये भटकन ही तो हासिल है
यही कामिल है 
रगों में यूँ ही तो 
भटकता है लहू भी
और साँसे धड़कनों में
मुझे भी बस भटकना है
यूँ ही उम्र भर... ख़ानाबदोश !
-- ऋचा



Monday, May 25, 2015

बेअदब सी पर गज़ब सी.. मनमर्ज़ियाँ...!!!




जाने क्यूँ अनप्लांड जर्नीज़ हमेशा से बहुत अट्रैक्ट करती आयी हैं हमें... कुछ कुछ मिस्टीरियस सी... बिना किसी तय परिसीमा या दायरों के... न पता हो जाना कहाँ है... न पता कि पहुंचना कब है... न ये कि कब वापस आना है... पहले से कुछ भी नहीं पता... बस मन हुआ कहीं जाने का और चल दिए... बंजारों के जैसे... कभी कभी सोचती हूँ ऐसी लॉन्ग ड्राइव्स और जर्नीज़ क्यूँ पसंद है हमें... ख़ासकर हाइवे पे बेवजह बेमकसद की यात्रा... मंज़िल से ज़्यादा रास्ते पसंद आते हैं... खुले खुले... अंतहीन...

इन आवारा सड़कों पर बेपरवाह भटकते हुए ख़ुद के बेहद करीब महसूस होता है... जैसे अपने ही वजूद का कोई खोया हुआ हिस्सा पा लिया हो... कितने ख़ूबसूरत होते हैं ये अनजान रास्ते... कहीं भी नहीं जाती फ़िर भी आपको ख़ुद तक पहुँचाती ये आवारा सड़कें... कि इनके साथ यूँ आवारा हो जाने के लिए बड़ा जिग़र चाहिए और साथ में थोड़ा पागलपन और जुनून...

बड़ा अच्छा लगता हैं इन रास्तों का हाथ थामे बस चलते चले जाना... इनसे बातें करते... इनके साथ हँसते खिलखिलते... सड़कों के किनारे खिले बंजारे फूलों की बस्तियों से ठिठोली करते... पेड़ों की आदिम गंध में ख़ुद को डुबोते.. या कभी कभी बस यूँ ही ट्रेन या बस की खिड़की से अनंत में देखते रहना जाने किन ख्यालों में डूबे हुए...

हाइवे वाली किसी चाय की टपरी पर रुकना... कुछ पल सुस्ताते हुए कुल्हड़ वाली चाय पीना.. मिट्टी की सौंधी सी ख़ुश्बू को आत्मा तक महसूसना.. आह... Bliss... ! कोई CCD, Barista, Star Bucks अपनी प्रीमियम कॉफ़ी से आत्मा को यूँ छू के बताये तो जानू...

ख़ुद के बारे में बहुत कुछ सोचने का... ख़ुद को और बेहतर जानने समझने का मौका देती हैं ये जर्नीज़... मानो किसी खुली जगह पर जाने से दिमाग़ की कितनी गिरहें खुल जाती हैं.. हमारा मानना है हर कुछ समय के बाद ऐसी कोई यात्रा बहुत ज़रूरी हो जाती है.. just to loosen yourself..

हमारा रिश्ता भी कुछ कुछ ऐसा ही है ना जान... कभी न ख़त्म होने वाली किसी अविरल यात्रा जैसा... जो हमें अन्वाइन्ड होने का... रिलैक्स होने का मौका देता है... या फिर डिस-आर्गनाइज़्ड सी किसी अनप्लांड जर्नी जैसा... बेदायरा... बेमंज़िल... खुला खुला... अनंत... !



Wednesday, December 18, 2013

तेरा नाम इश्क़ मेरा नाम इश्क़ !


तुम्हारी हँसी की आवाज़ आज बहुत देर तलक कानों में गूँजती रही...

जानते हो आज कितने दिनों बाद तुम इतना खुल के हँसे हो... वो बच्चों सी उन्मुक्त हँसी... ख़ुशी से गीली हो आयी पलकों से पोंछ के काजल... जी किया कि तुम्हारी हँसी को काला टीका लगा दूँ... या फ़ेंक के कोई जाल क़ैद कर लूँ इस लम्हें को... तुम्हारी हँसी से गूँजता खिलखिलाता ये लम्हा...

रोज़ हँस दिया करो ना ऐसी हँसी एक बार... भले मेरा मज़ाक बना कर ही सही... दिन बन जाता है मेरा...!


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एक हूक सी उठती है कई दफ़े दिल में... कि तुम्हारा हाथ थाम के और तुम्हारे काँधे पे सर रख के बस बैठी रहूँ कुछ देर... बिन कुछ बोले... तुम्हारा लम्स महसूस करूँ अपनी हथेली में... कि तुम्हारे हाथों की गर्मी मन को बहुत ठंडक पहुँचाती है... जैसे कोई अनदेखी ऊर्जा तुम्हारी हथेलियों से होके मेरे मन तक पहुँच रही हो... ज़िन्दगी की ऊर्जा... तुम से मुझ तक बहती हुई... सारी थकन सारी उदासी चंद पलों ही में कहीं ग़ुम हो जाती है...

टच थेरेपी और क्वांटम टच के बारे में सुना है कभी तुमने... कभी सोचा कैसे एक रोता हुआ बच्चा माँ की गोद में आते ही चुप हो जाता है... आप कितनी भी असफ़ल कोशिश कर चुकें हों उसे चुप करने की पर कैसे माँ के सहलाते ही बच्चे का सुबकना बंद हो जाता है... स्पर्श का ये कैसा बेआवाज़ रिश्ता होता है माँ और बच्चे के बीच...

तुम मेरे लिए माँ का वही स्पर्श हो... !

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चाय - कॉफ़ी पीने का मुझे कभी भी बहुत शौक़ नहीं रहा...मेरे लिए वो सिर्फ़ तुम्हारे साथ समय बिताने का बहाना मात्र हुआ करती थीं...वो लॉन्ग ड्राइव्स... वो बेवजह की बातें... वो बेवजह के किस्से कहानियाँ... वो बेवजह के झगड़े... सब...

जानती हूँ बहुत कीमती है तुम्हारा समय... और मेरे पास बेवजह की बातें बहुत सी... फिर भी मेरे सारे प्यार के बदले क्या एक दिन उधार दे सकते हो मुझे ? सिर्फ़ चौबीस घंटे...

बहुत समय हो गया ज़िन्दगी जिये... बड़ी सारी बेवजह की बातें भी इकट्ठी हो गयी हैं...!


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कभी किसी को एक ही सी इंटेंसिटी से पसंद और नापसंद किया है ? नहीं ? मतलब कभी किसी से प्यार नहीं किया आपने... किसी से प्यार कर के देखिये हुज़ूर... सच्चा प्यार... उसकी अच्छाइयों पे जितना प्यार आएगा उसकी बुराइयों से आप उतनी ही नफ़रत करेंगे... प्यार जितना सच्चा होगा नफ़रत उतनी ही तीव्र...

अजीब रिश्ता था उन दोनों का... पल में तोला पल में माशा जैसा... एक पल एक दूसरे पे इतना प्यार बरसाते मानो इस धरती पर प्यार की नीव उन्हीं ने डाली हो और दूसरे ही पल ऐसे पागलों के जैसे लड़ते गोया इस धरती से प्यार का अंत भी उन्हीं के हाथों लिखा हो... शब्दों के तीर से कभी ज़ख्म देते तो कभी उन्हीं ज़ख्मों पर शहद जैसे शब्दों से मरहम लगते... दर्द भी ख़ुद ही, ख़ुद ही दवा भी... जाने किस दुनिया के बंदे थे...

हमारा रिश्ता भी तो कुछ ऐसा ही अजीब है ना जान... इंटेंस... इन्सेशियेबल... इनसेन...!





Thursday, April 4, 2013

उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी...



Your Cheerful Looks Makes Day A Delight ! आज पलट के बीते सालों पे नज़र डालती हूँ तो यकीन नहीं होता... ये उसी लड़की के लिए कहा गया था कभी जो आज अपनों के लिए दुःख और उदासी का कारण बनी हुई है...

ये टाइटल ऐसे ही नहीं दिया गया था उसे क्लास ट्वेल्फ्थ की फेयरवेल पार्टी में... उसकी खुशमिज़ाजी ने उसे स्कूल कॉलेज, यार दोस्तों के बीच एक अलग पहचान दी हुई थी... बड़ी से बड़ी परेशानी में भी हमेशा ख़ुश और हँसती रहने वाली लड़की... वो कभी हर महफिल की जान हुआ करती थी जो आज ख़ुद से भी इतना कटी कटी रहती है... ख़ुद से ही नाराज़... कब वो इतना बदल गयी... उसकी वो हँसी कहाँ गायब हो गयी उसे भी कहाँ पता चला था...

बहुत चिड़चिड़ी हो गई थी वो... बात बात पे गुस्सा करने लगी थी... नाराज़ रहने लगी थी... लोग अक्सर उससे शिकायत करने लगे थे उसके स्वभाव को ले कर... पर जो लोग उसे अभी-अभी मिले थे वो उसे जानते ही कितना थे... वो हर किसी की शिकायत सुनती और चिढ़ जाती... एक अजीब सी खीझ भरती जा रही थी उसके मन में सबके प्रति... एक बेहद गहरी ख़ामोशी उसे घेरती जा रही थी जो सिर्फ़ उसे महसूस होती थी... वो ऐसी नहीं थी... वो ऐसी होना नहीं चाहती थी...

आज इतने सालों बाद जब ख़ुद को आईने में देखा तो पहचान नहीं सकी... ज़िन्दगी जाने कब उसका हाथ छुड़ा कर आगे बढ़ गयी... वो पीछे छूट गयी... बहुत पीछे... तन्हा... अकेली... किसी अनजाने से मोड़ पे... उसे बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था की वो अब क्या करे… ज़िन्दगी के सफ़र पर यूँ राह भटक जाना तकलीफ़देह होता है... पर ज़िदगी जीने की वजह का खो जाना... नृशंस !

जैसे कुछ टूट गया था उसके अन्दर... कुछ तो था जो मरता जा रहा था धीरे धीरे भीतर ही भीतर... एहसास सुन्न हो गए थे... दिमाग की सारी नसें जैसे सूज गयी थीं... सर दर्द से फटा जा रहा था... वो रोना चाहती थी... चीखना चाहती थी... शायद कुछ दर्द बह जाए आँसुओं के साथ तो जी थोड़ा हल्का हो... पर उसके एक दोस्त ने कभी उससे कहा था कि रोते तो कमज़ोर लोग हैं... उसका दिल हुआ वो आज पूछे उस दोस्त से... कभी कभी कमज़ोर पड़ जाना क्या इतना बुरा है... क्या ताक़तवर लोगों को तकलीफ़ नहीं होती कभी ?

उसकी ज़िन्दगी के सफ़र में बहुत से लोग आये... कहने को दोस्त पर कोई भी उसके साथ ज़्यादा दूर तक नहीं चला... हर रिश्ता उसे हमेशा टुकड़ों ही में मिला... कभी लोग उसके नज़दीक आये, कभी उसने लोगों को ख़ुद के नज़दीक आने का मौका दिया... पर अंत में ये उसकी अपनी ज़िन्दगी थी, उसका अपना सफ़र जो उसे अकेले ही तय करना था...

आज वो उदास है... बहुत उदास... इसलिए नहीं की वो अकेली पड़ गयी है... बल्कि इसलिए की उसने ख़ुद को कहीं खो दिया है... वो अब वो रह ही नहीं गयी है जो वो कभी हुआ करती थी... आज उस अनजान से मोड़ पे अकेली खड़ी वो ख़ुद को फिर से तलाशने की जद्दोजहद कर रही है... वो हताश है, निराश है, शायद थोड़ा डरी हुई भी... पर ज़िन्दगी आपके ख़्वाबों सी हसीन और आसान कब होती है... ख़ुशियों का सूरज हमेशा तो नहीं खिला रहता... ज़िन्दगी में कभी रात भी आती है… और रात के अँधियारे में ही तारे टिमटिमाया करते हैं... उसे भरोसा है ऐसा ही कोई तारा उसे भी मिलेगा... जो ख़ुद को वापस पाने की उसकी राह को रौशन करेगा...



Saturday, October 13, 2012

आजा तेरे कोहरे में धूप बन के खो जाऊँ... तेरे भेस तेरे ही रूप जैसी हो जाऊँ !



मौसम ने फिर करवट ली है... सर्दी की ख़ुश्बू एक बार फिर फिज़ा में घुलती हुई सी महसूस होने लगी है... ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ख़ुश्बू घुली हुई है मेरी साँसों में... कल ऑफिस से वापस आते वक़्त हवा में ठंडक थी... तुम्हें सोचते हुए जाने कब रास्ता कट गया तुम्हारे एहसास की गर्मी ने कितनी राहत पहुँचायी सारे रास्ते...

कितने दिन हो गए कुछ लिखा नहीं... आज दिल किया कुछ लिखूँ तो तुम्हारे सिवा और तुमसे बेहतर कोई दूसरा मौज़ू ही नहीं मिला... गोया मेरी लेखनी को भी प्यार हो गया है तुमसे...

तुमसे बात करना हमेशा ही दिल को एक सुकून दे जाता है... दुनिया भर की परेशानियों के बीच दो पल तुम्हारी आवाज़ रूह को ऐसे ठंडक पहुंचती है जैसे पसीने से भीगे बदन पर ठंडी हवा का झोंका... सारा तनाव सारी परेशानियाँ सब चंद लम्हों में ही काफ़ूर हो जाते हैं... सारे दिन की थकन के बाद तुमसे बात होती है तो यूँ लगता है मानो हर की पौड़ी पर बैठ कर संध्या आरती देख रहे हों... गंगा के ठन्डे पानी में पैर डाल के... तृप्ति !

जाने तुम्हारी आवाज़ का जादू है या तुम्हारे साथ का, पर कुछ तो ज़रूर है... कभी कभी तो जी करता है तुम्हें बिना बताये तुम्हारी आवाज़ का एक टुकड़ा चुरा कर रख लूँ अपने पास और फ़ुर्सत में उससे खूब सारी बातें किया करूँ...

जानते हो तीन दिन पहले एक सपना देखा था... हम साथ काम कर रहे थे एक ही ऑफिस में, एक ही बिल्डिंग में... पर तुम इस कदर मसरूफ़ थे कि एक पल के लिए बात करने का भी समय नहीं था... हम बस एक दूसरे को देख भर पा रहे थे... फिर सब काम छोड़ कर अचानक तुम मेरे पास आये... बोला कुछ भी नहीं बस मेरा हाथ पकड़ा था... तुम्हारा वो स्पर्श बिन कुछ बोले भी कितना कुछ कह गया था... उस एक स्पर्श में सहानुभूति थी, संवेदना थी, करुणा थी, समय न दे पाने की तकलीफ़ थी और सबसे बढ़ कर बेहद गहरा प्यार था... तीन दिन बाद भी सपने में महसूस किया वो तुम्हारे हाथों का स्पर्श अब भी अंकित है मन के पन्नों पर...

तुम ज़्यादा बोलते नहीं... तुम्हारे होंठ अक्सर ख़ामोश रहते हैं... पर तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... जाने किस भाषा में बातें करती हैं मेरी आँखों से कि सीधे दिल तक पहुँचती है उनकी आवाज़... बहुत से ऐसे एहसास हैं जिन्हें महसूस तो किया है तुम्हारी आँखों के ज़रिये पर शब्दों में उनका तर्जुमा करना मुमकिन नहीं है... कहाँ से सीखी ये भाषा ? सीधे दिल पे दस्तक देने वाली !

जानते हो पहला अक्षर और पहली भाषा कैसे बने ? और संगीत का पहला सुर ? नहीं जानते ? आओ आज बताती हूँ तुम्हें...

आदि रचना
मैं - एक निराकार मैं थी

ये मैं का संकल्प था
जो पानी का रूप बना
और तू का संकल्प था
जो आग की तरह नुमाया हुआ
और आग का जलवा
पानी पर चलने लगा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मैं की मिट्टी की प्यास थी
कि उसने तू का दरिया पी लिया
ये मैं की मिट्टी का हरा सपना था
कि उसने तू का जंगल खोज लिया
ये मैं की मिट्टी की गंध थी
और तू के अम्बर का इश्क़ था
कि तू का नीला सा सपना
मिट्टी की सेज पर सोया
ये तेरे और मेरे मांस की सुगंध थी
और यही हक़ीक़त की आदि रचना थी

संसार की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि पुस्तक
मैं थी और शायद तू भी
शायद एक सांस के फासले पे खड़ा
शायद एक नज़र के अँधेरे पे बैठा
शायद एहसास के मोड़ पे चल रहा
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

ये मेरा और तेरा अस्तित्व था
जो दुनिया की आदि भाषा बना
मैं की पहचान के अक्षर बने
तू की पहचान के अक्षर बने
और उन्होंने आदि भाषा की आदि पुस्तक लिखी

ये मेरा और तेरा मिलन था
हम पत्थर की सेज पर सोये
और आँखें, होंठ, उँगलियाँ, पोर
ये मेरे और तेरे बदन के अक्षर बने
और उन्होंने आदि पुस्तक का अनुवाद किया

ऋगवेद की रचना तो बहुत बाद की बात है !

आदि चित्र
मैं थी और शायद तू भी
मैं छाँव के भीतर थिरकती सी छाया
और तू भी शायद एक खाकी सा साया
अंधेरों के भीतर अंधरों के टुकड़े
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

रातों और पेड़ों का अँधेरा था
जो तेरी और मेरी पोशाक थी
एक सूरज कि किरण आयी
वो दोनों के बदन में से गुज़री
और परे एक पत्थर पर अंकित हो गयी
सिर्फ़ अंगों की गोलाई थी,
चाँदनी की नोकें
ये दुनिया का आदि चित्र था
पत्तों ने हरा रँग भरा
बादलों ने दूधिया, अम्बर ने सिलेटी
और फूलों ने लाल, पीला, कासनी

चित्रों की कला तो बहुत बाद की बात है !

आदि संगीत
मैं थी और शायद तू भी
एक असीम खामोशी थी
जो सूखे पतों कि तरह झड़ती
या यूँ ही किनारों की रेत कि तरह घुलती
पर वो परा-ऐतिहासिक समय की बात है

मैं ने तुझे एक मोड़ पर आवाज़ दी
और जब तू ने पलट कर आवाज़ दी
तो हवाओं के गले में कुछ थरथराया
मिट्टी के कान कुछ सरसराये
और नदी का पानी कुछ गुनगुनाया
पेड़ की टहनियाँ कुछ कस सी गयीं
पत्तों में एक झंकार उठी
फूलों की कोपल ने आँख झपकाई
और एक चिड़िया के पंख हिले
ये पहला नाद था
जो कानों ने सुना था

सप्त सुरों की संज्ञा तो बहुत बाद की बात है !

आदि धर्म
मैं ने जब तू को पहना
तो दोनों के बदन अंतर्ध्यान थे
अंग फूलों की तरह गूंथे गये
और रूह की दरगाह पर अर्पित हो गये

तू और मैं हवन की अग्नि
तू और मैं सुगन्धित सामग्री
एक दूसरे का नाम होंठों से निकला
तो वही नाम पूजा के मन्त्र थे
ये तेरे और मेरे अस्तित्व का एक यज्ञ था

धर्म की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि क़बीला
मैं की जब रुत गदराई थी
मांस के पौधे पर बौर आया था
पवन के आँचल में महक बंध गयी
तू का अक्षर लहलहाया था

मैं और तू की छाँव में
जहाँ "वह" आ कर निश्चिन्त सो गया
ये "वह" का एक मोह था
गेंहूँ का दाना हमने बाँट लिया
"वह" सहज था, स्वाभाविक था
मैं की और तू की तृप्ति

क़बीलों की कथा तो बहुत बाद की बात है !

आदि स्मृति
काया की हकीक़त से लेकर
काया की आबरू तक मैं थी
काया के हुस्न से लेकर
काया के इश्क़ तक तू था

यह मैं अक्षर का इल्म था
जिसने मैं को इख्लाक़ दिया
यह तू अक्षर का जश्न था
जिसने "वह" को पहचान लिया
भयमुक्त मैं की हस्ती
और भयमुक्त तू की, "वह" की

मनु स्मृति तो बहुत बाद की बात है !

-- अमृता प्रीतम

Tuesday, July 3, 2012

मेटामॉर्फसिस !



तुम्हारा भरोसा देता है मुझे पंख
और मैं तब्दील हो जाती हूँ
एक नन्ही सी चिड़िया में
सारा साहस समेट कर
भरती हूँ उड़ान, तो लगता है
आस्मां भी कुछ नीचे आ गया है

तुम्हारा भरोसा भर देता है मुझे
विश्वास से
उग आते हैं मेरे डैने
और मैं बन जाती हूँ नन्ही सी मछली
जो तमाम व्हेल मछलियों से बचते हुए
पार कर सकती है प्रशांत महासागर भी

तुम्हारा प्यार कर देता है लबरेज़ मुझे
ख़ुश्बू से
ख़िल जाती हैं नई कोपलें
नर्म पंखुड़ियों सी महक उठती हूँ मैं
गुलज़ार हो जाता है मेरा अस्तित्व
आशाएं तितलियाँ बन मंडराने लगती हैं

तुम रखते हो हाथ मेरी पलकों पे
तो भर जाता है रंग मेरे सपनों में
तुम्हारा भरोसा मेरे सपनों के साथ मिल
शिराओं में दौड़ते रक्त को
कर देता है कुछ और सुर्ख़
लाली से लबरेज़, खिल उठती हूँ मैं

आँखें कुछ खट्टा खाने को मचल रही हैं इन दिनों
लगता है नींद फिर उम्मीद से है
फिर कोई ख़्वाब जन्म लेने को है !

-- ऋचा



( धुन पियानो पर यिरुमा की - "ड्रीम")

Sunday, June 3, 2012

तुम्हारी यादों का केलाइडोस्कोप !



कल रात तुम्हारी बेशुमार यादें बिखरी पड़ी थीं बिस्तर पर... के जैसे केलाइडोस्कोप में रंग बिखेरते काँच के छोटे-छोटे रंग-बिरंगे टुकड़े... जिस ओर भी करवट लेती तुम्हारी याद का एक टुकड़ा खिलखिला के बिखर जाता मेरे आस पास... और मैं मुस्कुराती हुई हाथ बढ़ा के जैसे ही छूने को होती उसे तो दूसरी याद आ के पहली वाली का हाथ पकड़ के भाग जाती... तुम्हारी यादें भी ना बिलकुल तुम्हारी तरह ही हैं... बहुत तंग करती हैं मुझे... दुष्ट... शरीर... पर बेहद प्यारी... किसी छोटे बच्चे कि शरारतों जैसी...

ये यादें भी ना बड़ी बातूनी होती हैं... तुम हो कि कुछ बोलते नहीं और वो हैं कि चुप नहीं होतीं एक बार शुरू हो जाती हैं तो... ये तुम्हारी यादें बिलकुल मुझ पर गई हैं :) रात के बीते पहर ऐसे घेर के बैठी थीं मुझे कि गर कोई कमरे में आ जाता उस वक़्त तो चचा ग़ालिब की "छुपाये न बने" और "बताये न बने" वाली स्थिति हो जाती :) हँस लो हँस लो... सबका एक दिन आता है... किसी दिन तुमको आ के घेरेंगी मेरी यादें तो हम भी ऐसे ही हँसेंगे... हुंह !

पता है कल रात हमने ढेर सारी बातें करीं... यादों ने और मैंने... तुम्हारी यादें उन तमाम भूली बिसरी गलियों से होते हुए जाने सपनों के कौन से शहर ले गयीं थीं जहाँ बस हम दोनों थे... और चारों तरफ़ पीले रंग के फूल खिले थे... जैसे सूरज से सारी रौशनी चुरा लाये हों... एक अजीब सी मदहोश कर देने वाली गंध बिखरी थी सारी फिज़ा में... बड़ी जानी पहचानी सी लगी थी वो महक... जैसे जन्मों से उसे जानती हूँ... बहुत सोचा तो याद आया वो जब पहली बार तुम्हें गले लगाया था न, वैसी ही महक बिखरी थी फिज़ा में तब भी...

जानते हो आज सुबह सुबह तुम्हें सपने में देखा... तब से मुस्कुराती हुई घूम रही हूँ सारे घर में... गोया कोई खोयी हुई दौलत मिल गई हो... गहरे हरे रंग कि शर्ट में बड़े प्यारे लग रहे थे तुम... आमतौर पर मुझे वो रंग ज़रा भी नहीं भाता पर जब से तुम्हें देखा है उसमें, मेरा फ़ेवरेट हो गया है... बिलकुल वो ही शर्ट ढूंढ़ के लानी है तुम्हारे लिये... जानती हूँ अब बोलोगे "बिलकुल पागल हो तुम"... बोला ना ? और अब हँस रहे हो... पता था मुझे :)

तुम्हारी सबसे बड़ी ख़ासियत पता है क्या है ? कि तुम बेहद आम हो... तुम में हर वो कमी है जो तुम्हें एक ख़ास इन्सान बनाती है... तुम कोई कैसानोवा नहीं हो... इतने ख़ूबसूरत कि जिसे देखते ही लड़कियां पागल हो जाएँ... तुम मेरी ही तरह एकदम साधारण हो... बेहद सौम्य... और इसीलिए मुझे सबसे ज़्यादा पसंद हो... क्यूँकि तुम्हारी ख़ूबसूरती तुम्हारे दिल में बसती है... मेरी आँखों से देखना कभी ख़ुद को... ख़ुद अपने आप पे दिल ना आ जाये तो मेरा नाम बदल देना... वैसे वो तो तुमने पहले ही बदल दिया है... तुम्हारे मुँह से कभी अपना नाम सुनती हूँ तो कितना पराया सा लगता है ये दुनियावी नाम... सुनो, तुम मुझे मेरे नाम से मत पुकारा करो !


Saturday, January 28, 2012

तुम आये तो..........!



तुम आये तो पीले फूलों का मौसम फिर लौटा है देखो
तुम आये तो गौरैया फिर मेरे पेड़ों पे चहकने लगी
तुम आये तो सरगम हवाओं में फिर तैरने लगी
तुम आये तो ख़ुश्बू फिर बिखर गई फिज़ाओं में
तुम आये तो नीली झील का पानी फिर से लरज़ उठा
तुम आये तो चाँदनी फिर मुस्कुरा उठी
तुम आये तो लाल रंग कुछ और सुर्ख़ हो चला
तुम आये तो बारिशें फिर हसीन लगने लगीं
तुम आये तो इन्द्रधनुष फिर सज गया फ़लक पे
तुम आये तो आँखें फिर छलक उठी ख़्वाबों से
तुम आये तो ख़ुद पर फिर यकीं हो चला है
तुम आये तो होठों को भूली हँसी फिर याद आयी
तुम आये तो एहसासों ने फिर करवट ली
तुम आये तो जी करता है नाच उठूँ फिर से
तुम आये तो फिर जीने का दिल करता है
तुम आये तो..........!

Thursday, November 3, 2011

प्यार भर देता है उड़ने की तमन्ना दिल में और मेरे पंख भी पत्थर के वो कर देता है...


"प्यार"... दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत एहसास... अपने नाम जितना ही प्यारा... कहते हैं इन्सान को ज़िन्दगी में एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिये... प्यार इन्सान को बहुत अच्छा बना देता है... जिसे आप प्यार करते हैं उसके लिये जीना सिखा देता है और बेख़ौफ़ हो के मरना भी... जब आप किसी के प्यार में होते हैं तो सारी दुनिया किसी परी-कथा सी हो जाती है... जन्नत जैसी !

शुरू शुरू में प्यार किसी पहाड़ी नदी सा चंचल होता है... अल्हड़ और गतिशील... अपनी राह ख़ुद बनता हुआ... अपने रास्ते में आने वाली हर मुश्किल हर बाधा को अपने ही साथ बहा ले जाता हुआ... अच्छा बुरा, सही ग़लत... बिना कुछ सोचे समझे हम बस बहते चले जाते हैं उसके वेग में... सोच के वैसे भी कब किया जाता है प्यार... वो तो बस हो जाता है... सब अच्छा सब सही... प्यार में कुछ भी बुरा या ग़लत कब होता है... वो तो बिलकुल एक नन्हे बच्चे के समान होता है... मासूम और निश्छल... वो चंचल या अल्हड़ भले ही हो पर बुरा या ग़लत नहीं हो सकता... बच्चे को कब सही ग़लत का ज्ञान होता है...

समय बीतता है... उम्र का एक और पड़ाव आता है... प्यार में भी ठहराव आता है... अब वो पहले सा वेग नहीं रहता... जैसे मैदानी इलाके में आकर नदी का आवेग भी शान्त हो जाता है... एक स्थिरता आ जाती है... पर ध्यान से देखिये तो उसका फैलाव बढ़ जाता है और गहराव भी... अब आप उसमें डूब तो सकते हैं बह नहीं सकते... दिमाग़ कुछ कुछ दिल पे हावी होने कि कोशिश करता रहता है जब कब... तर्क वितर्क भी अपने पाँव पसारने लगते हैं मौका पाते ही... ज़्यादातर तो दिमाग़ हार ही जाता है ये लड़ाई... पर दिल तो दिल ठहरा... कभी कभार पसीज ही जाता है... दिमाग़ को भी एक लड़ाई जीत कर ख़ुद पे इतराने का मौका दे देता है...

दिल और दिमाग़ की ये जंग यूँ ही चला करती है... रही सही कसर परिस्थितियां पूरी कर देती हैं... कुछ भी अब पहला सा नहीं रहता... समय निरंतर बीतता रहता है... नदी भी धीरे धीरे बहते हुए अपने गंतव्य कि ओर बढ़ती रहती है... उसे एक दिन सागर में ही मिल जाना है... उसकी यात्रा का यही अंत है... पर प्यार... उसका क्या कोई अंत होता है कभी ? शायद नहीं... वो बीते लम्हों की यादें बन कर ठहर जाता है हमारे ही भीतर...

ये जो साग़र कि लहरें होती हैं ना... दरअसल ये वो सारे बीते हुए खुशनुमां पल होते हैं... नदी के शुरुआती दिनों का वेग जो लहरें बन जाता है... जाने कैसी ज़िद होती है फिर से वापस लौटने की... उन बीते हुए दिनों को फिर से एक बार जीने की... ये जानते हुए भी कि यात्रा अब ख़त्म हो चुकी... गुज़रा वक़्त दोबारा नहीं आएगा... फिर भी... यादें बन कर लहरें बार बार साहिल तक आती हैं... जाने किस तलाश में... ख़ाली हाथ वापस जाती हैं... पर हारती नहीं... थकती नहीं... शायद यही प्यार है... कभी ना थकने वाला... कभी ना हारने वाला...



भटकती फिरती हूँ
बंजारों सी
हर रोज़
सुबह शाम
तुम्हारी तलाश में
जाने किस घड़ी
तुम मिल जाओ
फिर से
उम्र के किसी
अनजान मोड़ पे
तुम्हारी यादों का इक घना जंगल
बसा है मेरे भीतर कहीं...

-- ऋचा




Sunday, October 9, 2011

हमने माना कि तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन...



कैसी होती होगी वो हवा जो तुम्हारे देस में बहती है... कैसे होते होंगे वो लोग जो तुम्हें देख सकते होंगे.. छू सकते होंगे... तुमसे रु-ब-रु बात कर सकते होंगे... उस हवा में साँस लेते होंगे जहाँ तुम रहते हो... जानते हो न्यूज़ चैनल बदलते हुए कभी जब तुम्हारे शहर का ज़िक्र आता है तो उँगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं... जैसे उन्हें भी सुनाई देता है तुम्हारे शहर का नाम... उस भीड़ में जाने किस अनदेखे चेहरे को तलाशने लगती हैं आँखें... कोई बात भी करता है ना तुम्हारे शहर की तो दिल करता है उससे कहूँ बस ऐसे ही बोलता रहे और मैं ऐसे ही सुनती रहूँ उसे... जी भर के...

झूठ कहते हैं लोग कि दुनिया छोटी हो रही है, दूरियाँ सिमट रही हैं... दूरियाँ तो और बढ़ गई हैं... कल हमारे बीच महज़ ७०० किलोमीटर की दूरी थी जिसे हम बस चंद लम्हों में तय कर लिया करते थे... आज वो दूरी सुदूर बसे किसी ग्रह जैसी लगती है... सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर... चाह कर भी दूरियाँ अब सिमट नहीं पातीं... तुम तक मेरी पुकार अब नहीं पहुँच पाती... बीच में ही कहीं राह भटक कर हमेशा के लिये खो जाती है ब्रह्माण्ड में...

हमारा मिलना ऐसा था जैसे आरती कि थाली में जलता हुआ कपूर... पवित्र... सुगन्धित... किन्तु क्षणिक... तुम मेरे अंधेरों में रौशनी की तरह आये... तुम्हारी उँगली थाम उम्र की  एक पथरीली पगडंडी पार करी... ठीक वैसे ही जैसे एक नन्हा सा बच्चा किसी की उँगली थाम चलना सीखता है और अपनी ज़िन्दगी का पहला क़दम बढ़ाता है... तुमने जीने की नई वजह दी... एक लम्बे अरसे बाद मुझे ख़ुद से मिलवाया...

जानती हूँ तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब तुम्हें आवाज़ दे रही हैं... मैं भी क्या करूँ... तुम्हारी आदत हो गयी है... तुम्हारी उँगली थामे बिना चलना शायद वैसा ही हो जैसा उस नन्हें बच्चे का होता है... थोड़ा डरूँगी... कुछ पल डगमगाऊँगी... शायद गिरूँ भी... पर तुम मत डरना... थोड़ा समय लगेगा पर संभल जाऊँगी... तुम जाओ... अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करो... उम्र के किसी पड़ाव पर गर फ़ुर्सत मिले कभी और याद आये मेरी या मिलने का मन करे... तो चले आना... मैं यहीं मिलूँगी... यहीं, जहाँ हम पहली बार मिले थे...

हो सके तो बस इतना करना कि भरोसा नहीं टूटने देना... विश्वास रखना... मैं यहीं मिलूँगी... तुम्हारा इंतज़ार करते... सुनो... पहचान तो लोगे ना ?

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एक कहानी याद आ रही है... बहुत जल्दी ना हो तो सुनते जाओ.. गुलज़ार साब कि आवाज़ में -




[ ये खेल आख़िर किसलिये ? मन नहीं ऊबता ? कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम अपनी ज़िन्दगी में... खेल खेला है... खेलते रहे हैं... नतीजा फिर वही... एक जैसा... क्या बाक़ी रहता है ? हासिल क्या होता है ? ज़िन्दगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क़ है ना ? आख़िर किसलिये ?

एक कहानी है... सुनाऊँ ? कहानी दो प्रेमियों की... दोनों जवान, ख़ूबसूरत, अक्लमंद... एक का दूसरे से बेपनाह प्यार... कसमों में बंधे हुए कि जन्म-जन्मान्तर में एक दूसरे का साथ निभायेंगे... मगर फिर अलग हो गये... नौजवान फ़ौज में चला गया... गया तो लौट कर नहीं आया... लापता हो गया.. लोगों ने कहा मर गया... मगर महबूबा अटल थी... बोली... वो लौटेगा ज़रूर... लौटेगा... पूरे चालीस सालों तक साधना में रही... वफ़ादारी से इंतज़ार किया... आख़िर एक रोज़ महबूब का संदेसा मिला... मैं आ गया हूँ, शिवान वाले मंदिर में मिलो... कहने लगी, देखा.. मैंने कहाँ था ना... दौड़ कर गई... मंदिर पहुंची... पर प्रेमी ना दिखाई दिया... एक आदमी बैठा था... एकदम बूढ़ा... पोपला मुँह.. टांट गंजी... आँखों में मैल... बोली.. यहाँ तो कोई नहीं... ज़रूर किसी ने शरारत की है... मायूस हो कर घर लौटी... वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया... कोई नहीं आया... चिड़िया का बच्चा तक नहीं.. हाँ, एक बुढ़िया आयी थी... कमर से झुकी हुई.. बाल उलझे हुए.. आँख में मोतिया-बिंध... मंदिर में झाँक कर देखा... कुछ बुड़बुड़ाई... और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गई... निराश हो गया बेचारा... बोला... उसने इंतज़ार नहीं किया... गृहस्ती रचाकर मुझे भूल गई... संदेसा भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आयी... किसलिये ? ... आख़िर किसलिये ये खेल ? ... मन नहीं ऊबता ? -- गुलज़ार ]
 

Friday, July 8, 2011

नम यादें... सीला सा मन !



धुन केनी जी के एल्बम ब्रेथलेस से - "इन द रेन"




( आओ आज फिर एक सपना देखते हैं... तुम हो... मैं हूँ... तारों भरा आसमां हो... बादलों में छुप के चाँद भी झाँकता हो... लजाया सा... कुछ कुछ शरमाया सा... पार्श्व में ये धुन हो मद्धम मद्धम बजती हुई... तुम्हारे गले में बाहें डाले, काँधे पे सर रखे, आँखें मूंदे... सारी उम्र थिरकती रहूँ... बस यूँ ही !!! )

Wednesday, June 29, 2011

तमाम मौसम टपक रहा है... पलक पलक रिस रही है ये क़ायनात सारी...


बारिशें सिर्फ़ बारिशें कहाँ होती हैं... वो अक्सर हमारी कैफ़ियत का आइना होती हैं... हम ख़ुश होते हैं तो वो भी ख़ुशी से नाचती झूमती लगती हैं... हम उदास होते हैं तो वो भी कुछ उदास सी बरसती हैं.. गोया बादल का भी दिल भर आता है कभी और फफ़क के रो पड़ता है वो छोटे बच्चों कि मानिंद... कहीं किसी ज़रूरी काम से जाना हो और बारिश रुकने का नाम ना ले तो कैसी खीज सी उठती है... दिल करता है डांट दें उसे ज़ोर से कि कोई और काम नहीं है क्या.. जाओ जा के कहीं और बरसो... और दिल ख़ुश होता है तो बरबस ही गुनगुनाने लगते हैं "फिर से आइयो बदरा बिदेसी तेरे पंखों पे मोती जड़ूँगी..."

जब हम किसी के प्रेम में होते हैं तो उसके साथ बीते हुए लम्हों की वो बे-हिसाब यादें भी बरसती हैं बारिश में... हम दोनों बाहें फैला के ख़ुशी से लिपट जाते हैं उन रिमझिम बरसती बूंदों से और वो भी प्यार से चूम के हमें गले लगा लेती हैं जैसे सिर्फ़ हमारे लिये बरस रही हों... हमें ख़ुश करने के लिये...

बरसात के इस मौसम से जाने कैसा रिश्ता है... बचपन से ही... जब काग़ज़ की कश्तियाँ तैराया करते थे घर के बाहर भर गये मटमैले बरसाती पानी में.. और दूर तलक उसे तैरते हुए जाते देखते थे... कोई डूब जाती ज़रा दूर जा के तो दिल कैसे भर आता था जैसे काग़ज़ की नहीं सच की नाव हो... "प्लीज़ भगवान जी! ये बारिश मत रोकना आज... इसे और तेज़ कर दो..." सुबह सुबह स्कूल के टाइम पर करी हुई ये मासूम इल्तिजा आज भी याद आती है... और वो "रेनी डे" की तमाम छुट्टियाँ भी, जब भगवान जी को हम बच्चों पे तरस आ जाया करता था और सारा दिन बस धमा-चौकड़ी करते और काग़ज़ की नाव तैराते बीतता था...

कॉलेज के दिनों को याद करें तो यूनीवर्सिटी की कैंटीन, चाय-पकौड़ी, दोस्त और अनगिनत गप्पें... सारा-सारा दिन... रेन कोट होते हुए भी बारिश में भीगते हुए घर आना... मम्मी का डांटना... और हमारा मुस्कुरा के बस इतना ही कहना कि अब तो भीग ही लिये...

और एक आज का समय है... ऑफिस के कमरे में बैठे हुए कब सुबह से शाम हो जाती है पता ही नहीं चलता... बारिशों का पता अब अक्सर घर लौटते वक़्त गीली सड़कों से लगता है... जाने कब बादल आते हैं और बरस के चले भी जाते हैं... शायद आवाज़ लगाते होंगे आज भी... पर ऑफिस की दीवारों को भेद के अन्दर तक नहीं पहुँचती अब उनकी आवाज़... ना ही अब खिड़कियों पे बूंदों से वो संदेसे लिख के जाती हैं कि बाहर आ जाओ मिल के भीगते हैं... उफ़... "छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई... ना जाने क्यूँ दिल भर गया... ना जाने क्यूँ आँख भर गई..."

बारिश के इन मुख्तलिफ़ रंगों को गुलज़ार साब के साथ-साथ और बहुत से शायरों ने बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ अपनी नज़्मों में क़ैद करा है... तो बरसात के इस मौसम में उछाल रही हूँ बारिश की कुछ बूँदें आपकी ओर भी... अपनी कैफियत के हिसाब से कैच कर लीजिये और हो जाइये सराबोर बारिश के इन तमाम रंगों में...



बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला
सब बजने लगते हैं

तंग गली में जाते-जाते,
साइकिल का पहिया पानी की कुल्लियाँ करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं क़द भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूब के चलता है

खुश्क था तो रस्ते में टिक टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप टप चलते हैं !

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पानी का पेड़ है बारिश
जो पहाड़ों पे उगा करता है
शाखें बहती हैं
उमड़ती हुई बलखाती हुई
बर्फ़ के बीज गिरा करते हैं
झरने पकते हैं तो झुमकों की तरह
बोलने लगते हैं गुलिस्तानों पर
बेलें गिरती हैं छतों से...

मौसमी पेड़ है
मौसम में उगा करता है !



कार का इंजन बन्द कर के
और शीशे चढ़ा के बारिश में
घने-घने पेड़ों से ढंकी "सेंट पॉल रोड" पर
आँखें मींच के बैठे रहो और कार की छत पर
ताल सुनो तब बारिश की !

गीले बदन कुछ हवा के झोंके
पेड़ों कि शाखों पर चलते दिखते हैं
शीशे पे फिसलते पानी की तहरीर में उँगलियाँ चलती हैं
कुछ ख़त, कुछ सतरें याद आती हैं
मॉनसून की सिम्फ़नी में !

-- गुलज़ार

गुलज़ार साब की आवाज़ में बारिश के कुछ और रंग -


इंदिरा वर्मा जी की आवाज़ में "पिछली बरसात का मौसम तो अजब था जानां.."

[ प्रिया की "स्पेशल रिक्वेस्ट" पर नज़्म के बोल जोड़ रही हूँ पोस्ट में :-) ]

पिछली बरसात का मौसम तो अजब था जानां
शाख़ दर शाख़ चमकती थी सुनहरी किरणें
भीगे सूरज से सराबोर थी तजदीद-ए-वफ़ा
और बादल से बरसती थी मोहब्बत कि घटा
रूह में रूह का एहसास हुआ करता था
पैराहन फूल कि मानिंद खिला जाता था
दिल का अरमान फिज़ाओं कि मधुर दुनिया में
ऊँचे पेड़ों कि बुलंदी से गुज़र जाता था
जाने वो किसका था एहसान सर-ए-इश्क़-ए-नियाज़
छनछनाती हुई बूंदों में छुपा था सरगम
शोर करती हुई चलती थीं हवाएँ हरदम
बर्क चमके तो बदलता था फिज़ा का नक्शा
दोनों हांथों से छुपाती थी मैं अपना चेहरा
मुझको तन्हाई में बरसात डरा देती थी
बेसबब ख़्वाब के पहलू में सुला देती थी
अबके जब आये रुपहला सा सुहाना मौसम
ख़्वाब के साथ हक़ीक़त में उतर जाना तुम
ऐसा चेहरे पे मोहब्बत का सजाना गाज़ा
बूँद बारिश कि जो ठहरे तो बने इक तारा
तन्हां तन्हां ना रहे दिल मेरा
जानां जानां...

-- इंदिरा वर्मा



जाते जाते बारिश का एक रंग ये भी... ये बारिशें बहुत मुबारक़ हों आप सब को !


Thursday, June 16, 2011

तेरी ख़ामोशी के सुर...


बचपन में पढ़ा था "एनर्जी" के बारे में
ना तो उसे बनाया जा सकता है
ना ही ख़त्म किया जा सकता है
सिर्फ़ उसका रूप बदला जा सकता है

वैज्ञानिकों ने ये साबित भी कर दिया
युगों पहले कृष्ण के दिये गीता उपदेश
अब तलक इस ब्रह्माण्ड में घूम रहे हैं
और "बीटल्स" का संगीत भी...

"साउंड एनर्जी" का तो समझ आता है
पर तुम्हारी ख़ामोशी के सुर कैसे गूंजा करते हैं
यूँ अविराम... अविरल... हर पल...
मेरी धड़कन में...

किस सप्तक के सुर हैं ये
कि कोई और नहीं सुन पाता इन्हें
तुम्हारे दिल से निकलते हैं
और मेरे दिल को सुनाई देते हैं बस

तुमसे मीलों दूर बैठे हुए भी
मुझ तक पहुँचते कैसे हैं ये...
इस मीलों लम्बे निर्वात में
कौन है इन सुरों का संवाहक ?

हंसो नहीं... बताओ ना प्लीज़
देखो ना
आज भी मेरी फ़िज़िक्स
बेहद कमज़ोर है...

-- ऋचा



बाँसुरी पर पं. हरी प्रसाद चौरसिया, संतूर पर पं. शिव कुमार शर्मा और गिटार पर पं. ब्रिज भूषण काबरा
राग : पहाड़ी, ताल : कहरवा
अल्बम : कॉल ऑफ़ दा वैली (1967)

Saturday, May 14, 2011

चलना अकेले है जो सबको यहाँ, चलें साथ-साथ परछाइयाँ भी क्यूँ...


[ ये लड़की यही कोई ८-१० साल पहले स्केच करी थी हमने...
एक पुरानी स्केच बुक में मिला ये स्केच तो यहाँ सहेज दिया... ]


ये जो मन है ना उलझनों का वेयर-हॉउस है... ऊपर से किसी नीली झील के जैसे शान्त दिखने वाले मन कि हर तह में ढेरों उलझनें छुपी रहती हैं... हमेशा... हर वक़्त... पढ़ाई-लिखाई, कैरियर, नौकरी, प्यार, मोहब्बत, दोस्ती से ले कर आपके घर-परिवार, शादी, समाज, सामाजिक मान्यताओं तक की... यही नहीं आपके स्वभाव, बर्ताव, लोगों के आपके प्रति नज़रिए और समय के साथ बदलते उनके और आपके रवैये तक की... समझ नहीं आता क्या सही है और क्या ग़लत... कब क्या करना चाहिये क्या नहीं... सच क्या है वो जो दिखता है या वो जो जिसपर हम यकीन करते हैं... सवाल ढेरों हैं और उलझनें अनंत...

आख़िर कितनी उलझनों को सुलझाएँ... और कब तक... एक की गिरहें किसी तरह खोलो तो दूसरी गाँठ लगा के बैठ जाती है... उफ़... तंग आ गये हैं अब तो... कभी कभी तो दिल करता है इन सारी उलझनों की पोटली बनायें और दूर कहीं छोड़ आयें किसी जंगल में... जहाँ से ये सब फिर कभी वापस ना आ सकें.. काश कि ऐसा कर पाते... मन कितना हल्का हो जाता ना... ये जानवर कितने अच्छे होते हैं... किसी तरह कि कोई उलझन नहीं... जब जी चाहा खाया... जहाँ जी चाहा सोये... जिसके साथ दिल किया जंगल में दौड़ लगा ली...

ये ज़िन्दगी कभी कभी कितनी ठहरी हुई लगती है ना... फिर भी साँसें चलती रहती हैं... वक़्त भी कहाँ रुकता है... वो तो बहता रहता है अपनी ही रौ में और हम कहीं पीछे, बहुत पीछे छूट जाते हैं... अपनी उलझनों के साथ... अकेले...

कभी किसी छोटे बच्चे के हाथ से अपनी उंगली छुड़ाई है आपने ? कैसे अपनी नन्हीं नन्हीं आँखों में उम्मीद के बड़े बड़े आँसू भरे आपको दूर तलक जाते हुए देखता है... आपको पता होता है ये आप सही नहीं कर रहे... आप ख़ुश भी नहीं होते... फिर भी आप चलते रहते हैं... एक टीस सी उठती है दिल में और आप खुद को किसी गुनहगार से कम नहीं समझते.. कैसे इतने कठोर हो पाते हैं आप उस पल कि उस छोटे से बच्चे के आँसू भी आपको रोक नहीं पाते... इतने कठोर ? बिल्कुल पत्थर के जैसे... एकदम खुदगर्ज़... ऐसे तो नहीं हैं ना आप... फिर कैसे और क्यूँ आप ऐसे बन जाते हैं... वो भी एक रोते हुए बच्चे के सामने...

इन उलझनों में कितना वेग होता है... बिलकुल किसी भंवर कि तरह... एक बार इसमें फंस गये तो निकलने का कोई रास्ता नहीं... कुछ ऐसी ही तो होती हैं यादें भी... ना समय देखती हैं, ना जगह, ना माहौल... बस वक़्त बे-वक़्त आपको आ के घेर लेती हैं... कितना मुश्किल हो जाता है उनसे उंगली छुड़ा के आगे बढ़ना... ना चाहते हुए भी सब भूल जाना... या कम से कम भूलने का नाटक करना... कितना दर्द होता है... वैसी ही टीस उठती है... और आप एक बार फिर गुनहगार जैसा महसूस करते हैं... ख़ुद को और ज़माने को धोखा देते हुए...


बादलों कि ओट में चाँद छुपा क्यूँ
हौले से वो लेता अंगड़ाइयां है क्यूँ
मुखड़े पे लिखी-लिखी है उलझन
जानता है आसमां वो तन्हां है क्यूँ

खिले-खिले चेहरे हैं सूने से नयन
द्वार पे रंगोली है ख़ाली-ख़ाली मन
चलना अकेले है जो सबको यहाँ
चलें साथ-साथ परछाइयाँ भी क्यूँ

चूरा-चूरा है अँधेरा हवा सन-नन
हाथ-हाथ ढूंढें हाथ, हाथ कि छुअन
दूर-दूर दिल और पास है भरम
हँसते-हँसते लगता है क्यूँ हँसे थे हम
जी में आता है रो-रो सुजा लें आँखें हम
रेत के वो पाँव जाने कहाँ खो गये
रूठी-रूठी हुई पुरवाइयाँ हैं क्यूँ

बादलों कि ओट में चाँद छुपा क्यूँ...

-- आसरिफ़ दहलवी




Monday, May 2, 2011

Love just happens... No conditions applied !



अन्कन्डिशनल लव - बेशर्त प्यार... आज तक प्यार के बारे में जितना कुछ सुना, समझा, पढ़ा उससे हमेशा यही जाना कि प्यार में शर्तें नहीं होती और बिना किसी शर्त का प्यार ही सच्चा प्यार है, "ट्रू लव" ... क़िस्से, कहानियों और परीकथाओं जैसा... वो प्यार जो आजकल की दुनिया में मिलना नामुमकिन सी बात लगती है... पर असल में देखिये तो क्या प्यार वाकई ऐसा होता है ?

अच्छा एक बात बताइये... क्या हम इस बात का अनुमान पहले से लगा सकते हैं कि हमें प्यार होने वाला है ? क्या प्यार करने से पहले हम ये शर्त रख पाते हैं कि हमें कब, किससे, कहाँ और कैसे प्यार होगा ? क्या हम प्यार के होने ना होने को काबू में कर पायें हैं कभी ? नहीं ना ?

प्यार तो बस हो जाता है... बिना हमारे कुछ करे.. बिना हमारे कुछ सोचे...

तो फिर प्यार में ये शर्तें आती कब हैं ? और क्या वाकई ये शर्तें होती हैं... शायद नहीं... ये तो बस छोटी छोटी अपेक्षाएं होती हैं... उस इन्सान से जिसे हम दिल कि गहराइयों से प्यार करते हैं... आख़िर हम उनसे क्या चाहते हैं... कोई बड़ा ख़ज़ाना तो नहीं मांगते कभी... बस छोटी छोटी चंद अपेक्षाएं, इच्छाएं होती हैं उनसे और वो ही पूरी हो जाएँ तो हमें किसी बड़े ख़ज़ाने मिलने जैसी ख़ुशी दे जाती हैं... हम बस इतना ही तो चाहते हैं ना कि अगर हम उन्हें फ़ोन करें तो बदले में वो भी हमें कभी कॉल कर लें... हम उन्हें दस चिट्ठियाँ लिखें तो कम से कम वो भी एक चिट्ठी लिख दे हमें... हम उनका ख़्याल रखते हैं तो वो भी हमारा ख़्याल रखें... हम उनकी परवाह करते हैं और बदले में यही उम्मीद ख़ुद के लिये भी रखते हैं... हम प्यार देते हैं और चाहते हैं कि हमें भी वो प्यार मिले... तो इसमें ग़लत क्या है ?

झूठ बोलते हैं वो लोग जो कहते हैं उन्हें किसी से कोई अपेक्षा नहीं... या उन्होंने उम्मीदें रखना छोड़ दिया है... ये तो इन्सानी फ़ितरत है... हमारे स्वभाव का हिस्सा है... ये भला कैसे बदल सकता है... हम जैसा महसूस करते हैं उसे झुठला तो नहीं सकते... ना ही अपनी संवेदनाओं को दबा सकते हैं... हम किसी से प्यार पाना तो चाह सकते हैं पर प्यार ना पाना भला कैसे चाह सकते हैं...

अन्कन्डिशनल लव का मतलब ये नहीं होता कि हम जिसे प्यार करें उससे बदले में प्यार ना चाहें या जिसका ख़्याल रखें, परवाह करें, जिसकी कद्र करें उससे बदले में उस सब की उम्मीद ना रखें... क्यूँकि ऐसा करना हमारे बस में नहीं है... अन्कन्डिशनल लव बिना शर्तों का प्यार नहीं होता, क्यूँकि हम कोई भगवान नहीं हैं, हम सब आम इन्सान हैं और हम अपनी भावनाओं और उम्मीदों को नियंत्रित नहीं सकते... उम्मीद कि लौ तो हम तब भी जलाए रखते हैं, हम तब भी ये चाहते हैं कि सब ठीक हो जाये जब हमें ये पता होता है कि वास्तव में कुछ भी ठीक होने वाला नहीं है...

अन्कन्डिशनल लव का मतलब दरअसल ये तमाम उम्मीद और अपेक्षाएं रखने के बावजूद उनके साथ समझौता करना होता है, उनके साथ सामंजस्य बनाना होता है... उस इन्सान के लिये... जिसे हम प्यार करते हैं...

अन्कन्डिशनल लव अपेक्षाएं रखने के साथ साथ ये स्वीकार करना भी होता है कि ज़रूरी नहीं वो सारी अपेक्षाएं पूरी हों... पूरी होती हैं तो उससे अच्छा कुछ भी नहीं पर अगर पूरी नहीं होतीं तो भी बुरा मत मानिये... क्यूँकि अंत में हमारे लिये इन अपेक्षाओं के पूरा होने से ज़्यादा उस इन्सान से प्यार करना मायने रखता है... और अगर आप किस्मतवाले हैं तो आपको भी बदले में वो प्यार ज़रूर मिलता है...

शायद उस तरह से नहीं जिस तरह से आप चाहते थे पर हाँ जिस भी तरह से वो इन्सान आपको प्यार दे सकता है, पूरे दिल से...

और फिर आप प्यार करते हैं - सिर्फ़ प्यार - बिना शर्तों का - अन्कन्डिशनल लव !

[ ऐसा ही एक आर्टिकल हाल ही में एक इंग्लिश मैग्ज़ीन में पढ़ा था... उसे ही अपने शब्दों में पेश करने कि एक छोटी सी कोशिश है बस... ]

मैं
दिये की लौ सी जलती रहूँगी
निरंतर
तुम्हारे लिये

बिना किसी चाह
अपने प्यार से सदा
रौशन करती रहूँगी
ज़िन्दगी तुम्हारी

तुम बस इतना करना
जब मद्धम पड़ने लगे कभी
रौशनी मेरी
या बुझने लगूँ मैं

तो थाम लेना मेरी लौ हाथों के घेरे से
और अपने प्यार का घी डाल देना
थोड़ा सा
और मैं फिर जल उठूँगी

एक बार फिर रौशन करने
ज़िन्दगी तुम्हारी
और जलती रहूँगी
निरंतर
यूँ ही
तुम्हारे लिये...

-- ऋचा




जाने क्यूँ आज ये गाना बड़ी शिद्दत के साथ याद आ रहा है... सोचा आप लोगों को भी सुनवा दूँ... कैनेडियन सिंगर शनाया ट्वेन का गाया हुआ - "यू आर स्टिल द वन"...


Thursday, March 10, 2011

पश्मीना सी...




कल रात अचानक फिर मिली
चॉकलेट के रैपर में लिपटी
भूली बिसरी सी वो
मखमली शाम

उन लम्हों के लम्स महसूसते हुए
मन रेशम रेशम हो गया
और उनमे खोयी हुई मैं
पश्मीना सी...

वो शाम जब सूरज पिघल के
मेरे दुपट्टे में भर आया था
और तुमने हथेली से ढक दी थीं
चाँद की आँखें

तुम्हें शायद पता नहीं
उस शाम
तुम्हारी आँखों की चमक भी
कितनी रेशमी थी !

तुम्हारी
उस मुस्कराहट का टिप्पा
कल फिर महसूस हुआ
पेशानी पर...

-- ऋचा



Saturday, March 5, 2011

ओ दिल बंजारे... जा रे...




जाने क्यूँ ये दिल बंजारों के जैसा भटक रहा था पिछले कुछ दिनों से... यहाँ वहाँ.. वहाँ यहाँ... पहाड़... झरने... जंगल... बादल... नदी... बारिश... कहीं भी चैन नहीं था... जाने क्या ढूंढ़ रहा था... न जाने किसकी तलाश थी... जानती थी ये भटकाव अच्छा नहीं है... पर दिल था कि कुछ सुनने मानने को ही तैयार नहीं था... ज़िद्दी हो गया है आजकल... लगता है हम पर ही गया है :)

ख़ैर... आज जनाब को जाने कहाँ से सेमल और पलाश के फूल याद आ गये... और बस हमारी उँगली पकड़ के ज़िद शुरू... चलो न किसी जंगल में... सेमल और पलाश के फूल चुन के लायेंगे... ढेर सारे... सुर्ख़... दहकते हुए से... कितने ख़ूबसूरत लगते हैं न... एक अलग सा तेज... एक अलग सी आभा लिये हुए... जैसे लाल जोड़े में सजी कोई दुल्हन खड़ी अपने प्रियतम का इंतज़ार कर रही हो...

हाँ तो ये जनाब कहाँ मानने वाले... ज़िद पे अड़ गये तो अड़ गये... हमने समझाया भी यहाँ कहाँ रखा है जंगल और ये पेड़... पर नहीं, उन्हें तो फूल चाहिये... तो भाई उनका हाथ थाम चल दिये हम भी... हम, वो और हमारा कैमरा... ;)

कंक्रीट के इस जंगल में अभी भी कभी कभार ये भूले बिसरे पेड़ देखने को मिल जाते हैं... सो हमें भी मिल गया एक सेमल का पेड़... श्रृंगार रस से ओत-प्रोत किसी कविता सा... और बस दिल रीझ सा गया उसकी ये सुर्ख़ सुनहरी धज देख कर... बंजारा दिल बाँवरा हो गया... ना ट्रैफिक की परवाह... ना आते जाते लोगों की और ना अचरज से देखती उनकी निगाहों की... कि आख़िर इस लड़की को हो क्या गया है... बीच सड़क कैमरा ले कर सेमल कि फोटो लेने में ऐसी मगन है कि कुछ ख़्याल ही नहीं दीन दुनिया का... अब क्या किया जाये... "कुछ तो लोग कहेंगे... लोगों का काम है कहना..." तो उन्हें कहने दिया और हम मगन रहे... ढेर सारी फोटो लीं... ज़मीं पर बिछी सुर्ख़ चादर से कुछ फूल उठाये और वापस चल दिये... होंठों पे मुस्कान और दिल में संतुष्टि ले कर... जैसे जग जीत आये हों :)

पर ये ज़िद्दी दिल वापस आने को तैयार ही नहीं था... फिर क्या था कर दी एक शाम इस पागल ज़िद्दी दिल के नाम :) ... पास ही एक पार्क था... चल दिये उधर... कुछ देर टहले और फिर एक लोहे की बेंच पे बैठ के शाम की ठंडी हवा और पेड़ पौधों का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अपने घोंसलों में लौटते कुछ पंछियों का झुण्ड वहाँ से गुज़रा और दिल फिर उड़ चला उन के साथ "पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में..." गाते हुए...

सच कहूँ तो उसे रोकने का मन नहीं हुआ... आज कितने दिनों बाद इतना ख़ुश था... बच्चों के जैसे निश्छलता से खिलखिला रहा था... थक गया था शायद ख़ुद को समझाते बहलाते... ये सही है ये ग़लत... ये करो ये नहीं... लोग क्या कहेंगे... कोई बच्ची हो क्या तुम... उफ़... उफ़... उफ़... बस यार ! कब तक आख़िर दुनिया की, दुनियादारी की, सही-ग़लत की परवाह करे... आज बिना किसी की परवाह किये उड़ रहा था... आज़ाद... बेफिक्र...


ओ दिल बंजारे... जा रे... खोल डोरियाँ सब खोल दे... !!!




Wednesday, March 2, 2011

अनवरत



बड़ा उदास सा मौसम था
पिछले कुछ दिनों से
कुछ धुंधला, थोड़ा नीरस

कल ख़ाली बैठी सोच रही थी
ऐसा क्या करूँ
कि ये मौसम फिर ख़िल उठे

उदासी की मिट्टी को
फूलों के रंग से गूँधा
कुछ बूँदें ख़्वाबों की ख़ुशबू भी डाली

फिर उस सौंधी सी मिट्टी से
दो मुस्कान बनायीं, और
उम्मीद की धूप में सूखने को रख दिया

बड़ी प्यारी लग रही हैं, सच्ची !
आज आओगे तो एक तुम्हें दूँगी
और दूसरी मुस्कान मैं पहनूँगी

ये मौसम अब कभी उदास न होगा
ये मुस्कान सदा खिली रहेगी
जीवन की हर ऋतु में...

-- ऋचा

Thursday, February 3, 2011

तिरसठवाँ चाँद !!


गहरे सिलेटी आसमां पर
चाँदनी की हल्की पीली शॉल ओढ़े
एक ज़र्द सा चाँद आया था आज

बहुत कमज़ोर दिख रहा था
कुछ उदास, थोड़ा ग़मगीन
शायद अकेलेपन का दर्द था

इतने तारे तो होते हैं
हर पल उसके आस-पास
फिर क्यूँ इतना तन्हाँ था

सारी दुनिया थकती नहीं
उसकी सुन्दरता की उपमाएं देते
उसे तो ख़ुश होना चाहिये, पर नहीं था

उसे यूँ देख कर तकलीफ़ हुई
पहली बार पूरनमासी का चाँद
मुस्कान की जगह उदासी दे गया

शायद तन्हाई का दर्द समझती हूँ
जी चाहा हाथ बढ़ा के थाम लूँ उसे
भर के आग़ोश में चूम लूँ उदास आँखें

ये ख़ुदा भी ना अब पहले सा नहीं रहा
इन्सानी फ़ितरत सीख गया है
पक्षपात करने लगा है

ज्यूपिटर पसंद है तो
उसे तिरसठ चाँद दे दिये
और पृथ्वी को बस एक

वो तिरसठवाँ चाँद जो वहाँ अकेला है
इस धरती को दे देता
तो हमारा चाँद यूँ तन्हा ना होता आज...

-- ऋचा

Thursday, January 20, 2011

गाँव मेरा मुझे याद आता रहा...


... उन दिनों सुबहें कितनी जल्दी हुआ करतीं थीं... शामें भी कुछ जल्दी घिर आया करती थीं तब... फूलों की महक भीनी हुआ करती थी और तितलियाँ रंगीन... और इन्द्रधनुष के रंग थोड़े चमकीले, थोड़े गीले हुआ करते थे... आँखों में तैरते ख़्वाबों जैसे... सुबह होते ही चीं-चीं करती गौरैया छत पर आ जाया करतीं थीं, दाना चुगने... उस प्यारी सी आवाज़ से जब नींदें टूटा करती थीं तो बरबस ही एक मुस्कुराहट तैर जाया करती थी होंठों पर... यूँ लगता था जैसे किसी ने बड़े प्यार से गालों को चूम के, बालों पर हौले से हाथ फेरते हुए बोला हो "उठो... देखो कितनी प्यारी सुबह है... इसका स्वागत करो..." ... सच! कितने प्यारे दिन थे वो... बचपन से मासूम... रूहानी एहसास भरे...

कोहरे और धुँध को बींधती हुई धूप जब नीम के पेड़ से छन के आया करती थी छज्जे में तो कितनी मीठी हुआ करती थी... गन्ने के ताज़े ताज़े रस जैसी... ख़ुशबूदार और एकदम मुलायम... दादी की नर्म गोद सी... खुले आँगन में जब दादी अलाव जलाया करती थीं तो सर्दी कैसे फ़ौरन ग़ायब हो जाया करती थी... अब बन्द कमरों में घंटो हीटर के सामने बैठ कर भी नहीं जाती... उस अलाव में कैसे हम सब भाई बहन अपने अपने आलू और शकरकंद छुपा दिया करते थे और बाद में लड़ते थे "तुमने मेरा वाला ले लिये वापस करो..." कितनी मीठी लड़ाई हुआ करती थी... वो मिठास कहाँ मिलती है अब माइक्रोवेव में रोस्टेड आलू और शकरकंद में...

कभी सरसों के पीले पीले खेत में दोनों बाहें फैला के नंगे पैर दौड़े हैं आप ? हम्म... यूँ लगता है मानो पूरी क़ायनात सिमट आयी हो आपके आग़ोश में... कभी महसूस करी है सरसों के फूलों की वो तीखी गंध ? क्या है कोई इम्पोर्टेड परफ्यूम जो उसकी बराबरी कर सकता है कभी ? शायद नहीं... आज भी याद आती हैं गाँव में बीती वो गर्मियों की छुट्टियाँ... सुबह आँख खुलते ही सबसे पहले वो आम के बाग़ में जा के खट्टी-खट्टी कैरियों का नाश्ता करना और फिर घंटों ट्यूब वेल के पानी में खेलना... बचपन और गाँव... दोनों अपने आप में ही ख़ूबसूरत और साथ मिल जाएँ तो यूँ समझिये दुनिया में उससे ज़्यादा ख़ूबसूरत और कुछ भी नहीं...

जाने क्यूँ आज दिल यादों की उन ख़ूबसूरत सी गलियों में फिर भटक रहा है... आज जब कुछ भी पहले सा नहीं है... कुछ भी पहले सा नहीं हो सकता... जी कर रहा है एक बार फिर उस बचपन में, उस गाँव में लौट जाएँ... मिट्टी के चूल्हे में पकी वो सौंधी सी रोटी जो धुएँ की महक को आत्मसात कर के कुछ और सौंधी और मीठी हो जाया करती थी... वो हँसी ठिठोली... वो देवी माँ का मंदिर, वो कमल के फूलों से भरा तालाब... वो गुलमोहर, वो नीम, वो नीम की डाली पे पड़ा लकड़ी के तख्ते वाला झूला... उस पर बैठे हम सब भाई बहन... पींग बढ़ाते हुए... शोर मचाते हुए.. "और तेज़... और तेज़... और तेज़..."

गाँव के इस तेज़ी से बदलते परिवेश पर हाल ही में अजेय जी की एक कविता पढ़ी कविताकोश पर... दिल को छू गई... आप भी पढ़िये...

मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।
गुज़र गई है एक धूल उड़ाती सड़क
गाँव के ऊपर से
खेतों के बीचों बीच
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
लाद ले जाती हैं शहर की मंडी तक
नकदी फसल के साथ
मेरे गाँव के सपने
छोटी छोटी खुशियाँ --

मिट्टी की छतों से
उड़ा ले गया है हेलीकॉप्टर
एक टुकड़ा नरम धूप
सर्दियों की चहल पहल
ऊन कातती औरतें
चिलम लगाते बूढ़े
"छोलो" की मंडलियाँ
और विष-अमृत खेलते बच्चे।

टीन की तिरछी छतों से फिसल कर
ज़िन्दगी
सिमेंटेड मकानों के भीतर कोज़ी हिस्सों में सिमट गई है
रंगीन टी० वी० के
नकली किरदारों में जीती
बनावटी दु:खों में कुढ़ती --
"कहाँ फँस गए हम!
कैसे निकल भागे पहाड़ों के उस पार?"

आए दिन फटती हैं खोपड़ियाँ जवान लड़को की
बहुत दिन हुए मैंने पूरे गाँव को
एक जगह/एक मुद्दे पर इकट्ठा नहीं देखा।
गाँव आकर भूल गया हूँ अपना मकसद
अपने सपनों पर शर्म आती है
मेरे सपनों से बहुत आगे निकल गया है गाँव
बहुत ज्यादा तरक्की हो गई है
मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।

-- अजेय


तरक्क़ी.. सुख-सुविधायें... ऐश-ओ-आराम... आगे बढ़ना... किसे पसंद नहीं होता... पर इस सब के बदले जो क़ीमत चुकानी पढ़ती है... अपने गाँव से, अपने घर से, अपने अपनों से बिछड़ने की... उस टीस को जसवंत सिंह जी की गायी हुई इस ग़ज़ल में बख़ूबी महसूस करा जा सकता है... "वक़्त का ये परिंदा रुका है कहाँ..."


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