बहुत
ही ख़ुशनुमा सुबह थी... सारी रात हुई बारिश के बाद उजली, धुली हुई सी
सुबह... हवा में हल्की नमी और बूंदों की ख़ुश्बू... पेड़, पौधे, पंछी सब
ख़ुशी से चहचहाते हुए... एक ऐसी सुबह जिससे बाहें फैला के गले मिलने का दिल
करे... ऐसी सुबह जो आपको आपके शहर से फिर प्यार करने पर मजबूर कर दे... और
फिर हमारा शहर तो यूँ भी हमारी जान है... किसी शायर ने क्या ख़ूब कहा है
हमारे लखनऊ के बारे में...
ये शहर रहा होगा शाइस्ता मिज़ाजों का इस शहर के मलबों से गुलदान निकलते हैं
हुसैनाबाद दरवाज़ा
तो
सुबह सुबह हम भी चल दिये अपने शहर से मिलने... जैसा की पिछली एक पोस्ट में बताया था बड़े दिनों से मन हो रहा था पुराने लखनऊ घूमने का... तो एक रात
पहले ही प्लान फाइनल हुआ और सुबह सवेरे ही हम निकल पड़े... हम, भाई और
उसके दो दोस्त... क़रीब सात बजे हम घर से निकले... और सबसे पहले पहुँचे
हुसैनाबाद बाज़ार... भाई के एक दोस्त को बहुत ज़ोर से भूख लगी थी बोला रात
में भी खाना नहीं खाया... पहले नाश्ता करेंगे फिर कहीं चलेंगे :) तो वो लोग
टूट पड़े पूड़ी सब्ज़ी पर और हमने उतनी देर में हुसैनाबाद बाज़ार की
तस्वीरें लीं... हुसैनाबाद के बारे में बताते चलें कि नवाबों ने यहाँ बहुत
सी इमारते बनवायीं जिसमें छोटा इमामबाड़ा (जहाँ हमें भी जाना था पर जा नहीं
पाये), हुसैनाबाद बाज़ार, दो ख़ूबसूरत दरवाज़े, घंटा घर और सतखंडा प्रमुख
हैं...
कुड़िया घाट
नाश्ता करने के बाद हम पहुँचे कुड़िया घाट... १९९० में इस घाट का
पुनर्निर्माण करवाया गया था... सुबह के शान्त माहौल में वहाँ गोमती नदी में
बोटिंग करना एक अनोखा अनुभव था... माना जाता है की गोमती नदी गंगा से भी
पुरानी है इसलिए इसे "आदि गंगा" भी कहा जाता है... गोमती नदी पर बना पक्का
पुल या लाल पुल जिसे हार्डिंग ब्रिज भी कहते हैं बहुत सी फिल्मों
में दिखाया गया है... अगर आप दिमाग़ पर थोड़ा सा ज़ोर डालें तो याद आएगा कि
हाल ही में आयी तन्नु वेड्स मन्नू और इशकज़ादे में भी इसे दिखाया गया है...
१९१४ में बना तकरीबन सौ साल पुराना वास्तुशिल्प की मिसाल ये पुल आज भी उसी
शान से खड़ा है और रोज़ सैकड़ों वाहन आज भी इसके ऊपर से गुज़रते हैं...
पक्का
पुल
टीले वाली मस्जिद
इसी पुल के एक सिरे पर स्थित है आलमगिरी मस्जिद जिसे हम टीले वाली
मस्जिद के नाम से भी जानते हैं... इसका निर्माण औरंगज़ेब ने १५९० में करवाया
था... इसके पास में ही बड़ा इमामबाड़ा या आसिफ़ी इमामबाड़ा (जिसके बारे में पिछली पोस्ट में भी बताया था) और रूमी दरवाज़ा हैं... बड़ा इमामबाड़ा जाना
इस बार भी रह गया... पर उसका कोई गिला नहीं क्यूँकि हमने वो देखा जो शायद
किस्मत से ही देखने को मिलता है... रूमी दरवाज़े के ऊपर से पुराने लखनऊ का
नज़ारा !!
बड़ा इमामबाड़ा और आसिफ़ी मस्जिद
रूमी दरवाज़ा
बीते दिनों में कुछ एक हादसों के चलते रूमी दरवाज़े के अंदर जाने का रास्ता लोहे
की फेंस लगा के पूरी तरह से बन्द कर दिया गया है... पर सुबह का समय था तो
सड़क पर और आसपास भीड़ भी कम थी... बस फिर क्या था हम सब कूद-फांद के पहुँच
गये दरवाज़े के अन्दर... क्या ख़ूबसूरत इमारत है... अवधी वास्तुकला का बेजोड़ नमूना... नवाबों को मानना पड़ेगा... एक से बढ़कर एक इतनी ख़ूबसूरत इमारतों की सौगात
दे कर गये हैं लखनऊ को कि दिल से बस वाह निकलती है उनके लिये !
रूमी दरवाज़े की उपरी मंज़िलें
सन १७८४ में बने इस दरवाज़े के नीचे से जाने कितनी ही बारगुज़रे
होंगे... हमेशा ख़ूबसूरत भी लगा पर इतना ख़ूबसूरत होगा असल में ये उस दिन
पता चला... क़रीब ६० फिट ऊँचे इस दरवाज़े के ऊपर बनी अष्टकोण छतरी पर
जब पहुँचे तो इतने सारे जीने चढ़ के आने की थकान एक पल में गायब हो गई...
एक ओर बहती गोमती नदी और दूसरी ओर बड़ा इमामबाड़ा... पीछे बैकड्रॉप में
दिखता हुसैनाबाद का घंटा घर, सतखंडा, हुसैनाबाद के दरवाज़े, जुमा मस्जिद और
भी जाने क्या क्या... लखनऊ बेहद ख़ूबसूरत नज़र आ रहा था वहाँ से... क़रीब एक
घंटे तक वहाँ बैठे रहे... इतनी ठंडी हवा लग रही थी की वापस जाने का मन ही
नहीं हो रहा था किसी का..
ख़ैर वहाँ से निकले तो क़रीब १०.१५ हो रहा था... अब तक हमें भी भूख लग
आयी थी थोड़ी थोड़ी और बाक़ी सब को दुबारा से :) तो हम जा पहुँचे चौक... श्री
की मशहूर लस्सी पीने और छोले भठूरे खाने... क़रीब २० मिनट के ब्रेक के बाद
हम सब की एनर्जी फिर से रीचार्ज हो गई थी... अब सोचा गया कि आगे कहाँ
जाएँ... धूप हो गई थी तो इमामबाड़ा जाने का किसी का मन नहीं हो रहा था...
फिर तय हुआ की काकोरी चलते हैं... बेहता नदी का पुल देखने...
बेहता पुल के पास बना शिव मन्दिर
क़रीब आधे घंटे बाद वहाँ पहुँचे... चारों तरफ़ आम के बाग़ों से घिरी वर्ल्ड मैंगो बेल्ट में :) यहाँ का मशहूर दशहरी आम पूरी दुनिया में निर्यात किया जाता है...
बेहता नदी का पुल और उसके पास बने शिव जी के प्राचीन मंदिर का निर्माण
१७८६-८८ में नवाब आसिफ़-उद-दौला के कार्यकाल में उनके प्रधानमंत्री टिकैत
राय ने करवाया था... अगर आपको याद हो तो फिल्म शतरंज के खिलाड़ी और शशि कपूर
द्वारा निर्देशित फिल्म जुनून के कुछ दृश्यों का फिल्मांकन भी यही हुआ है... यहाँ पास में ही वो रेल की पटरी भी है जहाँ 9 अगस्त १९२५ का मशहूर काकोरी कांड हुआ था... जिसमें राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाकउल्ला खान और उनके साथियों ने मिल कर ट्रेन लूटी थी...
मंदिर में दर्शन करने और पेड़ से आम तोड़ कर खाने के बाद हम लौटे अपने घर
की ओर और क़रीब १ बजे हमारा उस दिन का लखनऊ भ्रमण पूरा हुआ... अब अगली बार
पक्के से आप सब को इमामबाड़ा घुमाना है... जल्द ही चलते हैं फिर... ऐसी ही
किसी फ़ुर्सत वाली सुबह :)
तब तक के लिये बस इतना कहना है अपने लखनऊ के भाई बंधुओं से कि बुरा लगता है
तेज़ी से बदलती जा रही लखनऊ की फिज़ा को देख कर... सारी दुनिया जिसकी तमीज़
और तहज़ीब की कायल है, अवध की वो संस्कृति हमारी ही धरोहर है और हमें ही उसे
बनाए रखना है और सँवार कर आगे आने वाली पुश्तों तक भी पहुँचाना है... आइये
मिल कर इस संस्कृति को कायम रखते हैं जिससे आगे आने वाली पुश्तें भी शान
से कह सकें... मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं !
(ऑडियो साभार : रेडियो मिर्ची एफ एम चैनल)
कुछ और तस्वीरें --
हुसैनाबाद घंटा घर
कुड़िया घाट
गोमती नदी
रिफ्लेक्शन !
आइसोलेटेड !
माझी बगैर नैया
लाल पुल के नीचे से गुज़रते हुए
लाल पुल
बड़े इमामबाड़े का मुख्य दरवाज़ा
रूमी दरवाज़े से दिखती गोमती नदी
हुसैनाबाद दरवाज़ा, दाहिनी ओर सतखंडा और घंटा घर
बड़े इमामबाड़े में स्थित आसिफ़ी मस्जिद
बड़े इमामबाड़े का भीतरी दरवाज़ा
बड़ा इमामबाड़ा
रूमी दरवाज़े से दिखता बड़ा इमामबाड़ा
रूमी दरवाज़े से दिखता बड़ा इमामबाड़ा
रूमी दरवाज़े से दिखती आसिफ़ी मस्जिद की मीनारें
रूमी दरवाज़े के भीतर बने दरवाज़े
रूमी दरवाज़ा (पीछे से)
बेहता नदी का पुल
(सभी तस्वीरों को बड़ा कर के देखने के लिये उन पर क्लिक करें)
23 जून 2012. बहुत बेचैन शाम थी आज... मन किसी पिंजरे में क़ैद पंछी के जैसे छटपटा रहा
था... बस पिंजरा तोड़ के उड़ जाना चाहता था... खुली फिज़ा में साँस लेने को
बेचैन... शाम के क़रीब पौने सात बज रहे थे... सूरज ढल चुका था... रात अभी
हुई नहीं थी... "ना अभी रात ना दिन, ना अँधेरा ना उजाला" वाली स्थिति थी...
किसी काम में मन नहीं लग रहा था... कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करें कि इस बेचैनी से राहत मिले... तो एक्टिवा निकाली और बस चल दिये... मम्मी ने पूछा कहाँ जा रही हो... अब पता
हो तब तो बतायें... बोला, मन नहीं लग रहा... ऐसे ही जा रहे हैं लखनऊ की
सड़कें नापने... ख़ैर निकल तो गये घर से पर अभी तक वाकई नहीं पता था कि कहाँ
जा रहे हैं...
फ़्यूल मीटर देखा... गाड़ी रिज़र्व में थी... आलस में पिछले कितने
दिनों से पेट्रोल नहीं डलवाया था... कहीं दूर जाना भी नहीं हुआ तो जैसे
तैसे काम चल रहा था... पर आज जब पता ही नहीं कहा जाना है तो रिस्क नहीं ले
सकते ना... तो सबसे पहले पेट्रोल पम्प... पेट्रोल डलवाया... हवा चेक
करवाई... जा कहाँ रहे हैं अभी तक नहीं पता... ख़ैर... आगे बढ़े... अब तक कुछ
अँधेरा भी होने लगा था... गोमती नदी का पुल पार किया तो सामने पीली सी
रौशनी में झांकता सादत अली खां के मकबरे का गुम्बद दिखा... दूर से बड़ा
अट्रैक्टिव सा दिखा तो चल पड़े उधर... यूँ तो वो शहर के बीचों बीच है और
जाने कितनी ही बार उसके सामने से गुज़रते हैं पर ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार
उधर नज़र डालने का मौका भी नहीं देती... हाँ बचपन में बहुत बार गये हैं वहाँ
पर वो बस अब धुंधली सी यादें हैं... पास जा के देखा तो वहाँ रीस्टोरेशन का
काम चल रहा था... देख के अच्छा लगा कि पुरातत्व विभाग और सरकार ने कुछ तो
सुध ली ऐसी ख़ूबसूरत इमारतों को बचाने की...
फिर जाने क्या आया मन में और गाड़ी पुराने लखनऊ की ओर मोड़ दी... और बस चल
पड़े पुराने लखनऊ की सड़कें नापने :) ... शाम से ही हवा बड़ी अच्छी चल रही
थी... हवा की ठंडक और नमी बता रही थी कि कुछ लोगों में सुकून बाँट के और
उनकी दुआएं ले के आयी है... आस पास ही कहीं कुछ अब्र बरसे हैं शायद ! सड़कों
पर भी आज बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं थी... आज लखनऊ में नगर पंचायत और नगर निगम के
चुनाव थे तो सुबह से ही सब बन्द था... शाम के समय कुछ एक ही दुकाने खुली थी
और लोग भी कम ही थे सड़कों पर... शाम का वक़्त, सूनी सड़कें, ठंडी हवा...
कुल मिला के सुकून ! हम भी धीरे
धीरे, ३० की स्पीड पे चल रहे थे मौसम का आनंद लेते हुए... कहीं जाना ही
नहीं था तो कोई जल्दी भी नहीं थी...
बड़े इमामबाड़े का प्रवेश द्वार
थोड़ा आगे जाने पर बड़ा
इमामबाड़ा दिखा, इसे आसिफ़ी इमामबाड़ा भी कहते हैं... अँधेरा हो चुका था तो
अन्दर जाने का कोई फ़ायदा नहीं था... बाहर से ही थोड़ी बहुत फ़ोटोज़ क्लिक
करीं... क्या बुलंद इमारत है... इसके बनने के पीछे कि कहानी भी बड़ी
दिलचस्प है... सन १७८३ में इस इलाके में भीषण आकाल पड़ा था... अवध के लोग
भले भूखे मर जाएँ पर माँग के खाना उस वक़्त भी उन की शान के खिलाफ़ था... तब नवाब
आसिफ़-उद-दौला ने लोगों को रोज़गार देने के लिये इस इमामबाड़े का निर्माण
करवाया... आम प्रजा दिन में निर्माण का काम करती और उच्च वर्ग के लोगों से (क्यूँकि वो और कोई काम करने में सक्षम नहीं
थे)
रात के वक़्त दिन में हुए निर्माण को तुड़वा दिया जाता जिससे की लोगों को ज़्यादा दिन तक काम मिलता रहे... वो अकाल तकरीबन एक दशक से भी अधिक समय तक चला... और तब तक इस ईमारत
का निर्माण भी चलता रहा और लोगों को काम मिलता रहा... शायद इसीलिए कहा गया
होगा "जिसको ना दे मौला उसको दे आसिफ़-उद-दौला"... वैसे और भी बहुत कुछ
है इस इमामबाड़े के बारे में बताने को पर वो फिर कभी...
रूमी दरवाज़ा
बड़े इमामबाड़े के बाहर ही सड़क पर बना है रूमी दरवाज़ा जिसे लखनऊ का
प्रवेश द्वार भी कहते हैं और जो सारी दुनिया में लखनऊ की पहचान है... इसका
निर्माण भी उसी आकाल के दौर में हुआ था... अपने आप में कारीगरी का एक
बेमिसाल नमूना... पर रख रखाव के आभाव में अभी इसकी दशा भी कुछ ठीक नहीं है...
आज भी रोज़ाना सैकड़ों गाड़ियाँ इसके नीचे से गुज़रती हैं... उम्मीद है
पुरातत्व विभाग जल्द ही इसकी ओर भी ध्यान देगा...
इसी सड़क पर थोड़ा और आगे जाने पर हुसैनाबाद घंटा घर, सतखंडा, छोटा इमामबाड़ा और
हुसैनाबाद बाज़ार पड़ते हैं... वहाँ तक पहुँच के देखा तो घड़ी क़रीब पौने आठ
बजा रही थी... आगे कुछ ख़ास था भी नहीं देखने को और रात भी हो चुकी थी सो
वापस मुड़े... वापस आते हुए क्वालिटी वाल्स का ठेला दिख गया... गाड़ी रोक
के एक चॉकबार खायी और नौ बजे तक वापस घर... निकले थे बेमक़सद और देखिये ना
दो ही घंटो में कितना सारा सुकून ले कर वापस आये.. वो भी यूँ ही.. बेवजह !
P.S. :- घर आ के पापा को फोटो दिखायीं तो नेक्स्ट ट्रिप उनके साथ प्लान
हो गई... अगले जिस भी दिन मौसम अच्छा हुआ :) हाँ, इस बार इन सारी
इमारतों को अन्दर से घुमाउंगी... पक्का प्रॉमिस !
हुसैनाबाद बाज़ार
चलो ना भटकें लफ़ंगे कूचों में लुच्ची गलियों के चौक देखें सुना है वो लोग चूस कर जिन को वक़्त ने रास्तें में फेंका था सब यहीं आ के बस गये हैं ये छिलके हैं ज़िन्दगी के इन का अर्क निकालो कि ज़हर इन का तुम्हारे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और जितने वो मार देगा चलो ना भटकें लफ़ंगे कूचों में
एक छोटी सी जिज्ञासा कभी-कभी ढेरों ऐसी अनूठी जानकारियाँ दे जाती है कि आप सोच भी नहीं सकते... ऐसा ही कुछ हुआ कल हमारे साथ...
पेड़ पौधों का हमें बचपन से ही शौक़ रहा है... शायद पापा से विरासत में मिला है... अभी भी याद आता है कैसे बचपन में जब भी छुट्टियों में गाँव जाते थे तो वो बाग़ में घुमाने ले जाते थे और पूछा करते थे अच्छा बताओ ये कौन सा पौधा है, वो किस चीज़ का फूल है... या कभी किसी जंगली पेड़ का फल या बीज तोड़ लाते थे और कहते थे पता है ये क्या है... बस समझिये तभी से ये लत लग गई... फूलों और पौधों को पहचानने और उनका नाम याद रखने की...
कल शाम किसी के यहाँ गृह प्रवेश की पूजा में गये थे... घर के बाहर सड़क के किनारे यही कोई ६-७ फुट का एक छोटा सा पेड़ लगा हुआ था... गहरे भूरे रंग का बहुत सी दरारों वाला सूखा सा तना... बिलकुल महीन महीन सी हल्की हरी पत्तियां... और उसमें लगे बड़े ही अनूठे किस्म के छोटे से ब्रश के आकार के फूल, जिसका पिछला हिस्सा गहरा गुलाबी रंग का था और अगला सिरा पीला... जाने क्या था उस पेड़ में जो बार बार अपनी ओर आकर्षित कर रहा था... जब नहीं रहा गया तो जा कर एक छोटी सी टहनी तोड़ ही ली उसकी... घर आ कर पापा को दिखाया कि आख़िर ये फूल है कौन सा जो हमें नहीं पता... उस छोटी सी टहनी के आधार पर पापा भी पक्की तरह से कुछ नहीं बता पाये पर बोले कि पत्तियों से तो लग रहा है कि शायद "शमी" है... और ये भी बताया कि इसकी पत्तियाँ पूजा में काम आती हैं..
अब ये तो नाम ही हमने पहली बार सुना था तो हो गई खुजली शुरू... गूगल बाबा की जय हो... और बस खोजने बैठ गये कि आख़िर ये "शमी" क्या बला है... और फिर जो जानकारियों का पिटारा खुला तो बस खुलता ही गया... अब इतनी रोचक जानकारियाँ थीं तो सोचा क्यूँ ना ये सब आपके साथ भी सांझा कर लिया जाये कि ये "शमी" आख़िर है क्या बला :)
शमी जो खेजड़ी या सांगरी नाम से भी जाना जाता है मूलतः रेगिस्तान में पाया जाने वाला वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों पर भी पाया जाता है... अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है.
विजयादशमी या दशहरे के दिन शमी के वृक्ष की पूजा करने की प्रथा है... कहा जाता है ये भगवान श्री राम का प्रिय वृक्ष था और लंका पर आक्रमण से पहले उन्होंने शमी वृक्ष की पूजा कर के उससे विजयी होने का आशीर्वाद प्राप्त करा था... आज भी कई जगहों पर लोग रावण दहन के बाद घर लौटते समय शमी के पत्ते स्वर्ण के प्रतीक के रूप में एक दूसरे को बाँटते हैं और उनके कार्यों में सफलता मिलने कि कामना करते हैं...
शमी वृक्ष का वर्णन महाभारत काल में भी मिलता है... अपने १२ साल के वनवास के बाद एक साल के अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने अपने सारे अस्त्र इसी पेड़ पर छुपाये थे जिसमें अर्जुन का गांडीव धनुष भी था... कुरुक्षेत्र में कौरवों के साथ युद्ध के लिये जाने से पहले भी पांडवों ने शमी के वृक्ष की पूजा करी थी और उससे शक्ति और विजय की कामना करी थी... तब से ही ये माना जाने लगा जो भी इस वृक्ष कि पूजा करता है उसे शक्ति और विजय मिलती है...
हे शमी, आप पापों का क्षय करने वाले और दुश्मनों को पराजित करने वाले हैं
आप अर्जुन का धनुष धारण करने वाले हैं और श्री राम को प्रिय हैं
जिस तरह श्री राम ने आपकी पूजा करी मैं भी करता हूँ
मेरी विजय के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं से दूर कर के उसे सुखमय बना दीजिये
एक और कथा के अनुसार कवि कालिदास ने शमी के वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या कर के ही ज्ञान कि प्राप्ति करी थी.
शमी वृक्ष की लकड़ी यज्ञ की समिधा के लिए पवित्र मानी जाती है... शनिवार को शमी की समिधा का विशेष महत्त्व है... शनि देव को शान्त रखने के लिये भी शमी की पूजा करी जाती है... शमी को गणेश जी का भी प्रिय वृक्ष माना जाता है और इसकी पत्तियाँ गणेश जी की पूजा में भी चढ़ाई जाती हैं...
बिहार और झारखण्ड समेत आसपास के कई राज्यों में भी इस वृक्ष को पूजा जाता है और इसे लगभग हर घर के दरवाज़े के दाहिनी ओर लगा देखा जा सकता है... किसी भी काम पर जाने से पहले इसके दर्शन को शुभ मना जाता है...
राजस्थान के खेजराली गाँव में रहने वाले बिशनोई समुदाय के लोग शमी वृक्ष को अमूल्य मानते हैं और इसे कटने से बचाने के लिये सन १७३० में अमृता देवी के नेतृत्व में चिपको आन्दोलन कर के ३६३ बिशनोई लोग अपनी जान तक दे चुके हैं... ये चिपको आन्दोलन की सबसे पहली घटना थी...
कहते हैं ये पेड़ जहाँ होता है वहाँ की ज़मीन और अधिक उपजाऊ हो जाती है... इसकी जड़ से हल भी बनाया जाता है...
एक आख़िरी बात जो पता चली इस पेड़ के बारे में वो ये कि ऋग्वेद के अनुसार शमी के पेड़ में आग पैदा करने कि क्षमता होती है और ऋग्वेद की ही एक कथा के अनुसार आदिम काल में सबसे पहली बार पुरुओं (चंद्रवंशियों के पूर्वज) ने शमी और पीपल की टहनियों को रगड़ कर ही आग पैदा करी थी...
उफ़... एक नन्हां सा कौतुहल और कितना कुछ जाना एक पेड़ के बारे में... एक दोस्त अक्सर कहा करता है... तुम्हें बड़ी फ़ुर्सत से बनाया है भगवान ने... अब भला बताइये फ़ुर्सत से ना बनाया होता तो इत्ती सारी जानकारी मिलती आपको ?
जाने क्यूँ ये दिल बंजारों के जैसा भटक रहा था पिछले कुछ दिनों से... यहाँ वहाँ.. वहाँ यहाँ... पहाड़... झरने... जंगल... बादल... नदी... बारिश... कहीं भी चैन नहीं था... जाने क्या ढूंढ़ रहा था... न जाने किसकी तलाश थी... जानती थी ये भटकाव अच्छा नहीं है... पर दिल था कि कुछ सुनने मानने को ही तैयार नहीं था... ज़िद्दी हो गया है आजकल... लगता है हम पर ही गया है :)
ख़ैर... आज जनाब को जाने कहाँ से सेमल और पलाश के फूल याद आ गये... और बस हमारी उँगली पकड़ के ज़िद शुरू... चलो न किसी जंगल में... सेमल और पलाश के फूल चुन के लायेंगे... ढेर सारे... सुर्ख़... दहकते हुए से... कितने ख़ूबसूरत लगते हैं न... एक अलग सा तेज... एक अलग सी आभा लिये हुए... जैसे लाल जोड़े में सजी कोई दुल्हन खड़ी अपने प्रियतम का इंतज़ार कर रही हो...
हाँ तो ये जनाब कहाँ मानने वाले... ज़िद पे अड़ गये तो अड़ गये... हमने समझाया भी यहाँ कहाँ रखा है जंगल और ये पेड़... पर नहीं, उन्हें तो फूल चाहिये... तो भाई उनका हाथ थाम चल दिये हम भी... हम, वो और हमारा कैमरा... ;)
कंक्रीट के इस जंगल में अभी भी कभी कभार ये भूले बिसरे पेड़ देखने को मिल जाते हैं... सो हमें भी मिल गया एक सेमल का पेड़... श्रृंगार रस से ओत-प्रोत किसी कविता सा... और बस दिल रीझ सा गया उसकी ये सुर्ख़ सुनहरी धज देख कर... बंजारा दिल बाँवरा हो गया... ना ट्रैफिक की परवाह... ना आते जाते लोगों की और ना अचरज से देखती उनकी निगाहों की... कि आख़िर इस लड़की को हो क्या गया है... बीच सड़क कैमरा ले कर सेमल कि फोटो लेने में ऐसी मगन है कि कुछ ख़्याल ही नहीं दीन दुनिया का... अब क्या किया जाये... "कुछ तो लोग कहेंगे... लोगों का काम है कहना..." तो उन्हें कहने दिया और हम मगन रहे... ढेर सारी फोटो लीं... ज़मीं पर बिछी सुर्ख़ चादर से कुछ फूल उठाये और वापस चल दिये... होंठों पे मुस्कान और दिल में संतुष्टि ले कर... जैसे जग जीत आये हों :)
पर ये ज़िद्दी दिल वापस आने को तैयार ही नहीं था... फिर क्या था कर दी एक शाम इस पागल ज़िद्दी दिल के नाम :) ... पास ही एक पार्क था... चल दिये उधर... कुछ देर टहले और फिर एक लोहे की बेंच पे बैठ के शाम की ठंडी हवा और पेड़ पौधों का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अपने घोंसलों में लौटते कुछ पंछियों का झुण्ड वहाँ से गुज़रा और दिल फिर उड़ चला उन के साथ "पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में..." गाते हुए...
सच कहूँ तो उसे रोकने का मन नहीं हुआ... आज कितने दिनों बाद इतना ख़ुश था... बच्चों के जैसे निश्छलता से खिलखिला रहा था... थक गया था शायद ख़ुद को समझाते बहलाते... ये सही है ये ग़लत... ये करो ये नहीं... लोग क्या कहेंगे... कोई बच्ची हो क्या तुम... उफ़... उफ़... उफ़... बस यार ! कब तक आख़िर दुनिया की, दुनियादारी की, सही-ग़लत की परवाह करे... आज बिना किसी की परवाह किये उड़ रहा था... आज़ाद... बेफिक्र...
ओ दिल बंजारे... जा रे... खोल डोरियाँ सब खोल दे... !!!
लखनऊ कल सुबह से ही चेरापूंजी बना हुआ था... सारा दिन रुक रुक कर बरसात होती रही... और ऐसे मौसम में ऑफिस की जेल जैसी दीवारों के भीतर, मन को बड़ी मुश्किल से समझा बुझा के किसी छोटे बच्चे की मानिंद बैठाया हुआ था... लॉलीपॉप का लालच दे के... की बस थोड़ी देर और फिर यहाँ से रिहा हो के खुली फिज़ा में साँस लेते हुए चलेंगे वापस... मौसम को एन्जॉय करते हुए...
किसी तरह बेमन जैसे-तैसे ऑफिस का काम निपटाया... शाम होते होते बादल एक बार फिर बाँवरे हो उठे... सूरज अंकल को तो खैर सुबह से ही किडनैप कर रखा था उन्होंने... ऊपर से एकदम काले बादल... इतना रूमानी मौसम हो गया था की क्या बतायें... काश की ऐसे में "कोई" साथ होता तो कसम से आज निकल ही जाते लॉन्ग ड्राइव पे... हम्म... ख़्वाहिशें :) ...
हाँ तो उस "जेल" से छूट के चंद क़दम ही आगे बढ़े थे की बरखा रानी फुल मूड में आ गयीं हमसे मिलने... और बस मन मचल गया उन्हें गले लगाने को... अब इतने प्यार से आयी थीं तो इनकार कैसे करते... हमने भी सोचा अब थोड़ा तो भीग ही गये हैं और जब तक गाड़ी रोक के रेनकोट पहनेंगे और ज़्यादा भीग जायेंगे... पर दिमाग़ था की अपनी ही लगा रखी थी... ज़्यादा भीग गये तो, बीमार पड़ गये तो... दिल बेचारा दिमाग़ को समझाने में लगा ही था की इतने में अन्दर छुपा बच्चा भी लॉलीपॉप वॉलीपॉप छोड़-छाड़ के बाहर आ ही गया... छोड़ो यार... घर ही तो जाना है... आज भीगते हुए चलते हैं... :)
बस फिर क्या था... हम और हमारी एक्टिवा चल पड़े मौसम और बारिश से बातें करते हुए... अमूमन ४५ - ५० मिनट लगते हैं ऑफिस से घर आने में... पिछले कुछ दिनों से मन कुछ अच्छा नहीं हो रहा था... तो आज पूरा टाइम था उसे आराम से मनाने बहलाने का... मन का रेडियो जाने कौन कौन से गाने प्ले करता रहा सारे रास्ते... कभी ओल्ड मेलोडीज़... आज मौसम बड़ा बेईमान है... रिमझिम गिरे सावन... मौसम मौसम लवली मौसम... तो कभी गुलज़ार साब ये कहते हुए आ जाते... याद है वो बारिशों के दिन पंचम... और बैकग्राउंड में बजता... कच्चे रंग उतार जाने दो... आ चल डूब के देखें... उफ़... दिल तो बच्चा है जी :)
बारिश कुछ और तेज़ हुई तो रेडियो में बजते गानों ने कॉमर्शियल ब्रेक लिया... और मन की ख़याली फैक्ट्री ने एक ख़याल और प्रड्यूस किया... ये हेलमेट में वाइपर्स क्यूँ नहीं होते... अँधेरा भी कुछ बढ़ गया था... आगे चलती गाड़ियों की लाइट्स और बारिश की बूँदें अब मिल कर हेलमेट के शीशे पर बॉल-डांस कर रही थीं... कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था तो शीशा हटाना पड़ा... अब चेहरे पे बूँदें इस तेज़ी से पड़ रही थीं की मानो ढेर सारी चीटियाँ एक साथ काट रही हों... उहूँ... थोड़ा रूमानी अंदाज़ में कहें तो यूँ लग रहा था मानो बारिश ने बढ़ के अपने आग़ोश में ले लिया हो और प्यार से चूम रही हो और रोम-रोम वो एहसास जज़्ब करता जा रहा हो... इक ठंडक भरा सुकून डायरेक्ट आत्मा तक पहुँच रहा था...
खैर ऑलमोस्ट ५० मिनट बाद ये रूमानी सफ़र ख़त्म हुआ और फाइनली हमने अपने रूमानी ख़यालों और एकसासों के साथ घर के गेट में एंट्री करी...
कट... सीन चेंज... जिरह शुरू... :)
मम्मी जो परेशान सी बाहर बरामदे में बैठी इंतज़ार कर रही थीं देखते ही बोलीं...
- भीग गयीं ?
- नहीं तो... एकदम सूखे हैं... भगवान जी ने वॉटरप्रूफिंग कर के जो भेजा है ऊपर से :)
( अब इतनी बारिश हो रही है, कपड़ों से पानी चू रहा है, ऐसे में क्या लॉजिकल क्वेस्चन है... मम्मी भी ना... पर हँस भी नहीं सकते अभी... बड़ी मजबूरी है )
अगला सवाल, नहीं ऐक्चूअली सवाल ही सवाल, जवाब देने का मौका ही नहीं...
- रेनकोट नहीं ले गयी थी ? पहना क्यूँ नहीं ? ठण्ड लगी ? गाड़ी तेज़ तो नहीं चलाई ? वगैरा वगैरा वगैरा...
फिर जैसे अचानक उन्हें याद आया की वो मेरी मम्मी हैं...
कट... सीन चेंज... ट्रॅन्स्फर्मेशन... अब प्यार बरसना शुरू... :)
इतनी बड़ी हो गयी है भगवान जाने कब अक्ल आएगी इस लड़की को...
पागल हो एकदम...
जाओ जा के जल्दी चेंज करो नहीं तो ठण्ड लग जायेगी... हम अदरक वाली चाय बना देते हैं तब तक... :)
और हम चल देते हैं एक बार फिर गाते हुए... दिल तो बच्चा है जी... :)
चलिए जी फिर मिलते हैं... और जाते जाते गुलज़ार साब को छोड़े जाते हैं आपके पास -
कल सुबह जब बारिश ने आ कर
खिड़की पर दस्तक दी थी
नींद में था मैं - बाहर अभी अँधेरा था !
ये तो कोई वक़्त नहीं था,
उठ कर उससे मिलने का
मैंने पर्दा खींच दिया
गीला गीला इक हवा का झोंका उसने
फूँका मेरे मुँह पर, लेकिन
मेरी "सेन्स ऑफ़ ह्यूमर" भी कुछ नींद में थी
मैंने उठ कर ज़ोर से
खिड़की के पट उस पर भेड़ दिये
और करवट ले कर फिर बिस्तर में डूब गया !
शायद बुरा लगा था उसको
गुस्से में खिड़की के कांच पे
हत्थड़ मार के लौट गयी वो,
दोबारा फिर आयी नहीं
खिड़की पर वो चटख़ा काँच अभी बाक़ी है !
-- गुलज़ार
एक त्रिवेणी भी सुन लीजिये जाते जाते... अभी लिखी.... एकदम लेटेस्ट... ताज़ा :)
बहुत भरा था मन पिछले कुछ दिनों से
बारिशें ओढ़ वो जी भर के रोई कल शब
अपने बारे में क्या बताऊँ आपको, नवाबों के शहर लखनऊ में पली बढ़ी एक आम लड़की हूँ, a software engineer by profession... लेखिका नहीं हूँ सो शब्दों से खेलना नहीं आता, पर सराहना ज़रूर आता है और ज़िन्दगी की छोटी छोटी चीज़ों में खुशियाँ तलाशना आता है... बच्चों की मासूम किलकारी, फूलों की ख़ुश्बू, प्रकृति की शान्ति, रंग बिरंगी तितलियाँ, हवा में उड़ते गुब्बारे, बारिश की बूँदें, मिट्टी की सौंधी सी महक... बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेते हैं... i believe, with all its complications and uncertainties, life is still beautiful and worth living... u just have to face it with a positive attitude and take everything in ur stride !!
अच्छा लगता है न जब आपका लिखा कुछ लोगों तक पहुँचे... ख़ासकर उन लोगों तक जिनका आना जाना ब्लॉग और इन्टरनेट की इन तकनीकी गलियों में नहीं है... वो, जिनके लिए पढ़ने का ज़रिया आज भी अखबार और किताबें ही हैं... तो बेशक़ हमारे लिखे को उन लोगों तक पहुँचाइये... अगर हमारा लिखा इस लायक है... हाँ एक चिट्टी हमारे पते पर भी ज़रूर छोड़ते जाइये... थोड़ा सा हम भी ख़ुश हो लें !