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Thursday, May 21, 2020

ख़ानाबदोश !



ये मन भी कितना चंचल होता है न... कभी एक जगह टिकता ही नहीं... बिलकुल उस तितली की तरह जो फूलों से भरे बाग़ीचे में पहुँच कर एकदम पागल सी हो जाती है.... एक पल इस फूल पे बैठती है तो अगले ही पल उड़ के दूसरे फूल पर और फिर तीसरे और चौथे पर... जैसे उसे समझ ही नहीं आ रहा होता कि किस फूल का रस उसे सबसे ज़्यादा पसंद आया...

मन भी बिलकुल ऐसा ही होता है... इस एक छोटे से जीवन में ही उसे सब कर लेना है... कभी लगता है एक पेंटर बनना है तमाम पेंटिंग्स बनानी हैं... फिर कभी लगता है फ़ोटोग्राफ़ी करनी है... कभी लगता है की कम्प्यूटर्स की पढ़ाई ग़लत कर ली दिल तो घर बनाने और सजाने में लगता है... आर्किटेक्चर की पढ़ाई करनी चाहिये थी... फिर अगले ही पल लगता है ये सब मोह माया है... हमें तो कहीं पहाड़ पे छोटा सा एक कॉटेज बना के वहीं रहना है... मटीरिअलिस्टिक चीज़ों की ज़्यादा लालसा नहीं तो गाँव के किसी पहाड़ी स्कूल में बच्चों को पढ़ा के अपना ख़र्चा तो चल जाएगा... कितना तो ख़ाली समय मिलेगा उसमें बाग़वानी करेंगे... किताबें पढ़ेंगे... 

फिर कभी ये भी दिल करता है कि एक बी & बी चलाना है किसी पहाड़ पर.. घर का घर हो जायेगा और कमायी की कमायी और होम स्टे में जो तमाम लोग आयेंगे दुनियाभर से उनसे दुनिया जहान की बातें भी... और पहाड़ पे रहने का सपना पूरा होगा सो अलग...   फिर कभी दिल में दुनिया घूमने की ललक ज़ोर पकड़ती है...  लगता है काश किसी ट्रेवल चैनल में नौकरी मिल जाये तो सारी दुनिया घूम लें...

दरअसल हमारा मन बिलकुल किसी ख़ानाबदोश के जैसा है... हर कुछ दिन में अपना ठिकाना बदलता हुआ... कितनी तो क्षण भृंगुर लालसायें उपजती रहती है इस मन की ज़मीन पे हर रोज़... चचा ग़ालिब क्या ख़ूब कह गये हैं हम जैसों के ही लिये "हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले..."

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कोई भटकन है मेरे भीतर
कोई यायावर
कि बुझती नहीं जिसकी प्यास
किसी दरिया किनारे भी
न तृप्त होती है आत्मा
न भटकन ख़त्म होती है

कुछ करना है उसे
कुछ अलग
क्या
नहीं मालूम
पर कुछ तो

वो नन्हां सा टुकड़ा 
ख़्वाब का
जो धुंधला धुंधला अटका है 
याद के चिटके काँच में 
उसे रंगों से देनी है शक़्ल
किसी शफ्फाक़ कैनवस पर

कोई इक कविता कहनी है
बिना बाँधे शब्दों को
किसी भी पैमाने में
बस बिखेर देना है
कागज़ पर
जो महके सौन्धे सौन्धे

कुछ पौधे उगाने हैं
रंगीन फूलों के
के जिन पे तितलियाँ आयें
उनसे ढेरों बातें करनी हैं
दोपहरें रातें करनी हैं
हाँ इक जुगनू पकड़ना है

कोई जंगल है जो भीतर
अनगढ़ से विचारों का
उसे बाहर लाना है
किसी ऊँची पहाड़ी पे
एक घर भी बनाना है

हो इक छोटा सा कमरा
जिसमें इक खिड़की बड़ी हो
छत हो लाल पत्थर की
पेड़ पे झूला पड़ा हो
मखमली घास का हो इक गलीचा
किसी अलसायी दोपहरी में
कोई किताब पढ़नी है

बुलेट भी तो चलानी है
दुनिया की सैर करनी है
तमाम लोगों से मिलना है
नई नई कितनी 
भाषायें सीखनी है
समय की सीमायें लांघनी है

प्रवासी परिंदों संग 
सुनहरी सुबहें देखनी हैं
स्पिति की सफ़ेद रातों में
तमाम रतजगे करने हैं
आकाशगंगा में झिलमिल 
अनगिन तारे गिनने हैं

समय की चाँदी जब
चमकेगी बालों में
शाम का पिघला सोना चुनना है
सुनहले साहिल की रेत से
पैरों में भटकन बाँध
यूँ ही बस चलते जाना है

ये भटकन ही तो हासिल है
यही कामिल है 
रगों में यूँ ही तो 
भटकता है लहू भी
और साँसे धड़कनों में
मुझे भी बस भटकना है
यूँ ही उम्र भर... ख़ानाबदोश !
-- ऋचा



Monday, February 15, 2016

इश्क़ मुबारक़ !!!



पिछले एक हफ़्ते से हर जगह इश्क़ की ख़ुमारी छायी हुई है... फेसबुक पर... अख़बार में.. वाट्सऐप पर... न्यूज़ में... हर कहीं... जिधर देखो इश्क़ ही इश्क़... जैसे दुनिया में कोई बुराई बची ही ना हो... हर कोई किसी ना किसी के प्यार में है या होने के लिये बेताब है... प्रॉमिस डे प्रपोज़ डे से लेकर हग डे किस डे तक... सही मायनों में इश्क़ का बाज़ारीकरण... ऑनलाइन शॉपिंग साइट्स ने जम कर डिस्काउंट्स दिये प्यार के नाम पर तो होटेल्स और रेस्टोरेंट्स ने कपल्स के लिये स्पेशल ऑफर्स...

ख़ैर इस सब के बीच आज यूँ ही बैठी सोच रही थी कि क्या ज़रूरी है कि ये इश्क़ किसी इंसान से ही हो...कितनी तो चीज़ें हैं इस दुनिया में इश्क़ करने लायक... जैसे आपकी फेवरेट हॉबी... म्यूज़िक... पेन्टिंग... डांसिंग... ये सब भी तो आपका प्यार ही होते हैं... अपनी इन हॉबीज़ के लिये भी तो हम ठीक वैसे ही जुनूनी होते हैं जैसे किसी इंसान के लिये... हमने भी अपने इन सब इश्कों के साथ आज का पूरा दिन बिताया...

सुबह सबसे पहले तुम्हारे साथ राधा कृष्ण के मन्दिर गयी... कि प्यार की इनसे बड़ी कोई मिसाल है क्या दुनिया में... तो प्यार के इस दिन की इससे ख़ूबसूरत शुरुआत और क्या हो सकती थी... तुम चले गये तो थोड़ी देर फोटोग्राफी करी... देखो ना फूलों को भी जैसे पता था कि आज का दिन कुछ ख़ास है... जी भर के खिले थे.. हर रँग में मुस्कुराते हुए से... फिर अपना पसंदीदा नाश्ता बनाया गरमा गरम कॉफी के साथ... ढेर सारा म्यूज़िक सुना सारा दिन... अपना फेवरेट वाला पर्पल नेलपेंट लगाया... इश्क़ में डूबी एक कहानी पढ़ी... और इश्क़ से लबरेज़ एक मूवी देखी... फिर से... "लैटर्स टू जूलिएट"... देखी है क्या तुमने... प्यार के शहर वेरोना में फिल्माई बड़ी ही ख़ूबसूरत कहानी है... कैसे एक औरत 50 साल बाद अपने प्रेमी को ढूँढती है... जिस लकड़े को वो 15 साल की उम्र में छोड़ के चली गयी थी क्यूंकि उसमें समाज और अपने परिवार का विरोध करने कि हिम्मत नहीं थी... कैसे जूलिएट कि लिखी एक चिट्ठी उसे ये हौसला देती है उम्र के उस पड़ाव पे... और वो अपने पोते के साथ चली आती है अमेरिका से इटली... सिर्फ़ अपने प्यार को ढूँढने... पढ़ना चाहोगे उस चिट्ठी में क्या लिखा था ?

Dear Claire,

"What" and "If" are two words as non-threatening as words can be. But put them together side-by-side and they have the power to haunt you for the rest of your life: What if? What if? What if? I don't know how your story ended but if what you felt then was true love, then it's never too late. If it was true then, why wouldn't it be true now? You need only the courage to follow your heart. I don't know what a love like Juliet's feels like - love to leave loved ones for, love to cross oceans for but I'd like to believe if I ever were to feel it, that I will have the courage to seize it. And, Claire, if you didn't, I hope one day that you will.

All my love, Juliet

कौन ना पिघल जाये ऐसे ख़त से ऐ ख़ुदा... एक बात बताओ जान... तुमने इतने सालों में कभी हमें कोई चिट्ठी क्यूँ नहीं लिखी... लिखो ना प्लीज़... बस ऐसे ही... कुछ भी... पर लिखो... हाँ एक चीज़ और... इस बार तुमसे मिलेंगे ना तो एक शाम किसी पहाड़ी पर साथ में बैठ के डूबता हुआ सूरज देखेंगे... कितना ख़ूबसूरत लगता है ना वो... जब शाम का सिन्दूरी सोना आस्मां के गालों पे मल के उसकी आग़ोश में खो जाता है... तो इस बार हमारी एक सनसेट डेट पक्की ना ?

P.S. - सुबह सुबह तुमसे झगड़ी भी थी और ऐज़ यूज़ुअल हमारा ऑलमोस्ट ब्रेकअप भी हो ही गया था... पर तुम हो ना.. जानती हूँ लड़ोगे झगड़ोगे पर कहीं नहीं जाने दोगे हमें... और ना ही ख़ुद कभी कहीं जाओगे हमें छोड़ के... तो ये लड़ता झगड़ता प्यारा इश्क़ तुम्हें बहुत मुबारक़ मेरी जान... and do I need to say I Love You !!!



Monday, February 1, 2016

ये मिलती है, बिछड़ती है, बिछड़ के फिर से मिलती है...!



आज सुबह न्यूज़ पेपर पढ़ते हुए अनायास ही एक तस्वीर पर नज़र पड़ गयी... और तब से तुम बेइन्तहां याद आ रहे हो... अब तुम सोच रहे होगे कि ऐसी कौन सी तस्वीर देख ली हमने... याद है जान वो दौर जब हम सारा सारा दिन साथ रहा करते थे... सारा सारा दिन बातें करते... कभी साथ घूमते फिरते... कभी नाचते गाते... कभी साथ सफ़ाई करते... कभी साथ खाना बनाते... यूँ समझो वैसे ही एक पल की तस्वीर थी जब किचन में तुमने मुझे चुपके से जकड़ लिया था अपनी बाँहों में... और मज़ाक में कहा था अब कभी नहीं छोड़ूँगा तुम्हें और मैंने मन ही मन कहा था आमीन !

जाने क्यों आज सुबह से ही मन हो रहा है दूर कहीं हरी भरी वादियों के बीच जाने का... लंबी सी अंतहीन सड़क हो कोई... सुनसान सी... पर बेहद अपनी... सड़क के दोनों और हरे भरे खेत हों... उनकी मुंडेरों पर पीले जंगली फूल... गुनगुनी सी धुप और हवा में हरियाली की मादक गंध... पार्श्व में किसी बंजारन नदी का अनहद नाद... खुली हुई गाड़ी हो बिना छत की... तुम हो... मैं हूँ... बस... ऐसी कोई जगह जानते हो क्या जान ? ले चलो ना हमें वहाँ...

जानते हो इन शहरों का भी दिल धड़कता है... उनकी तासीर भी कुछ कुछ इंसानों जैसी ही होती है... उन्हें भी कभी कभी हम ठीक उसी तरह मिस करते हैं जैसे किसी इंसान को... तुम्हारे शहर से तो जैसे बरसों पुराना कोई रिश्ता है... यूँ साथ साथ ऊँगली थामे चलता है हर वक़्त गोया तुमने थाम रखा हो... जानते हो जान... तुम्हारे साथ साथ तुम्हारे इस शहर से भी मोहब्बत होती जा रही है... हर पल आवाज़ देता है ये... फिर फिर लौट आने को मजबूर करता हुआ...

कभी कभी ना बड़ा दिल करता है कि गुनगुनी धूप हो और मखमली घास पे तुम्हारी गोद में आँखें मीचे लेटी रहूँ और तुम मेरे बालों में हाथ फेरते हुए मेरी फेवरेट किताब पढ़ के मुझे सुनाते रहो... आह.. कितना प्यारा ख्याल है ना... काश कि कभी इसे हकीकत में बदल पाऊँ... यहाँ सिर्फ़ इसलिये दर्ज करा दिया है कि सनद रहे...

किसी के प्यार में होना जितना खूबसूरत एहसास है उतना ही अपने सामने प्यार को पनपते हुए देखना भी... लगता है जैसे एक्शन रिप्ले कर के हम अपनी ज़िंदगी ही दोबारा जी रहे हों... वो छेड़ना वो मनाना... वो घंटों घंटों बातें करना.. दुनिया से बेफिक्र.. एक दूसरे की छोटी छोटी बातों का ख़्याल रखना... एक दूसरे के बारे में हर छोटी बड़ी चीज़ जान लेने की उत्सुकता... कभी कभी सोचती हूँ आजकल के लड़के लड़कियों जैसे हम कभी डेट पर नहीं गए ना जान... कभी साथ में फ़िल्म नहीं देखी... कैंडल लाइट डिनर नहीं किया... कैसा एहसास होता होगा वो... सुनो ना ! किसी दिन डेट पे चलोगे मेरे साथ... ?


Thursday, January 22, 2015

बेसबब बातों की गर्माहट से खिलते बेसाख्ता हँसी के सूरजमुखी...


- सुनो हमें क्रूज़ पे जाना है.. चलोगे ?

- क्रूज़ पे ? अचानक क्या हुआ तुम्हें ?

- अरे बताओ ना... ले चलोगे ?

- हम्म... ले चलूँगा जान... पर बताओ तो क्यूँ जाना है ?

- अरे वो ना हमें समुद्र के बीचों बीच पानी में खेलती हुई डॉल्फिन्स देखनी हैं..

- हम्म :) तो उसके लिये इत्ती दूर जाने कि क्या ज़रूरत है... टीवी ऑन करो.. डिसकवरी चैनल लगाओ और देख लो.. तुम भी ना...

- अरे नहीं और भी कुछ काम है...

- वहाँ समुन्दर के बीच में भला कौन सा काम है तुम्हें...

- हमें ना सूरज को सागर के आग़ोश में सिमटते हुए देखना है... और ये मिलन देख पानी को शर्म से सुर्ख होते भी...

- तो वो तो तुम यहाँ साहिल पे खड़े हो के भी देख सकती हो... उसके लिये क्रूज़ पे क्यूँ जाना है..

- नहीं ना... यहाँ बहुत से डिस्ट्रैक्शंस होते हैं... और यहाँ किनारे तक आते आते वो लहरों का सुर्ख रँग डायल्यूट हो जाता है... मुझे वो सुर्ख नारंगी रँग की लहरों का फोटो लेना है...

- और करोगी क्या उसका ?

- उस रँग का दुपट्टा रँगवाऊँगी एक...

- अच्छा... और ?

- और वहाँ शिप के डेक पे लेट के तारे देखने हैं तुम्हारे साथ... सारी रात... कितने चमकीले दिखते हैं ना वहाँ से तारे...

- हम्म... सो तो है... :) एक बात बताओ...

- क्या ?

- तुम्हें तो पानी से डर लगता है ना... फिर वहाँ समुद्र के बीच में कैसे जाओगी... वहाँ तो चारों तरफ़ पानी ही पानी होता है ना..

- हाँ तो.. तुम होगे ना वहाँ मेरे साथ...

- तो..

- तो ये कि तुम्हारे साथ तो वहाँ डीप सी डाइविंग भी कर सकती हूँ...

- डर नहीं लगेगा... ?

- ना... बिलकुल भी नहीं... डर तब लगता है जब तुम साथ नहीं होते... तुमसे दूर हो जाने का डर लगता है... तुमसे बिछड़ जाने का डर लगता है... तुम साथ होते हो तो सुकून रहता है... ये आखिरी साँस भी हुई तो उसे लेते वक्त तुम साथ होगे...

- तुम पागल हो पूरी...

- हाँ हाँ... पता है जानेमन... रोज़ रोज़ याद क्यूँ दिलाते हो :)

- उफ्फ़... मेरे गले कहाँ से पड़ गईं आ के तुम :)

- अब तो सारी ज़िंदगी ऐसे ही टंगी रहूँगी तुम्हारी गर्दन पे.. बेताल के जैसे... विक्रम अब तू तो गया... हू हा हा हा...

- हाहाहा... चलो अब नौटंकी... क्रूज़ के टिकट बुक करते हैं ऑनलाइन... वरना फिर जान खाओगी :)

- लव यू मेरे विक्रम :):):)

- लव यू टू मेरी बेताल :):):)




Wednesday, January 14, 2015

ये सारे रँग तेरे रँग हैं...



- क्या हो गर मैं मिकोनोज़ के सफ़ेद गिरजे जैसे घरों पे एक बड़ी सी कूंची से ढेर सारे रँग छिड़क दूँ  ?

- तो.. ज़्यादा कुछ नहीं... तुम्हें पकड़ के मारेंगे वहाँ के लोग और पुलिस के हवाले कर देंगे... बस..

- हाय क्यूँ ?? किसी की बेरंग ज़िंदगी में रँग भरना कोई जुर्म है क्या ?

- नहीं... पर किसी के साफ़ सुथरे घर को ऐसे गन्दा करना कौन सा बड़ा पुण्य काम है ? और वैसे तुम्हें ये बे-सिर-पैर के खुराफ़ाती आइडियाज़ आते कहाँ से हैं ?

- हम्म... तुम जैसा नीरस इंसान नहीं समझ पायेगा... और काहे के साफ़ सुथरे जी...

- क्यूँ... देखो कैसे बर्फ़ से सफ़ेद हैं... दूर से ही चमक रहे हैं... साथ में... नीला सागर... नीला आकाश.. नीली खिड़कियाँ... बिलकुल किसी खूबसूरत पेन्टिंग सरीखे...

- ना... हमें तो ये हमेशा सूने सूने से लगते हैं... जैसे कोई बेस कोट कर के पेंटिंग बनाना भूल गया हो... इन्हें देख कर हमेशा एक बड़े से लाइफ साइज़ कैनवस का भ्रम होता है.. और दिल करता है बस रँग डालूँ इन्हें... ढेर सारे रंगों से...

- तुम पागल हो सच में :)

- हाँ तो :) मुझे तो ना इटली का बुरानो आइलैंड पसंद है... कैसा रँग बिरंगे घरों वाला द्वीप है... यूँ लगता है मानों किसी ने रँग बिरंगे फूलों से भरा पूरा एक बगीचा तैरा दिया हो पानी में...

- हम्म... तुम्हारी तरह... रँग बिरंगा...

- मैं कोई आइलैंड हूँ क्या... एक सीधी सादी साधारण लड़की हूँ...

- तुम क्या जानो... कितने किरदार बस्ते हैं तुम में... अपने आप में एक पूरी सभ्यता हो तुम...

- वाह... और तुम... मेरे मिकोनोज़ के बेरंग शहज़ादे... :)

- हाँ... तुम मुझमें यूँ ही रँग भरती रहना... हमेशा... :)

- अच्छा... आओ एक हग करो... अभी ट्रान्सफर कर देती हूँ आज के रँग :)

- हाहाहा... पागल...!

- हाँ... तुम्हारी... :):):)



Wednesday, January 7, 2015

बारहा दिल की ज़मीं पे फूटती हैं कुछ बाँवरी ख़्वाहिशों की कोपलें...



उसकी मुस्कुराहटें एक बार फिर लौट आयीं थीं... वो फिर से महकी महकी फिरने लगी थी कोहरे ढकी वादियों में... उदासियों का मौसम जा चुका था... वो धूप सी बिखरना चाहती थी... फिर से जीना चाहती थी... खुल के.. खिल के... अपनी ज़िन्दगी के साथ ज़िन्दगी भर...

उसने एक गाँव बसाया था नदी के किनारे... एक ही से दिखने वाले ढेर सारे घरों की कतारें... सारे घर चमकीले रंगों में रंगे हुए... दूर से देखो तो यूँ लगता था गोया इन्द्रधनुष धरती पर सजा दिया हो किसी ने... नदी किनारे... अपने मूड के हिसाब से वो कभी लाल रंग के घर में रहती तो कभी नीले में... कुछ सीमे सीमे से दिनों के लिए उजला पीला घर जो उसकी सारी उदासियाँ दूर कर दे... बारिशों वाले दिन धुली धुली पत्तियों के जैसे हरे रंग वाले घर में गुज़रते... जिस रोज़ उसका दोस्त गाँव से बाहर जाता वो जामुनी रंग के घर में जा कर ख़ुद को उसकी यादों में डुबा देती... वो वापस आने को होता तो गुलाबी घर में खिली खिली घूमती उसका इंतज़ार करते...

वो ढेर सारे जुगनू पकड़ना चाहती थी.. किसी घने जंगल में जा के... उन सबको अपने घर लाना चाहती थी... उसे बड़ा अच्छा लगता था जलते बुझते जुगनुओं को देखना... किसी सियाह रात जब चाँद तारे सब छुट्टी पे हों वो उन्हें अपने आसमां पे टांकना चाहती थी... फिर सारी रात छत पे लेटे हुए अपने दोस्त से बातें करना चाहती थी... उसके पास अनगिनत बातों का खज़ाना था... कभी न ख़त्म होने वाला... वो सारा खज़ाना अपने दोस्त को सौंप देना चाहती थी... दोस्त से बातें करते रात की तारीकी को तोड़ती भोर की पहली किरण को गले लगाना चाहती थी... फिर सारे जुगनुओं को विदा कर के सोना चाहती थी दोस्त का हाथ थामे... नीले आस्मां की ओढ़नी ओढ़े...




वो जंगल से गाँव तक आती पगडण्डी के किनारे खिले जंगली फूलों से उनका नाम पूछना चाहती थी... हवा के झोंको से डोलता उन फूलों का मोहल्ला उसे बहुत आकर्षित करता था... कैसे बिना माली के भी वो हमेशा मुस्कुराते हुए ही मिलते थे... क्या जाने कौन रात में आ कर उन्हें प्यार से सहला जाता था... उनकी जड़ों को सींच जाता था.. उसे तो कभी कोई नज़र नहीं आया उस गाँव में... ज़रूर कोई दूर देस का फ़रिश्ता होगा.. आधी रात आस्मां से उतरता होगा... 



वो अलसुबह घास पर बिखरी ओस की बूँदे इकट्ठी करना चाहती थी... उसे एक छोटा सा तालाब भरना था उन बूंदों से... सुनहली मछलियों के रहने के लिए... उसे ओस की बूँद पीती मछलियाँ देखनी थीं... मुँह से मुँह जोड़ कर बातें करती हुयीं... उसे भी सुननी थी उनकी बात-चीत... उसका दिल होता मछलियों की भाषा सीख ले... फिर जब उसका दोस्त काम पर गया हो तो वो उन मछलियों के संग सारी दोपहर गप्पे लड़ाया करे...

वो ढेर सारे खत लिखना चाहती थी... रँग बिरंगी स्याहियों से... इतने कि उसके जाने के बाद भी डाकिया, ता-उम्र, रोज़ाना एक खत पहुँचाता रहे उसके दोस्त को... वो उसके लिये अपने जैसा कुछ छोड़ जाना चाहती थी... उसे दोस्त की उदासी बिलकुल नहीं पसंद थी... वो कुछ ऐसा करना चाहती थी कि दोस्त उसके जाने के बाद भी उसकी कमी ना महसूस करे... उसे गीली मिट्टी बहुत पसंद थी... उसकी सौंधी सी खुश्बू ज़िंदगी का एहसास देती थी... उससे कुछ भी गढ़ा जा सकता था... उसने अपनी कल्पना के पंखों को फैलाया और कुछ सिरजना शुरू करा...

एक मुट्ठी तुम्हारी सौम्यता 
एक चुटकी तुम सा गुस्सा भी 
थोड़ी सी मेरी खीझ 
थोड़ी अपरिपक्वता 

कुछ कतरे तुम्हारे धैर्य के 
थोड़ी मुझ सी बेसब्री 
चंद छींटे तुम्हारा इश्क़
कुछ बूँदे मेरा जुनून 

मुस्कराहट तुम्हारी 
आँखें भी तुम सी ही 
चमकीली - गहरी कत्थई ! 
रँग दोनों का मिला जुला 

गर्भ की गीली मिट्टी से 
एक नयी सृष्टि गढ़ रही हूँ इन दिनों ! 
तुझे ही जन्म दे कर इक रोज़ 
मैं नया जन्म लेना चाहती हूँ

-- ऋचा

Sunday, December 14, 2014

कहाँ हो मेरे सैंटा... ख़्वाहिशों ने फिर दस्तक दी है...!


आज बड़ी सारी भीगी सीली रातों के बाद एक ख़ुशनुमा दिन खिला तो सोचा यादों की गठरी खोल के उन्हें भी थोड़ी सी धूप दिखा दूँ...  बैठी बैठी यूँ ही कुछ पुराने वर्क़ पलट रही थी यादों के कि अचानक ढेर सारी मीठी मीठी ख़्वाहिशों से लबरेज़ एक विश लिस्ट पर नज़र पड़ी...  कितनी तो प्यारी प्यारी ख़्वाहिशें लिखीं थीं उसमें... मेरी तुम्हारी... याद है वो दौर कि जब हर रोज़ हम उसमें अपनी एक ख़्वाहिश जोड़ा करते थे... एक दिन मेरी बारी होती, दूसरे दिन तुम्हारी... क्या पागलपन भरे दिन थे वो भी... कितने उजले, कितने प्यारे... ख़ुशियों से छलकते... बांवरा सा ये मन हर पल जाने किस दुनिया में विचरता रहता... अपनी ही धुन में मग्न... आज भी सोचो तो मुस्कुराहट होंठों पे बेसाख़्ता तैर जाती है...

एक एक कर सारी ख़्वाहिशों को पढ़ती गई तो पाया कि लगभग सारी ही तो पूरी हो चली हैं... समय भी तो बीत गया ना कितना... तो आओ आज इस उजले दिन में मिलकर एक नयी विश लिस्ट बनाते हैं... कुछ तुम अपनी ख़्वाहिशें जोड़ो इसमें... कुछ मैं अपने ख़्वाब टाँकती हूँ... कि कुछ ख़्वाहिश, कुछ ख़्वाब बचे रहें तो ज़िन्दगी जीने की ललक भी बची रहती है... और साथ मिल कर उन ख़्वाबों,  ख़्वाहिशों को पूरा करने का उत्साह भी बचा रहता है...

ऐसे ही किसी उजले से दिन एक लॉन्ग ड्राइव पे जाना है तुम्हारे साथ... दूर बहुत दूर तलक... जहाँ धरती और आसमां मिल कर एक होने का भ्रम देते हों... साथ ना होते हुए भी एकदम करीब... एक दूसरे में घुलते हुए से... एकसार... हमारी तरह...

किसी पूरनमासी की रात किसी ऊंचे पहाड़ की चोटी से चाँद देखना है... बिलकुल साफ़ शफ़्फ़ाक... इतना बड़ा गोया किसी ने आसमां से तोड़ के सामने वाली अल्हड़ पहाड़ी के माथे पे सजा दिया हो, बिंदिया बना के... इतना पास कि हाथ बढ़ाऊँ तो छू ही लूँ उसे... उसकी चाँदनी का शॉल ओढ़े पूरी रात तुम्हारे काँधे पे सर रख के ढेर सारी बातें करनी हैं...

किसी शांत नदी के तट पे बैठ तुम्हारी बाँसुरी सुननी है, भोर की पहली किरण के साथ... जब सुरों में बदल रही होंगी तुम्हारी साँसे उस बाँस के टुकड़े से गुज़र के... मेरे वजूद में भी घुल जायेंगे सातों सुर... तुम्हारी सिम्फनी के...
याद है हमारा पसंदीदा शहर वेनिस... पानी पे तैरते किसी ख़ूबसूरत जज़ीरे सा... वहाँ की सर्पीली गलियों में घूमना है तुम्हारे साथ हाथों में हाथ डाले... गंडोला पे बैठ के पानी में उतरता शाम का सूरज देखना है... दीवार से लग कर लकड़ी की ख़ूबसूरत नक्काशीदार खिड़की तक बढ़ती पीले गुलाब की बेल के नीचे तुम्हारा माथा चूमना है... मेरी ज़िन्दगी में आने के लिये...

देखो मैंने दर्ज करा दी अपनी चंद ख़्वाहिशें अब तुम्हारी बारी... तुम भी कुछ कहो...

तुम ये ही सोच रहे हो ना कि हमारी इन बाँवरी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिये इतने पैसे कहाँ से लायेंगे... पर हमारी ख़्वाहिशों को पूरा करने के लिये पैसों की ज़रूरत कब से पड़ने लगी जान... भूल गये क्या... हमारी दुनिया में बस चाहतों की करेंसी चलती है... जानते हो जान मैं दुनिया की सबसे अमीर लड़की हूँ कि मेरे पास एक पूरी गुल्लक भर के तुम्हारी हँसी के सिक्के हैं...

अच्छा छोड़ो ये सब... बाकी ख़्वाहिशें जब पूरी होंगी तब होंगी... एक ख़्वाहिश अभी पूरी कर दोगे... बोलो... कैन आई गेट अ टाईट हग... राईट नाओ ???


Friday, December 5, 2014

जागते जीते हुए दूधिया कोहरे से लिपट कर, साँस लेते हुए इस कोहरे को महसूस किया है ?



सर्दियाँ हमेशा से बड़ी पसंद हैं हमें... कि थोड़ा अलसाया, थोड़ा रूमानी, थोड़ा मिस्टीरियस, थोड़ा सूफ़ियाना सा ये मौसम बिलकुल अपने जैसा लगता है...

इन सर्दियों के पहले कोहरे ने आज सुबह सवेरे दस्तक दी... अमूमन आजकल देर से ही उठाना हो रहा है... गलती हमारी नहीं है... ये कम्बख्त रज़ाइयाँ तैयार ही नहीं होती अपनी गिरफ़्त से आज़ाद करने को... ख़ैर आज सुबह उनकी तमाम कोशिशों को नाकाम कर के बरामदे में पहुँचे तो देखा नर्म शफ्फाफ़ कोहरा अपनी पुर असरार ख़ुश्बू का मलमली शॉल ओढ़े लिपटा हुआ है धरती के आग़ोश में... जैसे सदियों से बिछड़े प्रेमी मिले तो बस एक दूजे से लिपट गए सब लोक लाज छोड़ छाड़ के... कितने देर तलक उनके इस पाकीज़ा मिलन को यूँ एक टक तकती रही... सोचा के फ्रीज़ कर लूँ इन दिव्य लम्हों को मन के कैमरे में...

मेरी इस टकटकी को तोड़ा बातूनी कबूतरों के एक जोड़े ने... जाने क्या गुटर गूं  - गुटर गूं लगा रखी थी सुबह सुबह... आप बेवजह हमें बोलते हो की हम बहुत बक बक करते हैं.. देखो इन्हें... इत्ती ठंडी में भी चैन नहीं है... ज़रूर मम्मी को कोई बहाना मार के आये होंगे सुबह सुबह कि बड़ा ज़रूरी कोई काम है और यहाँ कोहरे में छुप के बातें कर रहे हैं... ख़ैर करने दो.. हमें क्या...

ये कोहरा देख के हर बार ही मन होता है कि हाथ बढ़ा के छू लूँ इसे... या फूँक कर उड़ा दूँ... ताज़ी धुनकी रुई के जैसे कोहरे के इन फाहों को... जो बैठ गए हैं हर एक चीज़ पर और सब कुछ इनके ही रंग में रंग गया है.. या चुटकी भर ये कोहरा चाय में घोल के पी जाऊँ... या फ़िर लेप लूँ अपने तन मन पर मुट्ठी भर ये मदहोश कर देने वाली गंध... के जैसे साधू कोई भस्म लगा लेता है तन पर...

जानते हो कैसे मिली इसे ये भीनी ख़ुश्बू ? कोहरे और धरती के उस पाकीज़ा मिलन से... पर तुम तो न कुछ समझते ही नहीं... याद है कितना हँसे थे तुम... इक बार जब कहा था मैंने कि मुझे इस कोहरे की ख़ुश्बू बहुत अच्छी लगती है... कितना मज़ाक बनाया था तुमने मेरा... ये कह के कि तुम पागल हो बिलकुल... कोहरे की भी भला कोई ख़ुश्बू होती है... देखो न जान आज फिर से वही महक तारी है फिज़ा में अल-सुबह से... आज फिर तुम हँस रहे हो मुझ पर...

मुझे इस कोहरे की ख़ुश्बू वाला कोई इत्र ला दो न जानां.. कि ये कोहरे वाली सर्दियाँ पूरे साल नहीं रहतीं...!


Wednesday, September 3, 2014

जैसे कोई किनारा देता हो सहारा... मुझे वो मिला किसी मोड़ पर...!



तुमसे जितना झगड़ती हूँ प्यार उतना ही बढ़ता जाता है... रोती हूँ तो सपने धुल के नये से हो जाते हैं.. कुछ और चमकीले... तुम्हारे साथ हँसती हूँ तो उन सपनों में इन्द्रधनुषी रँग भर जाते हैं... तुम्हें हँसता देखती हूँ तो उनमें जान आ जाती है... हम तीनों मिल कर जी उठते हैं फिर से... तुम.. मैं और हमारे सपने...!

तुम्हारी मुस्कुराहट को पेंट करने का दिल करता है कभी कभी... काँच सी पारदर्शी तुम्हारी आँखें... उतना चमकदार रँग बना ही नहीं जो उन्हें कैनवस पे उतार सके... कभी कभी सोचती हूँ तुम्हारी रूह को एक काला टीका लगा दूँ... कहाँ बची हैं अब इतनी पाकीज़ा रूहें धरती पर... कहाँ रह गये हैं इतने साफ़ दिल इंसान...

मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... तुम्हें देखते हुए... तुमसे झगड़ते हुए... तुम्हें प्यार करते हुए.... उम्र के उस पड़ाव पर जब घुटनों में दर्द रहा करेगा... तुम्हारे गले में बाहें डाल मैं थिरकना चाहती हूँ तुम्हारी धड़कनों की सिम्फनी पे... मैं उड़ना चाहती हूँ तुम्हारे साथ तुम्हारा हाथ पकड़ के... तब जब ये दुनिया वाले शायद हमें शक की निगाहों से ना देखें... मैं पूरी दुनिया घूमना चाहती हूँ तुम्हारे साथ... वो सारे ड्रीम डेस्टिनेशंस जहाँ जाने का सपना हमने मिल कर देखा था... क्या तुम मुझे बाइक पर बिठा के एक लॉन्ग ड्राइव पर ले चलोगे तब... मैं महसूस करना चाहती हूँ हवा को अपने बूढ़े हो चले सफ़ेद बालों में...

मैं एक छोटा सा घर बनाना चाहती हूँ... किसी पहाड़ी गाँव में... जहाँ हम दोनों बुड्ढे बुढिया मिल कर बागवानी करेंगे... जंगल से लकड़ी बिन के लायेंगे... चूल्हे में खाना बनायेंगे... कच्ची पक्की रोटियाँ सेकेंगे... प्रकृति की सुंदरता निहारेंगे... चिड़ियों को दाना खिलायेंगे और सारा दिन फ़ुर्सत से बैठ कर सिर्फ़ बातें करेंगे...

आज सुबह से ही शहर का मौसम खुशनुमा सा है... कुछ अच्छा सा करने का दिल हो रहा है... तो इस खूबसूरत से दिन उस ऊपर वाले का शुक्रिया करना चाहती हूँ... तुम्हें मेरी ज़िंदगी में लाने के लिये... तुमसे मेरी ज़िंदगी खूबसूरत है दोस्त... तुमसे ही इस ज़िंदगी को मानी मिले हैं...!

मेरे पसंदीदा गीत तुम हो... तुम्हारा पसंदीदा गीत तुम्हारे लिये...


Friday, June 20, 2014

ख़ानाबदोश !



यात्रा करना कुछ कुछ ध्यान लगाने जैसा है... मेडीटेट करने जैसा... एक अनंत में ख़ुद को खो देने जैसा... एक असीम में ख़ुद को पा लेने जैसा... नयी जगह नये लोग नया वातावरण.. हर बार एक नया जन्म लेने जैसा... कितना रुच रुच के उस उपरवाले ने ये कायनात बनायी है... पूरी शिद्दत से... कहीं पेड़ कहीं पहाड़... झरने... जंगल... सागर... कहीं रेगिस्तान कहीं खेत खलिहान... ये प्रकृति कितनी ख़ूबसूरत है... जैसे हर कण में उसने अपना एक अंश छोड़ दिया है... और हम इंसानों के अन्दर एक यायावर की आत्मा... 

ये यायावरी ये ख़ानाबदोशी शायद थोड़ी ज़्यादा ही दे दी है उस उपरवाले ने हमें... पिछले जन्म की किसी बंजारन की आत्मा... थोड़ा सा समय बीतता है और लगता है बस अब कुछ दिनों के लिए कहीं घूम आना चाहिए... किसी नए शहर किसी नए कस्बे... और इस बार तो हद ही हो गयी... ढाई साल होने आ रहा है और हम कहीं जा नहीं पा रहे हैं... मन हर शाम एक अजीब सी बेचैनी से भर जाता है.. जैसे उसे भी सांस लेने को एक नयी खुली जगह चाहिए... पिछले साल फूलों की घाटी जाने का प्लान बनाया था... टूर ऑपरेटर को एडवांस पैसे भी जमा कर दिए, पर उत्तराखंड में पिछले साल आयी भयानक प्रलय से सारे टूर कैंसिल हो गए.. इस साल भी कोई ख़ास उम्मीद नहीं दिखती... तो आजकल किसी नयी डेस्टिनेशन की तलाश है... कहीं किसी दूसरे पहाड़ पर...

पहाड़ों में तो जैसे हमारी आत्मा बसती है... आज जब लोग सेविंग और रिटायरमेंट प्लान्स के बारे में सोचते हैं तो हम दूर किसी पहाड़ी पर एक छोटा सा कॉटेज लेने के बारे में सोचते हैं... वही किसी गाँव के किसी स्कूल में पहाड़ी बच्चों को पढ़ाते हुए तमाम उम्र गुज़र जाये तो क्या ही ख़ूब हो... उफ़ ये ख्वाहिशें... के हर ख्वाहिश पे दम निकले...

वैसे कितना कुछ है ना इस दुनिया में देखने को... एक्स्प्लोर करने को... छोटी छोटी जगहें... शहर... टापू... द्वीप... हिन्दुस्तान की बात करें तो काफ़ी हद तक हमने घूमा है... ज़्यादातर पहाड़... और बहुत कुछ है जो अभी देखना बाकी है... मुनार जाना है... केरेला देखना है... कच्छ का रण... कश्मीर... राजस्थान... गुजरात... दार्जलिंग... पेंगॉन्ग सो लेक... डलहौज़ी... चम्बा.. खजियार... लैंड्सडाउन... जिम कॉर्बेट... और भी न जाने क्या क्या... हमें उन सब जगहों पर जाना है... उन्हें महसूस करना है... आत्मसात करना है... कुछ पलों के लिये उन्हीं का हिस्सा हो जाना है...

ऐल्प्स की पहाड़ियाँ... सफ़ेद नीले घरों से जगमगाता मिकोनोस शहर... अमेज़न के घने जंगल... मालदीव्स का झिलमिलता नीला समुद्र... पानी में डूबता तैरता वेनिस... फ्रेंच वाइन यार्ड्स... ऑस्ट्रेलिया की ग्रेट बैरियर रीफ... लॉच नदी के किनारों पे बसा ख़ूबसूरत कोलमर शहर... फिलिपींस का डेडॉन आइलैंड... कैलाश मानसरोवर में बिखरे शिव...

सोचने बैठो तो एक के बाद एक नाम जुड़ते ही जाते हैं इस लिस्ट में... देखने को कितना कुछ है... और ज़िन्दगी कितनी छोटी... हर एक लम्हें में कितना कुछ जीना है... हर गुज़रते पल के साथ एक नया जन्म लेना है...!

Friday, May 10, 2013

रहें न रहें हम महका करेंगे...!



वो सारे ख़त जो कभी हमने एक दूजे को लिखे थे... वो सारी बेवजह की बातें... वो साथ बिताये अनगिनत पल... वो हँसी वो खिलखिलाहट जो अब तलक गूंजा करती है यादों की पिछली गलियों में... वो सारी शरारतें वो अटखेलियाँ... वो रूठना मनाना वो हँसना रुलाना.... हर वो लम्हा जो बीत कर भी नहीं बीता... ठहर गया है दिल की ज़मीं पर... तुम्हारी यादों के सुर्ख धागे में लिपटे बीते लम्हों के वो सारे सूखे फूल जिनकी ख़ुश्बू मन की जाने कितनी तहों के नीचे महफूज़ है... उन्हें बड़े प्यार से सहेजा है यहाँ.. हर एक पल हर एक लम्हां... यहाँ इस वर्चुअल दुनिया में...

हमारे ख़्वाबों की... हमारी ख्वाहिशों की दुनिया.. ये हमारी वर्चुअल दुनिया... जिसने हमारे बीच कभी भी दूरी को आने नहीं दिया... मीलों दूर होते हुए भी हम एक दूसरे से हमेशा जुड़े रहे... साथ रहे.. पास रहे... कितनी ख़ूबसूरत दुनिया है न ये... याद है तुम कभी कहा करते थे ये दुनिया उस दुनिया से बहुत ख़ूबसूरत है हमें कभी यहाँ से जाने को मत कहना... हम यही रहेंगे हमेशा.. बस हम और तुम...

कभी सोचा है जान कल जब हम न होंगे तो हमारे इस वर्चुअल वजूद का क्या होगा... क्या वो वर्चुअल दुनिया की ख़लाओं में अकेले यूँ ही भटकता फिरेगा...  मेरे बाद तुम मुझसे कैसे जुड़े रह पाओगे... क्या होगा उन सारे ख़तों जो मेरे ईमेल खाते में अब भी जमा हैं... पिकासा अकाउंट में इकट्ठी करी उन सारी तस्वीरों का... चैट हिस्ट्री में जमा तुम्हारी मेरी बातों का... मेरी उन सारी ब्लॉग पोस्ट्स का जो तुम्हारी थीं तुम्हारे लिए थीं... तुम्हारी याद कि उन सारी चमकती गिन्नियों का जो इस मेरे गूगल अकाउंट की गुल्लक में जमा हैं... मेरा ये सारा ख़ज़ाना क्या यूँ ही लावारिस सा पड़ा रह जाएगा...

नहीं जान.. इस ख़ज़ाने को यूँ ही गुम नहीं होने दे सकती मैं.. इसलिए लो आज ये सब तुम्हारे नाम करती हूँ... गूगल इनएक्टिव अकाउंट मेनेजर को बता दिया है मैंने कि मेरे बाद इस ख़ज़ाने की चाभी तुम्हें दे दे... सुनो, मेरे बाद इसे सम्भाल के रखना... मेरी ज़िन्दगी भर की जमा पूँजी है इसमें... मेरे वो सारे बचकाने ख्व़ाब... मेरी बे-सिर-पैर की ख़्वाहिशें... जिन्हें तुमने बड़े प्यार से पूरा किया हमेशा वो सब यहाँ जमा हैं... कल जब मैं नहीं होऊँगी तो भी इसके ज़रिये मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगी... तुम्हारा हमसाया बन के !

Thursday, April 18, 2013

पिओनी और इनूरी के देस में...




नीले पॉपी के बगल से होकर
वो जो अलसायी सी पगडण्डी मुड़ती है न
ठीक उसी पर आगे बढ़ना
मील भर के फासले पर
आबशारों की इक टोली मिलेगी
सुना है पूरनमासी की रात
आसमां से परियाँ आती हैं वहाँ

थोड़ा आगे बढ़ने पर
शफ्फाक़ बर्फ़ का जज़ीरा मिलेगा
न न उसके रंग पर मत जाना
दिल का बड़ा पाजी है !
संभल संभल के चलना उस पर
ज़रा सा कोई फिसला गया तो
मुआं खिलखिला के हंस पड़ता है

वहां से कुछ ही दूर पर
अलसाई सी पीली पिओनी का झुण्ड
हरी घास पर धूप सेंकता मिलेगा
बस वहीं से दायें मुड़ना
संभल कर… आगे ढलान है
सामने रुई के फ़ाहे सा नर्म
बादलों का इक दरिया होगा

जानती हूँ, दिल करेगा
उस मखमली दरिया में
पैर डाल के बैठो कुछ देर
रस्ते की कुछ थकन उतारो
पर वो मायाजाल है
उसमें फँसना मत... आगे बढ़ना

ज़रा ध्यान से सुनोगे तो
पास बहती नदी की शरारत सुनाई देगी
उसकी अठखेलियों से लजाये
कुछ गुलाबी फूलों की कतारें
नदी के किनारे दूर तक फैली होंगी
तुम भी उनकी ऊँगली थाम बढ़ते आना

आगे लाल और सफ़ेद फूलों की
इक बस्ती मिलेगी
आजकल कुछ नाज़ुक नारंगी
मेहमां भी आये हैं उनके देस
आदतन सब के सब बैठे
गप्पें मार रहे होंगे देवदार तले
या फिर भँवरे और तितली का
वाल्ट्ज देखते होंगे !

उनसे मिल के आगे बढ़ोगे तो
ओस में भीगी सकुचाई सी इक
जामुनी इनूरी मिलेगी
पीले गुलाब की दीवानी है
पर वो निरा जंगली ठहरा
अब तक उसका मन न समझा !

आगे रास्ता थोड़ा संकरा है
थोड़ा सा पथरीला भी
कोहरे के धुंधलके में
परिन्दों की आवाज़ का पीछा करते
जुगनुओं से कुछ नूर उधार ले कर
अपनी राह तलाशते, ये सफ़र अब
तुम्हें ख़ुद तय करना होगा

कुदरत की इस नायाब पेंटिंग में
जहाँ सूरज अपनी सारी लाली
घाटी के नर्म गालों पर मल कर
उसकी आग़ोश में जज़्ब हो जाता है
पहाड़ी के उस अंतिम छोर पर
मैं मिलूँगी
धरती की इस जन्नत में
तुम्हारा इंतज़ार करती !

-- ऋचा 


* पॉपी, पिओनी, इनूरी - फूलों की घाटी में खिलने वाले ३०० फूलों में से तीन फूलों के नाम !

Monday, May 14, 2012

राग पहाड़ी !



बंजारों सा ये मन उड़ते उड़ते जाने कौन शहर किस गली पहुँच जाता है हर रोज़... उसकी परवाज़ पर न तो कोई पहरा है न ही कोई सरहद उसे रोक पायी है कभी... बिना किसी रोक टोक कहीं भी, कभी भी चला जाता है... देखा जाए तो ये मन वो मुसाफ़िर है जिसे किसी मंजिल पर नहीं पहुंचना होता... उसे सिर्फ़ सफ़र करना होता है... भटकना ही जिसकी नियति होती है... वही उसकी प्रकृति भी और वही उसका शौक भी... अनवरत चलते रहने वाले इस सफ़र के दौरान बहुत से लोगों से उसका जुड़ाव होता है... मन मिलता है.. दो पल किसी के साथ ठहरता है, सुस्ताता है और फिर बढ़ चलता है अपने अगले पड़ाव की ओर...

ऐसे ही कुछ नए पुराने चेहरों के बीच से होता हुआ... कुछ जानी पहचानी और कुछ अनजानी गलियों से गुज़रता हुआ... ये मन उड़ चला आज पहाड़ों की ओर... जाने कैसा तो अजीब सा नाता है इन पहाड़ों से मन का... जाने किस जन्म का... जैसे कोई आवाज़ जो आपको पुकारती रहती हो हर पल... जैसे कान्हां की मुरली की धुन और मन राधा हो कर खिंचा चला आता है यहाँ... जैसे किसी भूले बिसरे गीत के बोल जो गूंजा करते हैं देवदार से ढकी इन ख़ूबसूरत वादियों में... जैसे बचपन का बिछड़ा हुआ कोई दोस्त जो लुक्का छिप्पी खेलते हुए दूर निकल आया और किसी चीड़ के पेड़ के पीछे खड़ा आज भी आपका इंतज़ार कर रहा हो कि आप आयें और उसे ढूंढ के जोर से बोलें, "पकड़ लिया... चल अब तेरी बारी..."

कितना सुकून मिलता है यहाँ आ कर... हर सू असीम शान्ति की एक उजली चादर फैली रहती है... ऐसी ख़ामोशी जो अकेले होते हुए भी आपको तन्हाँ महसूस नहीं होने देती... आपको मौका देती है ख़ुद से बात करने का, ख़ुद को समझने का... दिन के उजाले में जो ख़ामोशी आपको आकर्षित करती है, साँझ ढलते ढलते वही ख़ामोशी रहस्यमयी सी हो जाती है... एक अबूझ पहेली सी... देर शाम हुई हलकी बारिश की नमी हवा में महसूस होती है... फ़िज़ा में घुली गीले देवदार और चीड़ों की अनूठी ख़ुश्बू उसे और ज़्यादा रहस्यमयी बना देती है... और इस सब के बीच पेड़ों से छन के आती ठंडी हवा में लिपटी चाँदनी आपको किसी दूसरी ही दुनिया में ले जाती हैं... जहाँ आपका जन्मों का साथी आपका इंतज़ार कर रहा होता है... जुगनुओं की पायल पहने ख़्वाब आपको अपने आग़ोश में ले लेते हैं...


सूरज की पहली किरण के साथ ही पहाड़ों का रूप जैसे बदल सा जाता है... बर्फ़ से ढकी शफ्फाक़ चोटियाँ चाँदी सी चमक उठती हैं... मन एक बार फिर मचल जाता है बच्चों की तरह उस पर फिसलने को... कुछ दूर फिसलता हुआ आता है और फिर अचानक उड़ चलता है बादलों पर सवार होकर जंगल की सैर करने... वहाँ से नीचे देखो तो जहाँ तक नज़र जाती है सिर्फ़ हरा भरा जंगल दिखता है... अंतहीन... जैसे धरती सिमट कर बस इतनी सी हो गयी हो... इस हरियाली के परे कुछ भी नहीं... जंगल में गुलांची भरते हिरन और ख़रगोश दिखते हैं... दूर एक झरना जो बहुत शोर मचाता हुआ काफ़ी ऊँचाई से गिर रहा है... एक झील भी... और उसके एक सिरे पर किसी पहाड़ी देवी का मन्दिर भी... बादल उसी झील में उतरते हैं... जैसे वो भी देवी के दर्शन को आये हों... शाम होने वाली है... झील दियों की टिमटिमाहट से रौशन हो गयी है... मंजीरे और घंटियों की आवाज़ के बीच मन संध्या आरती में खो जाता है... कहता है आज यहीं बस जाओ... यहीं... इसी मन्दिर की सीढ़ियों पर... कल किसी और देस चलेंगे.....!




 

Thursday, May 26, 2011

.... कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले !


इस वीकेंड एक फिल्म देखी "दसवेदानिया - दा बेस्ट गुड बाय एवर"... यूँ तो ये फिल्म तकरीबन तीन साल पुरानी है... २००८ में रिलीज़ हुई थी... काफ़ी पसंद भी करी गई थी... और तब से ही ये फिल्म हमारी "थिंग्स टू डू" लिस्ट में पड़ी हुई थी... तो आख़िरकार देख ही डाली... अब हमारे जैसे आलसी ने तीन साल बाद भी इसे याद रखा और देख लिया ये भी क्या कोई कम अचीवमेंट है :) ख़ैर.. अपने अचीवमेंट्स का बखान फिर कभी...

हाँ तो वापस आते हैं फिल्म पर... इस फिल्म का जो नायक है बहुत ही सीधा साधा इन्सान है, आजकल के परिपेक्ष में सही-सही बोलें तो एकदम बोरिंग, भोंदू टाइप... ना कोई यार-दोस्त ना सोशल लाइफ... सिर्फ़ अपनी बूढ़ी माँ की सेवा करता है और नौकरी करता है... अकाऊंट्स मेनेजर है और अच्छा ख़ासा कमाता है पर ज़िन्दगी जीना नहीं जानता... वही रोज़ मर्रा की ज़रूरतों में सुबह से शाम करता है बस... हाँ एक काम और करता है, रोज़ाना सुबह उठ के सबसे पहले एक थिंग्स टू डू लिस्ट बनाता है - माँ कि दवाई लानी है, गीज़र सही करवाना है, ऑफिस से लौटते हुए सब्ज़ी लानी है, सब्ज़ी में तरोई नहीं लानी है... वगैरह, वगैरह, वगैरह...

एक दिन उसे पता चलता है कि उसे स्टमक कैंसर है... और उसके पास सिर्फ़ तीन महीने की ज़िन्दगी बाक़ी है... उसे समझ ही नहीं आता कि वो क्या करे... कैसे इस सिचुएशन को फेस करे... ऐसे में उसकी मदद के लिये आती है उसकी अंतरात्मा... वो रोज़ की तरह ही एक और लिस्ट बना रहा होता है... वही दवाई, गीज़र, इलेक्ट्रीशियन, तरोई टाइप... तो उसकी अंतरात्मा उससे पूछती है क्या उसकी ज़िन्दगी में और कोई ख़्वाहिशें नहीं हैं ? उसने सारी ज़िन्दगी यही तो किया है... ज़िन्दगी बीत गई पर उसे कभी जिया ही नहीं... तो क्यूँ ना ये बाक़ी बचे तीन महीने वो वो सब करे जो वो वाकई करना चाहता है... उन सारी अधूरी ख्वाहिशों को पूरा कर के इस दुनिया से, इस ज़िन्दगी से विदा ले... और सही मायने में उसके बाद शुरू होती है उसकी ज़िन्दगी... तीन महीने की ज़िन्दगी... जो वो सच में जीता है... दिल से...

ख़ैर ये तो थी फिल्म की बात... कभी मौका मिले और आपने भी हमारी तरह ना देखी हो अब तक तो ये फिल्म ज़रूर देखिएगा... अब आते हैं मुद्दे की बात पे... ये फिल्म देख कर बहुत से विचार उमड़े मन में... सोचा सही ही तो है... भविष्य तो कोई भी देख कर नहीं आया... कल हमारे साथ क्या होने वाला है किसी को कुछ नहीं पता... तो क्या अब तक जो ज़िन्दगी हमने गुज़ारी उसे क्या वाकई जिया या सिर्फ़ बिता दी... यूँ ही... आज अगर हमारी ज़िन्दगी का आख़िर दिन हो तो क्या हम संतुष्ट हो के जायेंगे इस दुनिया से... शायद नहीं... तो क्यूँ ना जो आज हमारे पास है उसे ही दिल से जियें... क्यूँ चीज़ों को उस कल पे टालें जिसका कुछ पता ही नहीं...

एक और सवाल आया मन में.. कि अगर इस फिल्म के नायक कि तरह हमारे पास भी चंद दिन ही बचे हो ज़िन्दगी के तो वो क्या सब है जो हम करना चाहेंगे यहाँ से जाने से पहले... मतलब हमारी "थिंग्स टू डू बिफोर आई डाय" लिस्ट :) ... अब यूँ तो हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले... और ये ख़्वाहिशें गाहे-बगाहे आप सब से शेयर भी करते आये हैं हम... तो इस बार आपका टर्न... सारी ना सही, एक-आध ख़्वाहिश आप भी शेयर कर लीजिये हमारे साथ... जो आप सच में करना चाहते हैं.. दिल से...


बहुत ज़्यादा तो नहीं हैं मेरी ख़्वाहिशें...

बस इक ठंडी सी सुबह
तुम्हारे काँधे पे सर रख के
पहाड़ों के बीच उगता सूरज देखना चाहती हूँ !

तुम्हारा हाथ थाम
साहिल की चमकती रेत पर कुछ दूर तलक
पैरों के दो जोड़ी निशान छोड़ना चाहती हूँ !

हरी की पौड़ी पर
एक बार तुम्हारे साथ
संध्या आरती देखना चाहती हूँ !

झील के पानी में घुले
शफ़क के पिघले रंगों को चुन
तुम्हारी एक तस्वीर बनाना चाहती हूँ !

तितली का पीछा करते कभी
किसी गहरे घने जंगल में कुछ पल
भटक जाना चाहती हूँ... तुम्हारे साथ !

इक चाँदनी रात में
छत पर तुम्हारी आग़ोश में बैठे हुए
एक टूटते तारे को देखना चाहती हूँ !

उस टूटते तारे से तुमको माँगना चाहती हूँ
हमेशा... हर जन्म के लिये...

क्या करूँ कि मेरी ख्वाहिशों का दायरा
बहुत छोटा है
तुम्ही से शुरू होता है
तुम पर ही सिमट जाता है !

-- ऋचा



A Thousand Desires such as these... A thousand moments to set this night on fire... Reach out and you can touch them... You can touch them with your silences... You can reach them with your lust... Rivers, mountains, rain... Rain against a torrid hill-scape... A thousand desires such as these....

Saturday, March 5, 2011

ओ दिल बंजारे... जा रे...




जाने क्यूँ ये दिल बंजारों के जैसा भटक रहा था पिछले कुछ दिनों से... यहाँ वहाँ.. वहाँ यहाँ... पहाड़... झरने... जंगल... बादल... नदी... बारिश... कहीं भी चैन नहीं था... जाने क्या ढूंढ़ रहा था... न जाने किसकी तलाश थी... जानती थी ये भटकाव अच्छा नहीं है... पर दिल था कि कुछ सुनने मानने को ही तैयार नहीं था... ज़िद्दी हो गया है आजकल... लगता है हम पर ही गया है :)

ख़ैर... आज जनाब को जाने कहाँ से सेमल और पलाश के फूल याद आ गये... और बस हमारी उँगली पकड़ के ज़िद शुरू... चलो न किसी जंगल में... सेमल और पलाश के फूल चुन के लायेंगे... ढेर सारे... सुर्ख़... दहकते हुए से... कितने ख़ूबसूरत लगते हैं न... एक अलग सा तेज... एक अलग सी आभा लिये हुए... जैसे लाल जोड़े में सजी कोई दुल्हन खड़ी अपने प्रियतम का इंतज़ार कर रही हो...

हाँ तो ये जनाब कहाँ मानने वाले... ज़िद पे अड़ गये तो अड़ गये... हमने समझाया भी यहाँ कहाँ रखा है जंगल और ये पेड़... पर नहीं, उन्हें तो फूल चाहिये... तो भाई उनका हाथ थाम चल दिये हम भी... हम, वो और हमारा कैमरा... ;)

कंक्रीट के इस जंगल में अभी भी कभी कभार ये भूले बिसरे पेड़ देखने को मिल जाते हैं... सो हमें भी मिल गया एक सेमल का पेड़... श्रृंगार रस से ओत-प्रोत किसी कविता सा... और बस दिल रीझ सा गया उसकी ये सुर्ख़ सुनहरी धज देख कर... बंजारा दिल बाँवरा हो गया... ना ट्रैफिक की परवाह... ना आते जाते लोगों की और ना अचरज से देखती उनकी निगाहों की... कि आख़िर इस लड़की को हो क्या गया है... बीच सड़क कैमरा ले कर सेमल कि फोटो लेने में ऐसी मगन है कि कुछ ख़्याल ही नहीं दीन दुनिया का... अब क्या किया जाये... "कुछ तो लोग कहेंगे... लोगों का काम है कहना..." तो उन्हें कहने दिया और हम मगन रहे... ढेर सारी फोटो लीं... ज़मीं पर बिछी सुर्ख़ चादर से कुछ फूल उठाये और वापस चल दिये... होंठों पे मुस्कान और दिल में संतुष्टि ले कर... जैसे जग जीत आये हों :)

पर ये ज़िद्दी दिल वापस आने को तैयार ही नहीं था... फिर क्या था कर दी एक शाम इस पागल ज़िद्दी दिल के नाम :) ... पास ही एक पार्क था... चल दिये उधर... कुछ देर टहले और फिर एक लोहे की बेंच पे बैठ के शाम की ठंडी हवा और पेड़ पौधों का लुत्फ़ उठा ही रहे थे कि अपने घोंसलों में लौटते कुछ पंछियों का झुण्ड वहाँ से गुज़रा और दिल फिर उड़ चला उन के साथ "पंछी बनू उड़ती फिरूँ मस्त गगन में..." गाते हुए...

सच कहूँ तो उसे रोकने का मन नहीं हुआ... आज कितने दिनों बाद इतना ख़ुश था... बच्चों के जैसे निश्छलता से खिलखिला रहा था... थक गया था शायद ख़ुद को समझाते बहलाते... ये सही है ये ग़लत... ये करो ये नहीं... लोग क्या कहेंगे... कोई बच्ची हो क्या तुम... उफ़... उफ़... उफ़... बस यार ! कब तक आख़िर दुनिया की, दुनियादारी की, सही-ग़लत की परवाह करे... आज बिना किसी की परवाह किये उड़ रहा था... आज़ाद... बेफिक्र...


ओ दिल बंजारे... जा रे... खोल डोरियाँ सब खोल दे... !!!




Monday, December 6, 2010

साँझ...


सुबह की धूप सी, शाम के रूप सी, मेरी साँसों में थीं जिसकी परछाइयाँ... देख कर तुमको लगता है तुम हो वही, सोचती थीं जिसे मेरी तन्हाईयाँ... था तुम्हारा ही मुझे इंतज़ार... हाँ इंतज़ार...

Monday, November 29, 2010

ख़्वाहिश !



लम्हा लम्हा ज़िन्दगी बीतती जाती है, चंद यादों को सिरजते दिन गुज़रते जाते हैं... अच्छे बुरे, सारे पल, फ़ना होते जाते हैं... अपने पीछे मुट्ठी भर ख़ुशियाँ, ओक भर क़सक और चंद कतरे प्यास छोड़ के... साल दर साल हम यूँ ही जिये जाते हैं... कभी फ़ुर्सत में बैठ के नज़र दौड़ाओ उस गुज़रे हुए कल की तरफ़ तो लगता है... काश, ज़िन्दगी को एक रेत घड़ी की तरह उलट सकते और एक बार फिर से वो सारे बीते हुए पल जी पाते अपने हिसाब से... तो उन्हें कुछ यूँ जीते... अपनी तरह से... वो सब जो तब नहीं कर पाये थे शायद अब कर लेते... थोड़ी ख़ुशियाँ और बटोर लेते... थोड़ी ग़लतियाँ और सुधार लेते... थोड़ी सी मिठास और भर लेते रिश्तों में... ज़िन्दगी में... ये ख़्वाहिशें भी ना... कितनी अजीब होती हैं...

सच... कभी कभी मन होता है काश की एक टाइम मशीन होती जिसमें बैठ के हम समय के इस चक्र को घुमा सकते... जहाँ मर्ज़ी आ जा सकते... अपने हिसाब से... ये वक़्त हमारा ग़ुलाम होता... हमारे हिसाब से चलता... सोचिये अगर ऐसा हो जाये तो... ज़िन्दगी को एक रिवाइंड और फॉरवर्ड बटन लग जाये तो... हां, एक पॉज़ बटन भी... सोच कर ही दिल ख़ुश हो जाता है... कितने सारे पल हैं ना जो फिर से जी सकेंगे... कितने लम्हों को फ्रीज़ कर सकेंगे... अच्छा बताइए वो कौन से पल हैं जिन्हें आप दोबारा जीना चाहेंगे... जिन्हें आप बदलना चाहेंगे :) हम्म... ढेर सारे !! है ना ?

अब फिलहाल तो ऐसी कोई टाइम मशीन आयी नहीं... तो सोच के ही ख़ुश हो लेते हैं :) कभी आयी तो आजमाएंगे ज़रूर....


कभी कभी सोचती हूँ
जो दे दे मौका
इक बार ज़िन्दगी
उसे फिर से जीने का

तो ज़िन्दगी का हाथ थाम
ले जाऊँ उसे पीछे
बहुत पीछे...

उस मोड़ तक
जहाँ से तुम्हारे साथ
तय कर सकूँ ये सफ़र

और बस चलती रहूँ
तुम्हारा हाथ थामे
ज़िन्दगी की आढ़ी-तिरछी
पगडंडियों पर...

-- ऋचा

Saturday, October 9, 2010

दिल का परिंदा...



मैं हूँ ग़ुबार या तूफ़ान हूँ, कोई बताये मैं कहाँ हूँ... जाने क्यूँ आज जी कर रहा है "गाइड" की रोज़ी जैसे झूम उठूँ इस गीत की धुन पे...


Monday, September 20, 2010

समय से परे...



वक़्त की नाव में बैठ कर
आओ चलें कुछ दूर
समय से परे

वहाँ,
जहाँ सूरज सदा चमकता है
फिर भी तपता नहीं
सिर्फ़ बिखेरता है
झिलमिल सी रश्मियाँ
जो ठंडक पहुंचाती हैं मन को...

वहाँ,
जहाँ कोई शोर गुल नहीं है
सिर्फ़ भीनी सी सरगोशियाँ हैं
हवाओं के कंगन की
पानियों की झांझर की
और मीलों फैले सुकून की...

वहाँ,
जहाँ समय थम जाता है
"तुम" और "मैं" का भ्रम मिट जाता है
बस वो एक लम्हा
जिसमे सिर्फ़ "हम" हों
एकाकार...

और फिर वक़्त की शाख़ से
तोड़ के उस लम्हें को
क़ैद कर के मुट्ठी में
नक्श कर के ज़हन में
समय के दायरे में
लौट आयेंगे...

-- ऋचा

Thursday, June 10, 2010

मासूम सी एक ख़्वाहिश...


पूरे दिन ऑफिस के बिज़ी हेक्टिक स्केड्यूल के बाद जब घर पहुँच के टी.वी. ऑन करो तो कुछ भी देखने लायक नहीं आ रहा होता है.... आधे चैनल्स पर तो वही सास-बहु के गंदे सीरीअल्स चल रहे होते हैं जिसमें घर की महिलायें एक दूसरे के लिये हमेशा कोई ना कोई षड्यंत्र रचा करती हैं... आधी रात में भी जागती हैं तो हेवी साड़ी और फुल मेकअप में... भगवान जाने कैसे मैनेज करती है इतना सब... सोते में भी शायद मेक अप ही टच अप करती रहती हैं... कोई न्यूज़ चैनल लगाओ तो या तो वही गन्दी राजनीति या किसी रिऐलिटी शो की चर्चा या फिर कोई तंत्र मन्त्र वाले बाबाजी आपकी सारी समस्याओं का इलाज बताते हुए दिखाई देते हैं... और कुछ नहीं तो कोई भी ऐरा गैरा क्रिकेटर "सचिन" को क्रिकेट खेलना सिखा रहा होता है... "उसे ये शॉट ऐसे नहीं मारना चाहिये था, शॉर्ट पिच बाल को कैसे मिस कर दिया, बाउंसर पे बैट छुआने की क्या ज़रुरत थी"... अब भला बताइये सचिन को ये खेलना सिखायेंगे :) खैर जाने दीजिये... आगे चलते हैं... कोई बिज़नस चैनल लगाओ तो सेंसेक्स का उतार चढ़ाव, मंदी, रिसेशन और टेंशन... अब कोई ये सब देख कर कैसे रिलैक्स कर सकता है भला... ऐसे में हमारा साथ देते हैं कार्टून चैनल्स और हमारा फेवरेट "टॉम एंड जेरी"... बिलकुल "स्ट्रेस बस्टर" की तरह काम करते हैं... यकीन ना हो तो कभी आज़मा के देखिएगा... एक कप गरमा गरम चाय और आधा घंटा टॉम और जेरी का साथ... सारी थकान, सारी प्रॉब्लम्स, सारी टेंशन मिनटों में छू मंतर... :)

कितनी अच्छी होती है इन कार्टून कैरेक्टर्स की दुनिया... हर समय बस मस्ती मज़ाक, धमाचौकड़ी, उछल कूद और शरारत और किसी बात की कोई टेंशन नहीं... बड़ा मज़ा आता है इन्हें देखने में... सुपर हीरो नहीं होते हैं पर फिर भी वो कुछ भी कर सकते हैं... २० मंज़िल की इमारत से छलांग लगा कर भी बच जाते हैं... पूरी की पूरी गाड़ी उनके ऊपर से गुज़र जाये फिर भी फ़ौरन ही उठ कर खड़े हो जाते हैं और फिर से वही शरारतें और मस्ती शुरू... कितने अच्छे होते हैं ना, कम से कम हम इंसानों से तो अच्छे ही होते हैं ये और इनकी मासूम दुनिया :)

कल ऐसे ही "टॉम एंड जेरी" देखते देखते मन में ख़याल आया की इंसानों कि इस बनावटी दुनिया से कितनी अच्छी और प्यारी है इनकी दुनिया... एक तरफ हम इंसानों की दुनिया में तो इमोशंस भी बनावटी हैं और जज़्बात भी और यहाँ तक की अब तो हँसी भी बनावटी होती जा रही है... वो क्या कहते हैं आज की भाषा में... "प्लास्टिक स्माइल"... और दूसरी तरफ हैं ये कार्टून कैरेक्टर्स जो सबको सिर्फ़ हँसी बाँटते हैं... बिना किसी बनावट या मिलावट के... कोई भी इनसे चिढ़ता नहीं, कोई भी इन्हें देख कर कभी उदास नहीं होता... ये सब सोचते सोचते "ऐज़ यूज़ुअल" फिर एक मासूम सी ख़्वाहिश जागी मन में :) काश हम भी इन कार्टून कैरेक्टर्स जैसे होते... एक बार जी के देखते इनकी दुनिया में... महसूस करते कि कैसी लगती है ये प्यारी, मासूम सी दुनिया अन्दर से... मन तो हुआ की बस टी.वी. में ही घुस जाएँ और उनके साथ ही ढेर सारी मस्ती करें कुछ देर... अच्छा ठीक है... अब ऐसे नहीं हँसिये... एक मासूम सी ख़्वाहिश ही तो थी... पूरी नहीं हो सकी तो क्या ख़ुशी तो फिर भी दे गयी :)


काश ये ज़िन्दगी
एक कार्टून फिल्म हो जाये
तुम टॉम और मैं जेरी
जेरी ज़्यादा क्यूट है ना
इसलिए मैं जेरी :)

कुछ देर जी के देखेंगे
उन कैरेक्टर्स की तरह
सारा दिन बस शरारत करेंगे
पूरे घर में
मस्ती, मज़ा, धमाल

एक दूसरे से लड़ेंगे भी
झगड़ेंगे भी
और रह भी नहीं पायेंगे
एक दूसरे के बिना
हाँ... कुछ कुछ ऐसे ही तो हैं हम भी...

कोई भी हमें देख कर कर
कभी उदास नहीं होगा
हम सिर्फ़ हँसी बाटेंगे सबको
चोट भी लगे कभी तो
फ़ौरन उठ के खड़े हो जायेंगे
और फिर शरारत शुरू

चूहे के बिल से घुस के
नल से निकलेंगे कभी
तो कभी टेबल पे चढ़ के
चाय के कप में डाइव मारेंगे
देखो... ज़रा ध्यान से चाय पीना...

यूँ ही हँसते खेलते
सबको हँसाते गुदगुदाते
ख़ुशियाँ और प्यार बाँटते
ये मुख़्तसर सी उम्र
बस यूँ ही बीत जाये...

हम्म... इत्ती सी तो ख़्वाहिश है बस
पूरी क्यूँ नहीं हो सकती !!!

-- ऋचा
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