Thursday, April 6, 2017

केरल डायरीज़ - २ : मिलना जल पर्वत से !



२९ जनवरी २०१७

बाहुबली फ़िल्म देखी है आपने ? अगर हाँ तो वो जल पर्वत तो याद ही होगा आपको... वो विशालकाय ख़ूबसूरत सा झरना जिस पर बाहुबली बचपन से चढ़ना चाहता है और अंततः चढ़ ही जाता है अपनी प्रेमिका से मिलने... जब पहली बार उस झरने को फ़िल्म में देखा था तभी से ये जिज्ञासा बनी हुई थी की क्या वाकई ऐसा कोई झरना है हिन्दुस्तान में... इतना विशाल... हालांकि ये तो अंदाज़ा था ही की कुछ तो फोटोग्राफी का कमाल है... फ़िर भी उसके बारे में जानने को गूगल खंगाला तो पता चला की वो केरल के थ्रिसूर डिस्ट्रिक्ट में स्थित अथिरापल्ली फॉल्स हैं... और सिर्फ़ बाहुबली ही नहीं दिल से, रावण, गुरु, पुकार और भी तमाम फ़िल्मों के गाने और सीन्स यहाँ शूट किये जा चुके हैं... बस तब से ही ये झरना केरल ट्रिप के हमारे "प्लेसिज़ टू विज़िट" लिस्ट में था... तो हमारी केरल यात्रा का दूसरा दिन इन फाल्स के नाम रहा... 

कोच्ची से करीब ७० किलोमीटर या यूँ कह लें की 2 घंटे की दूरी पर था ये फॉल... रास्ता बहुत सुन्दर नहीं था या फ़िर गर्मी के कारण पेड़ झुलसे झुलसे लग रहे थे... एक बार शहर पीछे छूटा तो गाँव के बीच से गुज़रती उबड़-खाबड़ सड़क भी बहुत ज़्यादा इनवाईटिंग नहीं लग रही थी... ऊपर से गर्मी इस कदर... लखनऊ के १२ डिग्री टेम्प्रेचर में सारा दिन जिस धूप की राह देखते थे कोच्ची के ३२ डिग्री टेम्प्रेचर में वो बरदाश्त के बाहर हो रही थी... ना शरीर और ना ही दिमाग एक दिन में हुए इस २० डिग्री के टेम्प्रेचर स्विच के साथ एडजस्ट कर पा रहा था... एक बार को तो लगा कि क्या यही वो केरल है जिसकी लोग तारीफ़ करते नहीं थकते... क्या इसी केरल को देखने के लिए हमने इत्ती जद्दोजहद की... देवभूमि की ऐसी कल्पना तो नहीं की थी हमने... खैर ये सब शायद गर्मी का ही असर था...

फॉल्स काफ़ी पहले ही टिकट काउन्टर है... टिकट ले कर गेट तक पहुँचे तो पता चला की गेट से करीब १०० मीटर अन्दर जाना है पैदल व्यू पॉइंट तक... पहाड़ी रास्ता था.. ऊँचा नीचा... यूँ तो ईंटो की सड़क बनी हुई थी पर रास्ते भर बहुत से बन्दर थे... बुज़ुर्गों या बच्चों के बैठने के लिए भी कोई बेंच वगैरा नहीं... ये बात बहुत अखरी हमें क्यूँकि हमारे साथ अधिकतर सीनियर सिटिज़न्स ही थे... खैर जैसे तैसे व्यू पॉइंट तक गए तो पता चला की अभी और नीचे जाना है... झरने की तलहटी तक... करीब करीब १०० मीटर की खड़ी ढलान और... जो बस नाम का ही रास्ता था... पगडण्डी मात्र... अब बड़े लोग तो किसी हाल में भी उसके आगे नहीं जा सकते थे.. तो सबको वहाँ बने एक रेस्टोरेंट में बिठा के हम बच्चे आगे चल दिये... 

अब तक झरने की एक झलक मिल चुकी थी.. तो और पास से उसे देखने की उत्सुकता बढ़ गयी थी... नीचे पहुँचे तो सफ़र की सारी थकान जैसे चंद सेकेंड्स में काफ़ूर हो गयी... सामने दिख रहा सफ़ेद झरना वाकई जल पर्वत था... ८० फूट की ऊँचाई से गिरता ये झरना चलाकुडी नदी पर स्थित है... इतनी ऊँचाई और इतना वेग था झरने में की पानी की बूंदे जैसे सफ़ेद रेशमी दुपट्टे में तब्दील हो गयी थीं... मन हो रहा था बस वहाँ पत्थरों पर बैठे पानी की बूंदों को यूँ धुएँ सा उड़ते हुए देखते रहें... जाने कितनी फ़ोटो और कितने वीडियो बना डाले ज़रा सी देर में.. हर ऐंगल से... बाहुबली फिल्म की बात करें तो वो पेड़ याद है क्या आपको जब जल पर्वत चढ़ने के दौरान सबसे आख़िर में रस्सी बाँध के तीर फंसाता है बाहुबली... वो पेड़ भी बनावटी नहीं था.. सच में था... १०० प्रतिशत असली.. बस फिल्म जितना बड़ा नहीं था पर था... हमने देखा उसे भी :)


अथिरापल्ली वाकई बहुत विशाल जलप्रपात है और उसे "निआग्रा ऑफ़ इंडिया" नाम मिलना कोई अतिश्योक्ति नहीं है... ये हाल तब था जब पिछले साल वहाँ बारिश कम हुई थी.. मानसून में जब ये झरना अपने चरम पे होता है तो वहाँ नीचे तक जाने की परमिशन नहीं होती... तब ऊपर व्यू पॉइंट से ही इसे देखा जा सकता है... नीचे इतना वेग होता है की कुछ ठहर ही नहीं सकता उसके आगे... वहाँ से वापस आने का मन तो नहीं हो रहा था फ़िर भी थोड़ी देर रुकने के बाद हम वापस आ गये... उतरते वक़्त की खड़ी ढलान अब वापस ऊपर चढ़ते वक्त खड़ी चढ़ाई बन चुकी थी.. बार बार बस एक ही ख़याल मन में आ रहा था कि इतनी सुन्दर जगह और रखरखाव इतना बुरा... क्यूँ हम हिन्दुस्तान के निआग्रा को थोड़ा और मेन्टेन कर के नहीं रख सकते... कम से कम टिकट लेते वक़्त ये तो आगाह किया ही जा सकता है की बुज़ुर्ग लोग या बच्चे इतना पैदल चल पाने की स्थिति में हों तो ही आगे जायें... खैर हम तो जब सुधरेंगे तब सुधरेंगे... सुधरेंगे भी या नहीं क्या पता... पर एक बार मानसून में इस जल पर्वत से फ़िर मिलने की इच्छा है !



( नोट - सभी फ़ोटो को बड़ा कर के देखने के लिए उन पर क्लिक करें )


Wednesday, April 5, 2017

केरल डायरीज़ - १ : यादों ने फिर दस्तक दी !



केरल से वापस आये आज पूरे 2 महीने हो गये... 10 दिन का ट्रिप एक ऐसे राज्य में जो न जाने कब से आपकी ट्रेवल बकेट में था... गए थे तो सोचा था की रोज़ डायरी लिखेंगे... वहाँ के सारे एक्सपीरियंसिज़... सारी अनुभूतियाँ... पर वो हो न सका... दिन भर का घूमना और रात होते होते थक के चूर हो जाना... हिम्मत ही नहीं बचती थी कुछ लिखने पढने की... सोचा वापस जा के लिखेंगे... और फ़ोटोज़ तो ले ही रहे हैं इतनी तो सब याद रहेगा... पर अनुभूतियों को शब्द देना आसान काम नहीं है... और जल्दबाज़ी का तो बिलकुल भी नहीं... 

वहाँ थे तो सुबह शाम फेसबुक लाइव कर कर के परेशान कर दिया था सबको पूरे 10 दिन... वापस आये तो दोस्त कहते कहते थक गये कि लिखो कुछ उस ट्रिप के बारे में... पर लिखने का महूरत नहीं निकला तो नहीं निकला... अब इसे आलस का नाम दे लें या कुछ और दोस्तों के सारे उलाहने सर माथे पर... 

आज लिखने बैठे हैं तो लगता है मानो यादें कुछ कुछ धुंधली हो चली हैं... वो चमक नहीं रही अब उनमें... फ़िर भी यादों को झाड़ पोछ के थोड़ा कुछ संजो रही हूँ यहाँ... उम्मीद है दोस्तों को निराश नहीं करुँगी... 

२८ जनवरी २०१७ 

केरल.. भारत का वो हिस्सा जहाँ इंद्रदेव सबसे पहले बारिशें भेजते हैं... वो हिस्सा जो दक्षिण में भारत का अंतिम छोर है... वो हिस्सा जो तकरीबन 600 किलोमीटर तक दिलफ़रेब फिरोज़ी रंग के अरब सागर से घिरा है... वो हिस्सा जो नारियल के पेड़ों और हरियाली से सराबोर है... वो हिस्सा जिसे "स्पाइस कैपिटल ऑफ़ दा वर्ल्ड" कहते हैं... वो हिस्सा जो न जाने कब से हमारी ट्रेवल लिस्ट में था... शायद तब से जब बचपन में जिऑग्रफी की बुक में पढ़ा था... या शायद तब से जब पहली बार टीवी पर कथकली नर्तकों को रंगबिरंगा मुखौटा लगा के अनोखी सी पोशाक में नृत्य करते देखा था... कुछ कौतुहल सा भर गया था मन में तब से ही... उस जगह को जानने का... वहाँ की संस्कृति को समझने का... ये जानने का कि आख़िर कश्मीर की ख़ूबसूरत झीलों, हिमाचल के ख़ुशनुमा पहाड़ों, कच्छ के चांदी से चमकते रण या फ़िर भारत के अनगिन ख़ूबसूरत हिस्सों में से केरल को ही क्यूँ चुना उस ऊपर वाले ने अपनी धरती के तौर पे... क्यूँ केरल को "गॉड्ज़ ओन कंट्री" यानी "देवभूमि" का दर्जा मिला... आख़िर ऐसा क्या है वहाँ...

इतने वर्षों का कौतुहल आख़िरकार इस साल वहाँ खींच ही ले गया हमें... बचपन से मैप पे हमेशा इत्तू सा मार्क करा जाने वाला केरल असल में इत्ता बड़ा है... इतना कुछ है वहाँ देखने को कि एक बार में सब कुछ  देख पाना लगभग नामुमकिन था... और इस ट्रिप पर हमें कन्याकुमारी और रामेश्वरम भी कवर करना था... तो आख़िरकार बहुत माथापच्ची के बाद कुछ जगहें फाइनल हुईं... और मन में ढेर सारा उत्साह लेकर हम चल दिए केरल से मिलने... वहाँ की संस्कृति को जानने समझने... तो आइये आपको भी मिलवाती हूँ केरल से... उस तरह जैसे हमने महसूसा उसे... 

केरल से पहली मुलाक़ात रात लगभग साढ़े नौ बजे हुई जब कोच्ची एयरपोर्ट पर लैंड किया हमने... मिलना तो था केरल की हरियाली से पर पहले गले मिली सियाह सी रात... एयरपोर्ट होटल से तक़रीबन 35 किलोमीटर दूर था... शहर के बाहर... रास्ता भी सन्नाटा था और रौशनी भी कम थी... सड़क के सिवा आस पास कुछ नहीं दिख रहा था... टैक्सी से होटल जाते वक़्त शीशे से बाहर अँधेरे में झाँक के सोच रहे थे कि यहाँ क्या होगा... नारियल के पेड़ होंगे या कोई नदी जैसा अब तक पिक्चरों और फोटो में देखते आये थे... ख़ैर तक़रीबन 45 - 50 मिनट बाद होटल पहुँचे जो मार्केट और मॉल्स से घिरा हुआ था... सामने मेट्रो रेल की लाइन गुज़र रही थी... कुछ भ्रम टूटे कुछ नये मन में घर कर गए... अगली सुबह क्या नया ले कर आयी ये अगली कड़ी में...!

Saturday, September 3, 2016

सात साल... सात जन्म... सात रंग इन्द्रधनुष के...!



ठीक ठीक याद नहीं अब सिवा इसके की ऐसे ही किसी मौसम में तुमसे पहली बार मिली थी... एक लंबा अर्सा गुज़र गया यूँ साथ चलते... आज सोचो तो लगता ही नहीं कि हम कभी अलग भी थे... इतने सालों में जाने कितने लम्हें बिताये तुम्हारे साथ... हर रंग में रंगे... सुर्ख भी... सब्ज़ भी... चमकीले भी... स्याह भी... कभी चटख गुलाबी तो कभी झील से नीले... हर लम्हें हर रंग का अपना मज़ा... पर वो पहला लम्हा वो पहला पल क्या कभी बुलाया जा सकता है... कोहिनूर सा चमकीला... सबसे अलग... कुछ अलग ही स्पार्क था उसमें... अलौकिक सा... रूहानी... जैसे उस एक लम्हे को वाकई उस ऊपर वाले ने ख़ुद ही रचा था हमारे लिये... रूहानी ही तो था हमारा मिलना.. है न ?

उस एक पल से ले कर आज तक हर लम्हा ये सफ़र ये हमारा साथ एक अलग ही एक्सपीरियंस रहा है.. कितना कुछ जिया हमने... हर वो ख़्वाब जो बिना हमारे मिले ख़्वाब ही रहता... वो सारी बचकानी ख़्वाहिशें जिन्हें तुमने पूरा किया... कितना कुछ तो लिख चुकी हूँ अपनी उन सारी ख़्वाहिशों के बारे में... साथ बिताये उन सारे पलों के बारे में... अब और क्या नया लिखूँ...

आज सोच रही हूँ... तुम्हारे साथ बिताये उन सारे चमकीले लम्हों को इक्कट्ठा कर के गर एक कलाइडोस्कोप बनाया जाये तो दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत रंग उनमें देखे जा सकेंगें... हर बदलते एंगल के साथ एक नयी पेंटिंग उभरेगी... बेहद ख़ूबसूरत... हमारे प्यार के रंगों में रंगी...

हमारे साथ का ये हर लम्हा तुम्हें भी मुबारक़ हो जान... तुम्हारी बहुत याद आ रही है आज.. बहुत मिस कर रही हूँ तुम्हें... बहुत ज़्यादा... बोलो न आज रात मिलोगे क्या... सपने में ?

ज़मीं पे न सही तो आसमां में आ मिल.. तेरे बिना गुज़ारा ऐ दिल है मुश्किल...!!!




*Paintings - Leonid Afremov

Thursday, August 18, 2016

चाय में चीनी सी ज़िन्दगी में घुली तुम्हारी नज्में...!



सुनो... एक कप चाय पियोगे हमारे साथ.. दो पल साथ बैठो ना... कि बड़े अर्से बाद आज थोड़ी फ़ुर्सत हाथ लगी है वो भी रात के इस पहर... और आज तुम्हारा जन्मदिन भी है तो तुमसे यूँ ही थोड़ी बातें करने का दिल चाह रहा है.. पिछले साल तो तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ लिख भी नहीं पायी तुम्हारे लिये... हाँ याद सारे दिन किया... सुनने में कितना अजीब सा लगता है ना.. कि लेखक ठहरे तुम और हम जैसे कोई बड़े फन्ने खां हैं जो तुम्हारे बारे में लिखेंगे... फिर भी जाने क्यूँ लोग तुम्हें ढूँढते हुए हमारे दरवाज़े आ जाते हैं... सही कहते हैं लोग इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते... तुमसे हमारा इश्क भी मशहूर हो चला है...

मोटर गैराज में रंगों के शेड्स मिलाते मिलाते जाने कब तुम ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से यूँ खेलने लगे... उनकी बारीकियों को ऐसे जान लिया... तुमने लिखना तो बहुत देर से शुरू किया पर शायद ज़िन्दगी के तजुर्बों को बचपन से ही आत्मसात करते गए थे... वो सब तजुर्बे जो तुमने अपने दिल में संजो रखे थे वो सब तुम्हारी नज़्मों में घुले हुए नज़र आते... तुम्हारी नज़्मों से गुज़रो तो समझ आता है कि वो ज़िन्दगी के इतने करीब कैसे हैं... बिना उन लम्हों को जिये कोई यूँ ही नहीं लिख सकता इस साफ़गोई से और दिल को यूँ छू लेने वाला और कभी कभी झकझोर देने वाला... सोचने पे मजबूर कर देने वाला... कुछ मायनों में तुम्हारी नज़्में हम सब का एक्सटेंशन हैं... हमारे लम्हों और हमारी ज़िन्दगी का एक्सटेंशन...

तुम्हारी नज़्में ज़िंदगी के हर लम्हें में घुल गयी हैं... कोई ना कोई नज़्म हर मोड़ पर हाथ थामे मिल ही जाती है... ख़ुशियों में... उदासियों में... प्यार में... तकरार में... सुनहरी सुबहों में... संदली शामों में... बारिशों के पानी में बच्चों सी छप-छप करती कोई, निम्मी निम्मी ठण्ड में आंगन में धूप सेकती कोई... चाँदनी रातों में बादलों का पश्मीना ओढ़े कोई... और तुम्हारी इन नज्मों से सिर्फ़ हम ही मुतास्सिर नहीं हैं.. यकीन नहीं तो ख़ुद देख लो.. जितने अच्छे से तुमने ये समझाया है कि नज़्म क्या होती है उतनी ही ख़ूबसूरती से ये विडियो बनाया गया है... जिसे चार मराठी डायरेक्टर्स ने अपनी फिल्म बाईस्कोप की ओपनिंग में इस्तेमाल किया था, ये फिल्म भी चार शायरों की नज्मों पर बनायी चार शॉर्ट फिल्मों के फॉर्मेट में एक अनूठा प्रयोग थी... तुमसे मुत्तासिर लोग भी तुम जैसे ही हो जाते हैं... अनकन्वेंशनल और सेंसिटिव !!!



आज का दिन तुम्हें और तुम्हारे चाहने वालों को बहुत बहुत मुबारक़ हो.. हैप्पी बर्थडे गुलज़ार साब... आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे चाहने वालों के लिए तुम्हारी पचास कहानियाँ छोड़े जाती हूँ...


Monday, July 4, 2016

आम के शहर से ख़ास मुलाक़ात !



बरसात का मौसम था और बादल सुबह से ही आँख मिचौली खेल रहे थे... कुछ कुछ हमारी तबीयत ही की तरह... हिम्मत नहीं पड़ रही थी जाने की पर सबका प्रोग्राम हमारी वजह से कैंसिल होता ये सोच के चल दिए हिम्मत कर के... नॉर्थ इंडिया की मैंगो कैपिटल घूमने... मलिहाबाद... लखनऊ से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर... यूँ तो पहले भी कई बार जाना हुआ पर आम के मौसम में ख़ास उनसे ही मुलाक़ात करने जाने का ये पहला मौका था... शहर की घनी आबादी से निकल कर जैसे जैसे काकोरी मलिहाबाद की ओर बढ़ रहे थे हवा में आम की मादक गंध घुलती जा रही थी... सड़क के दोनों ओर आम के घने बग़ीचे और सामने घने काले बादल... तबियत अब कुछ कुछ सँभलने लगी थी...

पद्मश्री हाजी कलीम उल्लाह ख़ान साहब की अब्दुल्ला नर्सरी पहुँचे तो समझ आया की भला किसी को आम उगाने भर के लिए पद्मश्री से क्यों नवाज़ा गया... हाजी साहब से तो भेंट नहीं हो पायी पर उनके बेटे और पोते से मिले... आम से ही मीठे लोग... इतने प्यार से पूरा बाग़ घुमाया... एक एक आम (ख़ास) से मिलवाया... किस आम की क्या ख़ासियत... किस का नाम कैसे पड़ा... कौन सा आम कब होता है... कौन ज़्यादा मीठा कौन कम मीठा... कौन देखने में सुन्दर कौन खाने में बढ़िया...

आम का वो ऐतिहासिक पेड़ जिस पर हाजी साहब ने ३०० से ज़्यादा किस्म के आम उगाये

 सचिन
उस पेड़ से भी मिलवाया जिसके लिये हाजी साहब को पद्मश्री से नवाज़ा गया... पेड़ क्या था मानो अपने आप में पूरा का पूरा बग़ीचा था... एक समूची विरासत... एक भरा पूरा कुनबा... 300 से भी ज़्यादा तरह के आम एक ही पेड़ पर... सचमुच अजूबा था... यूँ तो गाँव में हमारा भी आम का बाग़ था पर ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था... एक ही पेड़ पर सचिन से भी मिले और अखिलेश से भी... मोदी से भी और अनारकली से भी... दशहरी से भी और अल्फान्ज़ो से भी... क्या हुआ सोच में पड़ गए ? अजी ये सब आम की उन अलग अलग नस्लों के नाम हैं जो उस एक  पेड़ पर थे...


कटहल आम



आपसे कोई कहे की आम के पेड़ पर कटहल और शरीफा देखा तो क्या आप यकीन करेंगें ? नहीं ना... पर यकीन मानिये हमने देखा... आइये आपको भी मिलवाते हैं... ये जनाब हैं कटहल आम... इनका ये नाम इनके वज़न की वजह से पड़ा... तक़रीबन डेढ़ से तीन किलो का ये आम एक पतली सी डंठल के सहारे कैसे टिका रहता है इतने ऊँचे पेड़ पर ये तो वो ऊपर वाला ही जाने या जाने हाजी साहब...

शरीफा आम





और इनसे मिलिये ये जनाब है शरीफा आम... देखने में शरीफा और खाने में आम... शरीफा और आम की क्रॉस ब्रीडिंग से बना एक अजूबा... हालांकि स्वाद में बहुत अच्छा नहीं होता पर दिखने में बिलकुल अनोखा...






टॉमी ऐटकिंस




आगे चले तो मिलना हुआ टॉमी ऐटकिंस साहब से... देखने में सुर्ख़ लाल... पहली नज़र में आँखों का धोखा मालूम देता है... पर पास जा के देखा छुआ तो यकीन आया की जनाब सचमुच में आम ही है... स्वाद इनका भी बहुत अच्छा नहीं होता पर देखने में बेहद ख़ूबसूरत... यूँ लगता था मनो आम ने सेब के कपड़े पहन लिए हों... इस आम की ख़ासियत थी इनकी लॉन्ग शेल्फ़ लाइफ़... मतलब तोड़ने के बाद भी काफ़ी दिन तक ख़राब नहीं होते हैं ये...


अल्फान्ज़ो


हाँ महाराष्ट्र के मशहूर आम हापूस यानि अल्फान्ज़ो से भी मिले... देखा जाए तो पूरी दुनिया में आम के नाम से लोग अल्फान्ज़ो को ही जानते हैं... खाने में हल्का मीठा और देखने में ख़ूबसूरत... सब के सब तकरीबन एक ही कद काठी के मानो किसी साँचे में ढाले गए हों... पर हुज़ूर जिसने कभी दशहरी न चखा हो... जौहरी न खाया हो... चौसा से न मिला हो या लखनऊआ सफ़ेदा न चूसा हो उसे आम के बारे में मालूम ही क्या हो... यूँ ही कल बातों बातों में हाजी साहब के बेटे अज़ीम साहब से ज़िक्र छिड़ा की स्वाद में दशहरी अल्फान्ज़ो से कहीं ज़्यादा अच्छी होती है पर मशहूर अल्फान्ज़ो ज़्यादा है इसकी कोई ख़ास वजह तो उन्होंने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने अल्फान्ज़ो की मार्केटिंग काफ़ी अच्छे से करी है... उस पर बहुत पहले से सब्सिडी दी शायद यही वजह है की सारी दुनिया के लोगों तक वो ज़्यादा पहुँचा... पर अब जबकि यहाँ की सरकार भी दिलचस्पी ले रही है तो उम्मीद है जल्द ही दशहरी भी लोगों को आसानी से मुहैय्या होने लगेगी... 


आगे चले तो आम के बगीचे में पाइनएप्पल से भी मिले और नाशपाती, अमरुद और पपीते से भी... बाकी सब फल तो पेड़ों पर लगे हुए पहले भी देखे हैं पर पाइनएप्पल से यूँ मिलना पहली बार हुआ... हाजी साहब के बाग़ीचे में अर्से बाद आम के पेड़ों की डालियों पे चुहल करता बचपन फ़िर से मिला... जाने क्या क्या तो याद हो आया... पर उस बारे में फिर कभी बात करेंगे... क्योंकि बात निकलेगी तो फ़िर दूर तलक जायेगी... :)


आम के बग़ीचे में गए और आम का लुत्फ़ न लिया ये भी भला होता है कभी... कितने आम तो वहाँ से बीन के लाये... कितने वहाँ बैठ के खाये.. बचपन का हमारा फेवरेट आम सुर्खा मटियारा भी चखने को मिला वहाँ एक अर्से बाद... कभी आइये हमारे शहर तो मिलवायें आपको भी इस सब से...

वहाँ से निकले तो पास ही एक गौशाला देखने गए... आम के बाग़ों के बीच एक बेहद सुन्दर हनुमान जी का मंदिर... पास में ही एक तालाब था जिसके किनारे बतख मोर ख़रगोश जाने क्या क्या पला था... गायें तो खैर थीं ही... गौशाला के ही प्रांगण में कल आम की दावत थी... सब अपनी अपनी बाग़ का स्पेशल आम ले कर आये थे साथ ही आम का पना भी था... तो एक बार फिर आम की दावत कर के वहाँ से निकले...





 
मलिहाबाद की बात हो और जोश मलिहाबादी का ज़िक्र न आये ऐसा भला कहाँ मुमकिन है... मलिहाबाद को अलविदा करते हुए उनका वो मशहूर कलाम ज़हन में गूंजता रहा... "ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा...!



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