Saturday, January 28, 2012

तुम आये तो..........!



तुम आये तो पीले फूलों का मौसम फिर लौटा है देखो
तुम आये तो गौरैया फिर मेरे पेड़ों पे चहकने लगी
तुम आये तो सरगम हवाओं में फिर तैरने लगी
तुम आये तो ख़ुश्बू फिर बिखर गई फिज़ाओं में
तुम आये तो नीली झील का पानी फिर से लरज़ उठा
तुम आये तो चाँदनी फिर मुस्कुरा उठी
तुम आये तो लाल रंग कुछ और सुर्ख़ हो चला
तुम आये तो बारिशें फिर हसीन लगने लगीं
तुम आये तो इन्द्रधनुष फिर सज गया फ़लक पे
तुम आये तो आँखें फिर छलक उठी ख़्वाबों से
तुम आये तो ख़ुद पर फिर यकीं हो चला है
तुम आये तो होठों को भूली हँसी फिर याद आयी
तुम आये तो एहसासों ने फिर करवट ली
तुम आये तो जी करता है नाच उठूँ फिर से
तुम आये तो फिर जीने का दिल करता है
तुम आये तो..........!

Tuesday, December 20, 2011

कुछ ख़ुश्बूएँ यादों के जंगल से बह चलीं...



कुछ ख़ुश्बूएँ दिल के कितने क़रीब होती हैं... कभी होता है ना बैठे बैठे अचानक कोई ख़ुश्बू याद आ जाती है और बस मन बच्चों सा मचल उठता है उसे महसूस करने को... हाँ, इन ख़ुश्बुओं को बस महसूस करा जा सकता है बताया या समझया नहीं जा सकता... रूहानी सी कुछ ख़ुश्बूएँ... किसी नन्हें से बच्चे के हाथों से आती भीनी सी महक जैसी... पाकीज़ा सी कुछ ख़ुश्बूएँ... हवन वेदी से उठती पवित्र गंध जैसी... कोहरे में भीगी पहाड़ी पर चीड़ और देवदार से आती पुर-असरार सी कोई ख़ुश्बू, सम्मोहित कर के अपने मोहपाश में बाँध लेने वाली... रूमानी सी कोई ख़ुश्बू... जैसे बारिश की हल्की सी फुहारें पड़ने के बाद मिट्टी से उठने वाली सौंधी सी महक जो बस पागल ही कर देती है... सुकून देती कोई ख़ुश्बू जैसे सर्दियों की सुबह पेड़ से छन के आने वाली धूप की महक...

सर्दियों की रात अंगीठी में जलते कोयले की ख़ुश्बू... बारिश में भीगे मिट्टी के चूल्हे में जलती लकड़ी और उसमें सिंकती रोटी की ख़ुश्बू... सरसों के खेत से उठती सरसों के फूलों की तीखी गंध... आम के पेड़ पर आये नये कोपलों और बौर की ख़ुश्बू... गीली मेहँदी की ख़ुश्बू... किसी बेहद अज़ीज़ किताब के पन्नों से आती अतीत की ख़ुश्बू... इलायची वाली चाय की ख़ुश्बू... पुदीने की चटनी की ख़ुश्बू... गरम गरम भुट्टे पर नींबू और नमक की ख़ुश्बू... ताज़े भुने हुए अनाज की ख़ुश्बू... सर्दी की सुबह धुँध की ख़ुश्बू... जंगली फूलों की ख़ुश्बू... दादी के आँचल से आती वात्सल्य की ख़ुश्बू... बच्चों की आँखों से झाँकती शरारत की ख़ुश्बू... ब्लैक कॉफी से उठती कोई तल्ख़ सी ख़ुश्बू... सुबह सुबह झरे हरसिंगार की ख़ुश्बू..

आधी रात भीगे हुए मोगरे की ख़ुश्बू... चाँदनी की ख़ुश्बू... यादों की ख़ुश्बू... ख़्वाबों की ख़ुश्बू... साहिल की भीगी रेत की ख़ुश्बू... पीले गुलाब की ख़ुश्बू... पहले प्यार की ख़ुश्बू... लब-ए-यार की ख़ुश्बू... तुम्हारी ख़ुश्बू.....!



Friday, December 16, 2011

फिर नहीं सो सके इक सदी के लिये... हम दिलजले....



कानों में पहन के तेरी ख़ामोशी के सुर
साँसों में बसाये तेरी साँसों का मोगरा
खनकी रहती हूँ आरज़ू सी कभी...
महकी फिरती हूँ मुश्क़-बू सी कभी...

जाने ख़ुद को तुझमें छोड़ आयी हूँ या तुम्हें ख़ुद में बसा लायी हूँ... हमेशा के लिये... जाने क्या हुआ है पर कुछ तो हुआ है... आँखें भारी सी हो रही हैं गोया सदियों की नींद भरी हो उनमें... सोने का मन भी होता है पर नींद नहीं आती... भूख लगती है पर कुछ खाया नहीं जाता... किसी काम में दिल नहीं लग रहा... अजीब हाल है... बेवजह मुस्कुरा रही हूँ... बाँवरी सी... लगता है जैसे कोई बेहद ख़ूबसूरत ख़्वाब देखा है... या हक़ीक़त ख़्वाबों सी ख़ूबसूरत हो आई है... ये कैफ़ियत... ये गफ़्लत... उफ़ ! ये क्या कर दिया है तुमने मुझे...

धड़कने भी जाने कैसी दीवानी सी हो गई हैं... जाने किस सप्तक के सुर छेड़ रही हैं हर पल... बीथोवन की सातवीं सिम्फनी सी... ये कैसा सुरूर छाया हुआ है मुझ पर... नशे के ये किस भंवर में आ फँसी हूँ... जिस्म पर ये कैसी मदहोशी तारी है... साँसों में भी कुछ नशा सा घुलता हुआ महसूस होता है... जैसे नशे के किसी नमकीन महासागर में डूब के आयी हूँ... तुम्हारी कसम शराब को तो कभी हाथ भी नहीं लगाया... फिर ये नशा कैसा है... मैं सच में अपने होश खो बैठी हूँ क्या ?

ये कैसा मायावी जाल फेंका है कि ख़ुद-ब-ख़ुद खिंचती चली जा रही हूँ इसमें... ये कैसी कसमकस है... ये कैसी क़शिश है कि इससे बाहर निकलने का भी दिल नहीं होता... तुम सच में मायावी हो... जाने किस देस से आये हो... और आते ही मेरे दिल दिमाग़ सब पर तो कब्ज़ा कर लिया है... ना कुछ सोच पाती हूँ ना समझ पाती हूँ... फिर भी ख़ुश हूँ... बहुत ख़ुश... सुनो... इस क़ैद से कभी आज़ाद मत करना... ये बन्धन ज़िन्दगी बन गया है... इससे आज़ाद हुई तो मर जाऊँगी !

Thursday, November 3, 2011

प्यार भर देता है उड़ने की तमन्ना दिल में और मेरे पंख भी पत्थर के वो कर देता है...


"प्यार"... दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत एहसास... अपने नाम जितना ही प्यारा... कहते हैं इन्सान को ज़िन्दगी में एक बार प्यार ज़रूर करना चाहिये... प्यार इन्सान को बहुत अच्छा बना देता है... जिसे आप प्यार करते हैं उसके लिये जीना सिखा देता है और बेख़ौफ़ हो के मरना भी... जब आप किसी के प्यार में होते हैं तो सारी दुनिया किसी परी-कथा सी हो जाती है... जन्नत जैसी !

शुरू शुरू में प्यार किसी पहाड़ी नदी सा चंचल होता है... अल्हड़ और गतिशील... अपनी राह ख़ुद बनता हुआ... अपने रास्ते में आने वाली हर मुश्किल हर बाधा को अपने ही साथ बहा ले जाता हुआ... अच्छा बुरा, सही ग़लत... बिना कुछ सोचे समझे हम बस बहते चले जाते हैं उसके वेग में... सोच के वैसे भी कब किया जाता है प्यार... वो तो बस हो जाता है... सब अच्छा सब सही... प्यार में कुछ भी बुरा या ग़लत कब होता है... वो तो बिलकुल एक नन्हे बच्चे के समान होता है... मासूम और निश्छल... वो चंचल या अल्हड़ भले ही हो पर बुरा या ग़लत नहीं हो सकता... बच्चे को कब सही ग़लत का ज्ञान होता है...

समय बीतता है... उम्र का एक और पड़ाव आता है... प्यार में भी ठहराव आता है... अब वो पहले सा वेग नहीं रहता... जैसे मैदानी इलाके में आकर नदी का आवेग भी शान्त हो जाता है... एक स्थिरता आ जाती है... पर ध्यान से देखिये तो उसका फैलाव बढ़ जाता है और गहराव भी... अब आप उसमें डूब तो सकते हैं बह नहीं सकते... दिमाग़ कुछ कुछ दिल पे हावी होने कि कोशिश करता रहता है जब कब... तर्क वितर्क भी अपने पाँव पसारने लगते हैं मौका पाते ही... ज़्यादातर तो दिमाग़ हार ही जाता है ये लड़ाई... पर दिल तो दिल ठहरा... कभी कभार पसीज ही जाता है... दिमाग़ को भी एक लड़ाई जीत कर ख़ुद पे इतराने का मौका दे देता है...

दिल और दिमाग़ की ये जंग यूँ ही चला करती है... रही सही कसर परिस्थितियां पूरी कर देती हैं... कुछ भी अब पहला सा नहीं रहता... समय निरंतर बीतता रहता है... नदी भी धीरे धीरे बहते हुए अपने गंतव्य कि ओर बढ़ती रहती है... उसे एक दिन सागर में ही मिल जाना है... उसकी यात्रा का यही अंत है... पर प्यार... उसका क्या कोई अंत होता है कभी ? शायद नहीं... वो बीते लम्हों की यादें बन कर ठहर जाता है हमारे ही भीतर...

ये जो साग़र कि लहरें होती हैं ना... दरअसल ये वो सारे बीते हुए खुशनुमां पल होते हैं... नदी के शुरुआती दिनों का वेग जो लहरें बन जाता है... जाने कैसी ज़िद होती है फिर से वापस लौटने की... उन बीते हुए दिनों को फिर से एक बार जीने की... ये जानते हुए भी कि यात्रा अब ख़त्म हो चुकी... गुज़रा वक़्त दोबारा नहीं आएगा... फिर भी... यादें बन कर लहरें बार बार साहिल तक आती हैं... जाने किस तलाश में... ख़ाली हाथ वापस जाती हैं... पर हारती नहीं... थकती नहीं... शायद यही प्यार है... कभी ना थकने वाला... कभी ना हारने वाला...



भटकती फिरती हूँ
बंजारों सी
हर रोज़
सुबह शाम
तुम्हारी तलाश में
जाने किस घड़ी
तुम मिल जाओ
फिर से
उम्र के किसी
अनजान मोड़ पे
तुम्हारी यादों का इक घना जंगल
बसा है मेरे भीतर कहीं...

-- ऋचा




Sunday, October 9, 2011

हमने माना कि तगाफ़ुल ना करोगे लेकिन...



कैसी होती होगी वो हवा जो तुम्हारे देस में बहती है... कैसे होते होंगे वो लोग जो तुम्हें देख सकते होंगे.. छू सकते होंगे... तुमसे रु-ब-रु बात कर सकते होंगे... उस हवा में साँस लेते होंगे जहाँ तुम रहते हो... जानते हो न्यूज़ चैनल बदलते हुए कभी जब तुम्हारे शहर का ज़िक्र आता है तो उँगलियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं... जैसे उन्हें भी सुनाई देता है तुम्हारे शहर का नाम... उस भीड़ में जाने किस अनदेखे चेहरे को तलाशने लगती हैं आँखें... कोई बात भी करता है ना तुम्हारे शहर की तो दिल करता है उससे कहूँ बस ऐसे ही बोलता रहे और मैं ऐसे ही सुनती रहूँ उसे... जी भर के...

झूठ कहते हैं लोग कि दुनिया छोटी हो रही है, दूरियाँ सिमट रही हैं... दूरियाँ तो और बढ़ गई हैं... कल हमारे बीच महज़ ७०० किलोमीटर की दूरी थी जिसे हम बस चंद लम्हों में तय कर लिया करते थे... आज वो दूरी सुदूर बसे किसी ग्रह जैसी लगती है... सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर... चाह कर भी दूरियाँ अब सिमट नहीं पातीं... तुम तक मेरी पुकार अब नहीं पहुँच पाती... बीच में ही कहीं राह भटक कर हमेशा के लिये खो जाती है ब्रह्माण्ड में...

हमारा मिलना ऐसा था जैसे आरती कि थाली में जलता हुआ कपूर... पवित्र... सुगन्धित... किन्तु क्षणिक... तुम मेरे अंधेरों में रौशनी की तरह आये... तुम्हारी उँगली थाम उम्र की  एक पथरीली पगडंडी पार करी... ठीक वैसे ही जैसे एक नन्हा सा बच्चा किसी की उँगली थाम चलना सीखता है और अपनी ज़िन्दगी का पहला क़दम बढ़ाता है... तुमने जीने की नई वजह दी... एक लम्बे अरसे बाद मुझे ख़ुद से मिलवाया...

जानती हूँ तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब तुम्हें आवाज़ दे रही हैं... मैं भी क्या करूँ... तुम्हारी आदत हो गयी है... तुम्हारी उँगली थामे बिना चलना शायद वैसा ही हो जैसा उस नन्हें बच्चे का होता है... थोड़ा डरूँगी... कुछ पल डगमगाऊँगी... शायद गिरूँ भी... पर तुम मत डरना... थोड़ा समय लगेगा पर संभल जाऊँगी... तुम जाओ... अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करो... उम्र के किसी पड़ाव पर गर फ़ुर्सत मिले कभी और याद आये मेरी या मिलने का मन करे... तो चले आना... मैं यहीं मिलूँगी... यहीं, जहाँ हम पहली बार मिले थे...

हो सके तो बस इतना करना कि भरोसा नहीं टूटने देना... विश्वास रखना... मैं यहीं मिलूँगी... तुम्हारा इंतज़ार करते... सुनो... पहचान तो लोगे ना ?

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एक कहानी याद आ रही है... बहुत जल्दी ना हो तो सुनते जाओ.. गुलज़ार साब कि आवाज़ में -




[ ये खेल आख़िर किसलिये ? मन नहीं ऊबता ? कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम अपनी ज़िन्दगी में... खेल खेला है... खेलते रहे हैं... नतीजा फिर वही... एक जैसा... क्या बाक़ी रहता है ? हासिल क्या होता है ? ज़िन्दगी भर एक दूसरे के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क़ है ना ? आख़िर किसलिये ?

एक कहानी है... सुनाऊँ ? कहानी दो प्रेमियों की... दोनों जवान, ख़ूबसूरत, अक्लमंद... एक का दूसरे से बेपनाह प्यार... कसमों में बंधे हुए कि जन्म-जन्मान्तर में एक दूसरे का साथ निभायेंगे... मगर फिर अलग हो गये... नौजवान फ़ौज में चला गया... गया तो लौट कर नहीं आया... लापता हो गया.. लोगों ने कहा मर गया... मगर महबूबा अटल थी... बोली... वो लौटेगा ज़रूर... लौटेगा... पूरे चालीस सालों तक साधना में रही... वफ़ादारी से इंतज़ार किया... आख़िर एक रोज़ महबूब का संदेसा मिला... मैं आ गया हूँ, शिवान वाले मंदिर में मिलो... कहने लगी, देखा.. मैंने कहाँ था ना... दौड़ कर गई... मंदिर पहुंची... पर प्रेमी ना दिखाई दिया... एक आदमी बैठा था... एकदम बूढ़ा... पोपला मुँह.. टांट गंजी... आँखों में मैल... बोली.. यहाँ तो कोई नहीं... ज़रूर किसी ने शरारत की है... मायूस हो कर घर लौटी... वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया... कोई नहीं आया... चिड़िया का बच्चा तक नहीं.. हाँ, एक बुढ़िया आयी थी... कमर से झुकी हुई.. बाल उलझे हुए.. आँख में मोतिया-बिंध... मंदिर में झाँक कर देखा... कुछ बुड़बुड़ाई... और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गई... निराश हो गया बेचारा... बोला... उसने इंतज़ार नहीं किया... गृहस्ती रचाकर मुझे भूल गई... संदेसा भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आयी... किसलिये ? ... आख़िर किसलिये ये खेल ? ... मन नहीं ऊबता ? -- गुलज़ार ]
 
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