सुनो... एक कप चाय पियोगे हमारे साथ.. दो पल साथ बैठो ना... कि बड़े अर्से बाद आज थोड़ी फ़ुर्सत हाथ लगी है वो भी रात के इस पहर... और आज तुम्हारा जन्मदिन भी है तो तुमसे यूँ ही थोड़ी बातें करने का दिल चाह रहा है.. पिछले साल तो तुम्हारे जन्मदिन पर कुछ लिख भी नहीं पायी तुम्हारे लिये... हाँ याद सारे दिन किया... सुनने में कितना अजीब सा लगता है ना.. कि लेखक ठहरे तुम और हम जैसे कोई बड़े फन्ने खां हैं जो तुम्हारे बारे में लिखेंगे... फिर भी जाने क्यूँ लोग तुम्हें ढूँढते हुए हमारे दरवाज़े आ जाते हैं... सही कहते हैं लोग इश्क और मुश्क छुपाये नहीं छिपते... तुमसे हमारा इश्क भी मशहूर हो चला है...
मोटर गैराज में रंगों के शेड्स मिलाते मिलाते जाने कब तुम ज़िन्दगी के अलग अलग रंगों से यूँ खेलने लगे... उनकी बारीकियों को ऐसे जान लिया... तुमने लिखना तो बहुत देर से शुरू किया पर शायद ज़िन्दगी के तजुर्बों को बचपन से ही आत्मसात करते गए थे... वो सब तजुर्बे जो तुमने अपने दिल में संजो रखे थे वो सब तुम्हारी नज़्मों में घुले हुए नज़र आते... तुम्हारी नज़्मों से गुज़रो तो समझ आता है कि वो ज़िन्दगी के इतने करीब कैसे हैं... बिना उन लम्हों को जिये कोई यूँ ही नहीं लिख सकता इस साफ़गोई से और दिल को यूँ छू लेने वाला और कभी कभी झकझोर देने वाला... सोचने पे मजबूर कर देने वाला... कुछ मायनों में तुम्हारी नज़्में हम सब का एक्सटेंशन हैं... हमारे लम्हों और हमारी ज़िन्दगी का एक्सटेंशन...
तुम्हारी नज़्में ज़िंदगी के हर लम्हें में घुल गयी हैं... कोई ना कोई नज़्म हर मोड़ पर हाथ थामे मिल ही जाती है... ख़ुशियों में... उदासियों में... प्यार में... तकरार में... सुनहरी सुबहों में... संदली शामों में... बारिशों के पानी में बच्चों सी छप-छप करती कोई, निम्मी निम्मी ठण्ड में आंगन में धूप सेकती कोई... चाँदनी रातों में बादलों का पश्मीना ओढ़े कोई... और तुम्हारी इन नज्मों से सिर्फ़ हम ही मुतास्सिर नहीं हैं.. यकीन नहीं तो ख़ुद देख लो.. जितने अच्छे से तुमने ये समझाया है कि नज़्म क्या होती है उतनी ही ख़ूबसूरती से ये विडियो बनाया गया है... जिसे चार मराठी डायरेक्टर्स ने अपनी फिल्म बाईस्कोप की ओपनिंग में इस्तेमाल किया था, ये फिल्म भी चार शायरों की नज्मों पर बनायी चार शॉर्ट फिल्मों के फॉर्मेट में एक अनूठा प्रयोग थी... तुमसे मुत्तासिर लोग भी तुम जैसे ही हो जाते हैं... अनकन्वेंशनल और सेंसिटिव !!!
आज का दिन तुम्हें और तुम्हारे चाहने वालों को बहुत बहुत मुबारक़ हो.. हैप्पी बर्थडे गुलज़ार साब... आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुम्हारे चाहने वालों के लिए तुम्हारी पचास कहानियाँ छोड़े जाती हूँ...
आज ये चेसिस अस्सी बरस की हो गयी है... रूह अब भी ताज़ा है... दिल बच्चे सा मासूम... और लफ्ज़ जवां...!
कितना
कुछ लिख चुकी हूँ तुम पर... कितनी ही बार... तुम्हारे बारे में बात करते
हुए जाने कितने अनजान लोग दोस्त बने... वजह सिर्फ़ एक... तुम्हारे लिये
बेपनाह प्यार और इज्ज़त... तुम्हारे बारे में बातें करना.. दोस्तों से
तुम्हारी पोएट्री डिसकस करना... हमारा फेवरेट शगल बन गया है...
तुम्हें
पढ़ना... तुम्हारे बारे में पढ़ना... तुम्हारे बारे में दुनिया जहान के
रेडियो और टीवी इंटरव्यूज़ ढूँढ ढूँढ के सुनना देखना... ये आदत अब फितूर और
जूनून की हद से आगे बढ़ कर शायद कहीं परस्तिश की देहरी तक पहुँच गयी है...
जाने अनजाने तुम एक दोस्त... एक मेंटोर... बनते जा रहे हो... कितनी ही बार
ज़िंदगी के फलसफों को तुम्हारी नज़्मों में तलाशा है... कितनी ही बार मेरे
दर्द को तुम्हारे गीतों में पनाह मिली है... कभी किसी बड़े बुज़ुर्ग की
तरह सिर सहला के तुम्हारी नज़्में रिश्तों के मायने समझा गयी हैं... कभी खलाओं में
बिखरे हज़ारों करोड़ों सय्यारों को देखने का नया नज़रिया दे गयी हैं... कभी
उँगली पकड़ के मेले घुमा लाती है... तुम्हारी नज़्में भी तुम्हारी तरह ही
वर्सेटाइल हैं...
कभी एक मोटर गैराज में काम करते हुए तुम रंगों से
खेलते थे... बिमल दा तुम्हारी उँगली पकड़ के ले आये वहाँ से तब से तुम
लफ़्ज़ों से खेल रहे हो... तुम्हारे अन्दर छुपा वो आर्टिस्ट अब भी वही है.. एक्सप्रेशन का मीडियम
बदल गया बस... और तुम तो वैसे भी मल्टी फैसिटेड हो... कभी एक शायर... कभी
कहानीकार... कभी स्क्रीन प्ले लिखते हो कभी फ़िल्में डायरेक्ट करते हो... हर
फन में माहिर... तुम्हारी आवाज़ उन चंद आवाजों में से हैं जिनसे हम बेहद
मुत्तासिर हैं... जो सीधे रूह तक पहुँचती है... तुम्हारे लफ़्ज़ों की तरह... आज के दिन ज़्यादा कुछ नहीं सूझ रहा है कहने को... बस इतना ही की ये चेसिस हमेशा यूँ ही चुस्त दुरुस्त रहे... जन्मदिन मुबाराक़ को गुलज़ार साब !
जाते जाते तुम्हारे चाहने वालों के लिये तुम्हारा एक इंटरव्यू छोड़े जा रही हूँ यहाँ...
"गुलज़ार"... इस नाम ने हमेशा ही फैसिनेट किया है हमें... न सिर्फ़ उनकी
लेखनी ने बल्कि उनकी पूरी शख्सियत ने... उनकी आवाज़... उनका हमेशा कलफ़ किया
सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहनना... ज़रदोज़ी की हुई उनकी सुनहरी मोजरी... उनका
चश्मा होंठों में फंसा के लिखने का अंदाज़... हर बात कुछ हट के कुछ अलग...
आम होते हुए भी बहुत ख़ास... इतना क्रेज़ तो शायद आज तक कभी किसी फ़िल्मी हीरो
के लिए भी नहीं रहा होगा हमें... जैसा की आम तौर पर लड़कियों को होता है...
गुलज़ार साब के प्रति हमारा ये लगाव अब जग ज़ाहिर या यूँ कहूँ कि ब्लॉग ज़ाहिर बात हो चुकी है...
गुलज़ार साब का लिखा बहुत पढ़ा.. इन दिनों उनके बारे में पढ़ रही हूँ.. दो
किताबें मंगवाईं हैं पिछले दिनों फ्लिप्कार्ट से.. "In the company of a
poet" और "I swallowed the moon"...
In the company of a poet - नसरीन मुन्नी कबीर की गुलज़ार साब से एक
लम्बी बातचीत पर आधारित है... इस किताब के पन्नों से गुल्ज़रते हुए लगता है
गुलज़ार साब का कोई लम्बा इंटरव्यू चल रहा हो... अमूमन किसी मैगज़ीन में छपा
कोई इंटरव्यू हद से हद एक या दो पेज का होता है.. या रेडियो और टीवी
इंटरव्यू एक से दो घंटे का... पर यहाँ पूरे २०० पेज लम्बा इंटरव्यू है...
पूरी की पूरी किताब !
बचपन से लेकर गुलज़ार साब के स्ट्रगल के दिनों तक, दीना से लेकर दिल्ली
तक फिर दिल्ली से लेकर मुंबई तक, उनके उर्दू लिपि में लिखने से लेकर उनके
बंगाली प्रेम तक... उनकी पहली पढ़ी हुई किताब से लेकर पहली चुराई हुई किताब
तक... "शमा" में छपी उनकी पहली कहानी से लेकर (जिसका मेहेंताना उन्हें महज़
१५ रुपया मिला था) बंदनी के लिए "मोरा गोरा अंग लई ले" लिख कर फिल्मों में
आने तक... गीत लिखने से लेकर फिल्मों की कहानी लिखने तक... बाइस्कोप पर
सबसे पहली फिल्म सिकंदर देखने से लेकर फ़िल्में निर्देशित करने तक... मुंबई
के गैराज में काम करने से लेकर फ़िल्मी दुनिया के स्टॉलवर्ट्स को जानने और
उनके साथ काम करने तक... उन्हें जन्म देने वाली माँ से लेकर पालने वाली माँ
तक... भाई बहन पिता परिवार... यार दोस्त... राखी, बोस्की से लेकर समय तक..
उनकी ज़िन्दगी के हर एक पहलू को छूती है ये किताब... बहुत कुछ जो जानते थे
गुलज़ार साब के बारे में और बहुत कुछ जो कभी नहीं सुना या पढ़ा था कहीं...
किताब का फॉर्मेट भी दिलचस्प है... इंटरव्यू जैसा ही.. सवाल जवाब के
अंदाज़ में ही है पूरी बातचीत... ना सिर्फ़ फॉर्मेट में बल्कि कन्टेन्ट में
भी ये गुलज़ार साब पर लिखी हुई दूसरी किताबों से अलग है... ये किताब ख़ासतौर
पर गुलज़ार साब के बचपन से लेकर फ़िल्मी दुनिया तक के उनके सफ़र पर ज़्यादा
रौशनी डालती है...
हमारी दोपहरें आजकल इसी किताब के नाम हैं... हमारे साथ ही ऑफिस आती है
ये किताब भी.. और लंच के बाद का आधा घंटा ऑफिस के पास के पार्क में गुलज़ार
साब को जानते हुए ही गुज़रता है... और क्या खूब गुज़रता है...
जिस दूसरी किताब का ज़िक्र ऊपर किया है - "I swallowed the moon" उसे सबा महमूद
बशीर ने लिखा है... दरअसल सबा ने गुलज़ार साब की शायरी पर शोध यानी की PhD
करी है... यूँ तो शोध आम तौर पर नाम से ही हमें बोरिंग लगता है.. पर जब पता
चला की किसी ने गुलज़ार साब की शायरी पर पूरी थीसिस लिखी है तो पहला
रिएक्शन था "wow !" कितना मज़ा आया होगा ऐसे विषय पर शोध करने में...
ये किताब असल में उस शोध की ही उपज है...
यूँ तो सबा ने बड़ी ही
ख़ूबसूरती से इस किताब में गुलज़ार की शायरी की थीम उनके शब्दों और भाषा के
चुनाव पर रौशनी डाली है... फिर भी कहीं कहीं थीसिस का हिस्सा होना हावी हो
जाता है... अगर आप पूरी तरह से एक सिनेमा एन्थुज़िआस्ट नहीं है तो कहीं कहीं
शुरुआती हिस्से में ये आपको बोर कर सकती है... पर जब बात गुलज़ार की शायरी
की चलती है तो मन करता है एक के बाद एक पन्ने यूँ ही पढ़ते जाएँ...
किताब में बहुत ही डिटेल में बताया है की किस तरह गुलज़ार अपने शब्दों
के ख़ूबसूरत चुनाव से और अपनी इमेजरी से एक के बाद एक ख़ूबसूरत नज़्मे और
ग़ज़लें पेंट करते आये हैं... जिस पर हम जैसे पाठक हर बार अपना दिल निसार
करते हैं और आह भर के कहते हैं की कोई कैसे इत्ता ख़ूबसूरत सोच और लिख सकता
है...
लिखना तो लिखना उनकी तो बातें भी इतनी निराली होती है... अपनी
शायरी में अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों के उपयोग को गुलज़ार साब कितनी खूबसूरती
से समझाते हैं उसकी एक छोटी सी झलक आपको भी पढ़वाती हूँ...
हमारी रातों का चाँद आजकल इस किताब ने ही निगल रखा है...!
दोनों
ही किताबें पढ़ने की ललक इतनी थी की डिसाइड नहीं कर पा रहे थे की पहले किसी
पढ़ें और बाद के लिए किसे छोड़ें... तो हार कर ये तरीका निकाला... दिन के एक
किताब और रात को दूसरी... दोनों साथ साथ... आधी आधी पढ़ी हैं अब तक...
दोस्त लोग पागल कहते हैं हमें... हम भी इनकार नहीं करते... गुलज़ार को जानना
है ही ऐसा !
दाँतों में ऐनक की डंडी दबाये... काली स्याही से उर्दू जुबां में
जब... रेशमी हुरूफ़ों से कागज़ का आँचल रंगते हो... जानते हो किसी बूढ़े
फ़रिश्ते की मानिंद लगते हो... झक सफ़ेद कुरते पायजामे और पकी हुई दाढ़ी में
गोया चंद ख़राशें लिए चाँद अपनी पूरी आभा के साथ चमक रहा हो आसमान के आग़ोश
में...
तुम्हारी नज़्मों की तरह तुम्हारी शख्सियत भी बड़ी
रहस्यमयी सी है... तुम्हारी नज़्मों में कई परते होती हैं... बहुत से
मानी... पढ़ने वाला कितना समझ पाता है ये उसकी समझ और संवेदनशीलता पर निर्भर
करता है... जितनी बार पढ़ो उतनी बार नये आयाम खुल कर सामने आते हैं और लगता
है हाँ एक नज़रिया ये भी तो हो सकता है... तुम्हारी शख्सियत भी कुछ वैसी ही
है... आज तक तुम्हारे जितने भी इंटरव्यूज़ पढ़े या देखे हमेशा यही महसूस हुआ
कि जो तुम बताते हो उससे कहीं ज़्यादा सामने वाले को खुद समझना होता है...
तुम्हें कब से जानती हूँ मालूम नहीं पर हमेशा यही लगा की बरसों से
तुम्हारे लफ़्ज़ों को जीती आयी हूँ... मोगली से ले कर मेरा कुछ सामान तक...
हर मूड.. उम्र के हर दौर में तुम साथ थे... उदास होती हूँ तो लगता वो सारी
उदासी तुमने लफ़्ज़ों में पिरो के गीत की शक्ल दे दी है... खुश होती हूँ तो
उसकी लहक भी तुम्हारे बोलों में नज़र आती है... प्यार में होती हूँ तो तुम्हारे सारे गीत बेहद अपने से लगते हैं... जैसे मैंने ही अपनी डायरी में लिखा हो इन्हें...
बचपन
में कभी संडे को मोगली और पोटली बाबा की ले कर आ जाते तुम तो कभी प्यार
में पड़ने पर माया मुझ में जीने लगती... हाल ही में तकरीबन तुम्हारी सारी ही
फ़िल्में फिर से देखीं... उन सब में शायद इजाज़त हमारे दिल के सबसे करीब
है... पूरी फ़िल्म एक बड़ी नज़्म सी लगती है... या फिर किसी खूबसूरत पेन्टिंग
सरीखी... इन्सानी जज़्बातों और रिश्तों की पेचीदगी को कितनी खूबसूरती से
दिखाया है तुमने...
पंचम के साथ जो सफ़र शुरू किया था तुमने वो विशाल तक जारी है... तकनीक
भले बादल गयी पर रूह अभी तक ताज़तन है... आज अपने इंटरव्यूज़ तुम "Skype" पर
भी देते हो... और इससे तुम्हें मिलवाने वाला और कोई नहीं ऐ. आर. रहमान
हैं... जिन्होंने खुद "Skype" को तुम्हारे लैपटॉप में इंस्टाल किया और इसे
चलाना सिखाया तुम्हें... वही रहमान जिन्हें तुम बाल भगवान कहते हो... उम्र
के इस दौर में भी तुम्हारा दिल बच्चा है अभी तो इसका कुछ श्रेय तो विशाल,
रहमान जैसे लोगों को भी जाता है... और कुछ टेनिस खेलने के तुम्हारे शौक़
को... बाकि बची कसर "समय" ने पूरी कर दी... जिसके पीछे तुम सारा दिन दौड़ते
फिरते हो... पहले बोस्की के लिये किताबें लिखा करते थे और अब समय के
लिये...
तुम्हारी नज्में हों या फ़िल्में... नोस्टैल्जिया
से तुम्हारा लगाव साफ़ नज़र आता है... लोग शहरों में बस्ते हैं और तुमने अपने
अन्दर जाने कितने शहर बसा रखे हैं... दीना हो या दिल्ली जहाँ भी रहे वहाँ
का एक हिस्सा हमेशा के लिये तुम्हारे अन्दर ही बस गया... उसके गली, मोहल्ले, पेड़, सड़कें, लैम्पपोस्ट तक तुम्हारी नज़्मों में आज भी साँस लेते हैं... कैसे कर पाते हो इतना प्यार सबसे...
कैसे जुड़ जाते हो ऐसी बेजान चीज़ों से और उनमें भी जान फूँक देते हो...
चाँद को तो तुमने जैसे कॉपीराइट करा लिया है... आधा चाँद, पूरा चाँद, फीका
चाँद, गीला चाँद, रोटी सा चाँद, इतनी उपमाएं तो खुद ब्रह्मा ने भी नहीं
सोची होंगी चाँद को रचते समय...
जब तुमने समपूरण सिंह
कालरा की जगह खुद को "गुलज़ार" नाम दिया तो तुम्हारे बहुत से साथी शायरों ने
तुमसे कहा कि ये नाम कुछ अधूरा सा लगता है बिना किसी उपनाम के... आज इतने
बरसों बात ये नाम अपने आप में सम्पूर्ण है... गुलज़ार... सिर्फ़ गुलज़ार... जैसा तुम चाहते थे... जैसे अब लोग तुम्हें चाहते हैं...
तुम्हें चाहने वाले हर उम्र, हर दौर और दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं...
गुल्ज़ारियत को पूरी शिद्दत से मानने वाले... तुम्हारी ऐसी ही एक फैन और
सिडनी के एक रेडियो चैनल में काम करने वाली शैलजा चंद्रा से तुम्हारी
बातचीत की रिकॉर्डिंग कल रात ही हाथ लगी... सुनते सुनते कब रात के तीन बज
गये पता ही नहीं चला...
तुम्हारे जन्मदिन पर ख़ास तुम्हारे चाहने वालों के लिये यहाँ छोड़े जाती हूँ... जन्मदिन बहुत मुबाराक़ हो... लफ़्ज़ों का ताना-बाना बुनने वाले मेरे यार जुलाहे!
रफ़्ता रफ़्ता अर्श पे पहुंची है शान-ए-लखनऊ मिलती जुलती है फ़रिश्तों से ज़बान-ए-लखनऊ -- शफ़ीक़ लखनवी
अदब
और तहज़ीब के शहर में जन्म लेना और बड़ा होना आपके व्यक्तित्व पर ख़ासा असर
डालता है... एक आम मध्यम वर्गीय परिवार की बात करें तो बोलना सीखने के साथ
ही यहाँ एक अदबी लहज़ा ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाता है आपकी बोली में... यहाँ की भाषा
उन कुछ चीज़ों की लिस्ट में सबसे ऊपर है जो हमें हमारे शहर का दीवाना बनाती
हैं और उस पर फ़क्र करना भी सिखाती हैं...
हालाँकि अब वो पहले जैसी बात नहीं रही यहाँ की भाषा में भी... अंग्रेजी
के पीछे दौड़ती आज की युवा पीढ़ी अपनी मातृ भाषा बोलने में भी शर्म महसूस
करती है... तो अदब और तहज़ीब की बात कौन करे... बहरहाल... अभी भी बहुत से
ऐसे लोग बचे हैं जिन्होंने आज भी हमारी इस विरासत को सम्भाल रखा है...
जिनकी बदौलत ये दुनिया आज भी अदब और आदाब के इस शहर की कायल है... वो लोग
जो एक हाथ से बीते कल की डोर थामे हुए हैं और एक हाथ से वर्तमान की...
देखा जाये तो लक्ष्मण की नगरी और नवाबों के इस शहर लखनऊ में कोई एक
भाषा नहीं बोली जाती... अवधी, उर्दू और हिंदी का कुछ मिला जुला सा रूप
है... और तीन इतनी मीठी भाषाएँ जब आपस में घुल मिल कर एक हो जाएँ तो क्या
जादू करती हैं इसका असर आप सिर्फ़ लखनऊ आ कर ही महसूस कर सकते हैं...
अपनी चमक खोती जा रही लखनऊ की तहज़ीब और रवायत को एक बार फिर से संभाल कर उसी अर्श पर पहुंचाने की कवायद में बहुत से स्वयं सेवी संघ आगे आये हैं.. उनमें से ही एक जाना पहचाना नाम है "लखनऊ सोसाइटी"... जो लखनऊ की विरासत, उसकी कला और संस्कृति को एक बार फिर से जीवित करने में एक अहम् भूमिका अदा कर रहे हैं... पिछले दिनों इनकी एक मुहीम "Let's Save Calligraphy" से जुड़ने का मौका मिला...
ग़ालिब और फैज़ को पढ़ने के शौक़ ने यूँ तो थोड़ी बहुत उर्दू और फ़ारसी के
अल्फाज़ों की समझ दे दी थी पर उर्दू लिखना और पढ़ना चाह कर भी कभी सीखने का
मौका नहीं मिला... तो लखनऊ सोसाइटी की बदौलत हो रहे कैलीग्राफी या ख़त्ताती
के इन सेशंस में सबसे ज्यादा फायदा ये हुआ की उर्दू सीखने और समझने का मौका
मिला... जो की उम्मीद करती हूँ की इन सेशंस के ख़त्म होने के बाद भी सीखती
रहूंगी... ख़त्ताती और तुगराकारी तो खैर सीखा ही...
ख़त्ताती और तुगराकारी को ज़रा और पास से समझने के लिये लखनऊ की कुछ
पुरानी इमारते भी देखने गये हम सब... जिसमें हुसैनाबाद स्थित छोटा इमामबाड़ा
बेहद ख़ास है... 1838 में अवध के तीसरे नवाब मुहम्मद अली शाह द्वारा बनवाए
गये इस इमामबाड़े की ख़ासियत ये है कि इस पूरी इमारत कि बाहरी दीवार पर अरबी
में ख़त्ताती और तुगराकारी करी हुई है.. जो अपने आप में बेजोड़ है... दूर से
देखने में ये बड़ा ही कलात्मक प्रतीत होता है...
वो डायलॉग तो सुना ही होगा आपने फ़िल्म आँधी के गाने में... "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो
नहीं..." के बीच जब संजीव कुमार कहते हैं... "सुनो आरती, ये जो फूलों की बेलें नज़र आती हैं न, दरअसल ये बेलें नहीं हैं अरबी में आयतें
लिखी हैं..." कुछ वैसा ही महसूस हुआ उस दिन वो सब देख के... सब जीवंत हो आया था जैसे... खूबसूरत... बेहद खूबसूरत...!
बातों से बात निकलती है तो कैसे कड़ियाँ जुड़ती चली जाती हैं... है न... चलती हूँ अब... और आप सब को छोड़ जाती हूँ गुलज़ार साब की एक बेहद खूबसूरत नज़्म के साथ...
ये कैसा इश्क है उर्दू ज़बां का मज़ा घुलता है लफ्जों का ज़बां पर कि जैसे पान में महंगा क़माम घुलता है नशा आता है उर्दू बोलने में गिलोरी की तरह हैं मुंह लगी सब इस्तिलाहें लुत्फ़ देती हैं हलक़ छूती है उर्दू तो हलक़ से जैसे मय का घूँट उतरता है ! बड़ी एरिस्टोक्रेसी है ज़बां में फ़कीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दू अगरचे मानी कम होते हैं और अल्फाज़ की इफरात होती है मगर फिर भी बलंद आवाज़ पढ़िये तो बहुत ही मोतबर लगती हैं बातें कहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दू तो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं, खिड़की खुली है धूप अन्दर आ रही है अजब है ये ज़बां उर्दू कभी यूँ ही सफ़र करते अगर कोई मुसाफिर शेर पढ़ दे मीर-ओ-ग़ालिब का वो चाहे अजनबी हो यही लगता है वो मेरे वतन का है बड़े शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुनकर क्या नहीं लगता - कि इक तहज़ीब की आवाज़ है उर्दू ! - गुलज़ार
एक दोस्त हमेशा कहता है, शायद मज़ाक में... सच बोलते हुए इंसान बहुत ख़ूबसूरत
हो जाता है... पर महसूस करो तो उसकी बात सौ फ़ीसदी सही है... सच बोलते हुए
या सच स्वीकारते हुए आप हमेशा ख़ूबसूरत महसूस करते हैं ख़ुद को... एक आभा आ
जाती है चेहरे पर... शायद मन का सुकूं चेहरे पे झलक आता होगा... आज बहुत
समय बाद अच्छा सा महसूस हो रहा है... ख़ुद से सच बोल के... मन बहुत हल्का सा
लग रहा है...
हम अक्सर अपने रिश्तों को मुट्ठी में कस के पकड़ने की कोशिश करते हैं...
भूल जाते हैं रिश्ते बहता पानी होते हैं... जितनी कस के पकड़ने की कोशिश
करेंगे वो उतनी ही तेज़ी से हमारी मुट्ठी से बह जायेगा... छोड़ जायेगा बस
बीते लम्हों की कसक लिए एक नम सी हथेली.. और आज़ाद छोड़ दो तो चाहे कितनी भी
रुकावटें हो रास्ते में वो अपनी राह तलाशते हुए... अपनी जगह बनाते हुए...
अविरल बहता हुआ आ मिलेगा अपनी बिछड़ी धारा से...
जैसे एक फूल को सिर्फ़ छाया में रख के खिला नहीं सकते आप... उसे अपने
हिस्से की धूप भी ज़रूर चाहिए होती है... ठीक उसी तरह एक रिश्ते को भी हर
वक़्त आप ज़िन्दगी और परिस्थितियों की धूप से बचाए नहीं रख सकते... उसे इस
धूप में जलना होता है और इसमें तप के ही कुंदन बनना होता है... बहुत ज़्यादा
पानी और छाया में पेड़ की जड़ें गल जाती हैं.. पेड़ पनप नहीं पाता... और बहुत
ज़्यादा मीठे फल में कीड़े पड़ जाते हैं... कहने के मायने बस इतने की अति हर
चीज़ की बुरी होती है.. भले ही वो अच्छी चीज़ हो या अच्छे के लिए हो...
पौ
फूटने से पहले अँधेरा सबसे गहरा होता है... बेहद डरावना और उदास... ऐसी
स्याह तारीकी जो सब कुछ ख़ुद में छुपा ले, जज़्ब कर ले... पर सूरज की पहली किरण जब
उसे चीरती हुई धरती पे पड़ती है तो चिड़ियाँ चहक उठती हैं... फूल खिल जाते
हैं... धरती पर एक बार फिर जीवन शुरू हो जाता है...
अँधेरा छंट
चुका है... दिन एक बार फिर निकल आया है...
आज अपने रिश्ते को सारे बन्धनों
से मुक्त कर दिया है मैंने... उसे खुली हवा में फिर से साँस लेने की आज़ादी
दे दी है... उसे पनपने और मज़बूत होने की जगह दी है... बस अब इसे प्यार की
हलकी बौछार से सींचना है... आस पास उग आये घास पतवार को हटाना है और उसे एक
बार फिर से ख़ूबसूरत बनाना है...
बोलो दोगे मेरा साथ ?
मैं छाँव छाँव चला था अपना बदन बचा कर
कि रूह को एक ख़ूबसूरत सा जिस्म दे दूँ
न कोई सिलवट, न दाग़ कोई
न धूप झुलसे, न चोट खाये
न ज़ख़्म छुए, न दर्द पहुँचे
बस एक कोरी कुँवारी सुबह का जिस्म पहना दूँ रूह को मैं
मगर तपी जब दोपहर दर्दों की, दर्द की धूप से जो गुज़रा
तो रूह को छाँव मिल गयी है
अजीब है दर्द और तस्कीं का साँझा रिश्ता
मिलेगी छाँव तो बस कहीं धूप में मिलेगी
आज जब तुम्हें अपने एक दोस्त के बारे में बता रही थी तो तुमसे सुना
नहीं गया... बात को कैसे टाल गए थे तुम... जानते हो जान पूरे दिन में
सबसे ज़्यादा ख़ुशी का पल था वो मेरे लिए... तुम्हारी आवाज़ में वो चिढ़ बड़ी
प्यारी लग रही थी... बहुत दिनों बाद आज तुम्हारे अन्दर वो पज़ेसिव्नेस दिखी
अपने लिये... बहुत दिनों बाद आज फिर से ख़ुद पे गुमाँ हुआ...!
किसी पीर फ़कीर की दरगाह पर बंधा मन्नत का लाल धागा... या दुआओं का फ़ज़ल... के तुम मिले थे इक रोज़ यूँ ही... अचानक...!
मेरी बेनूर तन्हाई में घोला था तुमने एक मुट्ठी रँग अपने प्यार का... और मैं लरज़ उठी थी इन्द्रधनुष के रंगों से सजी एक कोरी चुनर सी... मेरे होंठों पे
चिपका दी थी तुमने एक मुस्कान बिलकुल अपनी मुस्कराहट की कार्बन कॉपी जैसी... और मिडास के जैसे छू के सुनहरी कर दिए थे वो सारे ख्व़ाब जो तैरा करते
थे मेरी पलकों में... मेरी मामूली सी ज़िंदगी में अपनी तिलिस्मी साँसें फूँक कर कहाँ खो गये तुम... ओ मेरे मायावी दोस्त...!
जानते हो ख्व़ाब क्यूँ आते हैं हमें ? सब उस उपरवाले का
किया धरा है... ये ख़ुदा भी ना... दिल तो दे दिया हमें.. ख्वाहिशें भी दे
दीं... पर हर ख्वाहिश पूरी कर सकें ऐसी क़िस्मत नहीं दी... सो ख्व़ाब दे
दिये... कि जी सकें हम वो सारे पल ख़्वाबों में जिन्हें हक़ीक़त में नहीं जी
सकते...
ख़्वाबों के सोपान पे पैर रख, कल रात आई थी तुम्हारे पास चाँदनी की
ऊँगली थामे... जाने क्या देख रहे थे सपने में तुम... बड़ी प्यारी सी
मुस्कुराहट थी होंठों पे... जी चाहा उस पल को वहीं थाम दूँ... या क़ैद कर
लूँ पलकों में वो प्यारी सी निश्छल मुस्कुराहट बिलकुल बच्चों सी मासूम...
आह ! के ये कमबख्त ख़्वाहिशें पूरी कहाँ होती हैं... के ख्व़ाब ख्व़ाब ही हुआ करते हैं...
हरे काँच कि चूड़ियों जैसे... शोख़, चमकीले, खनकते... और कच्चे !!!
दो नन्हीं मुलायम कोपलें... पहले पहल जब तोड़ के बीज का खोल... झाँकती हैं
बाहर... और लेती हैं पहली साँस खुली फिज़ा में... तो बेहद मासूम होती हैं...
बड़ी ही ऑप्टिमिस्टिक... चारों तरफ़ खुशहाली ही दिखती है उन्हें... नहीं
जानती कि कितने दिन बच पायेंगी किसी के पैरों तले कुचले जाने से... तुमसे
मिलने की उम्मीद भी गोया उन नाज़ुक कोपलों सी है... हर रोज़ फूट के निकलती है
दिल के खोल से... हर शाम कुचल जाती है सच के पैरों तले... उदास होती है...
नाकाम भी... ना-उम्मीद पर नहीं होती...!
हर शब इक उम्मीद सोती हैं... हर सहर नयी उम्मीद जगती है...!
कहते हैं आखें दिल का आईना होती हैं... लब झूठ बोल भी दें पर आँखें झूठ नही
बोल पातीं... दो पल झाँक के देखो उनमें तो दिल के सारे गहरे से गहरे राज़
खोल देती हैं... तुम्हारी गहरी कत्थई आँखें भी बिलकुल किसी मरीचिका सी हैं... एकटक
उनमें देखने की गलती करी नहीं किसी ने कि बस मोहपाश में बाँध के बिठा
लेती हैं अपने ही पास...
जानते हो तुम्हारी आँखें बेहद बातूनी हैं... हर रोज़
रात के आखरी पहर तक बातों में उलझा के मुझे जगाये रखती हैं... हर दिन ऑफिस
के लिये लेट होती हूँ मैं... देखना किसी दिन लिख ही दूंगी अटेंडेंस
रजिस्टर में देर से आने कि वजह...!
कुछ अक्षर बिखरे हुए थे... बेतरतीब से... यहाँ वहाँ... तुम जो आये तो...
उन्हें इक आकार मिला... अक्षर अक्षर शब्द बने... शब्द शब्द कविता, और कविता
कविता ज़िन्दगी...
सुनो जान... तुम मुझसे यूँ रूठा न करो... तुम
रूठते हो तो मेरे शब्द भी गुम हो जाते हैं कहीं... गोया तुम्हारा साथ मेरे
कलम की रोशनाई हो... तुम चुप होते हो तो ये भी सूख जाती है... गोया मेरे
सारे ख्याल तुम्ही से हैं... तुम नहीं होते तो एक वॉइड आ जाता है पूरे थॉट
प्रोसेस में... शब्द उड़ते फिरते हैं दिमाग की ख़लाओं में... तुम्हारे साथ का गुरुत्व मिले तो शायद ठहरें वो मन की ज़मीं पर...!
कुछ तो ज़रूर है तुम्हारे शब्दों में कि हर वो शख्स जिसने एक
बार भूले से भी पढ़ लिया तुम्हें, बकौल तुम्हारे, उसकी आदत बिगड़ ही जाती
है... तुम्हारी नज़्में उँगली थामे ज़िन्दगी के हर मोड़ पर मिल जाती
हैं... कभी बचपन के भेस में... कभी यादों के देस में... कभी चाँद पे
सवार... कभी बादलों के पार... तुम्हारे अनोखे मेटाफ़र्स को जीने लगते हैं
हम... हँसी सौंधी लगने लगती है... नैना ठगने लगते हैं... कभी जगते जादू
फूंकती हैं तुम्हारी नज़्में कभी नींदे बंजर कर देती हैं...
कोई कोई
दिन तो ऐसा भी आता है कि सुबह से शाम बस तुम्हारे गाने सुनते ही बीत
जाता है... क़तरा क़तरा मिलती है क़तरा क़तरा जीने दो... फिर से आइयो बदरा
बिदेसी... थोड़ी सी ज़मीं थोड़ा आसमां... तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई
शिक़वा तो नहीं... तुम आ गये हो नूर आ गया है... तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी... ओ
माझी रे... ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले... दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन... तुम सारा दिन यूँ ही घेरे रहते हो और हम कहते हैं आज कैफ़ियत बड़ी गुल्ज़ाराना है... जलन भी होती है कभी तुमसे... कितने चाहने वाले हैं तुम्हारे... इतनी शिद्दत से परस्तिश करते हैं तुम्हें कि एक नया धर्म ही बना दिया है तुम्हारे चाहने वालों ने - गुल्ज़ारियत !
जानते
हो तुम्हारे नाम का एक फोल्डर हर उस कम्प्यूटर, फ़ोन और आईपॉड में बना
हुआ है जिसे हम इस्तेमाल करते हैं... और हाँ किसी से कहना नहीं पर हमारा
दोस्त ना जलता है तुमसे :) हमारा ही क्या हर उस लड़की का जो तुम्हें पसंद
करती है... तुम्हारी नज़्मों में हर इक रिश्ते को जिया है हमने... जब कभी चल गुड्डी चल पक्के जामुन टपकेंगे चिल्लाते हुए रौशन आरा खेत कि जानिब भागते
हो तो बचपन का कोई भूला बिसरा दोस्त याद आ जाता है जिसके साथ जाने कितनी
ही दोपहरें ऐसी बचकानी हरकतें करते बिताई हैं... जब कहते हो बोस्की बेटी मेरी, चिकनी-सी रेशम की डली तो लगता है जैसे खुद हमारे पापा हमें आवाज़ लगा रहे हों...
बोस्की में तुम्हारी जान बस्ती है ना... जानती हूँ... उसे दो चोटियाँ
बना के स्कूल जाना होता था और वो भी एक बराबर कोई छोटी बड़ी नहीं होनी
चाहिये... तो तुमने चोटी बनाना सीखा बोस्की के लिये... हर साल उसके जन्मदिन
पर ख़ास उसके लिये लिखी कविताओं कि एक किताब उसे गिफ्ट किया करते थे.. बोस्की
का पंचतंत्र... और तुम्हारे घर का नाम भी तो बोस्कियाना है ना...
लोगों को शायद नहीं पता कि तुम्हें टेनिस खेलना कितना पसंद है... और आज भी सुबह उठ कर तुम टेनिस ज़रूर खेलते हो...और
क्या पसंद है तुम्हें ? बैगन बिलकुल भी नहीं पसंद खाने में :) है ना ?
हाँ, कलफ़ किया हुआ सफ़ेद कुर्ता पायजामा बहुत पसंद है तुम्हें, जिसे तुमने अपना
सिग्नेचर स्टाइल बना लिया है... कलफ़ भी इतना कड़क कि जाने कितने कुर्ते तो
पहनते वक़्त ही शहीद हो गये :) तुम्हारी नज्में भी तुम्हारे कुर्ते कि तरह ही हैं कभी सीधी सपाट चिकनी तो कभी उसकी सलवटों की तरह ही पेचीदा...
जब सुनती हूँ की तुम मीना कुमारी के लिये पूरे रमजान रोज़े रखते थे सिर्फ़
इसलिए कि उनकी तबियत नासाज़ थी और वो रोज़े ना रख पाने कि वजह से बेहद उदास
थीं, तो दिल से दुआ निकलती है कि ऐसा दोस्त सबको मिले... और जब कहते हो मैं अकेला हूँ धुँध में पंचम
तो जी करता है तुम्हारे दोस्त को कहीं से भी ढूँढ़ के वापस ला दूँ
तुम्हारे पास... तुम्हारी और पंचम की क्या कमाल की जोड़ी थी... वो संगीत के
साथ एक्सपेरिमेंट करते थे और तुम शब्दों के साथ... कितने गाने तो ऐसे खेल
खेल में ही बन जाते थे... तुम्हारा कोई फ्रेज़ पसंद आता उन्हें तो कहते थे इसे
इलैबोरेट करो... और करते करते पूरा गाना बन जाता था... तुमने भी तो पंचम के
कितने बंगाली गानों की धुनें चुरा कर उस पर अपने बोल लिख दिये...
तुमसे जब बात नहीं होती किसी दिन और तुम ख़ामोश, उदास से हो जाते हो तो जी करता है तुम्हारे गले में बाहें डाल कर गुदगुदा कर पूछूँ तुम्हें कहो यार कैसे हो ?
बरसों पहले जब उर्दू का एक हर्फ़ भी समझ नहीं आता था तो तुमने ग़ालिब को हमसे
मिलवाया था अपने सीरिअल के ज़रिये... पंजाबी नहीं आती थी तो तुमने अमृता से
मिलवाया उनकी नज़्में पढ़ के... ये तुम्हारी आवाज़ का ही जादू था कि पंजाबी
सीखने समझने कि इच्छा हुई... और अब टैगोरे से मिलवाने जा रहे हो उनकी लिखी
बंगाली कविताओं का तर्जुमा कर के... इतना कुछ करते रहते हो हम सब के लिये
कि जी करता है तुम्हारी पीठ थपथपा दूँ...
तुम शब्दों के जादूगर तो हो ही... पर तुम्हारी फिल्मों में ख़ामोशियाँ भी
बोलती हैं ये "कोशिश" के ज़रिये तुमने साबित कर दिया... जहाँ मौन ना सिर्फ़
बोला, उसने लोगों के दिलों को छुआ भी और उन्हें रुलाया भी... कैसे कर पाते
हो ऐसा... कैसे इतनी आसानी से समझ पाते हो इतने पेचीदा इन्सानी रिश्तों
को...
कितने ग्रेसफुल लगते हो आज भी सफ़ेद कुर्ते, सफ़ेद बालों, पकी हुई दाढ़ी और
मोटे फ्रेम के चश्मे में... तुम्हें देखती हूँ तो लगता है कि हमारे बाबा
होते तो ऐसे ही दिखते शायद... दिल करता है कभी कि बढ़ कर चरण स्पर्श कर लूँ
तुम्हारे... और आशीर्वाद ले लूँ उनकी तरफ़ से... तो कभी दिल करता है सिर पे
हाथ फेर के ढेर सारी दुआएँ दूँ तुम्हें... हमेशा स्वस्थ रहो और अपनी नज़्मों
और गीतों से अपने चाहने वालों के दिल ऐसे ही गुलज़ार करते रहो सदा...
जन्मदिन बहुत मुबारक़ हो गुलज़ार साब !
(राज्य सभा टी.वी. पर प्रसारित हाल ही में इरफ़ान जी द्वारा लिया गया गुलज़ार साब का इंटरव्यू)
23 जून 2012. बहुत बेचैन शाम थी आज... मन किसी पिंजरे में क़ैद पंछी के जैसे छटपटा रहा
था... बस पिंजरा तोड़ के उड़ जाना चाहता था... खुली फिज़ा में साँस लेने को
बेचैन... शाम के क़रीब पौने सात बज रहे थे... सूरज ढल चुका था... रात अभी
हुई नहीं थी... "ना अभी रात ना दिन, ना अँधेरा ना उजाला" वाली स्थिति थी...
किसी काम में मन नहीं लग रहा था... कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करें कि इस बेचैनी से राहत मिले... तो एक्टिवा निकाली और बस चल दिये... मम्मी ने पूछा कहाँ जा रही हो... अब पता
हो तब तो बतायें... बोला, मन नहीं लग रहा... ऐसे ही जा रहे हैं लखनऊ की
सड़कें नापने... ख़ैर निकल तो गये घर से पर अभी तक वाकई नहीं पता था कि कहाँ
जा रहे हैं...
फ़्यूल मीटर देखा... गाड़ी रिज़र्व में थी... आलस में पिछले कितने
दिनों से पेट्रोल नहीं डलवाया था... कहीं दूर जाना भी नहीं हुआ तो जैसे
तैसे काम चल रहा था... पर आज जब पता ही नहीं कहा जाना है तो रिस्क नहीं ले
सकते ना... तो सबसे पहले पेट्रोल पम्प... पेट्रोल डलवाया... हवा चेक
करवाई... जा कहाँ रहे हैं अभी तक नहीं पता... ख़ैर... आगे बढ़े... अब तक कुछ
अँधेरा भी होने लगा था... गोमती नदी का पुल पार किया तो सामने पीली सी
रौशनी में झांकता सादत अली खां के मकबरे का गुम्बद दिखा... दूर से बड़ा
अट्रैक्टिव सा दिखा तो चल पड़े उधर... यूँ तो वो शहर के बीचों बीच है और
जाने कितनी ही बार उसके सामने से गुज़रते हैं पर ज़िन्दगी की तेज़ रफ़्तार
उधर नज़र डालने का मौका भी नहीं देती... हाँ बचपन में बहुत बार गये हैं वहाँ
पर वो बस अब धुंधली सी यादें हैं... पास जा के देखा तो वहाँ रीस्टोरेशन का
काम चल रहा था... देख के अच्छा लगा कि पुरातत्व विभाग और सरकार ने कुछ तो
सुध ली ऐसी ख़ूबसूरत इमारतों को बचाने की...
फिर जाने क्या आया मन में और गाड़ी पुराने लखनऊ की ओर मोड़ दी... और बस चल
पड़े पुराने लखनऊ की सड़कें नापने :) ... शाम से ही हवा बड़ी अच्छी चल रही
थी... हवा की ठंडक और नमी बता रही थी कि कुछ लोगों में सुकून बाँट के और
उनकी दुआएं ले के आयी है... आस पास ही कहीं कुछ अब्र बरसे हैं शायद ! सड़कों
पर भी आज बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं थी... आज लखनऊ में नगर पंचायत और नगर निगम के
चुनाव थे तो सुबह से ही सब बन्द था... शाम के समय कुछ एक ही दुकाने खुली थी
और लोग भी कम ही थे सड़कों पर... शाम का वक़्त, सूनी सड़कें, ठंडी हवा...
कुल मिला के सुकून ! हम भी धीरे
धीरे, ३० की स्पीड पे चल रहे थे मौसम का आनंद लेते हुए... कहीं जाना ही
नहीं था तो कोई जल्दी भी नहीं थी...
बड़े इमामबाड़े का प्रवेश द्वार
थोड़ा आगे जाने पर बड़ा
इमामबाड़ा दिखा, इसे आसिफ़ी इमामबाड़ा भी कहते हैं... अँधेरा हो चुका था तो
अन्दर जाने का कोई फ़ायदा नहीं था... बाहर से ही थोड़ी बहुत फ़ोटोज़ क्लिक
करीं... क्या बुलंद इमारत है... इसके बनने के पीछे कि कहानी भी बड़ी
दिलचस्प है... सन १७८३ में इस इलाके में भीषण आकाल पड़ा था... अवध के लोग
भले भूखे मर जाएँ पर माँग के खाना उस वक़्त भी उन की शान के खिलाफ़ था... तब नवाब
आसिफ़-उद-दौला ने लोगों को रोज़गार देने के लिये इस इमामबाड़े का निर्माण
करवाया... आम प्रजा दिन में निर्माण का काम करती और उच्च वर्ग के लोगों से (क्यूँकि वो और कोई काम करने में सक्षम नहीं
थे)
रात के वक़्त दिन में हुए निर्माण को तुड़वा दिया जाता जिससे की लोगों को ज़्यादा दिन तक काम मिलता रहे... वो अकाल तकरीबन एक दशक से भी अधिक समय तक चला... और तब तक इस ईमारत
का निर्माण भी चलता रहा और लोगों को काम मिलता रहा... शायद इसीलिए कहा गया
होगा "जिसको ना दे मौला उसको दे आसिफ़-उद-दौला"... वैसे और भी बहुत कुछ
है इस इमामबाड़े के बारे में बताने को पर वो फिर कभी...
रूमी दरवाज़ा
बड़े इमामबाड़े के बाहर ही सड़क पर बना है रूमी दरवाज़ा जिसे लखनऊ का
प्रवेश द्वार भी कहते हैं और जो सारी दुनिया में लखनऊ की पहचान है... इसका
निर्माण भी उसी आकाल के दौर में हुआ था... अपने आप में कारीगरी का एक
बेमिसाल नमूना... पर रख रखाव के आभाव में अभी इसकी दशा भी कुछ ठीक नहीं है...
आज भी रोज़ाना सैकड़ों गाड़ियाँ इसके नीचे से गुज़रती हैं... उम्मीद है
पुरातत्व विभाग जल्द ही इसकी ओर भी ध्यान देगा...
इसी सड़क पर थोड़ा और आगे जाने पर हुसैनाबाद घंटा घर, सतखंडा, छोटा इमामबाड़ा और
हुसैनाबाद बाज़ार पड़ते हैं... वहाँ तक पहुँच के देखा तो घड़ी क़रीब पौने आठ
बजा रही थी... आगे कुछ ख़ास था भी नहीं देखने को और रात भी हो चुकी थी सो
वापस मुड़े... वापस आते हुए क्वालिटी वाल्स का ठेला दिख गया... गाड़ी रोक
के एक चॉकबार खायी और नौ बजे तक वापस घर... निकले थे बेमक़सद और देखिये ना
दो ही घंटो में कितना सारा सुकून ले कर वापस आये.. वो भी यूँ ही.. बेवजह !
P.S. :- घर आ के पापा को फोटो दिखायीं तो नेक्स्ट ट्रिप उनके साथ प्लान
हो गई... अगले जिस भी दिन मौसम अच्छा हुआ :) हाँ, इस बार इन सारी
इमारतों को अन्दर से घुमाउंगी... पक्का प्रॉमिस !
हुसैनाबाद बाज़ार
चलो ना भटकें लफ़ंगे कूचों में लुच्ची गलियों के चौक देखें सुना है वो लोग चूस कर जिन को वक़्त ने रास्तें में फेंका था सब यहीं आ के बस गये हैं ये छिलके हैं ज़िन्दगी के इन का अर्क निकालो कि ज़हर इन का तुम्हारे जिस्मों में ज़हर पलते हैं और जितने वो मार देगा चलो ना भटकें लफ़ंगे कूचों में
मैंने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है -- मिर्ज़ा ग़ालिब
एक वो दौर के जब पूछते थे कि ग़ालिब कौन है और एक ये जब कहते हैं होगा कोई ऐसा भी कि ग़ालिब को ना जाने...
ग़ालिब को जितना भी थोड़ा बहुत जाना-समझा है उसके पीछे सिर्फ़ और सिर्फ़ तीन लोगों का हाथ है... जो हमारे लिये ग़ालिब की रूह, शक्ल और आवाज़ बने... सबसे पहले और अहम वो शख्स जिसका ग़ालिब के प्रति लगाव और उन्हें आम आवाम तक पहुँचाने का जुनून और सपना एक टीवी सीरियल के ज़रिये हम तक पहुँचा... तब जब टीवी का मतलब सिर्फ़ दूरदर्शन हुआ करता था... और उम्र का वो दौर कि उर्दू फ़ारसी तो छोड़िए हिंदी के कठिन शब्द भी ब-मुश्किल ही समझ आते थे... उस दौर में भी वो शख्स जब अपनी पुरकशिश आवाज़ में बल्लीमारां के मोहल्ले की पेचीदा दलीलों की सी गलियों में एक कुरान-ए-सुख़न का सफ़हा खोलता था और कहता था कि यहाँ असद उल्लाह खां "ग़ालिब" का पता मिलता है तो उनकी आवाज़ की उँगली थामे हम भी पहुँच जाते थे क़ासिम की उन अँधेरी गलियों में... गुलज़ार, जी हाँ यही तो हैं वो शख्स जिन्होंने पहली बार ग़ालिब के बारे में जानने की शौक़-ए-तहकीक़ पैदा करी थी मन में...
कौतुहल से भरे हुए जब झाँक के देखा गली क़ासिम-जान में तो लम्बा सा चोगा पहने और लम्बी सी काली टोपी लगाये एक और शख्स नज़र आया... जाने कौन सी भाषा में कुछ बड़बड़ा रहा था और लोग वाह वाह किये जा रहे थे... मिर्ज़ा के शेर (जो उस वक़्त कम से कम हमारी समझ के परे थे) पढ़ते ये शख्स थे नसीरुद्दीन शाह... जिन्होंने ना केवल मिर्ज़ा ग़ालिब का किरदार निभाया इस सीरियल में बल्कि उस किरदार को इस हद तक जिया कि आज भी जब ग़ालिब को याद करते हैं तो नसीर साहब का चेहरा ही ज़हन में उभरता है... एक बार गुलज़ार साब अपने किसी इंटरव्यू में बता रहे थे की नसीर इस कदर खो जाते थे किरदार में कि शूटिंग के बाद उन्हें झकझोर के बाहर निकालना पड़ता था मिर्ज़ा ग़ालिब के किरदार से...
तीसरे शख्स वो जो तमाम दुनिया वालों के लिये ग़ालिब की आवाज़ बने... सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी... जब ग़ज़ल समझ भी नहीं आती थी तो उन्होंने ग़ालिब की आवाज़ बन के हमें ग़ज़लें सुनना सिखाया... बाज़ीचा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे, होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे... दीवानगी का आलम ये कि उस वक़्त १५० रूपये में मिलने वाले इस दो कैसेट के एल्बम को लेने के लिये जाने कितने महीनों का जेबख़र्च बचाया... दीवानगी कुछ और बढ़ी तो अब तक सिर्फ़ कानों को सुकून देती उन ख़ूबसूरत ग़ज़लों को समझने का भी दिल हुआ तो उसका भी जैसे तैसे इंतज़ाम करा... किसी कबाड़ी वाले कि दुकान से ग़ालिब की ग़ज़लों की एक किताब मिल गई... शायद ५ रूपये में... सारे मुश्किल शब्दों के अर्थ दिये हुए थे उसमें.. बस फिर क्या था... कैसेट प्लयेर पर जगजीत सिंह और हाथ में वो किताब... सालों लगे उन ग़ज़लों का मर्म समझने में... आज भी कितना समझी हूँ मालूम नहीं... हाँ प्यार ज़रूर हो गया है ग़ालिब की शायरी और शख्सियत से !
कुछ साल पहले मिर्ज़ा ग़ालिब सीरियल की विडिओ सीडी खरीदी और पूरा सीरियल फिर से देखा, जाने कितनी बार... इस बार शायद सही मायनों में थोड़ा कुछ समझ आया... गुलज़ार के निर्देशन में एक-एक चीज़ की डीटेलिंग इतनी अच्छी है कि बस तारीफ़ के कितने भी शब्द सूरज को दिया दिखाने जैसे होंगे... यकीन मानिये उसे देखते हुए रात के एक दो कब बज जाते थे पता ही नहीं चलता था फिर भी बन्द करने का दिल नहीं होता था... गुलज़ार साब, नसीर साब और जगजीत जी... ग़ालिब से हमारी पहचान कराने के लिये इन तीनों का ही तह-ए-दिल से शुक्रिया...
इतने सालों में अभी उस सीरियल और ग़ालिब की ख़ुमारी से बाहर निकल भी नहीं पाये थे कि उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए गुलज़ार साब ने एक जादू का पिटारा और थमा दिया... लो सुनो और फिर से मदहोश हो जाओ... इस जादुई पिटारे का नाम है तेरा बयान ग़ालिब... दो दिन से जो नशा चढ़ा है गुलज़ार साब की आवाज़ में पढ़े गये ग़ालिब के ख़ुतूतों का कि बस पूछिये मत... उसपर जगजीत जी की आवाज़ में ग़ालिब कि वो ग़ज़लें जो पिछले एल्बम का हिस्सा नहीं बन पायीं थी... गुलज़ार साब जब ग़ालिब के लिखे ख़ुतूत पढ़ना शुरू करते हैं तो एक बारगी लगता है आप ग़ालिब के ही दौर में पहुँच गये हैं... नसीर ना होते हुए भी जैसे हर पल ज़हन में उभरते रहते हैं... और जगजीत जी कि आवाज़... सब मिल कर ऐसा समां बाँध देते हैं... उफ़! कैसी कैफ़ियत है क्या बताऊँ...
बस अब और कुछ ना कह पाऊँगी... इतना कर सकती हूँ कि एक छोटा सा हिस्सा सुन देती हूँ आपको भी... बाक़ी अगर आपको भी ग़ालिब से प्यार है हमारी तरह तो ये सीरियल और ये एल्बम किसी भी कीमत पर छोड़ नहीं कर सकते आप...
बस बहुत, बहुत, बहुत ढेर सारा शुक्रिया गुलज़ार साब, नसीर साब, जगजीत जी, सलीम आरिफ़ जी और इस सीरियल और इस एल्बम से जुड़े हर उस शख्स का जिन्होंने ग़ालिब को हम तक पहुँचाया और माशा-अल्लाह क्या ख़ूब पहुँचाया !!!
कैसी होती होगी वो हवा जो तुम्हारे देस में बहती है... कैसे होते होंगे वो
लोग जो तुम्हें देख सकते होंगे.. छू सकते होंगे... तुमसे रु-ब-रु बात कर
सकते होंगे... उस हवा में साँस लेते होंगे जहाँ तुम रहते हो... जानते हो
न्यूज़ चैनल बदलते हुए कभी जब तुम्हारे शहर का ज़िक्र आता है तो उँगलियाँ
ख़ुद-ब-ख़ुद रुक जाती हैं... जैसे उन्हें भी सुनाई देता है तुम्हारे शहर का
नाम... उस भीड़ में जाने किस अनदेखे चेहरे को तलाशने लगती हैं आँखें... कोई
बात भी करता है ना तुम्हारे शहर की तो दिल करता है उससे कहूँ बस ऐसे ही
बोलता रहे और मैं ऐसे ही सुनती रहूँ उसे... जी भर के...
झूठ कहते हैं लोग कि दुनिया छोटी हो रही है, दूरियाँ सिमट रही हैं... दूरियाँ तो और
बढ़ गई हैं... कल हमारे बीच महज़ ७०० किलोमीटर की दूरी थी जिसे हम बस चंद
लम्हों में तय कर लिया करते थे... आज वो दूरी सुदूर बसे किसी ग्रह जैसी
लगती है... सैकड़ों प्रकाशवर्ष दूर... चाह कर भी दूरियाँ अब सिमट नहीं
पातीं... तुम तक मेरी पुकार अब नहीं पहुँच पाती... बीच में ही कहीं राह भटक
कर हमेशा के लिये खो जाती है ब्रह्माण्ड में...
हमारा मिलना ऐसा था जैसे आरती कि थाली में जलता हुआ कपूर... पवित्र...
सुगन्धित... किन्तु क्षणिक... तुम मेरे अंधेरों में रौशनी की तरह आये...
तुम्हारी उँगली थाम उम्र की एक पथरीली पगडंडी पार करी... ठीक वैसे ही जैसे
एक नन्हा सा बच्चा किसी की उँगली थाम चलना सीखता है और अपनी ज़िन्दगी का
पहला क़दम बढ़ाता है... तुमने जीने की नई वजह दी... एक लम्बे अरसे बाद
मुझे ख़ुद से मिलवाया...
जानती हूँ तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब तुम्हें आवाज़ दे रही हैं... मैं भी क्या करूँ... तुम्हारी आदत हो गयी है... तुम्हारी
उँगली थामे बिना चलना शायद वैसा ही हो जैसा उस नन्हें बच्चे का होता है...
थोड़ा डरूँगी... कुछ पल डगमगाऊँगी... शायद गिरूँ भी... पर तुम मत डरना...
थोड़ा समय लगेगा पर संभल जाऊँगी... तुम जाओ... अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी
करो... उम्र के किसी पड़ाव पर गर फ़ुर्सत मिले कभी और याद आये मेरी या
मिलने का मन करे... तो चले आना... मैं यहीं मिलूँगी... यहीं, जहाँ हम पहली
बार मिले थे...
हो सके तो बस इतना करना कि भरोसा नहीं टूटने देना... विश्वास
रखना... मैं यहीं मिलूँगी... तुम्हारा इंतज़ार करते... सुनो... पहचान तो लोगे ना ?
--------
एक कहानी याद आ रही है... बहुत जल्दी ना हो तो सुनते जाओ.. गुलज़ार साब कि
आवाज़ में -
[ ये खेल आख़िर किसलिये ? मन नहीं ऊबता ? कई-कई बार तो खेल चुके हैं ये खेल हम
अपनी ज़िन्दगी में... खेल खेला है... खेलते रहे हैं... नतीजा फिर वही...
एक जैसा... क्या बाक़ी रहता है ? हासिल क्या होता है ? ज़िन्दगी भर एक दूसरे
के अँधेरे में गोते खाना ही इश्क़ है ना ? आख़िर किसलिये ?
एक कहानी है... सुनाऊँ ? कहानी दो प्रेमियों की... दोनों जवान, ख़ूबसूरत, अक्लमंद... एक का दूसरे से बेपनाह प्यार... कसमों में बंधे हुए कि
जन्म-जन्मान्तर में एक दूसरे का साथ निभायेंगे... मगर फिर अलग हो गये...
नौजवान फ़ौज में चला गया... गया तो लौट कर नहीं आया... लापता हो गया.. लोगों
ने कहा मर गया... मगर महबूबा अटल थी... बोली... वो लौटेगा ज़रूर...
लौटेगा... पूरे चालीस सालों तक साधना में रही... वफ़ादारी से इंतज़ार
किया... आख़िर एक रोज़ महबूब का संदेसा मिला... मैं आ गया हूँ, शिवान
वाले मंदिर में मिलो... कहने लगी, देखा.. मैंने कहाँ था ना...
दौड़ कर गई... मंदिर पहुंची... पर प्रेमी ना दिखाई दिया... एक आदमी बैठा
था... एकदम बूढ़ा... पोपला मुँह.. टांट गंजी... आँखों में मैल... बोली.. यहाँ
तो कोई नहीं... ज़रूर किसी ने शरारत की है... मायूस हो कर घर लौटी...
वहाँ मंदिर में इंतज़ार करते करते वो भी थक गया... कोई नहीं आया... चिड़िया
का बच्चा तक नहीं.. हाँ, एक बुढ़िया आयी थी... कमर से झुकी हुई.. बाल उलझे
हुए.. आँख में मोतिया-बिंध... मंदिर में झाँक कर देखा... कुछ बुड़बुड़ाई...
और अपने ही साथ बात करते हुए दूर चली गई... निराश हो गया बेचारा...
बोला... उसने इंतज़ार नहीं किया... गृहस्ती रचाकर मुझे भूल गई... संदेसा
भेजा था, फिर भी मिलने तक नहीं आयी... किसलिये ? ... आख़िर किसलिये ये खेल ? ... मन
नहीं ऊबता ? -- गुलज़ार ]
ये कहाँ की दोस्ती है के बने हैं दोस्त नासेह
कोई
चारासाज़ होता कोई ग़मगुसार
होता
-- मिर्ज़ा ग़ालिब
कभी
कभी सोचती हूँ ग़ालिब साहब का एक अरसे पहले लिखा ये शेर आज के समय में भी
कितना प्रासंगिक है... जब आप ज़िन्दगी के एक ऐसे बुरे दौर से गुज़र रहे हो
कि कुछ ना सूझे, कुछ समझ ना आये... जब ग़म और ना-उम्मीदी के बादलों ने आपको
घेर रखा हो... आप चाह कर भी इन हालातों से बाहर ना निकल पा रहे हों... घर
वाले... बाहर वाले... सारी दुनिया के लोग सिर्फ़ और सिर्फ़ आपको उपदेश देने
में लगे हों... और तो और आपके दोस्त भी आपको नसीहतें ही देने लगें तो मन
झुंझला जाता है... ऐसे में दिल करता है कि कोई ऐसा दोस्त हो जो बस आपको सुन
भर ले... कोई नसीहत ना दे... एक ऐसा दोस्त जिसके काँधे पर सिर टिका कर आप
चुपचाप बैठे रहें... कुछ ना कहें फिर भी ख़ुद को बेहद हल्का महसूस करें...
वो दोस्त जो आपकी परेशानियाँ नहीं बस थोड़ी सी ख़ामोशी बाँट ले... यकीन
जानिये जिस किसी के पास ऐसे दोस्त होते हैं दुनियाँ में उनसे ज़्यादा
ख़ुशनसीब और कोई नहीं होता...
दोस्ती... हमारी नज़र से
देखिये तो दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता... हर दुनियावी रिश्ते से
बड़ा... शायद "प्यार" से भी बड़ा... जहाँ ना कोई स्वार्थ होता है, ना कोई
नसीहत... दोस्त कभी जजमेंटल नहीं होते... आलोचनात्मक नहीं होते... हाँ आपका
भला ज़रूर चाहते हैं, चाहते हैं कि आप हमेशा ख़ुश रहें और अगर आपमें कोई
कमी है, कोई बुराई है तो वो सुधर जाये... पर इस सब के बावजूद आप जैसे भी
हों आपके दोस्त आपको वैसे ही अपनाते हैं आपकी कमियों के साथ... आपकी
नाकामियों के साथ... किसी भी हाल में वो आपको अकेला नहीं छोड़ते...
आज के मतलबपरस्त दौर में जब दुनिया के तमाम रिश्ते अपने मायने खोते जा रहे
हैं... रिश्तों पर से आपका विश्वास डगमगाने लगा है... ऐसे दौर में भी
दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जिसने उम्मीद की लौ को जलाए रखा है... हर लड़खड़ाते
कदम पर आपका हाथ थामा है... आपको वो सुकून दिया है वो हिम्मत दी है कि आप
अकेले नहीं हैं... कोई है जो हर पल हर हाल में आपके साथ खड़ा है... आपका
दोस्त !
*********
कल रात दो बेहद करीबी दोस्तों ने दो बिलकुल अलहदा सी बातें कहीं... एक ने
दोस्ती का शुक्रिया अदा किया तो दूसरे ने हमसे दूर जाने कि बात कही...
दोनों ही बातें दिल को छू गयीं... तो पहले दोस्त से बस इतना कहना है कि
दोस्ती में शुक्रिया नहीं किया करते दोस्त और दूसरे से ये कि तुम्हारा
मुझसे दूर जाना हम किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं कर सकते... ऐसा दोबारा
फिर कभी ना सोचना ना कहना... "I really need u my friend... can't fight
this situation alone... don't u ever dare think of going anywhere..."
तुमसे जब बात नही होती किसी दिन ऐसे चुपचाप गुज़रता है सुनसान सा दिन एक सीधी सी बड़ी लंबी सड़क पे जैसे साथ-साथ चलता हुआ, रूठा हुआ दोस्त कोई मुँह फुलाए हुए, नाराज़ सा, ख़ामोश, उदास
और जब मिलता हूँ हँस पड़ता है ये रूठा हुआ दिन गुदगुदाकर मुझे कहता है, "कहो, कैसे हो यार"
मन बहुत उदास है आज सुबह से... पिछले कोई आठ दस साल से घर के सामने ख़ाली पड़े प्लॉट में एक नीम का पेड़ उग आया था... एक अजीब सा रिश्ता हो गया था उससे... बेनाम.. बेआवाज़... सिर्फ़ आँखों का रिश्ता.. अजब सा सुकून मिलता था उसे देख कर... जैसे घर का कोई बड़ा बुज़ुर्ग... आते जाते भले उसे ना भी देखूँ तो भी उसके होने का एहसास साथ रहता था... कितने ही दिन उसने माँ के आँचल कि तरह खिड़की से आती धूप को रोका और मेरी नींद नहीं टूटने दी... कितने ही दिन एक प्रेमिका कि तरह चाँद को अपने आग़ोश में छुपा के ज़िद पर अड़ गई आज कहीं नहीं जाने दूँगी तुम्हें.. आज तुम सिर्फ़ मेरे हो... मेरे चाँद... सिर्फ़ मेरे लिये चमकोगे... दुनिया में अमावास होती है तो हो जाये...
एक छोटे बच्चे से व्यस्क होते देखा उसे... बेहद घना और छायादार.. जाने कितने ही पँछियों का आशियाना बना हुआ था... दो कोयल भी रहती थीं उसपर... सारा दिन बोल बोल कर दिमाग़ खाती रहती थीं... वो कोयल अब न बोलेंगी... इन्सान ने एक बार फिर अपना आशियाना बनाने के लिये उनका आशियाना छीन लिया... क्या कोई सरकार उन्हें मुआफ्ज़े में नया आशियाना देगी... वो मासूम तो हम इंसानों कि तरह अपने हक़ के लिये लड़ भी नहीं सकते...
अब तक उस नीम की चीख सुनाई दे रही है... कैसे कराह रहा था बेचारा जब एक एक डाल काट कर उसके तने से अलग करी जा रही थीं... उसकी ख़ाली करी हुई जगह पर कुछ ही दिनों में एक नया कंक्रीट का आशियाना बन जायेगा... नये लोग बस जायेंगे... एक बार फिर वो जगह आबाद हो जायेगी.. हम भी भूल ही जायेंगे उस नीम को कुछ दिनों में... आख़िर एक पेड़ ही तो था बस... यही दुनिया है... डार्विन ने सही कहा था.. "सर्वाइवल ऑफ़ दा फिटेस्ट"... अंत में ताकतवर ही जीतता है... उसे ही हक़ है इस दुनिया में रहने का...
दोस्त अक्सर मुझसे कहते हैं... तुम सोचती बहुत हो... स्टॉप बीइंग सो इमोशनल... बी प्रैक्टिकल यार !!
कभी कभी लगता है वो सही कहते हैं...
हमें पेड़ों की पोशाकों से इतनी सी ख़बर तो मिल ही जाती है
बदलने वाला है मौसम...
नये आवेज़े कानों में लटकते देख कर कोयल ख़बर देती है
बारी आम की आई...!
कि बस अब मौसम-ऐ-गर्मा शुरू होगा
सभी पत्ते गिरा के गुल मोहर जब नंगा हो जाता है गर्मी में
तो ज़र्द-ओ-सुर्ख़, सब्ज़े पर छपी, पोशाक की तैयारी करता है
पता चलता है कि बादल की आमद है!
पहाड़ों से पिघलती बर्फ़ बहती है धुलाने पैर 'पाइन' के
हवाएँ झाड़ के पत्ते उन्हें चमकाने लगती हैं
मगर जब रेंगने लगती है इन्सानों की बस्ती
हरी पगडन्डियों के पाँव जब बाहर निकलते हैं
समझ जाते हैं सारे पेड़, अब कटने की बारी आ रही है
यही बस आख़िरी मौसम है जीने का, इसे जी लो !
बारिशें सिर्फ़ बारिशें कहाँ होती हैं... वो अक्सर हमारी कैफ़ियत का आइना होती हैं... हम ख़ुश होते हैं तो वो भी ख़ुशी से नाचती झूमती लगती हैं... हम उदास होते हैं तो वो भी कुछ उदास सी बरसती हैं.. गोया बादल का भी दिल भर आता है कभी और फफ़क के रो पड़ता है वो छोटे बच्चों कि मानिंद... कहीं किसी ज़रूरी काम से जाना हो और बारिश रुकने का नाम ना ले तो कैसी खीज सी उठती है... दिल करता है डांट दें उसे ज़ोर से कि कोई और काम नहीं है क्या.. जाओ जा के कहीं और बरसो... और दिल ख़ुश होता है तो बरबस ही गुनगुनाने लगते हैं "फिर से आइयो बदरा बिदेसी तेरे पंखों पे मोती जड़ूँगी..."
जब हम किसी के प्रेम में होते हैं तो उसके साथ बीते हुए लम्हों की वो बे-हिसाब यादें भी बरसती हैं बारिश में... हम दोनों बाहें फैला के ख़ुशी से लिपट जाते हैं उन रिमझिम बरसती बूंदों से और वो भी प्यार से चूम के हमें गले लगा लेती हैं जैसे सिर्फ़ हमारे लिये बरस रही हों... हमें ख़ुश करने के लिये...
बरसात के इस मौसम से जाने कैसा रिश्ता है... बचपन से ही... जब काग़ज़ की कश्तियाँ तैराया करते थे घर के बाहर भर गये मटमैले बरसाती पानी में.. और दूर तलक उसे तैरते हुए जाते देखते थे... कोई डूब जाती ज़रा दूर जा के तो दिल कैसे भर आता था जैसे काग़ज़ की नहीं सच की नाव हो... "प्लीज़ भगवान जी! ये बारिश मत रोकना आज... इसे और तेज़ कर दो..." सुबह सुबह स्कूल के टाइम पर करी हुई ये मासूम इल्तिजा आज भी याद आती है... और वो "रेनी डे" की तमाम छुट्टियाँ भी, जब भगवान जी को हम बच्चों पे तरस आ जाया करता था और सारा दिन बस धमा-चौकड़ी करते और काग़ज़ की नाव तैराते बीतता था...
कॉलेज के दिनों को याद करें तो यूनीवर्सिटी की कैंटीन, चाय-पकौड़ी, दोस्त और अनगिनत गप्पें... सारा-सारा दिन... रेन कोट होते हुए भी बारिश में भीगते हुए घर आना... मम्मी का डांटना... और हमारा मुस्कुरा के बस इतना ही कहना कि अब तो भीग ही लिये...
और एक आज का समय है... ऑफिस के कमरे में बैठे हुए कब सुबह से शाम हो जाती है पता ही नहीं चलता... बारिशों का पता अब अक्सर घर लौटते वक़्त गीली सड़कों से लगता है... जाने कब बादल आते हैं और बरस के चले भी जाते हैं... शायद आवाज़ लगाते होंगे आज भी... पर ऑफिस की दीवारों को भेद के अन्दर तक नहीं पहुँचती अब उनकी आवाज़... ना ही अब खिड़कियों पे बूंदों से वो संदेसे लिख के जाती हैं कि बाहर आ जाओ मिल के भीगते हैं... उफ़... "छोटी सी कहानी से, बारिशों के पानी से, सारी वादी भर गई... ना जाने क्यूँ दिल भर गया... ना जाने क्यूँ आँख भर गई..."
बारिश के इन मुख्तलिफ़ रंगों को गुलज़ार साब के साथ-साथ और बहुत से शायरों ने बड़ी ही ख़ूबसूरती के साथ अपनी नज़्मों में क़ैद करा है... तो बरसात के इस मौसम में उछाल रही हूँ बारिश की कुछ बूँदें आपकी ओर भी... अपनी कैफियत के हिसाब से कैच कर लीजिये और हो जाइये सराबोर बारिश के इन तमाम रंगों में...
बारिश आती है तो मेरे शहर को कुछ हो जाता है
टीन की छत, तर्पाल का छज्जा, पीपल, पत्ते, पर्नाला
सब बजने लगते हैं
तंग गली में जाते-जाते,
साइकिल का पहिया पानी की कुल्लियाँ करता है
बारिश में कुछ लम्बे हो जाते हैं क़द भी लोगों के
जितने ऊपर हैं, उतने ही पैरों के नीचे पानी में
ऊपर वाला तैरता है तो नीचे वाला डूब के चलता है
खुश्क था तो रस्ते में टिक टिक छतरी टेक के चलते थे
बारिश में आकाश पे छतरी टेक के टप टप चलते हैं !
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पानी का पेड़ है बारिश
जो पहाड़ों पे उगा करता है
शाखें बहती हैं
उमड़ती हुई बलखाती हुई
बर्फ़ के बीज गिरा करते हैं
झरने पकते हैं तो झुमकों की तरह
बोलने लगते हैं गुलिस्तानों पर
बेलें गिरती हैं छतों से...
मौसमी पेड़ है
मौसम में उगा करता है !
कार का इंजन बन्द कर के
और शीशे चढ़ा के बारिश में
घने-घने पेड़ों से ढंकी "सेंट पॉल रोड" पर
आँखें मींच के बैठे रहो और कार की छत पर
ताल सुनो तब बारिश की !
गीले बदन कुछ हवा के झोंके
पेड़ों कि शाखों पर चलते दिखते हैं
शीशे पे फिसलते पानी की तहरीर में उँगलियाँ चलती हैं
कुछ ख़त, कुछ सतरें याद आती हैं
मॉनसून की सिम्फ़नी में !
-- गुलज़ार
गुलज़ार साब की आवाज़ में बारिश के कुछ और रंग -
इंदिरा वर्मा जी की आवाज़ में "पिछली बरसात का मौसम तो अजब था जानां.."
[ प्रिया की "स्पेशल रिक्वेस्ट" पर नज़्म के बोल जोड़ रही हूँ पोस्ट में :-) ]
पिछली बरसात का मौसम तो अजब था जानां
शाख़ दर शाख़ चमकती थी सुनहरी किरणें
भीगे सूरज से सराबोर थी तजदीद-ए-वफ़ा
और बादल से बरसती थी मोहब्बत कि घटा
रूह में रूह का एहसास हुआ करता था
पैराहन फूल कि मानिंद खिला जाता था
दिल का अरमान फिज़ाओं कि मधुर दुनिया में
ऊँचे पेड़ों कि बुलंदी से गुज़र जाता था
जाने वो किसका था एहसान सर-ए-इश्क़-ए-नियाज़
छनछनाती हुई बूंदों में छुपा था सरगम
शोर करती हुई चलती थीं हवाएँ हरदम
बर्क चमके तो बदलता था फिज़ा का नक्शा
दोनों हांथों से छुपाती थी मैं अपना चेहरा
मुझको तन्हाई में बरसात डरा देती थी
बेसबब ख़्वाब के पहलू में सुला देती थी
अबके जब आये रुपहला सा सुहाना मौसम
ख़्वाब के साथ हक़ीक़त में उतर जाना तुम
ऐसा चेहरे पे मोहब्बत का सजाना गाज़ा
बूँद बारिश कि जो ठहरे तो बने इक तारा
तन्हां तन्हां ना रहे दिल मेरा
जानां जानां...
-- इंदिरा वर्मा
जाते जाते बारिश का एक रंग ये भी... ये बारिशें बहुत मुबारक़ हों आप सब को !
जाड़ों की नर्म धूप और आँगन में लेट कर
आँखों पे खींच कर तेरे आँचल के साये को
औंधे पड़े रहें कभी करवट लिये हुए
दिल ढूंढता है फिर वो ही फ़ुर्सत के रात दिन...
-- गुलज़ार
ओस की बूंदों को बींधती सुबह की धूप आजकल अच्छी लगने लगी है... शाम की हवाएँ फिर से सिहराने लगी हैं... गुलाबी सर्दियाँ एक बार फिर दस्तक देने को हैं... ये सर्दियाँ बचपन से ही हमारी फ़ेवरेट रही हैं... कुछ है इन सर्दियों के मौसम में जो बहुत "फैसिनेट" करता आया है हमेशा से ही... वो सुबह के कोहरे से झाँकती पीले गुलाब की नर्म पंखुड़ियाँ... हरी-हरी घास पर चादर से बिछे सफ़ेद नारंगी हरसिंगार के फूल... और उस पर चमकीले मोतियों सी सजीं ओस की शफ्फाफ़ बूँदें... सब कुछ बेहद ख़ूबसूरत लगता है... एकदम "मिस्टिकल" सा... आत्मा तक ठंडक पहुंचाता हुआ...
सुबह-सुबह शॉल लपेटे हुए ओस से सजी घास पर नंगे पैर टहलना और हवा का हौले से आपके गालों को चूमते हुए गुज़रना और फिर आपके बालों में ग़ुम हो जाना... बड़ा प्यारा सा एहसास भर देते हैं आपके भीतर... मीठा-मीठा... कुछ रूमानी सा... सर्दियों की सुबह नीम के पेड़ से छन के आती धूप की महक भी कुछ ऐसी मीठी हो जाती है मानो माँ ने अभी-अभी नन्हें को नहला के जॉनसन्स बेबी पावडर लगाया हो... बिलकुल नर्म मुलायम भीनी सी महक... आपको एकदम तरोताज़ा करती हुई...
सर्दियों के साथ बड़ी सारी यादें जुड़ी हैं बचपन की... जैसे दोपहर को छत पे बैठ कर कॉलोनी की सभी महिलाओं (आंटियों) का मूंगफली खाते हुए गप्पे मारना और हम बच्चों का सारी दोपहर धमा चौकड़ी करना... या फिर शाम को दादी का अलाव जलाना और हम सब भाई बहनों का उसके चारों ओर बैठ कर दादी से भूत और जिन्न वाली कहानी सुनना और फिर डर के मारे वहीं दुबके रहना अम्मा की गोद में... और हाँ उस अलाव में आलू भून के खाना हरी धनिया के नमक के साथ :)
कुछ आदतें हैं जो बचपन से आजतक वैसी की वैसी हैं... जैसे आज भी ऑफिस से वापस जा कर एक ही रजाई में घुस के बैठना भाई के साथ और फिर एक दूसरे को ठन्डे-ठन्डे पैर छुआ के लड़ना... "मम्मी देख लो इसे... ठन्डे पैर लगा रहा है... ओफ़्फ़ो सारी रजाई क्या तुम ही ओढ़ोगे... देखो हमारी तरफ़ से हवा आ रही है... तुम अपनी रजाई उठा के लाओ... नहीं ये मेरी है तुम लाओ जा के अपनी..." कितनी मज़ेदार लड़ाई होती है ना... सोच के ही हँसी आ रही है... :) उस प्यारी सी नोक झोंक का मौसम एक बार फिर आ रहा है...
सर्दियों के बारे में एक चीज़ और हमें बेहद पसंद है... वो है उसकी रहस्यमयिता... धुँध में ढकी छुपी सड़कें कितनी रहस्यमयी सी मालूम होती हैं... ना आगाज़ का पता ना अंजाम का... जाने कहाँ से आती हैं... ना जाने कहाँ को जाना है... बस चले जाती हैं... अनजान मुसाफ़िरों की तरह... हाँ ऐसी धुँध भरी सर्दियों की शाम जब लैम्प-पोस्ट की लाइट बड़ी मुश्किल से धुँध को चीरती हुई धुंधली सी रौशनी बिखेर रही हो... साँस लो तो मुँह से भी धुआँ निकले... ऐसे में हमें आइसक्रीम खाना बेहद पसंद है :)
सब्ज़ पत्ते धूप की ये आग जब पी जाएँगे
उजले फर के कोट पहने हल्के जाड़े आएँगे
गीले-गीले मंदिरों में बाल खोले देवियाँ
सोचती हैं उनके सूरज देवता कब आएँगे
सुर्ख नीले चाँद-तारे दौड़ते हैं बर्फ़ पर
कल हमारी तरह ये भी धुंध में खो जाएँगे
दिन में दफ़्तर की कलम,
मिल की मशीनें सब हैं हम
रात आएगी तो पलकों पे सितारे आएँगे
दिल के इन बागी फ़रिश्तों को सड़क पर जाने दो
बच गए तो शाम तक घर लौटकर आ जाएँगे
पिछले तकरीबन डेढ़ सालों की ब्लॉगिंग में ना जाने कितनी ही बार गुलज़ार साहब की नज्में आप सब के साथ बांटी... अब तक तो हमारा गुलज़ार प्रेम जग ज़ाहिर हो चुका है :) ख़ैर... अभी हाल ही में एक ख़ज़ाना हाथ लगा तो सोचा हमारी तरह ही ना जाने कितने गुलज़ार साहब के मुरीद हैं तो उन सब के साथ उस ख़ज़ाने को साँझा कर लूँ...
अब आप सोच रहे होंगे की ये किस ख़ज़ाने की बात कर रहे हैं हम... तो सुनिये... हुआ यूँ कि एक दिन यूँ ही गूगलिंग कर रहे थे :) अभी कुछ दिन पहले ही और ये हाथ लग गया... कहने को तो ये वर्ष 2010 का कैलेंडर है... अब आप सोचेंगे की यहाँ साल ख़त्म होने को आया और हम अब कैलेंडर की बात कर रहे हैं और उसे पा कर इतने ख़ुश हो रहे हैं... तो भईया राज़ की बात ये है की उस कैलेंडर में हर महीने के लिये गुलज़ार साहब ने एक ख़ास नज़्म लिखी है... जो हमने तो पहली बार ही पढ़ी हैं... कुछ एक तो बस कमाल हैं... बेहद ख़ूबसूरत तरीके से बेजान चीज़ों में जान फूंकी है गुलज़ार साब ने...
ये कैलेंडर मुझे मिला फोटोग्राफर विवेक रानाडे की वेबसाइट पर... चुराया नहीं है "डाउनलोड फ्री स्टफ़" में मिला :) इस कैलेंडर के लिये नज्में जैसा हमने अभी बताया लिखी हैं गुलज़ार साब ने, फोटोग्राफी है विवेक जी की और उन नज़्मों को ख़ूबसूरत तरीके से सजा के लिखा है कलिग्रफर अच्युत पलव जी ने...
लीजिये आप भी पढ़िये... देखिये... महसूस कीजिये और संजो लीजिये...
कैलेंडर की शुरुआत होती है गुलज़ार साहब की इस नज़्म से -
ये भी साल जमा कर लो २०१०
अकबर का लोटा रखा है शीशे की अलमारी में
रना के "चेतक" घोड़े की एक लगाम
जैमल सिंह पर जिस बंदूक से अकबर ने
दाग़ी थी गोली
रखी है !
शिवाजी के हाथ का कब्जा
"त्याग राज" की चौकी, जिस पर बैठ के रोज़
रियाज़ किया करता था वो
"थुन्चन" की लोहे की कलम है
और खड़ाऊँ "तुलसीदास" की
"खिलजी" की पगड़ी का कुल्ला...
जिन में जान थी, उन सब का देहांत हुआ
जो चीज़ें बेजान थीं, अब तक ज़िन्दा हैं !!
-- गुलज़ार
(कैलेंडर के सभी फोटो को बड़े साइज़ में देखने के लिये फोटो पर क्लिक करें और पॉप-अप विंडो को अलाऊ कर दें)
जनवरी -
(कैमरा)
सर के बल आते थे
तस्वीर खिंचाने हम से
मुँह घुमा लेते हैं अब
सारे ज़माने हम से
अपने बारे में क्या बताऊँ आपको, नवाबों के शहर लखनऊ में पली बढ़ी एक आम लड़की हूँ, a software engineer by profession... लेखिका नहीं हूँ सो शब्दों से खेलना नहीं आता, पर सराहना ज़रूर आता है और ज़िन्दगी की छोटी छोटी चीज़ों में खुशियाँ तलाशना आता है... बच्चों की मासूम किलकारी, फूलों की ख़ुश्बू, प्रकृति की शान्ति, रंग बिरंगी तितलियाँ, हवा में उड़ते गुब्बारे, बारिश की बूँदें, मिट्टी की सौंधी सी महक... बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेते हैं... i believe, with all its complications and uncertainties, life is still beautiful and worth living... u just have to face it with a positive attitude and take everything in ur stride !!
अच्छा लगता है न जब आपका लिखा कुछ लोगों तक पहुँचे... ख़ासकर उन लोगों तक जिनका आना जाना ब्लॉग और इन्टरनेट की इन तकनीकी गलियों में नहीं है... वो, जिनके लिए पढ़ने का ज़रिया आज भी अखबार और किताबें ही हैं... तो बेशक़ हमारे लिखे को उन लोगों तक पहुँचाइये... अगर हमारा लिखा इस लायक है... हाँ एक चिट्टी हमारे पते पर भी ज़रूर छोड़ते जाइये... थोड़ा सा हम भी ख़ुश हो लें !